थोड़ी बारिश हुयी, सड़क धँस गयी

थोड़ी बारिश हुयी, सड़क धँस गयी
विकास की टाँग गड्ढे में फँस गयी।

गाय तो निकल गयी पानी में तैरकर
आदमी की कश्ती नाले में सरक गयी।

झुग्गियों में रात भर रिसता रहा पानी
जिन्दगी कुछ यूँ आदमी पे हँस गयी।

@विक्रम
             

लघु कथा: कलुआ

कलुआ को आज पुलिस फिर उठा ले गयी। कल प्रधान जी के टूबवेल से मोटर चोरी हुयी थी। पुलिस ने बिना  किसी मुकद्मे के फिर कलुआ २ दिन जेल रखा। साथ ही साथ थर्ड डिग्री भी। लौटते हुये चलना मुश्किल था। पुलिस की मार आदमी को खोखला कर देती है!! कलुआ महसूस कर रहा था।

जब से कलुआ का पानी लगाने के चक्कर में प्रधान से विवाद हुआ तब से मानों कलुआ ने पूरे सरकारी तंत्र से पंगा ले लिया हो। चकबन्दी में उसकी सड़क किनारे वाली जमीन का टुकड़ा भी बेच में कर दिया गया। समाज में रोज की बदनामी अलग। "कलुआ चोर है" का नारा भी गाँव में बुलन्द हो गया था।  गाँव में उठना बैठना मुहाल हुआ।

बिस्तर पे पड़ा कलुआ अपनी बेबसी पर कुण्ठित होता जाता। सोचता की आखिर क्या करें कहाँ जाय कैसे लोगो को ये बताये की वो गलत नहीं। गलत तो प्रधान है। कुछ न कुछ तो कुछ करना भी पड़ेगा अब तो वो पुलिसकी हिट लिस्ट में आ चुका है।  बात बात पर पुलिस उठा लेती है।  इसी ऊहापोह में रात बिना किसी को बताये कलुआ उठकर खेतो की तरफ बढ़ चला। प्रधान में खेत और घर में आग लगा दी।  ........ रस्ते में भागते हुये सोचता था की ठीक किया अब गाँव में नहीं रहना ...... बीहड़ चलता हूँ।

बन्दूख तंत्र और बीहड़ के बागी 'ददुआ' के बहाने

'चम्बल' और 'चम्बल के बीहड़' मतलब खौफ का दूसरा नाम। चम्बल के बीहड़ों में बागियों का लम्बा इतिहास रहा है। अखबार की खबरों और दूसरेे कई माध्यमो से हमेशा चर्चा में रहे है और वहाँ पनाह पाने वाले बागी भी। इन बागियों को कुछ लोग डाकू भी कहते है!! किन्तु मैं इसके इतर सोचता हूँ। ये सवाल मेरे जहन में अक्सर आता है। कि आखिर क्यों अधिकतर बागी चम्बल में ही हुये? क्या चम्बल का पिछड़ापन या वहां पुलिस प्रशासन का बौनापन बागियों के जन्म का कारण है? या चम्बल का पिछड़ापन वहां के बागियों के कारण है?

'नक्सलवाद की उत्पत्ति' का 'बीहड़ के बागियों' से बुनियादी और सैद्धान्तिक जुड़ाव मेरे देखने का एक पहलू है। नक्सलवाद जहाँ भी  है वहां भी जबरदस्त पिछड़ापन है। कई रिपोर्ट, कई लेख इस बात का हवाला देते है की नक्सलवाद पिछडेपन और शोषण के विरुद्ध संगठित बगावत थी। पुलिस प्रशासन, सरकारी वादों से उठी आस्था के समानान्तर सत्ता थी। कुछ उसी तर्ज पर "चम्बल के बीहड़ो" का खूनी इतिहास भी है। चम्बल के बीहड़ो में समय के साथ शोषण के खिलाफ बगावत छोटे-छोटे गिरोहों ने की, हाँ ये गिरोह संगठित नहीं हो सके। अन्यथा देश नक्सलवाद की मानिन्द बीहड़वाद से भी एक छद्म लड़ाई लड़ रहा होता।

'चम्बल के बागियों' की दास्ताँ सुनिये उनकी पृष्ठभूमि खंगालिये तो बड़ी सरलता से ये देखा जा सकता है की अधिकतर मामलात में। तत्कालीन सामजिक ढाँचे "जिसकी लाठी उसकी भैंस" वाला ढाँचा। जहाँ सैड़कों गावों की जद  में एक पुलिस चौकी हुआ करती थी। वहाँ के दरोगा जी भी प्रभावशाली लोगो की जद में, उस पर गाँवों में जमीन जायदाद के मामलात में दीवानी के मुक़दमे फौजदारी में बदल जाया करते थे। उस समय फौजदारी अदालत में वकील नहीं लड़ते थे। खुद ही लड़नी पड़ती थी। ऐसे में 'बन्दूक तंत्र' का हावी होना लाजिमी था। एक बार आमने सामने की फौजदारी हुयी तो बस बागी होने के अलावा कोई चारा शायद ही बचता था।

