पर भौकाली पेल रहे ....

दफ्तर दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है
अपने शहर का छोड़ बसेरा
बंजारों से घूम रहे है ।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

पेट है पापी तन है याची
मजदूरी है भारत व्यापी
सुबह सवेरे, देर शाम तक
नथे बैल से झेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

भागदौड़ और मारामारी
दफ्तर में बन गये दरबारी
धर्म लुटा ईमान लुटा है
पर भौकाली पेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

@विक्रम


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