कुछ इस तरह की फिर से गाँधी जिन्दा हो उठें

ये नशा शराब का कहाँ था खुशियों का रहा होगा
पुलिस वाले कमबख्त बेवजह चालान काट देते है ।

आओ मनाये नया साल सबके साथ मिलकर के
बेघरों लोगों को खोजकर कम्बल बाट देते है ।

कि कल भी दिखेंगे चौराहो पर खाली पेट बच्चे
अपने निवाले का उनको भी छोटा भाग देते है।

कुछ इस तरह की फिर से गाँधी जिन्दा हो उठें
आओ मिलकर हिन्दोस्तां को एक नया अंदाज़ देते है

@विक्रम

आदमी सा दिखता था

उसे आदत थी
बिल्ला टाँगने की
सॉरी कहने की
थैंक्यू बोलने की 
भारत में अमेरिका जीने की 
जेंटलमैन जैसा दिखने की
बहुत कुछ सीखने की
वो एक मजदूर था
समाज से दूर था
सॉफ्टवेर लिखता था
आदमी सा दिखता था
@vikram

जीवन की रफ़्तार में वो आगे निकल गया

जीवन की रफ़्तार में वो आगे निकल गया
गिरता रहा मगर जो गिरकर सम्हल गया

मंजिल उसी की हो गयी मुकम्मल हुआ जहाँ
जो हौसलो के दरख्तों पर चढ़ता चला गया




रानीखेत: वीरता की संस्कृति और अदम्य साहस का हस्ताक्षर है, कुमाँयू रेजिमेंट का म्यूजियम ( kumaon regiment museum )

नैनीताल से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर बसा रानीखेत, यूँ तो आबादी वाला क्षेत्र प्रतीत होता है। पहाड़ो के शहरो में मालरोड की नाप और वहाँ आसपास बनी दुकाने शहर की बसावट का आबादी का अंदाज़ा बड़ी आसानी से दे जाती है। कुछ ऐसा ही रानीखेत में भी है। रानीखेत से त्रिशूल और नन्दादेवी पर्वत श्रृंखलाएँ काफी करीब से नज़र आती है। रानीखेत में एक हिलस्टेशन की तमाम खूबियों के साथ यहाँ एक बेहद खास चीज है वह है कुमायूँ रेजिमेंट का मुख्यालय, और कुमायूँ  रेजिमेंट का अपना संग्रहालय जो वीरता की संस्कृति और अदम्य साहस का अदभुत हस्ताक्षर है। और ये संग्रहालय और खास तब हो जाता है जब आप देखने जाये और एक रिटायर्ड सैनिक बेहद गर्व के साथ एक गाइड की तरह तमाम उपलब्ध चीजो के बारे विस्तार से बताये। सुनने और बताने वाले दोनों के रोंगटे खड़े हो जाये ऐसी कई दस्ताने है।

रानीखेत एक कैंटोनमेंट है, जैसा कि अमूमन हर हिल स्टेशन होता है। पर रानीखेत कैंटोनमेंट की बात औरो से जुदा है। रानीखेत भारतीय थल सेना की सबसे बड़ी रेजीमेन्ट कुमायूँ(KRC- Kumayu Regiment Centre) रेजीमेंट का गढ़ है। नागा रेजीमेंट भी कुमायूँ रेजीमेंट का एक हिस्सा है। आज़ादी से पहले ये रेजीमेंट हैदरबाद के निजाम की फ़ौज की तरह थी। नये रंगरूटों की भर्ती से लेकर ट्रेनिंग तक यही होती है।

यहाँ कुमायूँ(KRC) रेजीमेंट ने एक संग्रहालय भी बनाया है। जो अपनी तरह का पहला संग्रहालय है। कुमायूँ रेजीमेंट द्वारा देश के प्रति किये गये योगदान की विस्तृत जानकारी उपलब्ध कराता है। KRC के पूर्व सैनिक ने बड़े गर्व और शान के साथ ये बताया की कुमायूँ रेजीमेन्ट के मेजर सोमनाथ शर्मा 1947 में श्रीनगर में हुयी लड़ाई में अद्वितीय शौर्य पराक्रम दिखाते हुये मरणोपरान्त देश का पहला परमवीर चक्र प्राप्त। 1962 में भारत चीन के युद्ध में मेजर शैतान सिंह भाटी ने वही शौर्य और पराक्रम दिखाते हुये कुमायूँ रेजीमेंट का दूसरा परमवीर चक्र प्राप्त किया।

1965 ये युद्ध की कुछ तस्वीरें जो तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर जी द्वारा कुमायूँ रेजिमेंट के सैनिकों को विजय के उपरान्त पकड़े गए टैंक्स और हथियारों के साथ दिखाता है। यहाँ पकिस्तान का राष्ट्रीय ध्वज उल्टा टंगा हुआ है।
श्रीलंका में शान्ति सेना का हिस्सा रही कुमायूँ रेजीमेंट द्वारा LTTE से बरामद कुछ हथियार और उल्टा टंगा हुआ LTTE का ध्वज कुमायूँ रेजीमेंट के अभूतपूर्व योगदान और शौर्य को दर्शाता है।ऑपरेशन विजय(कारगिल) में कुमायूँ रेजीमेंट का बड़ा योगदान रहा।
















इसके अलावा एक कभी ना खत्म होने वाली लम्बी फेहरिस्त है जो कुमायूँ रेजीमेन्ट के अभूतपूर्व योगदान को आपके हृदय पर छाप देने के लिये काफी है। इस योगदान की गाथाएं बताते हुये एक पुर्व सैनिक का गर्व देखते ही बनता है, वहाँ मौजूद हमारे जैसे दर्शक भी गर्व और साहस से भर उठते है। कुमायूँ रेजीमेंट और उसके महान योगदान को नमन करते है, याद करते है, अमर शहीदों को, परमवीरों को, महावीरों को, अनन्य वीरों को....

कोई सोने की चिड़िया उड़ा ले गया .....

कोई सोने की चिड़िया उड़ा ले गया
और हम आस्तीनों में झाँकते रह गये।


कई पंचवर्षीय आयी और हवा हो गयी
हम दिल्ली की तरफ ताकते रह गये।
@विक्रम

EK sher

चिड़ियों सी चहकती है,कभी माँ सी दिखाई देती है
वो बेटी है मेरी, पहले डाटती है, फिर दवाई देती है।
-विक्रम

बहुमंजिला इमारतो में बिजली की ठेकेदारी प्रथा!!!

नोयडा के बहुमंजिला भवनों में एक नयी प्रथा का चलन है, बिजली की ठेकेदारी!!! बिल्डर को बिजली का कनेक्शन दिया जाता है और बिल्डर वहाँ के रहने वाले को बिजली का कनेक्शन देता है। बिजली के बिल जमा करने का पूरा सिस्टम प्री-पेड है। आप प्रीपेड जमा करिये वो जाता है अमूमन बिल्डर के अकाउंट में। बिल्डर कब और कैसे uppcl को पैसे जमा करता है। ये केवल बिल्डर जानता है!! यदि बिल्डर जमा नहीं करता तब क्या बिजली पूरी सोसाइटी की काटी जायेगी या अन्यथा?? कुछ महत्त्वपूर्ण बिन्दु जो UPPCL की इस कार्यप्रणाली को अपरिपक्व साबित करने हेतु काफी है।

- नोयडा में उपलब्ध उदाहरणो के आधार पर ये  कहा जा सकता है कि बिल्डर के UPPCL में पैसे जमा ना करने पर पूरी सोसाइटी की लाइट काट दी जाती है। जो गैर कानूनी है चूँकि उपभोक्ता ने प्रीपेड बिल दिया है।

- बिल्डर की नाम पर प्री-पेड पैसा क्यों जाना चाहिये? क्या बिल्डर से UPPCL कोई सिक्योरिटी मनी जमा करवाती है जो पूरी सोसाइटी के काम से कम 2-3 महीने के बिल के बराबर हो?

- जब हम प्री-पेड मोबाइल रिचार्ज करवाते है तब पैसा सीधे टेलीकॉम वेंडर के पास जाता है नाकि दूकान वाले के पास, उसी तर्ज पर हर बिजली उपभोक्ता का पैसा सीधे UPPCL के अकाउंट में क्यों नहीं जाता है? जो सुरक्षित तरीका भी है।

- बिजली बिल का कैलकुलेशन KVA में होगा ये KWH में होगा ये सुनिश्चित नहीं किया जाता, बिल्डर KVA में कैलकुलेशन करते है और ज्यादा वसूली करते है।

- जिस तरह का लचर रवैये के साथ ये नीति चल रही वह बिजली के ठेकेदारों और बिजली बाटने वाले मठाधीशों के बीच मिली भगत के स्पष्ट संकेत देती है।

ग्रेटर नोयडा की AVJ सोसाइटी प्रस्तुत बिंदुओं का मजबूत उदहारण है।  इस बावत मैं UPPCL के अधिकारियो को कई बार लिख चुका हूँ पर अफ़सोस सरकारी व्यवस्थाएं......

-विक्रम

बच्चो की गुल्लकें लुट गयी ....