बागी बनने के बाद 'बीहड़ में जिन्दा' रहने की कुछ अपनी मजबूरियाँ होती है जो यहाँ से हम देख सकते है। पुलिस और उनके मुखबिरों से मुकाबला, बदला पूरा करना, जीविका और हथियारों के लिये पूँजी का इन्तेज़ाम करना इत्यादि इत्यादि। बीहड़ में जितने भी नरसँहार हुये उनमें अधिकतर मामलात में पुलिस के मुखबिरों को डराने का प्रयास ही दिखा। 22 जुलाई 2007 को पुलिस मुठभेड़ में मारे गये, ३० साल तक बीहड़ों राज करने वाले "बागी ददुआ" ने ९ लोगों को एक गाँव में इसीलिये मारा चूँकि कुछ रोज पहले मुखबिरी के कारण पुलिस द्वारा घेर लिया गया था।  पुलिस मुठभेड़ में बच निकलने के बाद खौफ पैदा करने के लिये के गाँव के ९ लोगो को मार दिया। उसके २० वर्ष बाद भी शायद ही ददुआ का पता ठिकाना किसी ने पुलिस को बताया। मुरैना के बागी "पान सिंह तोमर" ने भी 10 -11 लोगो को एक साथ मार दिया वो भी पुलिस की मुख़िबरी के आरोप में खौफ पैदा करने की कोशिश थी। बीहड़ की एक और बागी 'फूलन देवी ' ने १९ लोगो को बेहमई में मारा उस मामले को फूलन के महीने तक बन्द कमरे में हुये बलात्कार का बदला ही माना गया।
 
 हालाँकि ये भी जाहिर है के सभी बागी कानून के अपराधी थे। किन्तु साथ ही साथ अपराधी प्रशासन भी था जिसने बन्दूख तंत्र को जन्म लेने दिया। जिसने समय पर न्याय दिलाने का कार्य नहीं किया। कारण  कुछ भी हो सकते है। न्याय तंत्र और सरकार से भरोसा उठा तो बागियों जन्म होना ही था। कुल मिलकर बागियों के भी मानवीय पहलू रहे। उन्होंने "बन्दूख तंत्र" से पाना न्याय खुद न्याय किया औरर बाद में पुलिस की गोली ने उनके साथ न्याय क्या किया।  बीहड़ में ३० साल राज करने वाले 'बागी ददुआ' को तो विंधायचल  में बहुत सारे लोग वहाँ का रॉबिनहुड भी कहते है। गरीबों की शिक्षा, बेटियों के सामूहिक विवाह इत्यादि का भी श्रेय उन्हें दिया जाता है। फतेहपुर के कबरहा में ददुआ का मंदिर भी है।   "पान सिंह तोमर" राष्ट्रीय खिलाडी थे बागी क्यों हुये ये हम सब जानते है। पान सिंह को भी बहुत मानने वाले थे प्रशंसक भी थे। वहीँ आज के परिपेक्ष में कई आधुनिक बागी जो नेता बन गये , सैकड़ो मुकदमे है पर संसद में बैठते है।  रफ्ता रफ्ता उनकी स्वीकार्यता हो गयी।  ये सामना भी जरूरी हो चलता है की बागी कोई जानबूझ कर नहीं बनता।  बागियों को सम्मान भले न दिया जाय , उन्हें स्वीकार भले न किया जाय किन्तु उनके मानवीय पहलू पर गौर जरूर किया जाय।

फिर मातम को, हुजूम जुटता रहा...

हम तमाशबीन रहे,शहर लुटता रहा
फिर मातम को, हुजूम जुटता रहा

सवाल है ये सँस्कारों और संस्कृति पर 
हर कोई दूसरे से उम्मीद करता रहा

नारे और सेमिनारें सब हवा हो गयी 
भ्रूण में लड़की हुयी गर्भ गिरता रहा

@vikram

गंगा जी में होता चल....

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

जब जन्मा तब था बनवारी
फिर ओढ़ी थी दुनियादारी
बहुत करी है झूठ पैरवी
अब तो सच्चा होता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

आयी देखो हनक करारी
छूट गयी हर रिश्तेदारी
खुद को अपने पास बिठा
कुछ पैबन्द तो सीता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

धर्म धर्म का राग जपा
सब गंगा पर लाद दिया
बहुत चढ़ावा चढ़ता आया
कुछ अच्छाई बोता चल 

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

मन मंतर हो माथे चन्दन
सर पे जटायें शंकर वाली
रख दे किनारे सारे झंझट
मार के हुक्का सोता चल

गंगा जी में होता चल
पाप पुराने धोता चल

Link of poem at youtube :
https://www.youtube.com/watch?v=Jv6JdNrMIMQ&feature=youtu.be

समीक्षा "जिन्दगी सियासत शामियाने में" डॉ गोरख प्रसाद मस्ताना द्वारा


दिल्ली से प्रकशित पत्रिका "डिफेंडर" में आदरणीय डॉ गोरखप्रसाद  मस्ताना जी  पुस्तक की समीक्षा लिखी।

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये .........

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये 

घर से निकले पहन सफारी
सलाम ठोकता हर व्यवहारी
लगा के किक, चढ़े बुलेट पर
थोड़ा चले, फिर फ्लाइट हो गये

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये

भैय्या जी का है टेम्पो हाई
कहते लोग उन्हें गुडडू भाई 
थे पहले-पहल वो बहुत धमकाते 
फिर थोड़ा सा लाइट हो गये 

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये

प्रेम रोग का काटा चुन्ना
मन है जपता ताता तुन्ना
टिनोपाल का लगा के तड़का
भैय्या जी चिकोलाइट हो गये

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये

लड़की ने मुस्का कर देखा 
नज़र आयी है उनमें  रेखा 
भाभी भाभी हो गया हल्ला  
लौड़े सारे डिलाइट हो गये

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये

शर्मा जी की बीवी पगली  
की भैय्या जी के घर चुगली 
बाप ने जब जूता चटकाया
पूरे बौड़म सल्फाइट हो गये

कि भैय्या!! कि कन्ने टाइट हो गये 

https://youtu.be/disfFbkKKis

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित 

लोकतन्त्र का बजा झुनझुना, अच्छे दिन दिखला देता है।।

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता  है
लोकतन्त्र का बजा झुनझुना
अच्छे दिन दिखला देता है।

