मुद्दा: माँ की मार्केटिंग का विरोध!!!

माँ के सवाल पर भावुक हो जाना माँ की मार्केटटिंग नहीं होती!!! किसी महत्त्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति के घर परिवार के लोगो पर, व्यक्तिगत जीवन से जुड़े लोगो पर टीका टिपण्णी ठीक नहीं लगती। मोदी जी की माँ ने 90 साल जीवन जिया उस जीवन को छोड़ कर PM आवास शिफ्ट होना। उम्र और जरूरतों के हिसाब से के हिसाब से ठीक नहीं। भरे पूरे परिवार का आदमी जब एकान्त से भरे घर में आयेगा तो उसकी उम्र कम समझ लीजिये। शपथ ग्रहण जहाँ हुआ था क्या उस जगह 90 वर्ष की वृद्धा घंटो बैठ पाती? वो भी गुजरात से चल कर दिल्ली आने के बाद? विरोध उन कार्यो के आधार पर किया जाना चाहिये जो सामाजिक कार्यो और पद से जुड़े है। 

व्यक्तिगत अनुभव के आधार कहूँ तो एक अरसा गुजर गया अपने माँ और पिता से अनुनय-विनय करते की आओ और हमारे साथ रहो। किन्तु वो जब भी आये हफ्ते भर में ताने मार कर निकल लिए। ताना "क्या हवा में लटके रहते हो। ये भी कोई जीवन है? ना कोई बात करने वाला न कोई अपना।" कुल मिला कर उन्हें पिंजरे जैसे अपार्टमेंट रास नहीं आये। ये एक व्यवहारिक सच है कि जमीन से जुड़े हुए लोगो मेट्रो शहरों का जीवन पसन्द नहीं आता । आधुनिकता के पैमाने को  परखने के लिए हफ्ते दो हफ्ते ठीक लगता है उन्हें भी । किन्तु मेट्रोज में स्थायी जीवन खोज पाना संभव नहीं लगता।

बिखरी हुयी माटी से खिलौना बना देते है .......

आज बचपन की बात करते है। पहले कुछ गुणगान .......

बिखरी हुयी माटी से खिलौना बना देते है
बच्चे बुजुर्गो को भी जीना सिखा देते है।

सूखे हुये पत्तो से फिरकी बनाते है
मौसम के मिजाजो को हँस के सजा देते है।

साथ हवाओं के पतंगे भी उड़ाते है।
गगन चूमने की हसरत जगा देते है।

किन्तु देश में बचपन की दशा दिशा ठीक नहीं है। मासूम बचपन मजलूम बना जाता है।  रोज का रोज ढाबो,होटलो, घरेलू काम काज में बच्चों को रोज पिसते देखता हूँ। एक कैलाश सत्यार्थी काफी नहीं है। हम सब को लड़ना होगा। बचपन अधिकारों से वंचित रहेगा तो यकीनन देश में उजाला कितना भी होगा धुंधला ही होगा। जिक्र लाजिमी है।

मेर वो दिन कभी मुकम्मल नहीं होता है।
जब सर्दी में मासूमो के पास कम्बल नहीं होता है।
दिल उस रोज भी बहुत रोता है
जब बच्चा को भूख सोता है।
भारत तब ही बड़ा बन जायेगा
परवाज के लिए हर दम भर पायेगा।।

-विक्रम

मुद्दा: ताकि सच अण्डरग्राउंड रहे !!!

UPPSC के बड़े साहब गुण्डे रह चुके है !!
आजकल जो मार्केट में खबर है कि "UPPSC" के बड़े साहब गुण्डे रह चुके है साथ ही साथ जिलाबदर भी। कुल मिलकर गौर करने वाली बात ये है की जिलाबदर को UPPSC का बड़ा साहब कैसे बनाया गया? किस आधार पर? क्या किसी तरह का कोई बैकग्राउंड वेरिफिकेशन नहीं किया गया? इस मुद्दे में कुल मिलाकर बड़ेसाहब के राजनीतिक आका और पप्रशासनिक व्यवथाये सभी सवालिया है। यदि केवल जाति आधार पर वरीयता देकर साहब को पद मिला तो ये चिन्ता का विषय है। साथ ही साथ ये सोचने पर मजबूर करता है कि क्या राजनीतिक रूप से कद का भारी होना, इतना ज्यादा अहम है कि योग्य और अयोग्य की पहचान भी ना की जाय??