500 और हज़ार के नोटों पर बैन से सबसे ज्यादा बड़ा झटका देश के छोटे बच्चो को लगा है।.... बेचारो की गुल्लकें फूट गयी...दादी नानी और आने जाने वालों से मिली सारी रकम सारी जमा पूँजी .... पल में फुर्र ...मानो कोई डाकू मलखान सिंह टाइप आया और एक मुश्त लपेट ले गया... बाद में पता चला की बस्ती....खुद के माँ बाप ने लूट ली.... बेचारे लुटे लुटे से घूम रहे आधुनिक डाकू मलखान  को कोसते .....

महापराक्रमी सेल्फीवीर, पलक झपकते खींचे तस्वीर....

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

लपक-लपक के FB खोले
हपक हपक के फीलिंग छोड़े
चपक-चपक के टैगिंग दौड़े
मन ही मन में होते चौड़े
मोबाइल जैसे शमशीर

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

बाल बनाये गाल फुलाये
देख खुद ही को खुद मुश्काये
एडिट वेडिट कर फोटो चमकाये
है करिया गोरा दिखलाये
पसन्द करे  राँझा या हीर

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

साथ जहाँ भी जाये पिकनिक
घड़ी-घड़ी है सेल्फी टेक्निक
लिख-लिख फोटू चिपकाये सन्टी ब्रदरस
विथ पहाड़ एंड थ्री अदरस
सेल्फी स्टिक लगती तीर

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

ड्राइव करी थी 1 सौ चालिस
डैशबोर्ड की फोटो डालिश
फिर मोबाइल का माड़ है बदला
सेल्फी खींच रहा है पगला
समझ ना पाया नियम की पीर

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

गंगा बैराज पुल गया था
दुनियादारी भूल गया था
लटक-लटक के सेल्फी खींची
उसी नदी में झूल गया था
हुयी शहादत निपटा वीर

महापराक्रमी सेल्फीवीर
पलक झपकते खींचे तस्वीर

@विक्रम सर्वधिकार सुरक्षित

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार...

हिन्दुस्तान के एकीकरण के थे तुम सूत्रधार
कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

त्याग धैर्य की प्रतिमूर्ति तुम संघर्ष किये अपार
कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

खेड़ा की सरजमी से आन्दोलन उदघोष किया
सोते हलधर को ललकारा भारत को नवजोश दिया
देख इरादे वल्लभभाई के जन जन था साथ हुआ
नतमस्तक था हुआ प्रसाशन हिली ब्रिटिश सरकार

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

राष्ट्रहित का किया वरण था आज़ादी का प्रथम चरण था
राह चले तुम वहीं निरन्तर जहाँ आपदाएँ रही भयंकर
हर बाधा को हँसते पार किया त्याग अनवरत अपार किया
आज़ादी के संघर्षों के बने सिपहसालार

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

आयी आज़ादी मगर दर्द था भारत बिखरा इधर उधर था
बीड़ा तुमने उठाया लिया सारा भारत मिला लिया था
जूनागढ़, निजाम ने तलवार विरोध की तानी थी
गाँधीवाद की छाया में पलते रौद्र रूप से अनजानी थी
दम्भी कॉप उठे भय से और किया एकीकरण स्वीकार

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार।

सबने तिरंगा थाम लिया था आपको नेता मान लिया था
पर आपके मन की अलग दिशा थी बात थी रखी राष्ट्रपिता की
पद का मोह ना कद की माया सर्वस्व देश पे लुटाया
जो भी आपने लिये फैसले सच था अंगीकार

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

वो दिन भी ऐतिहासिक है जब तू काल से टकराया था
अन्तिम विदाई तुझको देने जन सैलाब उमड़ कर आया था
आम आदमी की जानिब तूने सोनापुर अपनाया था
सारा भारत रोया था सबसे शीश नवाया था
तुझे नमन है लौहपुरुष है कोटि-कोटि आभार

कालजयी व्यक्तिव तुम्हारा बारदोली के सरदार

@विक्रम प्रताप सिंह सचान सर्वधिकार सुरक्षित

अथ श्री सैफई कथा ....

अथ श्री सैफई कथा
आधुनिक कैकेयी कथा
रोते बिलखते प्रदेश की कथा,
ये कथा है,
एक परिवार की
परिजन जिसके बने स्वार्थी
ये कथा है लूट की मार की टकरार की
सारथी जिसके रहे
शिवापाल, रामगोपाल,अमर चाटुकार की
सत्य दिग्घोषित हुआ,
प्रजापति जी सार्थक सर्वदा
निरन्तर लुटी गोमती और नर्मदा
परिवार व्यूह में फॅसा प्रदेश
अब देखो हँसता सारा देश
समाजवाद का लगा पलीता
लो कटा उदघाट्न का फीता
अथ श्री सैफई कथा
आधुनिक कैकेयी कथा।








एक कुशल चालक की मानिन्द ......

ले दे के 18 साल का बालक 
३ सीटर टेम्पू का चालक 
पान बहार चबाता हुआ 
आवाज़ लगाता हुआ 
३ वाली में 7 सवारी बिठाता हुआ 
टेम्पू पर अपनी कुशलता दिखाता हुआ 

कमोवेश,
रामदेव के किसी योग की मुद्रा में 
सिकुड़ा हुआ, अकड़ा हुआ
कमाई के जाल में जकड़ा हुआ 
अपने पुष्ट उठाये 
अपने आयतन को मिनीमाइज करता हुआ  
एक और सावरी बैठाने के प्रयास में 
नज़रे इधर उधर फिराता हुआ 
गला फाड़कर चिल्लाता हुआ 

गिद्ध सी नज़रे सड़क पर जमाये 
टेम्पू आगे बढ़ता हुआ 
शॉर्टेस्ट पाथ अल्गोरिथम अपनाता हुआ 
हर समय एक और सवारी का स्कोप बनाता हुआ 
सारे सिस्टम को गलियाता हुआ 
आगे बढ़ा 
सड़क के नियमो और कानूनों पर चढ़ा 
रॉंग साइड में बचता बचाता हुआ 
गंतव्य की ओर 
एक कुशल चालक की मानिन्द ...... 

जिन्दगी किसी जद्दोजहद की तरह

जिन्दगी किसी जद्दोजहद की तरह
रूकती नही, चलती रहती है हवा की तरह।

टिमटिमाती सी रोशनी रही रातभर
कोई जलता रहा शमा की तरह

फिरता रहा वो रुसवाईयों की महफ़िल में
चाहते रही उसके लिये दवा की तरह

वो चाँदनी रात थी दीवाना कर गयी
किसी गुलबदन की अदा की तरह

हासिल क्या है जिन्दगी में हुज़ूर
रंग है कभी खुशियों कभी कजा की तरह





पाक के तोते होंगे फेल....

सतलुज, रावी, व्यास, चेनाब,झेलम, इंडस सभी नदियों का श्रोत भारत की सरजमी से है।....... ये वही बात हुयी कि जब सैंया भये कोतवाल तौ अब डर काहें का?

....... तो भैया छोड़ो रोना गाना, युद्ध- वुद्ध की बातें दिल्ली से बटोरों डेंगू और चिकनगुनिया का लार्वा और फैला देयो   बिलकुल रायता टाइप इन्ही नदियों की जलधार में,  देखो फिर कैसा हाहाकार मचता पाकिस्तानी मार्केट में सब  हुडुकचुल्लू टाइप मिसाइलों से फॉगिंग करते फिरेंगे। ईंट का जवाब पत्थर से देने वाली बात रह जायेगी। घुसपैठ का जवाब घुसपैठ से ...

पाक के तोते होंगे फेल
बनेगी नवाज की रेल
गंजी खोपड़ी में लगायेगा मच्छर उड़ाऊ तेल
जब मचाएगी चेनाब, राबी झेलम पेल 

फिर दिल्ली में औपचारिकता निभाई गयी।

तिरंगे में लिपटा हुआ
बहुत बहादुर दिखता हुआ 
रामलाल का बेटा
चिता पर लेटा 
देश के लिये कुर्बानी दी
राजकीय सम्मान के साथ सलामी ली

भावुक रामलाल बोला 
बेटा देश पे कुर्बान हुआ 
साधारण से महान हुआ 
अन्य परिजनों के आँसू  नहीं रुके 
बिना पिता, पति के हम कैसे जिये?

इन सब के बीच 
दिल्ली में हाई प्रोफाइल मीटिंग हुयी 
बिसलेरी की बोतलो से प्यास बुझाई गयी 
वातनुकूलित जगह पर 
चिन्ता जताई गयी 
निन्दा हुयी 
कड़ी कार्यवाही का विश्वास दिलाया गया 

कुछ दिन ही बीते है थे 
इस बारी श्यामलाल का बेटा 
तिरंगे में लिपटा हुआ 
बहुत बहादुर दिखता हुआ

 ...  प्रक्रिया दोहराई गयी 
बार बार सीमा से अर्थियाँ लायी गयी 
फिर दिल्ली में औपचारिकता निभाई गयी।






सौ तरह के जरूरत नहीं है, केवल डेंगू और चिकनगुनिया से काम हो लेगा....