बीघे को बालिश्तों में बेच ज्यूँ
बिल्डर मोटी रकम बना लेता है
कारोबारी हेर फेर में ज्यूँ बनिया
शक्कर, शुगर फ्री  बना देता है।

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता है

कॉर्पोरेट का सेल्समेन ज्यूँ
दिन में स्वप्न दिखा देता है
बीमा वाला कर्मी कोई ज्यूँ
पॉलिसी के गुण गिनवाता है

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता है

सात साल का छोटा बच्चा
ज्यूँ राज श्री चबा जाता है
गँजू गँजू कह कर जो
टकले पर थाप बजा जाता है

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता है

तन पे कपड़े भगवाधारी
हुक्का पिये धरा जाता है
गली का गुण्डा जैसे अब
पुलिस मुखबिर बन जाता है

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता है

पद, वर्दी का रौब झाड़ ज्यूँ
कोतवाल बैरंग लौटा देता है
पान चबाता कोई आदमी
पता गलत बतला देता है

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता

जैसे कोई छोटा बच्चा
सब कुछ बतला देता है
मोर कोई मस्त नृत्य में
अपने पँख गिरा देता है

राजनीति में मँझा खिलाड़ी
दिन में चाँद दिखा देता
@vikram

अहसास मर चुके है और रूह सो गयी है

किसी अनजान शायर की पेशकश है बजह फरमायें  ..... 

अहसास मर चुके है और रूह सो गयी है 
अफ़सोस आज दुनिया पत्थर की हो गयी है 

गाड़ी में कशमकश है सीटों के वास्ते अब 
वो पहले आप वाली तहजीब खो गयी है 

उसने नहीं उगाया अपनी तरफ से इसको 
बेवा के घर में मेहँदी बारिश से हो गयी है 

दुनिया के दौड़ में मैं फिर रह गया हूँ पीछे 
फिर मुफलिसी कदम की जंजीर हो गयी है 

 --------गुमनाम--------------

लघुकथा: राजनीति एक छलावा

राजनीति से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेकेंगे, क्या आप साथ देंगे? हम मिलकर लड़ेंगे अंतिम साँस तक लड़ेंगे, क्या आप साथ देंगे? नेता जी ऊर्जा से भरा भाषण देकर लाखों की भीड़ में ऊर्जा भर दी थी। हाथ उठा कर लोग जवाब दे रहे थे। हम साथ देंगे हाँ हम साथ देंगे।

अगले दिन पार्टी के कार्यालय में टिकटार्थियों की भीड़ सजी थी। कुछ नेता जी की विश्वस्त लोगो के साथ आये थे। कुछ कुछ अपने काम और समाज सेवा की दम पर। अपने क्षेत्र के नामी गिरामी रामसेवक मास्टर का नम्बर आया, बातचीत हुयी, राम सेवक ने अपने सामाजिक कार्यो कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाने के कई कार्यक्रमो के बारे बता क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा बतायी। अच्छा ठीक है आप निष्ठावान कार्यकर्ता है, अपना टिकट पक्का समझिये।

देखिये कल पार्टी फण्ड में 3 करोड़ जमा करा दीजिये।..... रामसेवक के पाँव के नीचे की जमीन खिसक गयी। साहब, हमारे काम ही हमारी पूँजी है, पैसा तो हमरे पास है ही नहीं!! हम तो सोचते थे हमारा नाम और काम देखकर पार्टी अपने खर्चे पर चुनाव लड़ाएगी, आपकी भ्रष्टाचार विरोधी बातों से प्रभावित होकर ही तो मैं पार्टी में आया। .... वो ठीक है रामसेवक जी पर देखिये पार्टी बजी तो चलानी है ये कार्यकर्ता जो नारे लगाते है इनका चाय पानी कहाँ दे आयेगा, कल तक जमा करा दीजिये, नहीं तो दूसरा प्रत्याशी घोषित कर दिया जायेगा....
रामसेवक समाज सेवा का, ईमान का बोझ काँधे ओर लादे चल पड़े।

पर भौकाली पेल रहे ....

दफ्तर दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है
अपने शहर का छोड़ बसेरा
बंजारों से घूम रहे है ।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

पेट है पापी तन है याची
मजदूरी है भारत व्यापी
सुबह सवेरे, देर शाम तक
नथे बैल से झेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

भागदौड़ और मारामारी
दफ्तर में बन गये दरबारी
धर्म लुटा ईमान लुटा है
पर भौकाली पेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

@विक्रम


तकनीकि के जंगल में डार्बिन जिन्दाबाद।

जैसे -जैसे तकनीकि तार से बेतार हुयी, रफ्ता-रफ्ता हम एक विधुतचुम्बकीय तरंगो की सभ्तया बन गये है। सूरज के प्रकाश पुँज के अलावा चारों तरफ हवाओं और फिजाओं में विधुत तरंगे लहराती फिरती है। जिस तरह मकड़ी अपने रहने चलने और जीने के लिये अपना जाल बनाती है। उसी तर्जोअंदाज़ में रोज-रोज पैदा होती इंसानी जरूरतों का कारोबार मानवीय सभ्यता को बेतार/विधुतचुम्बकीय तरंग सभ्तया बनाता है। 

तकनीकि के घने जंगल में रोज नयी करिश्माई भाषाएँ विधियाँ जन्म लेती है।  किन्तु डार्बिन का सिद्धान्त स्वतः ही एक तकनीकि की चरित्र हत्या दूसरी तकनीकि से करा देता है। ये दौर अनवरत चलता जाता है। आज के दौर में 2G डाटा को एक बार देखे और सोचे लगेगा मानों कितना बोरिंग टाइप का आइटम सांग था। आज के 4G की चमक दमक के सामने कितना तुच्छ टाइप लगता है। 

