कानूनों की फेहरिस्त में इजाफा मात्र है, पिलियन राइडर को हेलमेट की अनिवार्यता

कल नोयडा से दिल्ली जाना हुआ। नोयडा की उन ट्रैफिक रेडलाइट पर रुकना हुआ जहाँ यदा-कदा लोग या तो पुलिस वालों को देखकर रुख जाते है। या फिर अपनेआप की आवाज़ सुनकर। रेडलाइट ध्यान उन बाइक सवारों की तरफ खिंचा चला गया। जिनमे पीछे बैठने वालों ने फैंसी से हेलमेट लगा रखे थे। ये देख कर अचानक याद आया कि कल अखबार में खबर थी कि पीछे बैठने वालों को हेलमेट लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।


इसी बीच एक और वाक्या मानसपटल से होकर गुजरने लगा। चन्द महीनों पहले का नोयडा के सेक्टर-62 में लेबर चौक के पास "फादर अग्नेल स्कूल" के पास तिराहे पर खड़ा एक पुलिसकर्मी याद आ गया। जो अपनी पर्सनल बाइक को स्टैण्ड में लगाये खड़ा कुछ चुनिन्दा आने-जाने वालों को रोक रहा था। मेरे जहन में कई सवाल आये। जैसे क्या ये पुलिसवाला आधिकारिक ड्यूटी पर है? क्या इस पुलिसवाले के पास चालान काटने का अधिकार है? क्या पुलिस कण्ट्रोल रूम को ये सूचना है कि ये उनका एक पुलिस वाला यहाँ खड़ा है और चेकिंग कर रहा है? यदि पुलिस वाले के पास  चालान काटने का अधिकार नहीं है तो पुलिसवाला बाइक में ट्रिप्प्लिंग करते लोगों, या अन्य ससंकित लोगों को रोक कर क्या हासिल करना चाहता है?  कई बाइक वाले एक-एक के रोके गये और थोड़ी बहुत बातचीत के बाद चले गये जाहिर है कुछ आदान-प्रदान भी हुआ। सनद रहे चण्डीगढ़ में रहने के मेरे अनुभव के आधार पर जाँच के लिये आधिकारिक तौर पर तैनात पुलिस वाले कम से कम २ होते है और चालान बुक के साथ होते है । चालान बुक नहीं है तो किसी को रोकने का उद्देश्य वसूली के अलावा क्या हो सकता है?

खैर पीछे बैठे लोग हेलमेट लगाये ये सरकारी आदेश पहले से लागू कई कानूनों और आदेशों की फेहरिश्त में एक नया जुड़ाव है। उद्देश्य जाहिर है और काबिलेतारीफ भी। किन्तु व्यवहारिकता ससंकित करती है। लगता है कि मानों वसूली का एक औजार और तैयार!! क्यूँ का जवाब पाने के लिये नोयडा की बात करते है। नोयडा NCR का हिस्सा है। उत्तर-प्रदेश सरकार की आय का सबसे बड़ा श्रोत भी। उद्योग-धन्धो, गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन, काम करने वाले वेतनभोगियों की बड़ी सँख्या सब सरकार के आय का श्रोत है। अब यातायात व्यवस्था पर गौर करिये। लगभग हर चौराहे पर रेडलाइट है। किन्तु कब कौन सी चलती है ये विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। साथ ही साथ रेडलाइट चल रही है तो क्या उसका पालन भी हो रहा है? जिन चौराहों पर पुलिस यदा-कदा उपलब्ध होती है। यदि होती भी है तो ट्रैफिक के दबाव के अनुरूप होती है क्या? दुखद ये है कि इस पर कतई ध्यान नहीं दिया जाता। 

यहाँ पुलिस अक्सर चालान के आँकड़ें जारी कर के बताती है की यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने में उसने कितनी मशक्कत की। इनमे से अधिकतर चालान औचक निरीक्षण चेकिंग अभियान चला कर किये जाते है। साल में ज्यादा से ज्यादा 8 -10 बार। चालान काटे जाते है किन्तु क्या ये चालान यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के उद्देश्य से काटे जाते है? क्या ये बेहतर नहीं होता की इन औचक निरीक्षणों के साथ-साथ हर रेडलाइट पर ये व्यवस्था नियमित होती। नोयडा की सड़कों पर बिना लाल या नीली बत्ती के भी हूटर बजती ना जाने कितनी गाड़ियाँ रोज का रोज घूमती है। ऐसी कितनी गाड़ियों के चालान काटे जाते है? कुल मिलाकर जबतक ट्रैफिक व्यवस्था की निगेहबानी नहीं बढ़ाई जाती। जब तक नियम कायदे-कानून के पालन के उद्देश्य के साथ आगे काम नहीं किया जाता। तब तक नया कानून केवल बेईमानी है। वसूली का एक औजार मात्र है। नोयडा की स्थिति प्रदेश के अन्य शहरों की स्थिति की भी गवाही भी देता है।

