तकनीकि के जंगल में डार्बिन जिन्दाबाद।

जैसे -जैसे तकनीकि तार से बेतार हुयी, रफ्ता-रफ्ता हम एक विधुतचुम्बकीय तरंगो की सभ्तया बन गये है। सूरज के प्रकाश पुँज के अलावा चारों तरफ हवाओं और फिजाओं में विधुत तरंगे लहराती फिरती है। जिस तरह मकड़ी अपने रहने चलने और जीने के लिये अपना जाल बनाती है। उसी तर्जोअंदाज़ में रोज-रोज पैदा होती इंसानी जरूरतों का कारोबार मानवीय सभ्यता को बेतार/विधुतचुम्बकीय तरंग सभ्तया बनाता है। 

तकनीकि के घने जंगल में रोज नयी करिश्माई भाषाएँ विधियाँ जन्म लेती है।  किन्तु डार्बिन का सिद्धान्त स्वतः ही एक तकनीकि की चरित्र हत्या दूसरी तकनीकि से करा देता है। ये दौर अनवरत चलता जाता है। आज के दौर में 2G डाटा को एक बार देखे और सोचे लगेगा मानों कितना बोरिंग टाइप का आइटम सांग था। आज के 4G की चमक दमक के सामने कितना तुच्छ टाइप लगता है। 

कैथोड रेज़ टीवी की ट्यूबनुमा लम्बी पाइप लाइन भला कभी दीवार में चिपक पाती? अब देखिये ना दीवार चिपकू टीवी हाहाकारी छायाचित्रों के साथ कितनी आसानी से उपलब्ध है। जब जरा सोचिये बाहुबली क्या वाकई लग पाता कैथोड रेज़ टीवी में, कट्टपा की भारी आवाज से ही टीवी की पिक्चर ट्यूब ही फट लेती। 

कुल मिलाकर डार्बिन के सिद्धांत का भूत एक तकनीकि को खाता दूसरे को उगाता है और हमे अस्थायी तौर पर कमोवेश आधुनिक होने का भरम देता है। कल वो हवा होगा। 
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