कैथोड रेज़ टीवी की ट्यूबनुमा लम्बी पाइप लाइन भला कभी दीवार में चिपक पाती? अब देखिये ना दीवार चिपकू टीवी हाहाकारी छायाचित्रों के साथ कितनी आसानी से उपलब्ध है। जब जरा सोचिये बाहुबली क्या वाकई लग पाता कैथोड रेज़ टीवी में, कट्टपा की भारी आवाज से ही टीवी की पिक्चर ट्यूब ही फट लेती। 

कुल मिलाकर डार्बिन के सिद्धांत का भूत एक तकनीकि को खाता दूसरे को उगाता है और हमे अस्थायी तौर पर कमोवेश आधुनिक होने का भरम देता है। कल वो हवा होगा। 

कहानियों का बहीखाता - "कितने रंग जिन्दगी के"

"कितने रंग जिन्दगी के" तेज प्रताप नारयण जी का पहला कहानी संग्रह है। 'तेज प्रताप नारायण जी' का कविता संग्रह 'अपने अपने एवरेस्ट' वर्ष 2015 के  'मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार (भारत सरकार प्रदत्त)' से पुरस्कृत है। 

इसके पहले उनके चार कविता संग्रह चुके है। उनकी किताब के बही खाते में कुल जमा 10 कहानियो की पूँजी है। जीवन के विविध आयामों को अपने आगोश में लेती कहानियों का संग्रह। एक तरफ कहानियों में किसान खूबीराम के घर का छप्पर है, कमोवेश वैसा ही परिवेश जो प्रेमचन्द जी की कहानियों मिलता है, जैसा की फणीश्वरनाथ रेणु  के लेखन में झलकता है। दूसरी तरफ शहरी जिन्दगी की आपाधापी है, भीड़ में अकेलेपन का जख्म है, सदैव आगे बढ़ने जाने का श्राप है। समाज की मान्यताओं और परम्पराओं को चुनौती देती नारी है। कुल मिलाकर कर कहानियो का बही खाता जिन्दगी की जमा पूँजी का जवानी से प्रौढ़ावस्था तक पूरा हिसाब करता है। किताब का प्रकाशक मानो वो मुनीम है जो रंग के नोट को बटोर कर नयी तिजोरी भर लाया हो। 

तेज प्रताप जी की लेखन शैली और भाषा अनुशासन की लकीर इर्द गिर्द ही घूमती है। किन्तु रुचिकर है। भाषा में प्रयोगधर्मिता, रोज नये-नये पैदा होते शब्दों का चुनाव कम है।  किन्तु साहित्य को अराजक होने से बचाये रखने के लिये ये जरूरी भी और लेखन शैली का वजन भी। उनके सफल प्रयास  बधाईयाँ इस उम्मीद के साथ की उनकी कलम अनवरत चलती रहे, विसंगतियों और बुराईयों पर चोट करती रहे। 

@विक्रम 

11वी सदी का राष्ट्रवाद

इतिहास का लेखा जोखा जो अखबारों और सोशल मीडिया में चलता है, उसमें ये अक्सर पढ़ने में आता है कि 11वी सदी भारत में बाहरी आक्रमणकारियों के प्रवेश की सदी थी। चर्चा उसी पर है। बाहरी कौन और कैसे? राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद

इतिहास ये भी पुख्ता करता है 11वी सदी वीरो की सदी थी। दिल्ली के शासक पृथ्वीराज, महोबा के पराक्रमी सामन्त बन्धु आल्हा-ऊदल, मलखान, कन्नौज के जयचन्द और उनके पुत्र लाखन इत्यादि इत्यादि 11 वी सदी में जन्मे।

तत्कालीन संस्कृति  बेवजह लड़ाइयों के तमाम खाके खींचती है। ये भी कहती है लड़ाई स्वाभाविक कम पैदा की हुयी ज्यादा होती थी।महोबा के वीर आल्हा-ऊदल,मलखान ने 52 लड़ाईयाँ लड़ी, आधी से अधिक लड़ाईयाँ तत्कालीन विवाह पद्धतियों के कारण हुयी, जहाँ टीके से लेकर गौने तक खून बहता था। बाकी की अधिकतर लड़ाईयाँ अपने-अपने अहम् को तुष्ट करने की लड़ाईयाँ थी। जिन्हें इतिहासकार साम्राज्य विस्तार की लड़ाई भी कहते है।

11वी सदी के उत्तरार्द्ध में दिल्ली और महोबा के बीच जो युद्ध हुये उसने विदेशी आक्रमण कारियों के लिये द्वार खोले। इन युद्धों में मुख्यतया भुजरियों की लड़ाई जिसमें आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज को हराकर महोबा को बचाया और बैरागढ़ की निर्णायक लड़ाई जहाँ ऊदल मारे गये और पृथ्वीराज की सेना लगभग तबाह हो गयी।

ये जाहिर है की राजा अपनी रक्षा, अपने अहम् की रक्षा, अपने राज्य विस्तार जी लडाईयां लड़ते रहे, वहाँ राष्ट्रवाद नहीं दूर तक नहीं राज्यवाद, अहमवाद था। राष्ट्रवाद एक राज्य की सीमा से दूसरे राज्य की सीमा पर जाकर दम तोड़ता हुआ दीखता है। हर राज्य की सीमा खत्म होते ही जो भी दूसरा राज्य था वो बाहरी था। कुल मिलाकर 11वी सदी में राष्ट्रवाद था ही नहीं, केवल राज्यवाद था, घना राज्यवाद था।रियासते थी और सियासतें थी।

चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो...