जिन्दगी, सियासत के शामियाने में

व्यवस्था और सियासत के ताने-बाने में लिपटी जिन्दगी के कई पहलुयों से परतदर-परत गुजरती, निहारती और विचरण करती, खुशरंग, संजीदा कवितायों और ग़ज़लों की संग्रह, मेरी पहली किताब "जिन्दगी, सियासत के शामियाने में" आपके लिये उपलब्ध है। नीचे दिये गये लिन्क के माध्यम से आप अपनी प्रति बुक करा सकते है।
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बेटी अग्रिमा द्वारा दिया गया गिफ्ट "फादर्स डे पर" एक पापा को एक बड़े-बड़े पापा को

बेटी अग्रिमा द्वारा दिया गया गिफ्ट "फादर्स डे पर" एक पापा को एक बड़े-बड़े पापा को 

पेट्रोल पम्प पर मुस्कराते मोदी

अपनी सरकार के कार्यो का जो ज्यादा विज्ञापन करते है। वो मियाँ मुँह मिठू बनने से ज्यादा कुछ नहीं। अब देखिये केजरी ने जमकर विज्ञापन दिया, भक्तों ने खूब कोसा कोसने वाली बात भी थी!!! अब निकल कर आया है की। मोदी जी की सरकार ने भी हज़ारों करोड़ उड़ा दिये। भक्त यकीन करने को तैयार नहीं।

पर एक बड़ा सच जो नंगी आँखों से देखा जा सकता है। कहीं भी किसी भी समय। देश के किसी भी पेट्रोल पम्प पर जाइये, मोदी जी आपको मुस्कराते हुए मिलेगें। बड़े-बड़े  सरकारी विज्ञापनों में!!!! ये भी खर्चा है जो कृषि कल्याण सेस के लिये इस्तेमाल हो सकता था किन्तु विज्ञापन जरूरी है। बाक़ी की वसूली हमसे कर ही लेगी सरकार। जब चाहा तब फाइनेंस बिल ले आयेंगे।

उपलब्ध आँकड़ों के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पम्प है भारत में,  जो होर्डिंग्स लगाये गए है थोक में भी उनकी कीमत 2500 से कम नहीं हो सकती बाकी वो सरकारी संसाधन जो डिज़ाइन करने में लगे अलग। कुल मिलाकर मोदी सरकार ने  कम से कम 1lakh ×2500 मूल्य के विज्ञापन कर ही दिये, बाकी अखबारो में जो छपता है पूरा-पूरा पेज उससे हम सब वाकिफ  है। आप ही विश्लेषण करले खर्चे का किसी RTI की जरूरत है भी क्या?

NH-2 का नशा

कानपुर से इलाहबाद जाते हुये राष्ट्रीय राजमार्ग-2 बीच-बीच में शराबियों की तरह लहराने लगता है, झूमने लगता है। मालूम होता है बच्चन साहब की मधुशाला का सबसे ज्यादा असर इसी पर हुआ है। समय पर ब्रेक ना लगायी तो सब हवा हो जाये इतना झूमता है!!! बाकी देश के वफादार देशी कुत्तों के लिये ये मौत का हाईवे है। अनगिनत कुत्ते सड़क पर पोस्टर बने हर 2-3 किलोमीटर पर मिल जाते है। जाने और आने दोनों ओरे की लेन को जोड़ लिया जाय तो कुत्तों को मिलने वाली कुत्ते की मौत का आँकड़ा हर 2 किलोमीटर एक है।  जाने भगवान इनकी आत्मा की शान्ति देता होगा की नहीं।

देखिये की हम सँसार में उपलब्ध सबसे वफादार कौम का क्या हश्र क्या करते है।पोस्टर बनाकर छोड़ देते है आखिर हम इंसान है सबसे दिमागदार कौम!! जरूरत के हिसाब से जो भी बदलना चाहे बदल दे।