यदि नियुक्ति केवल योग्यता के आधार पर हुयी तो बैकग्राउंड वेरिफिकेशन जैसा महत्वपूर्ण पहलू अनदेखा कैसे रह गया?
देखने का दूसरा तरीका ये भी है की जानबूझ कर छुपाया क्यों गया। गौरतलब है कि जब चुनावों की घोषणा होती है हर उस बार जिलाम, क़स्बा के अपराधी लोग राउंडअप किये जाते है कुछ को हिरासत में भी लिया जाता है। लाइसेंस जमा करा लिये जाते है। ये सब बड़े साहब के साथ क्यों नहीं हुआ? कुल मिलाकर ये साफ़ है जानबूझ कर ऐसा किया है। क्यों कि बैकग्राउंड वेरिविकशन करने वाली पुलिस, LIU घूस लेकर रिकॉर्ड क्लियर दिखा सकते है। किन्तु चुनावों के दौरान होने वाले राउंडअप से ये तो पता चल ही जाता की अपराधी है कोई जिसका नाम अनिल यादव है। किन्तु पूरे तन्त्र का फेल होना साजिश की तरफ इशारा करता है।


इन्ही बड़े साहब के के कार्यकाल के दौरान ये UPPSC की लिस्ट का यादवीकरण करने के गम्भीर आरोप लगे थे।  किन्तु राजनीतिक, प्रशासनिक चुप्पी सीधा संकेत करती है की साजिश थी। जहाँ की ओरे साधारण से साधारण सरकारी कर्मचारी की भर्ती हेतु पुलिस वेरिफिकेशन होता वहीं इतने अहम पद के लिये गुण्डो का चुना जाना पूरे तन्त्र को सवालिया बनाता है।

संजय दत्त साहब को पेरोल कैसे मिलती है।
संजय दत्त अक्सर खबरों में छाये रहते है। ना जाने क्यों और कैसे कानून केवल उन्ही पर मेहरबान है। देश में लोग वर्षो कचहरी के चक्कर लगाते पर बेल तक मिलना मुश्किल होता है। जहाँ लोग बिना सजा हुये ही सालो जेल में सड़ते है। वहाँ किसी व्यक्ति विशेष को छूट देना कैसे संभव है? इस सबको देख कर आपको क्या लगता है की कानून सब के लिये बराबर है? कानून अमीर गरीब देख रहा है।  नहीं तो वो लोग जिनको बेल मिलने के बाद भी वो प्रशासनिक लापरवाही और आर्थिक कमजोरी के चलते जेल में सड़ते रहते है वो भी संजय दत्त की अपराधी करार होने के बाद भी पेरोल पर घुमते। !!!

लघुकथा: पी पी पी इ इ इ . . . . . . . . . . . . . पो पो पो ओ ओ ओ .......

पी पी पी इ इ इ  . . . . . . . . . . . . . . . हाहाकार मचाता हॉर्न पता नहीं क्यूँ बजे जा रहा था . लोग हलकान और वातारण धन्य हुआ जाता था। बड़ी गाडी का रौब और पार्टी के झण्डे का ताव कुलाँचे मारता हुआ सड़क पर से सब को हटा देने के लिये आमादा दिखाई देता था। …… हॉर्न वो सफारी में लगा स्पेशल टाइप वाला हॉर्न ....   कईयों कान में खुजली कर गया। कान की इसी खुजली के चलते सफारी के बगल में खड़ी  800 -ऑल्टो का सीसा नीचे खिसका और आवाज़ आयी। अरे भाईसाहब … भाईसाहब सुनते है!!!! सफारी में बैठे चम्पकलाल ने मुँह ऑल्टो की तरफ घुमाया ……....ऑल्टो वाले भाईसाहब की आवाज चम्पकलाल के कान से टकराई  अरे भाईसाहब हॉर्न से हुँकार कहे भर रहे है। ऑल्टो वाले कटियार साहब ने चम्पकलाल से सवाल किया? आप को क्या मतलब? चम्पकलाल ने उत्तर देते हुये कहा …   कटियार साहब ने दिमाग पर जरा जोर डालते हुये कहा  …… भाईसाहब हॉर्न कोई तीर थोड़ी ही है जो जाकर आपकी आगे वाली कार में लगेगा। यहाँ खड़े सब लोग प्रभावित हो रहे है। वातावरण प्रदूषित हो रहा है।