हाँसिये पर आ गया इंसान देखो
चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो

चर्चा में है प्रेम कृष्ण और मीरा का
दे रहे है लोग कैसे-कैसे नाम देखो

कबिरा मिट गया प्रेम का संदेश देते
नफरतों का हो रहा गुणगान देखो

दुनिया भर का है उपद्रव जिंदगी में
है शान्त कितना लेटा,शमसान देखो 

है प्रेम-कबूतर थाने में...

बरपा कहर ज़माने में
है प्रेम-कबूतर थाने में

लईका बिटिया इश्क़ लड़ाये
लगे माई बाप लगा कमाने में

इश्क का बाजार लुट गया
था अरसा लगा पटाने में

बन मुर्गा मशहूर हो गया
शहर भरे दीवानों में

बैठ पार्क, फरहाद बना
वही लगा रिरियाने में

प्रेम पपीहा मुँह बायें था
छलकी मदिरा पैमाने से

यादव जी सस्पेंड हो गये
बस अपनी बात बताने में

भैया भाभी दोवु नप गये
मुर्ग मुसल्लम खाने में

एन्टी रोमियो वर्सेज एन्टी ठर्की

रोमियो, यूँ तो सेक्सपियर के उपन्यास का नायक था, पर भारत में है "एक तरफ़ा प्रेम कबूतर" भी कहते है। खैर अब तो थप्पड़ थेरेपी चल रही है ससुरऊ की थाने में, पुलिस और में बाप दोनों ने गत करी।

एन्टी ठर्की ऑपरेशन कब चलेगा भैया? संसद से जुम्मा-जुम्मा 2 किलोमीटर की दूरी पर ठरक पन शबाब पर है?कानूनी शब्दो में एंटी जिस्मफरोसी ऑपरेशन भी कह लीजिये। GB रोड वाला ठरकपना!!! ऑपरेशन कब शुरू होगा? माना कि उनका वोट बैंक ज्यादा नहीं पर है तो भारतीय नारी ही, चलो कुछ तौ करो, सनी लियॉन टाइप पुनर्ववासित भी।

ये कैसी शर्माने लगी सैफई देखो ....

नेता वोट लेकर चला गया भाई
वोटर खड़ा झुनझुना हिलाता है ।

ये कैसी शर्माने लगी सैफई देखो
जैसे कोई सलमान घूँघट उठाता है

लुट गया डेमोक्रेसी का हस्तिनापुर
द्रौपदी सा खड़ा कोई मुस्कराता है।

खुमार कभी उतरता नहीं देखो
देशभक्ति का हुक्का गुड़गुड़ाता है ।

@विक्रम

तुम आदमी नहीं...

तुम आदमी नहीं
इंसानियत की जिन्दा लाश हो
हाड़ के ढाँचे में
गुथा हुआ मास हो
ये तुम्हारा घर इंसानियत की कब्र है
ये तुम्हारा स्पन्दन करता यकृत
खोपड़ी की गुथम्म-गुत्था
साजिशो का साज है
@विक्रम

मुट्ठी भर ही सही हौसला बचाये रख......

जिगर है चाक, ना सी, बस देखता रह
गिलास में शराब, ना पी बस देखता रह

बहुत भीड़ है और शोर शराबा भी है
उन्माद की तासीर है, बस देखता रह

कई अभिनय अदाकारियाँ चलते रहेंगे
तामझाम है शहर का बस देखता रह

ये डर ये कैद ये सलीब सब किसके है
शोर है नये निजाम का बस देखता रह

मुट्ठी भर ही सही हौसला बचाये रख
कि होते है करिश्मे भी बस देखता रह

@विक्रम

भौरा-भौरा गुँजन करता...

जीवन अपना,
रंग-बिरंगे फूलों जैसी पाती है
भौरा-भौरा गुँजन करता,
तितली-तितली गाती है

रात चरागों की बारातें
झिलमिल-झिलमिल आती है
दिन आता है सुबह लेकर
आस कभी न जाती  है।

एक शेर : कोख किराये पर है, आबरू चौराहे पर है,

कोख किराये पर है, आबरू चौराहे पर है,
और हम है कि नारी दिवस मनाये जाते है।
@विक्रम

जिन्दगी लीज पर है, फ्रीहोल्ड थोड़ी है...

अमा कैसी नफ़रतें,कैसी अदाकारियाँ
जिन्दगी लीज पर है, फ्रीहोल्ड थोड़ी है।

सियासी लिबास पहने आया है मजहब
अपने भी उसूल है, झाड़ का पेड़ थोड़ी है।

ना जमीं, ना दौलत का शौक मुझको
तहजीब की पूँजी मुश्किल से जोड़ी है।

कब तक नफ़रतपसंद रहोगे दोस्त मेरे
बंजारों का तम्बू है,परमानेंट थोड़ी है ।

ईमान को क्यों काँधे पे उठाये फिरते हो
अरे मेरा शहर है, शमशान थोड़ी है ।

वो मुकर गया करके बड़े-बड़े वादे
कोई नहीं इंसान है, भगवान थोड़ी है।

शहर में चर्चे है आपके कारनामो के
सब जानते समझते है, अंजान थोड़ी है।

नित नये फतवे है धर्म का कारोबार है
कोई मौलवी है सम्विधान थोड़ी है

हाथ जोड़े करता है सेवक वायदा
कातिल है, हुक्मरान थोड़ी है



जिसपे नामजद थाने में कई FIR है...