आकाशवाणी में टीवी अक्सर एक गाना  सुनाई देता है" ........सौ तरह के रोज ले लूँ इश्क का मर्ज क्या ........"
अरे भैया कोई हो मार्केट में तो केवल दो मर्जो "डेंगू और चिकनगुनिया" की होम डिलीवरी कराओ भाई के घर होश फाख्ता हो जायेंगे..... यमराज के भैंसे नज़र आयेंगे!!!

@विक्रम

कट्टे की मानिन्द .....

व्हिसल ब्लोअर ने व्हिसल बजायी
भक्तों की भीड़ आयी
की बड़ी नुक्ताचीनी 
व्हिसल छीनी
पलटाई
कट्टे की मानिन्द
व्हिसल ब्लोअर के कान में लगायी
बजायी और जोर से बजायी
व्हिसल ब्लोअर भड़भड़ा गया
व्हिसल ब्लोअर लड़खड़ा गया
गच्चा खा गया
जमीन पर आ गया
अब हाथ जोड़े माफ़ी माँग रहा है
लोकतन्त्र का रक्षक भी जाग रहा है।
@विक्रम सर्वधिकार सुरक्षित

हमाम में सब नंगे कौन बताये.....

दफ्तर से आया
चाय पानी पिया
बेटी से हालचाल पूछे
स्कूल में होने वाले ढकोलसले
और बवाल पूछे
समाचार सुनने की गरज में टीवी चलायी
आवाज़ आयी

खबरों से पहले आप तक
पसन्दीदा चैनल आज तक
एंकर प्रकट हुये,
आज के मुख्य समाचार
कुछ इस प्रकार
चाचा भतीजे की ठनी
अमर सिंह पर तलवार तनी
फेसबुक से हुयी दोस्ती
प्यार में बदली पर महिला निकली दोगली
इमरान हाशमी नयी फिल्म में
कैटरीना को जबर्दस्त किस करेंगे,
सनी लियोने अहिल्या का किरदार निभाएंगी
माधुरी रुपहले पर्दे ओर फिर आयेगी
धक-धक टाइप कुछ गाँयेंगी

.... ब्रेक हुआ
रामदेव आये, अपने उत्पाद को राष्ट्रीयता से जोड़ा
पतंजलि मैगी बेची, फिर शहद थोड़ा
सब्र टूटा चैनल बदल डाला
NDTV आ रहा था
भाई समाचार में कार्टून दिखा रहा था
केजरी, मोदी, शाह बैक टू बैक
पुनः एंकर प्रकट हुये,
अभी आप सुन रहे थे मुख्य समाचार
अब जाने माने ज्योतिषी बतायेगे उपचार
एक एक कर कई सवाल आये
कई गृह धुरी से हटे, कई हटाये गये,
भविष्य वाले भगवान पटाये गये

एंकर फिर अवतरित हुये
रात 9 बजे देखिये सनसनी.....
अमेरिका में धँसी धरती
जिन्दा हुयी औरत मर चुकी

दिमाग शून्य होता उससे पहले
टीवी ऑफ किया हाथ में अखबार लिया
सम्पादकीय खोला पढ़ा
मन कुछ शांत हुआ
कादम्बिनी उठायी
मुख्य पृष्ठ पर लिखा था
पत्रकारिता मिशन का व्यवसाय
हमाम में सब नंगे है कौन बताये।

@विक्रम सर्वधिकार सुरक्षित

और हम मच्छर मार रहे थे,

श्रीहरिकोटा से मिसाइल पलायन कर रही थी,
बंगलौर कावेरी के पानी से जल रहा था,
महाराष्ट्र में मनसे थप्पड़ थेरेपी कर रहे थी,
व्हिस्लर ब्लोअर कपिल माफ़ी माँग रहा था,
और मच्छर मार रहे थे,
डेंगू और चिकनगुनिया से हार रहे थे।

आर्थिक विकास दिल्ली से होता हुआ
दिल्ली में ही सिमट रहा था
केजरी पंजाब और गोवा में भटक रहा था
शाहबुद्दीन जेल से सटक रहा था
और हम मच्छर मार रहे थे
डेंगू और चिकनगुनिया से हार रहे थे।

रेलवे टिकट के दाम बढ़ रहा था,
शेयर मार्केट लड़खड़ा रहा था,
CM चाचा पर डण्डे चला रहा था
CMO पूरी खबर झुठला रहा था
और हम मच्छर मार रहे थे
डेंगू और चिकनगुनिया से हार रहा था।
@विक्रम

सत्तासीन नेता जी.....

अद्वितीय भाषण शैली
नेता जी की रैली
रैली में आये
मंचासीन हुये
नज़रे तरेरी
इधर उधर फेरी
प्रदेश अध्यक्ष से बतियाये
भैया केवल 20 हज़ार जी भीड़ लाये?
माइक थामा
अभिवादन के साथ
1950 तक गये
वल्लभभाई को सराहे
गाँधी और नेहरू को गालियाये
1965 आये शास्त्री जी टकराये
प्रसंशा किये
इंदिरा को तानाशाह बताये
आपातकाल पर टूट पड़े
खोद डाली कांग्रेस की जड़े
हर पंचवर्षीय का हिसाब बताया
लूट का हिसाब किताब बताया
मण्डल और कमण्डल पर आये
हिलाएँ डुलायें, थोड़ा गंगागल फैलाएँ
पवित्र हुये,
20वी का लगभग सब बेकार
21वी शताब्दी से हुआ करार
कई वादे किये
सब कुछ सुधारने के इरादे किये
सत्तासीन हुये
गद्दी पर आसीन हुये
बाहर निकलना छोड़ दिया
हर वादा तोड़ दिया
अब 15 अगस्त को लाल किले से चिल्लाते है
कि हम सपने दिखाते है।
कि हम सपने दिखाते है।

आज हिन्दी दिवस है।

एक नवजात और उसकी माँ के बीच सम्वाद की कौन सी भाषा होती है? संकेतो की भाषा, भावों की भाषा, और आशायों की भाषा!!! भाषा जो परिभाषायों से परें है। किन्तु बेहद प्रभावी, बिलकुल साफ़ और सपाट। एक शान्त किन्तु बहती हुयी नदी की जलधार पत्थरों और चट्टानों के किस मधुर भाषा में बात करती है। दूर क्षितिज में उड़ते पक्षियों का कलरव जिस तरीके से प्रकृति से बात करता है। रिमझिम बारिश की बूँदे जिस सुगमता के साथ हवायों में समाहित हो धरती की ओर हवायों से बात करती चली आती है। दूर पहाड़ो के पीछे से आती भोर  पहली किरण जिस हर्ष और उल्लाष से एक जीव से बात करती। उसी सुगमता, सरलता, मधुरता और तरलता से हिन्दी हमसे बात करती है। हम हिन्दी से बात करते है। 

हिन्दी ह्रदय की भाषा है। हिन्दी हमारी संस्कृति की भाषा है। हिन्दी हमारे सँस्कार की भाषा है। हिन्दी का उत्थान सम्पूर्ण विश्व में हमारे प्रचार की भाषा है।  हिन्दी हमारे अन्दर के शिल्पकार की भाषा है। हिन्दी हक़ से पढ़ें और पढ़ायें बोले और अपनायें। 

कि अब कविता नहीं कुछ और लिखूँगा

मन में इरादा है,
अपने आप से भी वादा है
कि अब कविता नहीं कुछ और लिखूँगा
मजदूर की हथेलियों की रेखाएँ लिखूँगा
अँगुलियों का एक- एक पोर लिखूँगा
कविता नहीं कुछ और लिखूँगा।

हर शहर हर कस्बे में रोज
सुबह-सुबह लगने वाली
दिहाड़ी मजदूरों की मण्डियों में
सर छुपाने तक के लिये
नहीं है कोई ठाँव और ठौर लिखूँगा।
कविता नहीं कुछ और लिखूँगा।

विकास की खोखली बात के बीच
रोजगार के काले प्रकाश के बीच
रोज सँवर कर निकलती महँगाई के बीच
गरीब के निवाले और कौर लिखूँगा
कि अब कविता नहीं कुछ और लिखूँगा


जिसको जिन्दगी खुद जीती है
व्यवस्था जिसका लहू हर शह पीती है
सड़क किनारे बने आशियानों का
गिरता हुआ हर छोर लिखूँगा
मानवता के परभावो का दौर लिखूँगा।
कि अब कविता नहीं कुछ लिखूँगा।

सच को हजम करने की कयावद
झूठ के अनवरत होने की रवायत
सरकार के मन का चोर लिखूँगा
कमजोरो पर ही चलता उसका जोर लिखूँगा।
कि अब कविता नहीं कुछ और लिखूँगा।।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित



नोयडा की हवाई इन्सानी बस्तियाँ

नोयडा की हवाई इन्सानी बस्तियाँ
घर मानो हवा में तैरती कश्तियाँ
आस-पास कंक्रीट का जंगल
बची खुची जमीन पर गाड़ियों का दंगल
बाकी सब कुशल मंगल

सीमेंट की बीमों पर पक्षियों के घौसले
हवा में तड़पते तन्हा बच्चो के हौसले
हवा में फिजा में चहूँ ओर चोंचले
ऊँचाईयो का दस्तूर,फिजूल के फितूर
कायम है दिखावे का शगल

बाकि सब कुशल मंगल

हवाएँ रस्ता खोज नहीं पाती
दीवारों से अनवरत सर टकराती
रिश्ते नाते और सामाजिकता
दूर का होता है इनसे नाता
पता नहीं हित रहता है कौन अगल-बगल
बाकि सब कुशल मंगल 

पैदल हमेशा से मात खाता हुआ

लोकतन्त्र अभी आया है क्या?
कोई खबर मिले तो चस्पा करे!!
सड़क पर चलता हुआ पैदल,
सड़क पार करने की फिराक में,
कभी सड़क के इस किनारे,
कभी उस किनारे,
कभी जेब्रा क्रासिंग पर
कंफ्यूज सा जान की खैर मनाता हुआ
गालियाँ खाता हुआ
सड़क पार की,

वहीं उसी सड़क पर
बुलेट प्रूफ बख़्तरबंद में पैक
भारी लाव लश्कर से लैस
सड़क पर पूरी हनक से
पूरे रसूख से
पूरे हक़ और हुकूक से
सायं सायं सायरन बजाते हुये
बजीर निकल गया!!!
वाकई लोकतन्त्र आया क्या?
पैदल हमेशा से मात खाता हुआ
अधिकारों की पुंगी बजाता हुआ
बजीर, राजतंत्र की नजीर
स्थिति गम्भीर
लोकतन्त्र आया क्या?
मिलेगा तो बताईयेगा!!!