अरे बस करिये भाषण मत दीजिए ,भाषण देना हमारा काम है …… चम्पकलाल ने सफारी के बोनट तरफ लगे राजनीति पार्टी की झण्डे की तरफ देखते हुये कहा। कटियार साहब ने फिर सभ्यता,सऊर, और सड़क चलने के नियमों का हवाला दिया। ……… अपना काम करो यार। इस बार चम्पकलाल का मिजाज गरम था और त्योंरिया चढ़ी हुयी थी कि अचानक पीछे से तेज हॉर्न की आवाज़ सुनायी दी। नेता जी का ध्यान बटा एक्सीलेटर पर जोर लग गया और सामने वाली गाड़ी ठुक गयी।  सामने वाले भाईसाहब उतर आये और नेता जी से पिल पड़े। नेता जी भी उतर कर फुल फॉर्म में आ गये। सड़क पर दूर तक जाम लग चुका था।  हर कोई हर आड़ी तिरछी जहाँ भी जगह मिली गाड़ी घुसा कर खड़े हुये थे। बाइक वाले इधर उधर से जगह बनाने की जद्दोजहद में थे। पी पी पी इ इ इ  . . . . . . . . . . . . . पो पो पो ओ ओ ओ .......... की आवाज़ बेहद तीव्र  हो चली थी। हर गाड़ी  अपना हॉर्न बजाते हुये पीछे वाली गाड़ी को कोश रहा था।

नोट: घटना के विषय में जानकारी देने के लिये "अरुण कटियार जी " का आभार।

ग़ज़ल: मुफ़्त मिले रूसवाई भी।

रफ्ता रफ्ता समझ गया हूँ
दुनिया की सच्चाई भी।

अब खोजे से मिल जाती है
भीतर छिपी बुराई भी ।

भला किसी का चलो जो करने
मुफ़्त मिले रूसवाई भी।

रगों में बहता खून है जैसे
सच के साथ मिले कठनाई भी

धर्म की राह में बहुत है काँटें
और मिलती तनहाई भी।
-विक्रम

पूरे प्रदेश में तो रोज टूटते है टाइपराइटर ........

राजधानी लखनऊ में एक बुजुर्ग का टाइपराइटर लात मार कर तोड़ दिया है। खबर CM साहब तक पहुँची, संतोषजनक कार्यवाही हुयी। CM साहब ने जो तेवर दिखाये जिस तेजी से कार्यवाही की वो कबीले तारीफ है। किन्तु सरकार के कर्तव्यों की इतिश्री यही नहीं होती है। इस घटना के बृहद रूप को देखना भी जरूरी है। प्रभाव क्षेत्र और  प्रभावितों को समझना जरूरी है। घटना के मूल कारणों की पहचान करना भी जरूरी है। लखनऊ की तर्ज पर प्रदेश में हर पल कहीं ना कहीं टाइपराइटर रोज टूट रहा होता है। किन्तु लखनऊ की तरह हर घटना की जानकारी CM साहब तक नहीं पहुँच पाती।

प्रदेश में पुलिस और अन्य प्रशासनिक विभागों द्वारा वसूली निरन्तर प्रक्रिया की तरह चलती चली आ रही है। फुटपाथ पर लगी किसी भी दुकान वाले से पूँछ लीजिये, पुलिस को नगर निगम को बिना चन्दा दिये उसके घर का चूल्हा नहीं जल सकता। विरोध का हश्र सब जानते है। कानून के मकड़जाल में फँसा बस पानी माँगता नज़र आता है। ये हाल तब है जब देश में स्ट्रीट वेंडर एक्ट लागू है। ये बात अलग है की अगर किसी पुलिस वाले से आपने इस बात का जिक्र कर दिया तो उसका अहम जाग उठेगा " हमे कानून सिखाता है !!!!" दो चार लाते और दो चार FIrr लप्पड़ कानून की जानकारी के बोनस के तौर पर मिलने तय है। इस प्रक्रिया को रोकने की जिम्मेदारी सरकार है कि नहीं ?? पारदर्शिता कैसे लायी जाय इसकी रणनीति बनाना और सुझाव लेने की जिम्मेदारी क्या सरकार की नहीं है??