वो सुशासन का वादा कर गया सबसे
जिसपे नामजद थाने में कई FIR है।

हवा भी नहीं है,डेमोक्रेसी क्या बला है?
वो सर झुकाकर मत माँगने को तैयार है।

कल चलाता था गोलियां अपने हाथ से
आज सियासत उसकी लूट का औजार है।



@विक्रम 

नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय

उस दौर में जब संस्कृति का संक्रमण गम्भीर मुद्दा है। पाश्चात्य और प्राचीन के बीच रस्साकशी का दौर जारी है। जब "सन्त वेलेंटाइन" और प्रेम के मूर्त रूप "दशरथ माँझी" के तौर-तरीको और उपलब्धियों पर चर्चा होती है। जब युवायों की नयी फसल, संस्कृति के रक्षको से निरन्तर संघर्षरत है । संस्कृतियों के संक्रमण में प्रेम सबसे चर्चित विषय है। ऐसे में इस विषय पर बात भी जरूरी हो चलती है। ऐसा ही एक सफल प्रयास 18 FEB -17 "@परिवर्तन साहित्यिक मँच" के तत्वाधान में हुआ। जहाँ पर प्रेम के विविध रंगों, आयामों और विधायों को उकेरती, चिन्तन करती , उनके सामाजिक प्रभाव और सरोकारों की बात करने वाली रचनाये प्रस्तुत की गयी। जहाँ से समाज को "मुहब्बत की तासीर मुहब्बत" ही होने का सन्देश दिया गया। जहाँ साहित्य की दुनिया के वरिष्ठ हस्ताक्षर थे और नवोदित भी। जहाँ सुरमयी शाम थी और ज्ञान गंगा भी। जहाँ सामाजिक सरोकार भी थे और गम्भीर चिंतन भी। ऐसे "परिवर्तन साहित्यिक मँच" में मँच संचालन का जिम्मेदारी भरा दायित्व और काव्य पाठ करने की गरिमामयी अनुभूति के साथ कुछ तस्वीरे साझा कर रहा हूँ। टीम परिवर्तन के मित्रो बन्धुयो और वरिष्ठों के प्रति हार्दिक। आने वाले समय में नयी ऊँचाईयो को छूने के शुभकामना साथ। तस्वीरों के लिये Omendra भाई को विशेष आभार के साथ।
मुहब्बत की चाशनी में रिश्तों को पकाया जाय
नाहक ना तितली को बागों से उड़ाया जाय
मुहब्बत में मायनों को फिर से जगाया जाय ........

@विक्रम 






मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा...

मुहब्बत डे पर विशेष पेशकश.....

घर से अक्सर फरार सा लगा
मुहब्बत में गिरफ्तार सा लगा

मन में ख्वाब, हाथों में गुलाब
लड़का बड़ा अदबदार सा लगा

टिपटॉप हो के निकला था घर से
लौटा तो खर्च हुयी पगार सा लगा

शेरों शायरी सब सीख लिया उसने
जलेबी में सने अखबार सा लगा

रात चाँद तारों को ताकता रहा
इश्क़ का कीड़ा जोरदार सा लगा

खोल रखे है दिल के रोशनदान उसने
किसी साये का तलबगार सा लगा

दिल हार आया मुहब्बत के मैदान में
कभी खुश तो कभी बीमार सा लगा

बारहा इतराता है आईने के सामने
किसी काबिल अदाकार सा लगा


@विक्रम

Jindagi Siyasat ke Shmaiyane me- जिन्दगी, सियासत के शामियाने में

व्यंगात्मक कवितायें :
पाठक के मन को गुदगुदाती, व्यवस्था और राजनीति, सामाजिकता पर तंज कसती कवितायें

संजीदा कवितायें :
कवितायें जो रिश्तों​​ के बदलते मायने को टटोलती है, कवितायें जो आधुनिकता के मकड़जाल में फसते जाते सामजिक सरोकारों को खोजती है। जो नयी दोस्ती में पुरनेपन को खोजती है।
आधुनिक कवितायें :
आपाधापी भरी जिन्दगी में ,भूमण्डलीकरण के दौर में माँ,बाप, मायने तलाशती, बदबूदार होती सियासत, और महकते चहकते सियासतदारों, धर्म और अधर्म के बीच झूलती इन्सानियत को तौलती मापती कवितायेँ


ग़ज़लें:
सामान्य आदमी के जीवन में परत दर परत झाँकती, किसानों,कामगारों की बात करती ग़ज़लें, उस बुधिया की बात , जिसके कभी भीड़ आकर मार जाती है, कभी गाँव में वही बुधिया तहसीलदारों ​​ के​ दबाव में बिखर जाता है, शहर में सब्जी की दुकान लगते जिसे पुलिस जीने नहीं देती उसी बुधिया, और उसके सरोकारों , रिश्तों, उसके योगदान, बात करती ग़ज़लें।

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है ..

आने वाले "मुहब्बत डे" मौके पर "मुहब्बत मैनो" को समर्पित  ...... 