फेसबुक चस्का है, चरस है

फेसबुक चस्का है,  चरस है 
सेल्फी चिपकाने,
फीलिंग फैलाने,
अपनी खुशियाँ बताने की हवस है
फीलिंग हैप्पी, फीलिंग सैड,
अम्मा, बच्चा बाप भी मैड,
फीलिंग्स की हवाई फायरिंग,
रिश्तों और मित्रता की आभासी वायरिंग,
में धाराप्रवाह डेटा,
भारत से अमरीका और फिर 
अमरीका से भारत 
आ रहा है, जा रहा है।
देखलो फेसबुक 
आदमी को पोपला 
सामजिकता को खोखला बना रहा है
भारत की एक तिहाई जीडीपी खा रहा है।
भारत की एक तिहाई जीडीपी खा रहा है।



अपराध,बलात्कार, निलम्बन, बहाली और राजनीति

देर रात हाईवे पर एक नाबालिग और एक प्रौढ़ के साथ बलात्कार हुया। देर रात घटना को दबाने की कोशिश भी हुयी। देर सुबह कुछ पुलिसवालों के निलम्बन की खबरें आयी और देर शाम कुछ बड़े अधिकारी भी नप गये। लखनऊ से बड़े लोगों का आना जाना शुरू हुआ। कुछ गिरफ्तार हुये, कौन थे कौन है पता नहीं चला। सियासत शुरू हुयी पर एक सवाल कल भी कायम था आज भी कायम है। व्यवस्था में क्या सुधार आये?? वो कौन से साकारात्मक कदम उठाये गये जो। जो घिनौने अपराध से हिले हुये हुये लोगो सम्बल दे । पीड़ित को न्याय दे। इस सवाल के जवाब में रोज अखबार खोलता हूँ बन्द करता हूँ किन्तु ढाक के तीन पात ही नज़र आते है। 

मुख्यमन्त्री जी से कुछ सकारात्मक की आशा थी। उनका बयान भी आया, बचने बचाने की जुगत में दिखे। बयान में सियासत बहुत दिखी, ईमानदारी बहुत कम। मेरी नज़र में बुलन्दशहर की घटना 16 दिसम्बर ( निर्भया घटना ) से भी ज्यादा शर्मशार कर देने वाली है। उस दर्द के कारण जो एक नाबालिग बेटी ने जिया, वहीं आस-पास ही उसकी माँ ने जिया। वो दर्द जो एक बाप ने जिया, खुद का दर्द, पत्नी का दर्द और सबसे बड़ा, सबसे भारी बेटी का दर्द। वो दर्द, वो भय जो ताउम्र उस पिता हो सालता रहेगा। पीड़ित परिवार को अब जिन्दा लाश ही मानिये। वो पीड़ित है किन्तु अपराध का भर उन्हें ही सहना होगा। इस सबके बीच इस सच को मुख्यमंत्री जी शायद अपनी व्यस्तता या शायद किसी सियासी भय के कारण दरकिनार कर गये। बेहतर होता इस मामले में वे सीधे बोल बोलते। बेहतर होता की बहुत ही पारदर्शी तरीके से वो पूरी सरकारी ताकत पीड़ित को न्याय दिलाने के लिये झोक देतें। एक ऐसा अद्वितीय दण्ड जो अपराधियों की जान हलक तक ले आये दिलवाने की कोशिश करते। 

भारत में आँकड़े कभी सच नहीं बोलते। जाहिर है आँकड़ें हमेशा मैनिपुलेट किये जाते है। छोटे-छोटे अपराधो को दबाकर आँकड़ें तो बेहतर होते है किन्तु ये बड़े और विकृत अपराधो के लिये अपराधी को मनोबल देते है। हमारे प्रदेश और समूचे देश में प्रवृत्ति हमेशा से रही है। ये अघोषित सत्य रहा है की छोटे-मोटे मालमात की प्राथमिकी कभी नहीं होती। यही छोटे-मोटे अपराधी किसी दिन बड़े और विकृत अपराध को अंजाम देते है। हम गिरते मानवीय मूल्य और क्षरण की ओर जाती सभ्यता में जी रहे है। ये क्षरण किस हद तक होगा मालूम नहीं किन्तु। इस तरह की घटना में ना जिम्मेदारियों से हम बच सकते है ना ही सरकार। ये जरूरी है कि ईमानदार प्रयास हो। पुलिस प्रसासन की कार्यप्रणाली में लम्बे समय से चली आ रही खामियों को उजागर कर सुधार किया जाय तो ये बेहतर तरीका होगा बजाय इसके की उन्हें अनवरत छिपाते रहा जाय। ये भी किसी से छिपा नहीं है की प्रदेश पुलिस बल की भारी कमी है। जरूर है कि उसे पूरा किया जाय। किन्तु इन सबके बीच कार्यप्रणाली में पूरी पारदर्शिता का होना भी जरूरी है। निलम्बन का हथियार केवल एक बहाने जैसा लगता। एक फौरी मानसिक राहत जैसा। निलम्बन के बाद बहाली हमेशा होती है। कुछ की जल्दी कुछ की थोड़े दिनों में किन्तु लोकतन्त्र और कानून व्यवस्था का निलम्बन कभी का भूलने वाला दर्द दे जाता है। सभ्यतायों और उसके निगहबानों पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

भक साला सब बेकार!!!

पिछले इतवार को,
छत पर गया,
कुर्सी,अखबार और चटाई  टाँग कर 
छत पर जाकर,
दूरतक नज़र दौड़ाई 
दुनियादारी में लगे 
फॅसें लोगों देखा,
कुछ सोचा, कुछ कोसा,
थोड़ा इधर, 
थोड़ा उधर, 
ताकाझाँकी की 
मोहल्ले का मुआयना किया,
मन ही मन बातें की,
थोड़ा इसको थोड़ा उसको गलियाया,
कुर्सी डाली,
बैठ गया,
जबर अँगड़ाई ली,
अखबार पर चढ़ाई की,
अखबार पूरी चौड़ाई तक फैलाया,
सूरज के ताप को धता बताया,
एक एक खबर पढ़ी,
फिर पूरा अखबार घोट डाला 
मोहल्ला, नगर, देश विदेश तक 
हर खबर, 
का स्टीकर मन में चिपकाया,
नेता, मन्त्री, से लेकर ओबामा तक 
सबको गलियाया, 
देश का कुछ हो नहीं सकता,
आदमी ठीक हो नहीं सकता 
भक साला सब बेकार!!!
थके अलसाये हुए शरीर और मन के साथ 
फिर नीचे गया,
एक कटोरी में कड़वा तेल लाया  
सर पर चुपड़ा,
सर थपथपाया,
फिर पूरे बदन में लगाया,
सूरज के ताप से बंद होती 
आँखों को जोर से मीशा 
ले-देकर चटाई बिछाई,
और फ़ैल गया,
टाँगें फैलाकर,
सूरज से मुँह चुराकर 
देर तक नींद के नशे में सुस्ताता रहा,
देर तक नींद के नशे में सुस्ताता रहा। 

@विक्रम  सर्वाधिकार सुरक्षित 



चौराहे पर लुटता चीर....

बुलन्दशहर की घटना पर जनाबेआली आज़म खान की टिप्पणी आयी!!! ये सोचने में कई लम्हात खर्च हो गये कि राजनीति कितनी क्षुद्रता तक जा सकती है। आदमी की जबान को कितना बेशर्म और कितना बेकाबू बना सकती है। इसी झंझावात से दिमाग थोड़ा बाहर निकला तो अटल जी की कालजयी रचना याद आयी।

चौराहे पर लुटता चीर,
प्यादे से पिट गया वजीर,
चलू आखिरी चाल की बाजी छोड़,
विरक्ति रचाऊँ मैं,
राह कौन सी जाऊँ मैं .....