प्रदेश में हर गली के मुहाने पर एक भूमाफिया बैठा है साथ ही बैठे है कई गुंण्ड़े भी। वो सब बैठे कानून की संविधान थ्योरी के ऊपर। थाने में एक fir लिखाने के लिये पहले थाने के फिर SP फिर कोर्ट के चक्कर लगाने होते है। इस सब के बावजूद प्रदेश सरकार गान्धारी बनी बैठी है?? न्यायप्रियता के साथ रह सकता है क्या भला कोई? भूमाफियों और गुण्डो  की बात CM साहब खुद स्वीकार चुके है। पर उपाय नहीं खोज सके अब तक। CM साहब हर दिन हर पल टूटते टाइपराइटरस का हिसाब रखना चाहिये। कानून के अनुपालन लिये सरकारी तन्त्र को वाध्य करना चाहिये। एक मामले में सख्त हो जाना अच्छा तो है किन्तु पर्याप्त नहीं!!!!

एक साधारण सा उदहारण ले लीजिये। पार्किंग के नाम पर उठाये जाने वाले ठेके अधिकतर अपराधी प्रवृत्ति के लोगो के पास जाते है। जिससे जितना चाहा वसूला जाता है। कई जगह ये जरूर बताया जाता है कि पार्किंग के रेट कितने है।  किन्तु ये कभी नहीं बताया/लिखा जाता की यदि अधिक वसूली जाय तो शिकायत कहाँ दर्ज करायी जाय? कौन कार्यवाही करेगा। पुलिस या शहर के विकास प्राधिकरण के पास ? किसके पास और कैसे शिकायत की जाय? शिकायत के बाद  अपराधी पर दण्ड के प्रावधान है??? शिकायत करने के लिये प्रोत्साहित करने  हतोत्साहित किये जाने का क्या मतलब है। जिक्र दूसरे उदहारण का भी कर लेते है। रोज का रोज स्ट्रीट वेन्डर एक्ट को रौंदा  रहा है।  उसके लिये शिकायत कहा की जाय ये प्रदेश में किसको पता है??

जरूरी हो चला है कि शिकायत निवारण के लिये आधुनिक तकनीकि अपनायी जाय। हर हाल में समय पर शिकायत का निवारण सुनिश्चित किया जाय। एंड्रॉयड फ़ोन के किसी एप्प के द्वारा, e-mail शिकायत और FIR का प्रावधान होना चाहिये, शिकायत पर कार्यवाही के लिये पुराने केसेस के अनुभव  एक मिनिमम रिस्पांस टाइम देना चाहिये।  यदि समयनुसार काम नहीं होता तो कार्यवाही कठोर होनी चाहिये। हर महीने तरह की शिकायतों पर विश्लेषण करना चाहिये। शहर के पुलिस कप्तान की जिम्मेदारी तय हो। सीमा विवाद के लिये किसी तरह की कोई जगह नहीं होनी चाहिये। युवा और तकनीकि शिक्षित होने के नाते CM को गम्भीरता से विचार कर इस तरह के प्रावधान चाहिये। अन्यथा प्रदेश सरकार इस तरह तो कोई चला लेगा !!!!

CM साहब विचार करिये प्रदेश को उस गर्त में मत ले जाइये जहाँ से वापसी सम्भव न हो। हर नागरिक को असुरक्षा के भाव में जीने से बचाईए!!! कम से कम कोशिश तो कीजिये !!!!

जिन्दगी एक प्रयोगशाला है....

तरह तरह के किरदारों से भरी, नाना प्रकार के अहसासों से लिपटी ज़िन्दगी एक प्रयोगशाला ही तो है। हाँ हाँ हाँ...... नेता जनता के साथ प्रयोग करता है। अभिनेता रंगमंच में प्रयोग करता है। भगवान जज्बातों के साथ प्रयोग करता है। सभी प्रयोगों में लिप्त है। एक प्रयोग जो सबसे बड़ा है भीमकाय है वो है मच्छर का डेंगू प्रयोग ये प्रयोग बीते पखवारे का सबसे सफल प्रयोग है।

गुड़ खायें पर गुलगुले से परहेज ……....