देशी ठर्रा सी मुहब्बत है जो गली कूचों में होती है 
शहरी वाली सजधज कर  कैफे कॉफी डे में बैठी 
हो लो टिपटॉप तुम भी अब लगाकर Fogg देखो
जो विलायत वाली है किसी के इंतज़ार में बैठी है। 
  

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है

मुहब्बत का महीना आ चुका है ,बस तारीख आनी बाकी है।  ऐसे में केवल ये बताने की कोशिश है कि मुहब्बत केवल महबूब और महबूबा की कॉपीराइट नहीं है। मुहब्बत हर जगह हर तरह है। ..... मुहब्बत वो भी है जो नेता कुर्सी से करता है। जो किसान हल से करता है। जो जवान अपने कर्तव्य से करता है।

सियासत की पतंगे है उड़ाई जिन जनाबों ने 
कि सत्ता संग सगाई है रचाई साहबों ने 
जिनके दम पे मातम है गिरिजाघर, शिवालों में 
दिल्ली उन्ही के अदब में सर नावती है
मिलते ही मौका बाँहों में झूल जाती है।

खेतो में किसानों की मुहब्बत हल चलाती है 
सावन और भादव में ख़ुशी के गीत गाती है 
हरियाली ही हरियाली है फसले लहलहाती है 
गौरैया फिर से पेड़ो पर अविरत चहचहाती है 
चौपालों देहातों में गाती और बजाती है। 

सीमा पर जवानों की शहादत ही मुहब्बत है
धरती और माटी की इबादत ही मुहब्बत है
घर में माँ, बहनों की दुआएं  ही मुहब्बत है
बुजुर्गों का स्नेह,आसीष ही मुहब्बत है
हवायों में मुहब्बत है फ़जायो में मुहब्बत है।


+Vikram Pratap Singh Sachan 




"जिन्दगी सियासत के शामियाने" का अनावरण

सूर्या सँस्थान के एक कार्यक्रम में जिंदगी सियासत के शामियाने का अनावरण। डॉ रामशरण गौर जी अध्यक्ष दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी, देवेन्द्र मित्तल जी, अशोक जी सम्पादक शुलभ इण्डिया, गायक और लेखक दीपक श्रीवास्तव की उपस्थिति में।
उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134







"जिन्दगी सियासत के शामियाने में", आदणीय अनुप्रिया पटेल जी के साथ

मौसम सर्द है और सियासी पारा चढ़ा हुआ। कयासों और प्रयासो का दौर है। अनवरत घनघनाते फ़ोन, प्रत्याशियों की प्रत्यशाएँ, दिल्ली में दिग्गजोंं के माथे पर शिकन छोड़ रही है। ऐसे में आज एक बेहद शान्त और स्वछन्द मुलाकात युवा तुर्क, कद्दावर नेता, केन्द्रीय मन्त्री आदरणीय अनुप्रिया पटेल जी से, चाय पे लम्बी चर्चा और इत्तफाकन मेरी पुस्तक का जिक्र।

वो यकीनन गौरव के क्षण थे जब अनुप्रिया दीदी ने एक के बाद एक मेरी कई कविताये पढ़ी और कहा बहुत खूब विक्रम....लेखन जारी रहे, खासकर तौर पर "हुज़ूर एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर", "दिल्ली सियासत का सेन्टर है भाई", "आओ करे CBI जाँच की माँग" का जिक्र किया।

किताब की उपलब्धता:
https://www.flipkart.com/jindagi-siyasat-ke-shamiyane-mein/p/itmejveqxaxdg5jd?pid=9789386163134





How to use BHIM App, Introduction os usages and technology

Several questions reated to BHIM App answwred here n this blo post via youtube video.
In case you have further queries please write via commnets.

1.What is BHIM-. Bharat Interface for Money App.
2. How we can use this, as a option mobile vallet,
3. How it is using UPI, it is just extension of IMPS.
4. How your account listed just via phone no.
5. How instant transfer work.
6. UPI pin generation, what u need.
 7. Precautions to be taken.

आल्हाखण्ड: बेतवा मैदान की लड़ाई

ऊदल पहुँचा गढ़ सिरसे में
गज मोतिन ने कहा सुनाय
अब क्यों आये गढ़ सिरसे
तुमको पड़ी कौन परवाय
ऊदल ऊदल करते मरा मलखा
तब तुम क्यों नज़र ना आये
रोते रोते ऊदल बोला
ऐसी वाणी बोलो नाय
जब जब ऊदल घिरा भीड़ में
तब तब चमकी मलखे की तलवार
ऊदल ऊदल करता मरा है दादा
मेरे जीवन पर धिक्कार

रानखेतो में पहुँचा ऊदल
मार मार कर दिया मैदान
कट कट मुण्ड गिरे धरती पर
उठ उठ रुण्ड पुकारे जाय
मरे के नीचे जिन्दा घुस गये
कैसे जान बचेगी हाय
कुछ सुमिरे है रामचन्द्र को
कुछ सुमिरे शारदा माय
आधा हाथी रण में जूझे
आधा लिये महावत जाय
खेत छोड़कर भगा चौडिया
आगे बढे पिथौराराय
देख के गरजा रणबंका
और पृथ्वी से कहा सुनाय
एकला जान मार दौ मलखे
तुमने सिरसा घेरा जाय
पहला वार करो तुम मुझ पर
अपने अरमान निकालो आय
इतना सुन के पृथ्वी जल गया
गुस्सा भरा बदन में आय
मार निशाना साँग चला दी
देख वार को ऊदल हट गया
अपनी ली है जान बचाय
और बेंदुला बढ़ा अगाड़ी
जैसे कला कबूतर खाय
दो पैर धरे गज मस्तक पर
और ऊदल दी तलवार चलाय
जार बेजार हुये पृथ्वी अब
और गिरे धरा पर आय
ये सब देख रहा नर धांधू
आगे बढ़ कर ऊदल रोका आय
पृथ्वी की ली जान बचाय
पैर उखड गये लश्कर के
छोड़ छोड़ भगे मैदान

मंडलीक आल्हा की कनवज में कैद

जैसे ही वीर मलखान की मृत्यु की खबर आल्हा तक आती है, आल्हा कनवज के राजा जयचन्द के दरबार में सिरसा कूच की आज्ञा लेने जाते है किन्तु जयचन्द उन्हें कैद करवा लेते है। ऊदल को खबर लगती है।