नज़रबन्द मानवधिकार, ईरोम चानू शर्मिला और मलोम हत्याकाण्ड।

ये सनद रखते हुये कि भारत गाँधी का देश है।जरा गौर करे 15 साल अनशन पर रही ईरोम शर्मिला। सन 2000 में मलोम हत्याकाण्ड के विरोधस्वरूप AFSPA को हटाने की मांग को लेकर। मालोम हत्याकाण्ड में 10 लोग मारे गये। मारे गये लोगों में २ लोग" नेशनल ब्रेवरी अवार्ड" प्राप्त थे, ८ वर्षीया लड़की और 62 वर्षीया महिला भी!!

शर्मिला का विरोध कहाँ गलत था?  कोर्ट ने कछुआ चाल चलते हुये 14 साल बाद पूरे मलोम हत्याकाण्ड को फर्जी बताया। वैसे भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में विरोध हक़ है। शायद AFSPA पर ईरोम की बात सुननी चाहिये थी। बीच का रास्ता निकलना चाहिये था। भारत का सम्विधान कहता है 100 दोषी छूट जाये तो ठीक किन्तु निर्दोष की सजा नहीं होनी चाहिये। ऐसे में मलोम हत्याकाण्ड निरंकुशता ही तो थी।मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन ही तो था।
साभार:http://www.livemint.com/

मुझे अखबार की वो खबर आज भी याद है जब जन्तर-मन्तर में आसाम रायफल्स के खिलाफ शर्मिला के समर्थन में 30 महिलायों के नग्न प्रदर्शन की खबर छपी थी। ये बैनर लेकर की "Indian Army Rapes Us" यहाँ भी मौका था की बीच रास्ता निकाला जाता। किन्तु नग्न हुयी महिलायों को 3 महीने के लिये जेल भेज दिया गया। अभी भी वक्त है। कोई तो हल निकाल ही सकती है सरकार।

खैर सरकार जिद्दी हो सकती है कुछ मजबूरियाँ भी हो सकती है। पर ईरोम शर्मिला असाधारण है। उनके लम्बे और असाधारण संघर्ष को परास्त होते देखना बड़ा कष्टदायी है। 1957 से लागू AFSPA के नफे और नुकसान की समीक्षा भी सरकार की जिम्मेदारी है। नफे और नुकसान पर क्यों ना भारत सरकार एक स्वेत पत्र जारी करके ये बताये की मानवधिकारों को अब तक नज़रबन्द रखने से क्या नफे हुये। बेमियादी नज़रबंदी पर सवाल उठने तय है।

मजदूरी कर रहे है, घर चला रहे है।

दिल्ली के कड़क लौण्डे,
खोज-खोज के बैंड बजा रहे है,
आप के विधायक रोज जेल जा रहे है,
सलमान खान जश्न मना रहे है,
संजय दत्त फिल्मे बना रहे है,
नेताजी चुनाव की रणनीति बना रहे है,
आदर्श सोसाइटी पर विचार किये रहे है,
स्कूल फीस बढ़ा रहे है,
बाकी हमारे जैसे दफ्तर जा रहे,
मजदूरी कर रहे है, घर चला रहे है,
देश का खर्च चला रहे है।

नोयडा का साइकिल ट्रैक प्रोजेक्ट और उसकी चुनौतियाँ

दिल्ली जाईये, रिहायशी इलाको में सड़क की चौड़ाई को आधा करती पार्क वाहनों की कतारें, इन्ही वाहनों का बोझ उठाता फुटपाथ, चलने की लिये रस्ते की जुगत भिड़ाते पैदल, जगह जाम की स्थिति और बात-बात पर सर फुटब्ब्ल की नौबत। ये दिल्ली का मोटा-मोटा सा खाका खींचा है । अखबार पढिये कभी NGT, कभी न्यायालय, कभी सरकार छोटे-मोटे गैर स्थायी तरीके अपनाकर प्रदूषण और यातायात दोनों की समस्या साथ चोट करना चाहती है। किन्तु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा है। ऐसे समय में ये सोचने की जरूरत जाहिर है की इन सब समस्याओं का स्थायी निवारण किस तरह से सुनिश्चित किया जाय।  

ऐसे में दिल्ली से राष्ट्रीय राजमार्ग -24 होते हुये नोयडा के सेक्टर -62 में प्रवेश करिये। तो कुछ उम्मीद भरे प्रयास आपको दिखेंगे। नज़ारा देखकर नज़रे टिकी रह गयी। सेक्टर -62 के थाने, IIM लखनऊ के कैंपस से होकर गुजरने वाली सड़क के दोनों ओर लालरंग की कारपेट सी बिछी नज़र आती है । इस कारपेट पर और इसके किनारे लगे बोर्डस पर कई जगह साइकिल के निशान बने हुए है। जाहिर है की साइकिल के लिये समर्पित पथ का निर्माण किया गया है । ये न सिर्फ देखने में आकर्षक था बल्कि मन में उत्साह भर देने वाला है। मेट्रो शहरों में रहने वाले लोग जिन्हें अपना स्वास्थ्य दुरुस्त रखने के लिये सुबह-शाम जिम में जाकर कृत्रिम साइकिल चलनी पड़ती । ऐसे में यदि साइकिलिंग रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन जाये। तो ये एक सपने के सच होने जैसा ही तो है। बिना किसी खर्चे, बिना किसी प्रदूषण के आप गन्तव्य तक पहुँच रहे है। किन्तु इस सपने के साथ कुछ चुनौतियाँ भी है। जो अभी कायम नज़र आयी।
साभार: http://www.hindustantimes.com

साइकिल ट्रैक के साथ-साथ चलिये, आप पायेंगे की इस ट्रैक का इस्तेमाल इक्का-दुक्का लोग ही कर रहे है। हालाँकि कुछ लोग साइकिल से मुख्य मार्गो में चलते दिखते है पर साइकिल ट्रैक से दूर नज़र आते है कई जगह पर साइकिल ट्रैक पर कारों ने अतिक्रमण किया हुआ है, कई जगह स्ट्रीट वेंडर्स भी खड़े दिखायी देते है। केवल कुछ एक चौराहों पर साइकिल चालकों के लिये विशेष ट्रैफिक लाइटिंग सिस्टम का भी इस्तेमाल किया गया है। किन्तु इसका पालन कितना होगा ये सुनिश्चित करना किसकी जिम्मेदारी है? ये अभी तक जाहिर नहीं है। जब तक जिम्मेदारी तय नहीं है तब तक लोगों को साइकिल का इस्तेमाल करने के लिये प्रेरित करना दूर की कौड़ी होगी। देश और खासकर प्रदेश में सड़क दुर्घटनाओं की आँकड़े सीधा संकेत करते है कि सड़क पर किसी भी तरह का दुपहिया वहां चलाने में पहली जरूरत है चालक की सुरक्षा। सुरक्षा के कड़े मानदण्ड तय किये बिना इस प्रोजेक्ट की सफलता एक मारीचिका को पाने की कवायद भर है।


अतैव दीगर है नोयडा के साइकिल ट्रैक के रख-रखाव, नियमित जाँच, यातायात के नियमों के पालन इत्यादि को सुनिश्चित करने के लिये अलग से अधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित होनी चाहिये। इस बावत एक हेल्पलाइन की व्यवस्था हो जो 100 नंबर जैसी व्यवस्था के समानान्तर हो, जिमसें शिकायत निवारण के जिम्मेदारी भरी व्यवस्था हो। कुल मिलाकर साइकिल सवारों की शिकायत को प्राथमिकता से सुना जाय।


इसके साथ सहकारिता के सिद्धान्त को भी साथ लेकर चला जा सकता है।  पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की तर्ज पर लोगो को भी जोड़ने की जरूरत है। जहाँ-जहाँ से होकर ट्रैक गुजरता है उसके आस-पास या सामने स्थित संस्थानों को ट्रैक की निगरानी की जिम्मेदारी दी जाय। मतलब यदि ट्रैक पर अतिक्रमण है, कोई नया काम चल रहा है तो पुलिस या जिम्मेदार अधिकारी को सूचित करना उनकी जिम्मेदारी हो। खासकर नोयडा में RWA इसमें महती भूमिका निभा सकते है। 

कनाडा के ब्रिटिश कोलम्बिया प्रवास के दौरान रोजमर्रा के कामो में साइकिल का इस्तेमाल भरपूर होता देखा है। साथ ही साथ ये  की सड़क पर चलने वाला पैदल या साइकिल सवार किसी भी बड़े वाहन पर प्राथमिकता पता है। यदि किसी कारणवश पैदल या साइकिल सवार को किसी भी तरह का नुकसान पहुँचता तो मान लीजिये की कानून पूरी मजबूती के साथ पैदल या साइकिल सवार के साथ खड़ा होगा। यहाँ पर अलग से साइकिल ट्रैक, जगह-जगह पर साइकिल को बाँध कर रखने वाले स्टैण्ड उपलब्ध है। यहाँ की लोकल रेल और बस में साइकिल लेकर चलने की सुविधा उपलब्ध है। ये साइकिल प्रोजेक्ट मुख्यमंत्री  नीदरलैण्ड से लेकर आये है। सो ये समझना भी जरूरी है की सत्तर के दशक में गाड़ियों का देश बन गये नीदरलैण्ड ने अनवरत होती साइकिल सवार बच्चों और बड़ो की होती मौतों के उपरान्त हुये सांकेतिक धरना प्रदर्शनों को संज्ञान में लेते हुये। साइकिल सवारों को बढ़ावा देने वाली नीतियाँ बनायीं। अलग से साइकिल के ट्रैक बनाये, नियामक संस्थाएँ बनायीं। आज नीदरलैण्ड पुनः साइकिल सवारों का देश है।