आज गणेश चतुर्थी है और विश्वकर्मा जी की पूजा का भी दिन है। आज दोनों के दरबार में बहुतों ने हाजिरी लगायी, सुबह-सुबह जल्दी उठ कर टिप-टॉप होकर पण्डित जी के शरणागत हुये और उनकी आज्ञा का पालन किया। पण्डित जी ने संस्कृत के कुछ श्लोक और हिन्दी में आरती कर पूजा और हवन किया।

जब पण्डित जी आरती सुना रहे थे तो इस बात पर ध्यान बरबस ही ही चला गया कि भगवान से प्रार्थना, याचना या किसी अन्य तरीके का संवाद तो हम हिन्दी या संस्कृत में ही करते है। किसी भी पूजा में मैंने आज तक इंग्लिश में आरती नहीं सुनी। आपने सुनी हो तो बताये? इसका मतलब ये हुआ की भगवान से बात करनी हो तो हिन्दी याद आती है, विलुप्त होती संस्कृत याद आती है। अन्यथा नहीं!!! कुल मिलकर गुड़ तो खा लिया पर गुलगुले से परहेज है। नैतिक और सांस्कृतिक आधार पर ये ठीक नहीं लगता। भगवान के साथ-साथ इन्सान के साथ भी हिन्दी का इस्तेमाल होता तो बेहतर होता। खासकर जब दो हिन्दीभाषी बात करें तो हिन्दी को तवज्जो देना ही बेहतर है। वर्ना हिन्दी को 365 दिन में एक बार तो हम याद कर ही लेते है, हिन्दी के हलाक होते जाने का अफ़सोस भी कर लेते है। 

जिन्दगी क्या है बे? टी-सीरीज की फँसने वाली कैसेट !!!

जिन्दगी क्या है बे? पुरानी ऑडियो कैसेट की रील …  जो चलते-चलते अटकने लगती है, भाँय-भाँय करती है फिर चलती है …… और फिर रुक जाती है। रील निकालों तो उलझ जाती है सुलझाओ तो और उलझ जाती है उड़ती चली जाती है दूर तक उड़ती चली जाती है। या फिर जिन्दगी भारत सरकार की पंचवर्षीय योजना है। जो कब तक चलेगी पता नहीं। सरकारों के साथ-साथ योजना के साथ बर्ताव भी बदलता है। जिन्दगी कभी बेनूर मन्दिर के बाहर बैठी उस कोढ़िन की तरह। जिन्दगी कभी हूर कोहिनूर की तरह क्या है बे ये जिन्दगी? कभी जंग, कभी घुप्प अँधेरी सुरँग। कभी होली के रंग और कभी कीचड़ की तरह बदबूदार और बेरंग। क्या है ये जिन्दगी बे? ये सवाल लगातार मेरी अन्तर्रात्मा मुझसे पूछ रही है। आनन-फानन में पूछें ही जा रही है अधीर हुयी जाती है जलती हुयी आग की तरह।

सोच-सोच कर परेशान हूँ की जिन्दगी क्या है। आपाधापी भरे जीवन में प्रेसर कुकर में पकती दाल की तरह है जिन्दगी। कितनी ही योजनाये कितनी ही परियोजनाये बने पर जिन्दगी का अपना राग है। कभी कभी भी रूठ छोड़ देती है। वर्तमान भविष्य के लिये कुर्बान हुआ जाता है। भविष्य गुमशुदा है। तड़ीपार है खोजे मिलेगा की नहीं पता नहीं। आज ये सवाल हावी है। हम पिछले 1 महीने से मूक ही तो देखते रहे, मुसाफिर गुजर गया हम रस्ते के पेड़ की तरह बेबस असहाय खड़े, देखते रहे। हम ही क्यों? समूचे भारतवर्ष के डॉक्टर देखते रहे, 21 सदी का विज्ञान, २१ सदी का मेडिकल साइंस, 21 सदी का विकास सब बेबस खड़े रहे देखते रहे। आज तड़के सुबह करीब १. 30 सुधीर चले गये। "सुधीर कुमार शेट्टी" हम सबको छोड़ गये। असमय चले गये । 44 साल इंसान का जीवन भी तो नहीं हुआ ना!!! जिन्दगी की मैराथन अभी बाकी थी। अभी तो बस सबसे तेज दौड़ने का वक्त था। जो ऊर्जा शुरुआत में बचा कर रखी थी उसे लगाने का समय था। आज वो समय को लॉक कर गये चले गये। समय उनके लिये थम गया। दफ्तर में आज उनकी शीट पर उनकी फोटो थी, सुमन अर्पित थे। आज का दिन आँखों से आँसू और दिल के दर्द की बीच प्रतियोगिता का रहा। कभी दर्द हावी हुआ कभी आँसू आने को हुये।