जैसे खबर मिली ऊदल को
बंध गये मंडलीक अवतार
झपट के बँगले पहुँच गया
जिसने बाँधा मंडलीक को
उसका रहा काल ललकार
देख के हालत नर आल्हा की
नैना भये लाल अँगार
झपट के कब्जाया जयचन्द को
और सीने पर हुआ सवार
कौन सूरमा तेरी फौजो में
जो झेले ऊदल का वार
बाद में जायूँ गढ़ सिरसे की
पहले तेरा खटका देयु मिटाय

आल्हा खण्ड: मलखान की मृत्यु (Alha Khand Malkhan kee mrityu)

जहाँ आल्हा की लगी कचहरी
एक हलकारा पहुँचा आन
नौलख दल से सिरसा घेरा
जिसका नाम धनी चौहान
रणखेतों में कई दिना तक
एकला लड़ा वीर मलखान
जुलम गुजार दये पृथ्वी ने
सिरसे डालो मलखे मार
होश बिगड़ गये बनाफरो के
ऊदल गये सनाका खाय
एक पल गरजे एक पल बरसे
मन में सोच-सोच रह जाय
देवला रोवे मछला रोवे
महलों गया है मातम छाय
अब गरजा है रणबंका और
आल्हा से कहा सुनाय
कूच की भैया आज्ञा दे दो
अब क्यों रखी देर लगाय
एकले मलखे के बदले मैं
सबके लेयू शीश उतार
खेद-खेद दिल्ली तक मारू
जिसका नाम पिथौराराय
खोज मिटा दूँ चौहानों की
जिन्दा किसी को छोड़ू नाय
इतना कह कर ऊदल सज गया
उड़ा बेंदुला पंख लगाय।

शहर का मौसम चुनावी है।

बढ़ गयी है इज़्ज़त लोगो की
शहर का मौसम चुनावी है।

फिर सज गये सुरमयी सपने
मानो आसमाँ का रंग गुलाबी है

गले बजने लगे है माइको के
वादे और बातें सब किताबी है।

घर पे दस्तक दिन में होती बारहा
विनम्रता हमला है जवाबी है

मौका दे फिर एक बार मुझको
पास मेरे खुशियो की चाभी है।

@विक्रम


सुना है नौकरी करने कार्पोरेट दफ्तर जाता है।

तनाव ओढ़ता है और तनाव ही बिछाता है
सुना है नौकरी करने कार्पोरेट दफ्तर जाता है।

नफे,नुकशान का सजा बाजार है हरदम
रेशमी बातों से यहाँ कारोबार किया जाता है

ऊँची इमारतों में कशिश होती है बहुत
मिलावटी खुशबुयो पे ऐतबार किया जाता है

सच कह नहीं पाता,मैं थामकर दामन झूठ का
जो है ही नहीं उसी का इश्तेहार दिया जाता है।

@विक्रम 

पिथौराराय (पृथ्वीराज)और ऊदल के बीच का सम्वाद रण क्षेत्र में

अलंकार और वीररस.................
"चन्द्रावल का डोला दे दो 
अब तुम रार बढ़ाओ नाय
जो ये बात नहीं मानी तो
गढ़ महोबे में जिन्दा बचे कोई भी नाय
इतना सुनकर ऊदल जल गया
गुस्सा भरा बदन में आय
सांग खींच लाई ऊदल ने
जैसे शेर तामेड़ा खाय
काले बादल की लाली में
जैसे बाज रहा मंडराए"

आल्हाखण्ड: जगनिक के परमाल रासो की कुछ अंश जो  आल्हा गवैयों  मुँह से सुना 
AlahaKhand, Jagnik, parmalraso 

पैबन्द जिन्दगी के सारे दिखे मुझे ( Paiband Jindagi ke saare dikhe mujhe)

उस रात आसमा पे कुछ तारे दिखे मुझे
पैबन्द जिन्दगी के सारे दिखे मुझे

दवायो पे जिन्दगी, दुआओ का चलन है
लोग दीवाने सारे के सारे दिखे मुझे

थी पते की बात कि हलक में रुक गयी
चहु ओर दुश्मनों के हरकारे दिखे मुझे

आँखों से बह गये जलते सवालात कई
लुटती हुयी आबरू के नज़ारे दिखे मुझे

सर्वधिकार सुरक्षित
विक्रम

Us raat asmaan pe kuch taare dikhe mujhe
paiband jindagi ke saare dikhe mujhe

davayo pe jindagi hai duyayo ka chaan hai
log deewane saare ke saare dikhe mujhe

thee pate kee baat kee halat me ruk gayi
chauhoo ore dushmano ke harkaare dikhe mujhe

aankohn me bah gaye jalate savalaat kayi
lutti huyi aabru ke nazare dikhe mujhe
@Vikram




माँ किसी किताब की जिल्द कि तरह ....

अपने सर लेती है बलाएँ मेरी
माँ किसी किताब की जिल्द कि तरह।

बड़ी परेशानियाँ और बहुत आपाधापी
माँ है कि नज़र आती दवाई कि तरह |

संसद खोजता है लोकतन्त्र कहाँ है किधर है?

दिल्ली खुद दर-बदर है, सियासत तरबतर है 
संसद खोजता है लोकतन्त्र कहाँ है किधर है?

दिन कई गुजरते रहे है घोषणायों के दौर में 
हकीकत का ताना और बाना शून्य है सिफर है । 

हो गयी है रात देखो मत निकलना घर से अब
घात में है जुर्म बैठा ये संगीनों का शहर है।

खुद्दारियो को रख के अलमारी में लगा दो ताला 
बोलना मत कुछ फ़िज़ायों में हर तरफ जहर है ।