कुछ आँकड़ों पर नज़र: 
- उत्तर प्रदेश में साइकिल की खरीद पर वैट हटा दिया गया है। 
- नोयडा में कुल मिलाकर ४२.5 किलोमीटर लम्बा ट्रैक बनाने का प्रावधान है 
- ग्रेटर नोयडा, लखनऊ, आगरा, आगरा से इटावा लायन सफारी तक साइकिल ट्रैक का काम चल रहा है। 
- देश में सड़क दुर्घटना में मरने वालो में 25 प्रतिशत लोग दुपहिया वहां वाले होते है।

हर दहलीज़ लाँघ गयी जिन्दगी

हर दहलीज़ लाँघ गयी जिन्दगी 
अब चैन कहाँ और सुकून कहाँ। 

आपाधापी में खुद ही उलझ गये  
अब वो फुरसत का मजमून कहाँ।

        ना अदब आशिकी में, ना मौज मौसिकी में
अब मौजो में वो जूनून कहाँ।


@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित 




बहुत मुँहफट है, बहनजी

दलित आन्दोलन के प्रणेता थे मान्यवर कांशीराम जी। बहनजी उसी आन्दोलन के राजनीतिक पैदाइश है। आन्दोलन और उसके मूल्यों से बहनजी का धेले भर का लेना देना नहीं है। जिस तरह अण्णा जी के आन्दोलन से केजरी निकले बिलकुल उसी तरह मान्यवर कांशीराम जी के एक लम्बे और मूल्यों पर आधारित आन्दोलन से जन्मी बहनजी।  मान्यवर कांशीराम जी को और उनके परिजनों को उनके अन्त समय में किस तरह प्रताड़ित किया गया। ये बहनजी  से बेहतर कौन जानता है?? बहुजन समाजवादी पार्टी लोकतान्त्रिक व्यवस्था के तानाशाही पार्टी है।

कुछ रोज पहले बीजेपी के नेता ने बहनजी पर जी पर जो टिप्पणियाँ की, उनके से अन्त में की कई एक टिपण्णी विशेष को छोड़ दिया जाय तो ये बात तो सही ही है ना कि बहनजी टिकट बेचती है!!! उनके पूर्व सिपहसालार स्वामीप्रसाद जी में भी यही बात कहीं थी। बहुजन समाजपार्टी से जुड़े अधिकतर लोग भी यही कहते आये है कहते है। निचले सदन के विधायक, एमएलसी सभी का टिकट बेचा जाता है। एक मुकदमा एक कार्यवाही उन भी बनती है।

खैर, बहनजी की खुद भी तो बहुत मुँहफट है बहुत मुँहफट,  गाँधी से लेकर देवी देवतायों तक को नहीं बक्शा। आज बयान आया है की वो देवी, पर ये नहीं क्लियर किया की कौन सी देवी है जो अक्सर गाँव घरों में आ जाती है या जो मंदिर में बैठती है। 


तब हाथो में किस्मत की लकीर आयी है ।

अक्सर सजाता रहा ख्वाब मखमल के
तब जाकर पैरो तले जमीन आयी है।

उम्र गुजारी है दस्तकारियों में हुज़ूर
तब हाथो में किस्मत की लकीर आयी है ।

मान लिया की नहीं हूं किसी मजहब का मैं
अब देखिये थोड़ी बहुत तहजीब आयी है।

अब मुकद्दर से लड़ना छोड़ दिया विक्रम
जो जिन्दगी आयी है बड़ी लजीज आयी है।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित

भारतीय रेल की लेट लतीफी पर एक विचार

आज श्रमशक्ति एक्सप्रेस रास्ता चलते-चलते बिदकने लगी, इतनी बिदकी इतने नखरे दिखाये की कानपुर सेण्ट्रल आते-आते पूरे 3.30 घण्टे लेट हो ली।

कुछ छात्र भी ट्रेन में थे, जो दिल्ली से कानपुर कोई प्रतियोगी परीक्षा देने आये थे। परीक्षा 10 बजे से शुरू थी। ट्रेन जितना बिदकती रही उतनी ही हवाईयां छात्रों की उडी रही। सेण्ट्रल में ट्रेन आयी 10.05 मिनट पर, तय था की छात्र परीक्षा छूट गयी।

अब ऐसे मामलात में क्या छात्रों ने जो द्वन्द सहा जो पीड़ा सही, जो हानि हुयी उनकी, उसकी  भरपाई की जिम्मेदारी क्या रेलवे की नहीं है??? वो रेलवे तो तत्काल टिकट कराने पर वरिष्ठ नागरिक को वरिष्ठ मानती ही नहीं, वो रेलवे जो प्रीमियम तत्काल में फ्लाइट के टिकट से भी ज्यादा चार्ज करती है। वो रेलवे जो तत्काल टिकट कैंसिल कराना पड़े तो पूरे पैसे डकार जाती है। तत्काल में टिकट कैंसिल करने पर क्या सीट खाली जाती है जो पूरा पैसा डकार जाया जाता है?? भारत की किसी ट्रैन में कोई सीट खाली जाती बजी है क्या? सामान्य टिकट कब और कैसे बुक होती है ये शायद आपको ध्यान भी ना हो।

कुल मिलाकर रेलवे जिस तरह की खुला दोहन कर रहा है उसके पश्चात लेट लतीफी पर हुये नुकसान की भरपाई रेलवे की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिये। भक्तगणों के हमले की पूरी उम्मीद है।

.... सियासत की और सियासतदार मशहूर हो गये।

सैकड़ो गलियाँ, हज़ारों घर बेनूर हो गये
सियासत की और सियासतदार मशहूर हो गये।

निगाहों ने देख लिये कैसे कैसे मंजर 
झुक गयी निगाहे और हम मजबूर हो गये। 


थोड़ी ही दूर चले है राहें जिन्दगी में 
अभी से थक गये थककर चूर  हो गये है। 

शहरों में  जीते रहे जो अक्सर जिन्दगी अपनी 
शहरी  हो नहीं पायें गाँवों से भी दूर  गये। 

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित 

....भूतो ना भविष्यति

मामला मेरे संज्ञान में नहीं,
जाँच चल रही है,
कड़ी कार्यवाही होगी,
अपराधियों को बख्शा नहीं जायेगा,
ये जुमले है? 
ढाढ़स बाँधने के तौर तरीके है?
व्यवस्था चलाने के सलीके है?
या जिम्मेदारियों की थूकी पीकें है?

रोज सुबह अखबार में,
पढ़ता हूँ, सोचता हूँ,
क्या हुआ?
क्या होने को है?
क्या हो पायेगा?
भूतो ना भविष्यति ही,
चरितार्थ होता, होता जायेगा।
@ सर्वाधिकार सुरक्षित

अग्रिमा की आर्ट

...इन्साफ फ़ुटबाल है

इन्साफ फ़ुटबाल है
इंसान फ़ुटबाल है
न्यायालय टकसाल है,
इंतज़ार का,
दुर्व्यवहार का

कानून जुनून है
सत्य को दबाने का
मनमाफिक करने का
लोगो को धरने का
सच को हरने का

न्यायालय में,
न्याय के थोक और फुटकर विक्रेता
अदालतों के विजेता
अपील करने में
जलील करने में
माहिर,
पीड़ित की लिखाई पढ़ाई
पीड़ित से कमाई धमाई
थोड़ा बहस थोड़ा मुहावसे
बाकी तारीख,

और पीड़ित
न्याय को पकड़ने में
जकड़ने में 
के बॉल सफ़ेद
चप्पले घिसी हुयी
झुर्रियां पड़ी हुयी
मुसीबतें खड़ी हुयी
बीबी लड़ी हुयी
बेबसी जड़ी हुयी
नींद उडी हुयी
कभी छले जाने का दर्द
कभी न्याय ना पाने का दर्द
दर्द ही हमसफ़र
दर्द ही हमदर्द

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित

....... फिर से नर्सरी में पढ़ाई शुरू करते है।

फुरसत की ईकाई दहाई शुरू करते है
फिर से नर्सरी में पढ़ाई शुरू करते है। 

एक ही कमरे में बैठकर गुथमगुत्था 
भाईयों बहनों से लड़ाई शुरू करते है। 

लूटकर लानी है गर वो पतंग फिर से
तो फिर मिल के चढ़ाई शुरू करते है। 

खेलते है खेल डॉक्टर मरीज वाला 
मुफ्त में एक दूसरे की दवाई शुरू करते है। 

गमजदा रहने में लुत्फ़ कहाँ आता है 
वो बच्चों सी निश्छल हँसाई शुरू करते है।  

@Vikram All Rights Reserved

जैसे रौशनी से सगाई कर ली।

मैंने तुझसे लड़ाई कर ली
अपनी जिन्दगी परायी कर ली।

वो देखो कैसे चमकता है चाँद
जैसे रौशनी से सगाई कर ली।

फूलो के खिलने का सिलसिला है
जैसे पौधों ने छटाई कर ली

जब भी उठा है दर्द जहन में
अपने आप ही अपनी दवाई कर ली

किसको बुलाते फिरते इधर उधर
अदालतों में हमने खुद ही गवाही कर ली।

@Vikram all rights reserved.