फ्रेंच मार्का दाढ़ी, बुर्राक सफ़ेद शर्ट, काम करने का बेहद  प्रोफेशनल तरीका, असीमित ऊर्जा का श्रोत, मातहतों के साथ बेहद ही शालीन और सहज, दोस्ताना। पर सब कुछ पीछे छूट गया बॉस को जाना पड़ा। १ महीने पहले की हमेशा तरोताजा रहने वाले बॉस घर पर अचानक गिर पड़े। MRI रिपोर्ट ने ब्रेनtumer की शिनाख्त की। पर देश का कोई भी डॉक्टर उनका सफल इलाज़ नहीं कर सका। बॉस, हरे भरे पेड़ की तरह छाँव देने वाले बॉस ....... पर मानो अकाल पड़ गया हो पानी के आभाव में एक दरख्त मानिन्द सूखते चले गये। बस एक महीने में ही। दुयाओं का असर भी ना जाने क्यों नहीं हुआ। हम सब तो कर रहे थे रोज का रोज। काल की क्रूरता हमने देखी है, उनका पविवार झेल रहा है। अगर भगवान है कहीं तो यदि इल्तजा है की बॉस की आत्मा को शान्ति बक्शे और उनके परिवार को शक्ति दे ये इस बेहद समय को का सामना करने लिये। भगवान से शिकायत जरूर रहेगी की ऐसा क्यों करते हो!!! धरती में अदालते मुकदमा चलाती है , फिर सजा देती है। अन्तिम इच्छा भी पूरी करती है। ऐसा आप क्यों नहीं करते आदमी को कम से कम उसका दोष तो बता दिया करो। खैर शिकायत तो रहेगी आप से हम सब को। बॉस, आपके साहस को आपकी ऊर्जा को और आपके द्वारा दी गयी सीखों को सलाम। आपको श्रद्धाँजलि।

ग़ज़ल: जो मिला है उसी का जश्न मनाते चलो .....

जब होगा मुनासिब वक्त साथ हो लेगा
मेहनत पे यकीन कर कदम बढ़ाते चलो

कब बरसती है खुशियाँ आसमाँ से कभी
जो मिला है उसी का जश्न मनाते चलो

मुस्करा उठी है बंज़र जमीन पर फसले
भले निकले चिंगारियाँ,हल चलाते चलों

रंग खिलेंगे, तितलियाँ उड़ेगी बागो में
पौधा प्यार का रोज एक लगाते चलो

-विक्रम

शिक्षक दिवस पर: कच्चा १ , पक्का १ और राजयपाल अचार जी।

कच्चा १ , पक्का १ और राजयपाल अचार जी।

नेशनल हाईवे -86 के साथ-साथ चलता हुआ कानपुर का सीमावर्ती इलाका जो आगे हमीरपुर में यमुना-तट को स्पर्श करता हुआ जल समाधि ले लेता है और आगे नये अवतार में हमीरपुर कहलाता है । यमुना से करीब 10 किलोमीटर पहले ही हमीरपुर का रेलवे स्टेशन है। यूँ तो रेलवे स्टेशन हमीरपुर का है पर है कानपुर-नगर में। इसी रेलवे स्टेशन से 1.5 किलोमीटर दूरी पर छोटा सा गाँव है बिलगवाँ आबादी मुश्किल से 600 लोगों की होगी आज की तारीख में। 

