​Post independence in process of nation building, Textile industry of Kanpur achieved new extremum. profit made from this industry has been parked to run other profitable business. Over the process of time machinery has been not upgraded and technical advanced has not been opted by mills owners and slowly by 1960 these textile mills became non-profitable. 1968 government formed " Nation textile corporation and with 16 mills it started process of overhauling but no avail, by 1974 116 companies came under banner of NTC. in 1981 British India corporation has been taken over by India government, and Lalimli and Dhariwal mills where profitable till 1989. post nationalization bureaucracy taken a toll on mill. Government made several policies but they fallen flat due to lack of practical approach. Mills are not closed formally till now. Lal-imli is still running with almost 1800 employees in place.

​Post independence in process of nation building, Textile industry of Kanpur achieved new extremum. profit made from this industry has been parked to run other profitable business. Over the process of time machinery has been not upgraded and technical advanced has not been opted by mills owners and slowly by 1960 these textile mills became non-profitable. 1968 government formed " Nation textile corporation and with 16 mills it started process of overhauling but no avail, by 1974 116 companies came under banner of NTC. in 1981 British India corporation has been taken over by India government, and Lalimli and Dhariwal mills where profitable till 1989. post nationalization bureaucracy taken a toll on mill. Government made several policies but they fallen flat due to lack of practical approach. Mills are not closed formally till now. Lal-imli is still running with almost 1800 employees in place.

सांस्कृतिक चोटी बनाम अपभ्रंश चोटी और चोटीकटवा

अजीब संकट है मार्केट में, सभ्रान्त घरों की महिलायों की चोटी नयी होती संस्कृति ने काट दी। बाकी की चोटी कटवा काट रहा है। चोटी का कटना आधुनिकता का प्रतीक सा है किन्तु यहाँ बात अलग है, गहरा मातम पसरा है, जबकि यहाँ जश्न का माहौल होना चाहिये था :)

नज़र थोड़ी बड़ी करके देखे तो लगता है चोटीकटवा का उद्देश्य चोटी काटकर के India और भारत के बीच के सांस्कृतिक फर्क को ख़तम करना है। वो अपराधी नहीं साँस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तक है। 

आज के करीब 17-18 साल पहले मैंने एक कविता लिखी थी, चोटी के कटते जाने पर मुखड़ा प्रस्तुत है, पूरी याद भी नही, लिखूँगा भी नही, नही तो नारी विरोधी घोषित किये जाने का खतरा होगा :)
" कट गई लम्बी छोटी पिछड़ गया कुर्ता सलवार
देखो यारो कैसी आयी टीशर्ट जीन्स की बयार
एक हाथ मे छाता है एक हाथ मे पर्स टँगा
इनकी फ़ोटो ले ले कर आज हर अखबार छपा
.............."
इस कविता को मैं 2001 में मालवीय की फ्रेशर पार्टी में सुना रहा था की सदन में हंगामा बरप गया, यकीन मानिये उस दिन भरी सभा मे मुर्गा बनते-बनते बचा, सभा में उपस्थित लगभग सभी लड़कियों(सीनियर्स) ने वाक-आउट कर दिया। नारी विरोधी होने का तमगा तो माथे पर चिपक ही गया .....
आज देखिये चोटियां काट रही है कोई विरोध नही है :)
"चोटीकटवा आया था, चोटी उसकी काट गया,
बची खुची संस्कृति को दो हिस्सों में बात गया"

भूखा मुँहनोचवा....

शहर में खौफ पसरा था, अखबार के दफ्तर के फ़ोन घनघनाने का सिलसिला थमता ही नही था। मुँह नोचने के अनवरत होते हमलों की खबरें अखबार में छायी थी। सूरज ढलते ही लोग दहलीज जे भीतर शरणागत होते, कुछ रंगबाजी करने के चक्कर मे छतों पर मंडराते।

विशाल, इस मुद्दे पर स्टोरी लिख रहा था। कलम मुँह में दबाये सोचता उन लोगो के बारे में जो शिकार हुये, आखिर  मुँह नोचवा केवल उन्ही इलाकों में क्यों नोचता है, जहाँ कम पढ़े लिखे लोग रहते है, कभी रईसों की बस्ती में क्यों नही जाता?? आर्य नगर, स्वरूप नगर, में कोई घटना नही अधिकतर घटनाएं ब्यस ग्वालटोली, बजरिया, सुतरखाना में क्यों? मैं तो रात दो बजे घर जाता हूँ दफ्तर से 10 किलोमीटर चल कर मुझे क्यों नही मिलता मुँह नोचवा!!!

जहाँ देवी आती है वही मुँह नोचवा भी आता है आखिर क्या कारण है, क्या अशिक्षा ही इस तरह के भ्रमो का कारण है???.... कि अचानक दफ्तर का फ़ोन कान बजाने लगा। विशाल ने फोन उठाया, ... जागरण से बोल रहे,....सुतरखाना से रामदीन बोल रहे है,  हमने मुँह नोचवा को धर लिया, जबर हौका है ससुरे को, ......निपट ही जायेगा।

मुँह नोचवा मारा गया की खबर आम थी, दूसरे दिन मुँहनोचवा की पोस्टमार्टम रिपोर्ट छपी दो दिन से भूखा था, मुँहनोचवा, ओड़िसा के कालाहाण्डी का था, रोजगार की तलाश।में कानपुर आया था।

कानपुर का हाहाकारी मुँहनोचवा !!!

जैसे आजकल चोटी कटवा का सुर्रा चलायमान है उसी तरह 12-13 बरस पहले कानपुर में "मुँहनोचवा" का प्रकोप हुआ था। दैया- दैया करके कई मोहतरमाएँ अटरिया से कूद गई। आस पड़ोस के लोग रात-रात भर छत आकर पहरा देने की जुगत भिड़ाते और जरा सा हल्ला मचते ही हवा हो जाते। अखबार के दफ्तरों में फोन की घण्टियाँ 24×7 बजती। कितनो का मुँह नुचा इसके पुख्ता सबूत कभी नही मिले। हाँ हफ्ते से ज्यादा समय माहौल में खौफ पसरा रहा। कुछ मामलात तो ऐसे थे की लोगो ने खुद ही अपने मुँह नोच डाले थे, ध्यानाकर्षण हेतु  .....कानपुर पुलिस मुँहनोचवा की सच्चाई का पता कभी नही लगा पायी।....