चुप रहता हूँ, जुर्म को हवा देता हूँ.....

जब भी होता है, दर्द दवा लेता हूँ
हर बार सच को छुपा लेता हूँ।

खड़ा रहता हूँ, तमाशाई बनकर
चुप रहता हूँ, जुर्म को हवा देता हूँ।

जिन्दगी मुझसे कभी सँवर नहीं पायी
आग है, पर अधूरे हक़ से हवा देता हूँ।

आओ तुम भी बैठो मेरे साथ कभी
ग़मों में मुस्कराने की अदा देता हूँ।

ऐ मालिक मेरा हक़ ना छीन मुझसे
मैं भी दरबार में तेरे हाजिरी लगा देता हूँ ।

@विक्रम सर्वाधिकार सुरक्षित



ये जुलाहे तेरी कारीगरी की दरकार है मुझको

ये जुलाहे तेरी कारीगरी की दरकार है मुझको
सुलझाता हूँ जिन्दगी, उलझ जाती है बेवजह

@Vikram
जिन्दगी सियासत के शामियाने में।


कल रविश कुमार द्वारा सातवें वेतन आयोग पर लिखे आर्टिकल का जवाब

कल रविश कुमार द्वारा सातवें वेतन आयोग पर लिखे आर्टिकल पर नज़र पड़ी। उनके तर्कों और तथ्यों को पढ़ने और समझने की कोशिश की। पर कोशिश नाकाम रही। इसी कोशिश में पिछले वर्ष की कुछ घटनाये याद आ गयी। जानी मानी बहुराष्ट्रीय कम्पनी के एक कर्मचारी, उम्र करीब ४२ साल की डेंगू से मृत्यु हो गयी। कम्पनी द्वारा कर्मचारी का कोई बीमा नहीं था। अच्छी खासी कमाई करने वाले कर्मचारी का परिवार आगे क्या करेगा कैसे करेगा ये एक बड़ा सवाल हो गया। कुछ सहकर्मियों ने मिलकर कुछ आर्थिक मदद दी किन्तु 8 -10 लाख रुपये में जिन्दगी २ बच्चों और बीवी की जिन्दगी बसर हो सकती है क्या? सनद रहे की कर्मचारी मृत्यु से पूर्व भारत सरकार को अच्छा खासा टैक्स भुगतान भी करता था। जीवित था तो सरकार ने प्रत्य्क्ष और अप्रत्क्ष्य दोनों तरीके से टास्क्स वसूला। आदमी मर परिवार सड़क पर!!! सरकारी जिम्मेदारी सिफर!!!!!

जब से कोई वेतन आयोग गठित होता है , जब भी किसी का महँगाई भत्ता बढ़ता है।  हर उस बार ना जाने क्यों मैं इस सोच से किनारा नहीं कर पता की क्या वेतन आयोग के साथ-साथ गरीबी रेखा रिव्यु करने के लिये भी किसी आयोग का गठन हुआ क्या? नहीं हुआ!!! क्यों नहीं हुआ? गरीबी रेखा को महँगाई भत्ते के अनुक्रमानुपाती क्यों नहीं बढ़ाया गया? आखिर क्या वजह है की वेतन आयो केवल कुछ लाख लोगों की वेतन बढ़वाने के लिये गठित होता है। होता है तो होता रहे कोई बुराई नहीं। पर क्या उसी अनुपात में अन्य लोगों की जरूरतें भी रिव्यु की गयी। क्या अनाज का समर्थन मूल्य भी उसी दर से बढ़ा दिया गया? किसानों का सूखा राहत मुआवजा आखिरीबार काम और किस हिसाब से रिव्यु हुआ था। क्या आपमें से किसी कोई ध्यान है।

सरकारी टैक्स सरकारी और गैर सरकारी कर्मचारियों दोनों के लिये बराबर है। किन्तु जरूरतें केवल एक की ही रिव्यु होती है? सरकार की जिम्मेदारी लोकतन्त्र के आखिरी आदमी तक राहत पहुँचना है। पर क्या वास्तव में ऐसा है। हम सब सरकार के लिये तो काम करते है। सरकार को टैक्स देने के लिये ही तो काम करते है।  बदलें में सरकार हमे क्या देती है? सामाजिक सुरक्षा की केवल सरकारी लोगो की जरूरत है? बाकी हवा हवाई है? हड़ताल और यूनियन फॉर्म करने की आज़ादी क्या देश के हर कर्मचारी संगठन को है? क्यों नहीं है?

रविश जी लिखते है की सरकार ठेके पर काम करने करने वाले लोगों का इस्तेमाल कर बहुत सारा धन बचा रही है!!!  जाहिर नहीं है कि देश के सकल घरेलू उत्पाद में ८% के आस-पास का हिस्सा रखने वाली पूरी की पूरी सूचना पौद्योगिकी ठेके पर ही चलती है। हर बड़ी कम्पनी में सिक्योरिटी, आईटी स्टाफ, फैसिलिटी का पूरा स्टाफ, प्रोजेक्ट में काम  करने वाले बहुत सारे रिसोर्स श्रम कानूनों को धता बताते हुये। काम वेतन पर काम करते है। किसी भी बहुमंजिला भवन में देख लिजिये १२ घटे से ज्यादा काम करने वाले लोग ठेके पर होते है। ठिकाना ना पगार का। क्या रविश को प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पत्रकारों के शोषण के बारे में जानकारी नहीं है।  १२ घण्टे काम और पगार बिलकुल बेकार?  सरकार बहुत कॉपोरेट से देखकर सीखती है।

कुल मिलाकर वेतन आयोग का गठन जरूरी है, और होना भी चाहिये किन्तु उसी आवृत्ति से अन्य क्षेत्र ( संगठित और असंगठित क्षेत्र के लोगों की जरूरतें भी देखनी चाहिये। उसी दर से सामाजिक सुरक्षा, स्वस्थ्य सुरक्षा सभी की होनी की चाहिये ना केवल साहेबान की। मान्यतायों के हिसाब से जिनकी पगार तो बस कहने के लिये होती है।




कानूनों की फेहरिस्त में इजाफा मात्र है, पिलियन राइडर को हेलमेट की अनिवार्यता

कल नोयडा से दिल्ली जाना हुआ। नोयडा की उन ट्रैफिक रेडलाइट पर रुकना हुआ जहाँ यदा-कदा लोग या तो पुलिस वालों को देखकर रुख जाते है। या फिर अपनेआप की आवाज़ सुनकर। रेडलाइट ध्यान उन बाइक सवारों की तरफ खिंचा चला गया। जिनमे पीछे बैठने वालों ने फैंसी से हेलमेट लगा रखे थे। ये देख कर अचानक याद आया कि कल अखबार में खबर थी कि पीछे बैठने वालों को हेलमेट लगाना अनिवार्य कर दिया गया है।


इसी बीच एक और वाक्या मानसपटल से होकर गुजरने लगा। चन्द महीनों पहले का नोयडा के सेक्टर-62 में लेबर चौक के पास "फादर अग्नेल स्कूल" के पास तिराहे पर खड़ा एक पुलिसकर्मी याद आ गया। जो अपनी पर्सनल बाइक को स्टैण्ड में लगाये खड़ा कुछ चुनिन्दा आने-जाने वालों को रोक रहा था। मेरे जहन में कई सवाल आये। जैसे क्या ये पुलिसवाला आधिकारिक ड्यूटी पर है? क्या इस पुलिसवाले के पास चालान काटने का अधिकार है? क्या पुलिस कण्ट्रोल रूम को ये सूचना है कि ये उनका एक पुलिस वाला यहाँ खड़ा है और चेकिंग कर रहा है? यदि पुलिस वाले के पास  चालान काटने का अधिकार नहीं है तो पुलिसवाला बाइक में ट्रिप्प्लिंग करते लोगों, या अन्य ससंकित लोगों को रोक कर क्या हासिल करना चाहता है?  कई बाइक वाले एक-एक के रोके गये और थोड़ी बहुत बातचीत के बाद चले गये जाहिर है कुछ आदान-प्रदान भी हुआ। सनद रहे चण्डीगढ़ में रहने के मेरे अनुभव के आधार पर जाँच के लिये आधिकारिक तौर पर तैनात पुलिस वाले कम से कम २ होते है और चालान बुक के साथ होते है । चालान बुक नहीं है तो किसी को रोकने का उद्देश्य वसूली के अलावा क्या हो सकता है?