बिलगवाँ यूँ है तो बहुत छोटा सा किन्तु ना जाने किनती ही रोंगटे खड़े कर देने वाली कहानियाँ इस गाँव से जुडी है। करीब २ दशक पहले साजिशों और रंजिशों का दौर यहाँ चला करता था। उस दौर में ये वो गाँव था जहाँ घर में खाने के लिये निवाले भले ना हो पर कारतूस,तमंचा,अद्धी इधर-उधर अलमारियों या भूसे के ढेर में पड़े रहते थे। खाली कारतूस को भरकर ठाय-ठाय करने वाले किनते ही कुशल कारीगर जरूर घर-घर में थे। वो दौर डकैतों का था वो दौर ताकतवर और मुस्तैद बने रहने का भी था। अहम, वहम और वर्चस्व की लड़ाई अक्सर खूनी हो जाती थी । वर्षो बाद गाँव के तालाब  भले सूख चुके है। पर साजिशे आज भी जिन्दा है। वर्तमान थोड़ा खामोश है किन्तु पूरी तरीके से नहीं। हमीरपुर रेलवे स्टेशन के आलावा बस कच्ची सड़के गाँव की हम सफर थी। एक ओर बरीपाल और दूसरी तरफ सजेती बीच में धीरपुर . विकास सुना था की कानपुर में रहता था। जब भी आता था हमीरपुर की तरफ निकल जाया करता था।

इस दौर में गाँव में स्कूल नहीं था। हाँ करीब 2 किलोमीटर का पैदल कच्चा रास्ता नाप बरीपाल में एक आध स्कूल थे डॉक्टर भी। पर रंजिशें जवान थी और सुरक्षा सवाल थी । सो घर से दूर जाना ठीक नहीं था। चूँकि उस समय दद्दू गाँव के प्रधान हुआ करते थे सो घरवालों ने एक मास्टर साहब से बात करी। मास्टर साहब तो बाद में प्रचलित हुआ हम तो अचार जी कहते थे। "आचार्य जी" का बिगड़ा हुआ रूप किन्तु जबान फिसलती चली जाती थी। वो थे धीरपुर के राजयपाल मास्टर साहब उर्फ़ राजयपाल अचार जी थे , वो साइकिल चलाकर हमारे गाँव आते और हमारे घर के बाहर नीम के पेड़ के नीचे बैठा सबको पढ़ाया करते।बाहर नीम के पेड़ के नीचे इसलिये की गाँव के कुछ और जागरूक लोग भी अपने बच्चों को प्रारम्भिक शिक्षा दे सके। "कच्चा एक" और "पक्का एक"  कुछ ऐसे ही हमारी पढ़ाई शुरू हुयी। घर के सारे बच्चे जो गाँव में थे। मैं, बड़े भाईसाहब,चाचा जी के बच्चे गाँव के कुछ अन्य परिवारों के बच्चे भी। बस खड़ियाँ और एक स्लेट(पाटी के नाम से जानी जाती थी, लकड़ी की बनी हुयी) बस इसी सहारे राजयपाल अचार जी ने हमें कक्षा 2 तक पहुँचा दिया।

ये हमारे वरिष्ठ परिजनों की जिजीविषा ही थी की गाँव में शिक्षा के प्रति जागरूकता आयी। राजयपाल अचार जी के योगदान को, उनके कठिन परिश्रम को ना हम, ना हमारे परिजन और ना ही हमारा गाँव कभी भूल पायेगा। जिस गाँव में लोग कहकरा सीखने से पहले माँ और बहन के हर प्रकार के विशेषण सीख जाया करते थे।
क का मतलब - कमीने कुत्ते और ब -का मतलब बहन……… पढ़ते थे उस दौर में राजयपाल आचार जी ने हमे पढ़ाया और उस माहौल से अलग होकर विकसित होने में मदद की। आगे की पढ़ाई बरीपाल के "सरस्वती शिशु मन्दिर में भी करी" करीब २-3 साल। उसके बाद कानपुर शहर में की, गोरखपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में भी किन्तु राजयपाल अचारजी आज भी दिल में बसते है। आज भी जब गाँव जाना होता है और राजयपाल अचार जी को खबर हो जाती है तो कभी वो मिलने चले आते है कभी हम चले जाते है। वही प्यार और वही स्नेह आज भी जीवित है। राजयपाल अचार जी बड़े भाईसाहब द्वारा अखबारों में लिखे गये आलेखों की कतरन आज भी अपने पास रखते है, लोगों को भी बताते है। वर्षो से लगतार गंगा नदी के लिये कलम और जन आंदोलनों के जरिये, बड़े भाईसाहब के सतत प्रयसों और लड़ाई के  उद्देश्यों का समर्थन करते हुये गर्व से भी भरे नज़र आते है।