जिसपे नामजद थाने में कई FIR है...

वो सुशासन का वादा कर गया सबसे
जिसपे नामजद थाने में कई FIR है।

हवा भी नहीं है,डेमोक्रेसी क्या बला है?
वो सर झुकाकर मत माँगने को तैयार है।

कल चलाता था गोलियां अपने हाथ से
आज सियासत उसकी लूट का औजार है।



@विक्रम 

नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय

उस दौर में जब संस्कृति का संक्रमण गम्भीर मुद्दा है। पाश्चात्य और प्राचीन के बीच रस्साकशी का दौर जारी है। जब "सन्त वेलेंटाइन" और प्रेम के मूर्त रूप "दशरथ माँझी" के तौर-तरीको और उपलब्धियों पर चर्चा होती है। जब युवायों की नयी फसल, संस्कृति के रक्षको से निरन्तर संघर्षरत है । संस्कृतियों के संक्रमण में प्रेम सबसे चर्चित विषय है। ऐसे में इस विषय पर बात भी जरूरी हो चलती है। ऐसा ही एक सफल प्रयास 18 FEB -17 "@परिवर्तन साहित्यिक मँच" के तत्वाधान में हुआ। जहाँ पर प्रेम के विविध रंगों, आयामों और विधायों को उकेरती, चिन्तन करती , उनके सामाजिक प्रभाव और सरोकारों की बात करने वाली रचनाये प्रस्तुत की गयी। जहाँ से समाज को "मुहब्बत की तासीर मुहब्बत" ही होने का सन्देश दिया गया। जहाँ साहित्य की दुनिया के वरिष्ठ हस्ताक्षर थे और नवोदित भी। जहाँ सुरमयी शाम थी और ज्ञान गंगा भी। जहाँ सामाजिक सरोकार भी थे और गम्भीर चिंतन भी। ऐसे "परिवर्तन साहित्यिक मँच" में मँच संचालन का जिम्मेदारी भरा दायित्व और काव्य पाठ करने की गरिमामयी अनुभूति के साथ कुछ तस्वीरे साझा कर रहा हूँ। टीम परिवर्तन के मित्रो बन्धुयो और वरिष्ठों के प्रति हार्दिक। आने वाले समय में नयी ऊँचाईयो को छूने के शुभकामना साथ। तस्वीरों के लिये Omendra भाई को विशेष आभार के साथ।
मुहब्बत की चाशनी में रिश्तों को पकाया जाय
नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय
मुहब्बत में मायनों को फिर से जगाया जाय ........

@विक्रम 






मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा...

मुहब्बत डे पर विशेष पेशकश.....

घर से अक्सर फरार सा लगा
मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा

मन में ख्वाब, हाथों में गुलाब
लड़का बड़ा अदबदार सा लगा

टिपटॉप हो के निकला था घर से
लौटा तो खर्च हुयी पगार सा लगा

शेरों शायरी सब सीख लिया उसने
जलेबी में सने अखबार सा लगा

रात चाँद तारों को ताकता रहा
इश्क़ का कीड़ा जोरदार सा लगा

खोल रखे है दिल के रोशनदान उसने
किसी साये का तलबगार सा लगा

दिल हार आया मुहब्बत के मैदान में
कभी खुश तो कभी बीमार सा लगा

बारहा इतराता है आईने के सामने
किसी काबिल अदाकार सा लगा


@विक्रम

Jindagi Siyasat ke Shmaiyane me- जिन्दगी, सियासत के शामियाने में

व्यंगात्मक कवितायें :
पाठक के मन को गुदगुदाती, व्यवस्था और राजनीति, सामाजिकता पर तंज कसती कवितायें

संजीदा कवितायें :
कवितायें जो रिश्तों​​ के बदलते मायने को टटोलती है, कवितायें जो आधुनिकता के मकड़जाल में फसते जाते सामजिक सरोकारों को खोजती है। जो नयी दोस्ती में पुरनेपन को खोजती है।
आधुनिक कवितायें :
आपाधापी भरी जिन्दगी में ,भूमण्डलीकरण के दौर में माँ,बाप, मायने तलाशती, बदबूदार होती सियासत, और महकते चहकते सियासतदारों, धर्म और अधर्म के बीच झूलती इन्सानियत को तौलती मापती कवितायेँ


ग़ज़लें:
सामान्य आदमी के जीवन में परत दर परत झाँकती, किसानों,कामगारों की बात करती ग़ज़लें, उस बुधिया की बात , जिसके कभी भीड़ आकर मार जाती है, कभी गाँव में वही बुधिया तहसीलदारों ​​ के​ दबाव में बिखर जाता है, शहर में सब्जी की दुकान लगते जिसे पुलिस जीने नहीं देती उसी बुधिया, और उसके सरोकारों , रिश्तों, उसके योगदान, बात करती ग़ज़लें।

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है ..

आने वाले "मुहब्बत डे" मौके पर "मुहब्बत मैनो" को समर्पित  ...... 

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है 
शहरी वाली सजधज कर  कैफे कॉफी डे में बैठी 
हो लो टिपटॉप तुम भी अब लगाकर Fogg देखो
जो विलायत वाली है किसी के इंतज़ार में बैठी है। 
  

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है

मुहब्बत का महीना आ चुका है ,बस तारीख आनी बाकी है।  ऐसे में केवल ये बताने की कोशिश है कि मुहब्बत केवल महबूब और महबूबा की कॉपीराइट नहीं है। मुहब्बत हर जगह हर तरह है। ..... मुहब्बत वो भी है जो नेता कुर्सी से करता है। जो किसान हल से करता है। जो जवान अपने कर्तव्य से करता है।

सियासत की पतंगे है उड़ाई जिन जनाबों ने 
कि सत्ता संग सगाई है रचाई साहबों ने 
जिनके दम पे मातम है गिरिजाघर, शिवालों में 
दिल्ली उन्ही के अदब में सर नावती है
मिलते ही मौका बाँहों में झूल जाती है।

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है 
सावन और भादव में ख़ुशी के गीत गाती है 
हरियाली ही हरियाली है फसले लहलहाती है 
गौरैया फिर से पेड़ो पर अविरत चहचहाती है 
चौपालों देहातों में गाती और बजाती है। 

सीमा पर जवानों की शहादत ही मुहब्बत है
धरती और माटी की इबादत ही मुहब्बत है
घर में माँ, बहनों की दुआएं  ही मुहब्बत है
बुजुर्गों का स्नेह,आसीष ही मुहब्बत है
हवायों में मुहब्बत है फ़जायो में मुहब्बत है।


+Vikram Pratap Singh Sachan