खैर पीछे बैठे लोग हेलमेट लगाये ये सरकारी आदेश पहले से लागू कई कानूनों और आदेशों की फेहरिश्त में एक नया जुड़ाव है। उद्देश्य जाहिर है और काबिलेतारीफ भी। किन्तु व्यवहारिकता ससंकित करती है। लगता है कि मानों वसूली का एक औजार और तैयार!! क्यूँ का जवाब पाने के लिये नोयडा की बात करते है। नोयडा NCR का हिस्सा है। उत्तर-प्रदेश सरकार की आय का सबसे बड़ा श्रोत भी। उद्योग-धन्धो, गाड़ियों के रजिस्ट्रेशन, काम करने वाले वेतनभोगियों की बड़ी सँख्या सब सरकार के आय का श्रोत है। अब यातायात व्यवस्था पर गौर करिये। लगभग हर चौराहे पर रेडलाइट है। किन्तु कब कौन सी चलती है ये विश्वास के साथ नहीं कहा जा सकता। साथ ही साथ रेडलाइट चल रही है तो क्या उसका पालन भी हो रहा है? जिन चौराहों पर पुलिस यदा-कदा उपलब्ध होती है। यदि होती भी है तो ट्रैफिक के दबाव के अनुरूप होती है क्या? दुखद ये है कि इस पर कतई ध्यान नहीं दिया जाता। 

यहाँ पुलिस अक्सर चालान के आँकड़ें जारी कर के बताती है की यातायात व्यवस्था दुरुस्त करने में उसने कितनी मशक्कत की। इनमे से अधिकतर चालान औचक निरीक्षण चेकिंग अभियान चला कर किये जाते है। साल में ज्यादा से ज्यादा 8 -10 बार। चालान काटे जाते है किन्तु क्या ये चालान यातायात व्यवस्था को दुरुस्त करने के उद्देश्य से काटे जाते है? क्या ये बेहतर नहीं होता की इन औचक निरीक्षणों के साथ-साथ हर रेडलाइट पर ये व्यवस्था नियमित होती। नोयडा की सड़कों पर बिना लाल या नीली बत्ती के भी हूटर बजती ना जाने कितनी गाड़ियाँ रोज का रोज घूमती है। ऐसी कितनी गाड़ियों के चालान काटे जाते है? कुल मिलाकर जबतक ट्रैफिक व्यवस्था की निगेहबानी नहीं बढ़ाई जाती। जब तक नियम कायदे-कानून के पालन के उद्देश्य के साथ आगे काम नहीं किया जाता। तब तक नया कानून केवल बेईमानी है। वसूली का एक औजार मात्र है। नोयडा की स्थिति प्रदेश के अन्य शहरों की स्थिति की भी गवाही भी देता है।

जिन्दगी, सियासत के शामियाने में

व्यवस्था और सियासत के ताने-बाने में लिपटी जिन्दगी के कई पहलुयों से परतदर-परत गुजरती, निहारती और विचरण करती, खुशरंग, संजीदा कवितायों और ग़ज़लों की संग्रह, मेरी पहली किताब "जिन्दगी, सियासत के शामियाने में" आपके लिये उपलब्ध है। नीचे दिये गये लिन्क के माध्यम से आप अपनी प्रति बुक करा सकते है।
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बेटी अग्रिमा द्वारा दिया गया गिफ्ट "फादर्स डे पर" एक पापा को एक बड़े-बड़े पापा को

बेटी अग्रिमा द्वारा दिया गया गिफ्ट "फादर्स डे पर" एक पापा को एक बड़े-बड़े पापा को 

पेट्रोल पम्प पर मुस्कराते मोदी

अपनी सरकार के कार्यो का जो ज्यादा विज्ञापन करते है। वो मियाँ मुँह मिठू बनने से ज्यादा कुछ नहीं। अब देखिये केजरी ने जमकर विज्ञापन दिया, भक्तों ने खूब कोसा कोसने वाली बात भी थी!!! अब निकल कर आया है की। मोदी जी की सरकार ने भी हज़ारों करोड़ उड़ा दिये। भक्त यकीन करने को तैयार नहीं।

पर एक बड़ा सच जो नंगी आँखों से देखा जा सकता है। कहीं भी किसी भी समय। देश के किसी भी पेट्रोल पम्प पर जाइये, मोदी जी आपको मुस्कराते हुए मिलेगें। बड़े-बड़े  सरकारी विज्ञापनों में!!!! ये भी खर्चा है जो कृषि कल्याण सेस के लिये इस्तेमाल हो सकता था किन्तु विज्ञापन जरूरी है। बाक़ी की वसूली हमसे कर ही लेगी सरकार। जब चाहा तब फाइनेंस बिल ले आयेंगे।

उपलब्ध आँकड़ों के हिसाब से 1 लाख से ज्यादा पेट्रोल पम्प है भारत में,  जो होर्डिंग्स लगाये गए है थोक में भी उनकी कीमत 2500 से कम नहीं हो सकती बाकी वो सरकारी संसाधन जो डिज़ाइन करने में लगे अलग। कुल मिलाकर मोदी सरकार ने  कम से कम 1lakh ×2500 मूल्य के विज्ञापन कर ही दिये, बाकी अखबारो में जो छपता है पूरा-पूरा पेज उससे हम सब वाकिफ  है। आप ही विश्लेषण करले खर्चे का किसी RTI की जरूरत है भी क्या?

NH-2 का नशा

कानपुर से इलाहबाद जाते हुये राष्ट्रीय राजमार्ग-2 बीच-बीच में शराबियों की तरह लहराने लगता है, झूमने लगता है। मालूम होता है बच्चन साहब की मधुशाला का सबसे ज्यादा असर इसी पर हुआ है। समय पर ब्रेक ना लगायी तो सब हवा हो जाये इतना झूमता है!!! बाकी देश के वफादार देशी कुत्तों के लिये ये मौत का हाईवे है। अनगिनत कुत्ते सड़क पर पोस्टर बने हर 2-3 किलोमीटर पर मिल जाते है। जाने और आने दोनों ओरे की लेन को जोड़ लिया जाय तो कुत्तों को मिलने वाली कुत्ते की मौत का आँकड़ा हर 2 किलोमीटर एक है।  जाने भगवान इनकी आत्मा की शान्ति देता होगा की नहीं।

देखिये की हम सँसार में उपलब्ध सबसे वफादार कौम का क्या हश्र क्या करते है।पोस्टर बनाकर छोड़ देते है आखिर हम इंसान है सबसे दिमागदार कौम!! जरूरत के हिसाब से जो भी बदलना चाहे बदल दे।

स्कूल फीस और लोकतान्त्रिक तानाशाही

पिछले दिनों जब बेटी के स्कूल में फीस जमा करने पहुँचा।बेटी KG में पढ़ती है। पता चला फीस 25% बढ़ा दी गयी। इस बावत सूचना केवल स्कूल की फीस जमा करते वक्त मिली। 25% बढ़ोत्तरी का मतलब लगभग 20 हज़ार साल का खर्चा और (ट्रांसपोर्ट की फीस नहीं बढ़ी इसलिये 20 हज़ार)।

CBSE के नियम कहते है। 10% से ज्यादा फीस नहीं बढ़ सकती, बिना अभिवावक की सहमति के भी फीस नहीं बढ़ाई जा सकती। स्कूल के अन्दर ड्रेस किताब इत्यादि बेचना गलत है। इन्ही नियमो का हवाला देते हुए स्कूल के प्रिंसिपल जवाब माँगा, कोई जवाब नहीं मिला!!! एक दो बार reminder भेजे। जवाब नहीं आने पर ट्रस्टी को लिखा, फिर अचानक एक दिन प्रिंसिपल ने बुलाकर फीस बढ़ाने की जरूरत को तर्कों से स्पस्ट किया। जबरदस्ती के तर्क!! उगाहने वाले तर्क!!! मैंने प्रिंसिपल पर एक जलता हुआ सवाल दागा, क्या आपने स्कूल के शिक्षको को 25% का इन्क्रीमेंट दिया? क्या आपने RTE का पालन करते हुये गरीब बच्चों को स्कूल में एडमिशन दिया?  जवाब गोलमोल इतने की मैं भी उलझ गया। RTE के नियमो का जबरदस्त उल्लंघन चल रहा है। सबको पता है सब बस नज़रअंदाज़ किया जाते है।

खैर मैंने और मेरे जैसो बहुतो ने नॉएडा के डीएम को ख़त लिखे। डीएम साहब ने पक्ष सुनने के बाद जाँच बिठा दी।स्कूल्स से फीस कम करने का अनुरोध किया। स्कूल ने नहीं सुनी। डीएम भी असहाय उन्होंने विस्तृत जांच रिपोर्ट cbse को भेजी कार्यवाही की मांग की। पर कार्यवाही हवा!!!
व्यक्तिगत तौर मैंने डीएम की रिपोर्ट का हवाला देते हुये, प्रदेश के मुखिया अखिलेश जी, स्म्रति ईरानी जी, प्रधानमंत्री जी को ट्वीट किया, कई इ-मेल लिखे। कुल मिलकर 2 महीने गुजर गये और अभी तक सब की कुछ हवा हवाई। कुल मिलाकर शिक्षा संस्थानों का अनैतिक टैक्स भी हमे ही देना होगा। ये टैक्स दूर तक बाटा जाता है बराबर। स्कूल, सीबीएसई, शिक्षा के प्रधान सेवक सब एक इस मामले में। अनूठी एकता है, जबरन उगाही की!!!