मुद्दा:हार्दिक पटेल और आन्दोलन का विरोध क्यों?

आपको क्या लगता है? कि देश में आज़ादी के बाद से चली आ रही, आरक्षण व्यवस्था किसी रोज अचानक एक चमत्कार होगा और खत्म हो जायेगी??? या फिर कुछ और सोचते है आप इस बारे में? क्या करना चाहिये आरक्षण को ख़त्म करने के लिये? वैसे एक तरीका ये हो सकता है कि जो आरक्षण माँगे देते रहो और एक दिन ऐसा आयेगा की सभी आरक्षित हो जायेगे और आरक्षण के मायने ही ख़त्म। दूसरा तरीका ये कि आरक्षण को पूरी तरीके से संसद में ध्वनिमत से ख़ारिज जाय। दूसरा तरीका सकारात्मक है। यदि ऐसा जाय तो कितना अच्छा हो। किन्तु क्या ये कभी सम्भव है? भारत में राजनीति की नींव ही जाति और धर्म है, जहाँ चुनाव में टिकट जाति और धर्म की बहुलता हो देख कर दिया जाता है। वहाँ अचानक संसद में ऐसा हो जायेगा ये व्यवहारिक नहीं लगता। किन्तु आज नहीं तो कल कोई न कोई हल तो चाहिये होगा। इसके लिये थोड़ा और विचार करना होगा। सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर भी गौर करना होगा। आईये आगे बढ़े और कारणों को खंगाले।

आरक्षण माँगने के मूलभूत कारण क्या है?
अखबारों में पढ़ा कुछ लोग ये कह रहे थे की हमारे 90% वाले बच्चों का एडमिशन नहीं होता और उनके 35 -36 % वालों का भी हो जाता है। जायज बात है। किसी को भी कष्ट होगा। इस कष्ट निवारण लिये फिर वही पहलू निकल कर आता है। निवारण तभी है जब या तो आरक्षण जाये या सबको मिल जाये। हटाने की बात तो कोई मानने से रहा। हाँ लेने  सरल दिखती है जाहिर है कि 1990 के दशक से वाद-विवाद, हिँसा-अहिँसा का दौर चलता आ रहा है कई लोग कुर्बान भी हो गये, किन्तु आरक्षण जस का तस कायम है बुलन्दी के साथ। नयी जातियाँ आरक्षण से जुड़ने के लिये आन्दोलन करती रही। सामाजिक कदापि नहीं किन्तु राजनीतिक कारणों से कुछ समुदायों की माँगो पर विचार भी किया गया। उसी चलन का परिणाम है कि अब इन आन्दोलनों की सँख्या में इजाफा हुआ है और स्थिति बदली नहीं तो आगे भी होता रहेगा। भारत में रुतबे वाली नौकरी सरकारी ही होती है और मूल लड़ाई वही तक पाने की है। जो समुदाय प्रभाव वाले क्षेत्रो में है बस पैसा या नाम  अपनों को भरे पड़ा है। उत्तर प्रदेश में यदवीकरण एक नायाब उदाहरण है इसका। पुलिस के हवलदार से लेकर UPPSC के आला अफसरान किस तरीके से भर्ती हुये।

हार्दिक पटेल के उद्देश्य पर ध्यान दे  
खैर हार्दिक पटेल की बात पर लौटते है। कल शाम की रैली में हार्दिक ने ये कहा था कि आरक्षण या तो "हमें भी दो या तो हटा दो!!!" हमे भी दो वाली बात को दिल से लगाना कितना ठीक है? बाद वाली बात को भी तो तवज्जों दी जा सकती है कि आरक्षण हटा दो। देने की सम्भावनाये बहुत कम है। कारण जाहिर है कि पटेल या कुर्मी क्षत्रिय समुदाय की खासकर गुजरात में समृद्धता इसका कारण है। सो जाहिर है की आन्दोलन का अगर चलता रहा तो आन्दोलन का दूसरा पहलू " आरक्षण हटा दो" सामने आने की पूरी सम्भावनाये है. इसमें भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिये की खून हर स्थिति मजे बहेगा माँग हटाने की हो या फिर लेने की। इस तरह के आन्दोलन सकारात्मक रहे हो या नाकारात्मक कुर्बानियाँ जरूर ली है। इस बार वही हुआ। बेहतर होता की गुजरात के साथ के पटेलों/कुर्मी क्षत्रियों का आन्दोलन चलता रहता और इसी आन्दोलन में और आरक्षण माँगने के लिये और जातियाँ आ जाती तो आन्दोलन कोई न कोई सकारात्मक परिवर्तन शायद ले ही आता। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि आरक्षण ऐसे ही किसी आन्दोलन से या सबको मिल जायेगा। अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे गुजरते समय के साथ खात्मे  सम्भावनाये घटती चली जायेगी।

गाँधी जी के प्रदेश में लाठी क्यों चली
चन्द रोज पहले 5 लाख लोगों  हुयी। बिना किसी हील हुज्जत के, बिना किसी बखेड़े के। कल अहमदाबाद में अचानक हिँसा क्यों फ़ैल गयी?? 22 साल का एक नेता जिसको भरपूर समर्थन मिल रहा था। उसे जबरन गिरफ्तार करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? आमरण अनशन पर बैठे लोगों पर बल प्रयोग क्यों किया गया? हिँसा भड़की नहीं जान-बूझ कर भड़कायी गयी प्रथम दृष्ट्या ऐसा ही लगता है। अन्यथा ना लाठी चार्ज होती और ना लोग मरते। आन्दोलन राजस्थान में हुये रेल की पटरियों पर लोग बैठ गये ,उखाड़ डाली। उन पर लाठी चार्ज नहीं हुयी। लाठी चार्ज की आन्दोलन को दबाने की कोशिश है। उस आन्दोलन को जो आरक्षण ख़त्म करने दिशा में ले जाता। पहले भी देखा गया है कि राज्य सरकार ने भले माँग मान ली हो किन्तु आगे जाते हुये माननीय उच्चतम न्यायलय या फिर उच्च न्यायलय ने उसे ख़ारिज कर दिया। ये तथ्य सामने होते हुये भी दमनकारी नीति अपनायी गयी लोग मारे गये सार्वजानिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा। जाहिर है की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को लाठी चार्ज और जबरन गिरफ़्तारी की कीमत आगे  चुनावो में शर्तिया चुकानी पड़ेगी। बेहतर होता की बात कर मामला सुलझाया जाता। आगे जाते हुये अगर मामला कोर्ट से ख़ारिज होता तो आन्दोलनकारियों अपने आप छट जाती। और यदि आंदोलन बड़ा होता समूचे देश को फायदा होता। किन्तु भीड़ पर बल प्रयोग एक बड़ी कूटनीतिक भूल है बल्कि ये जनहानि और धनहानि का कारण भी है।

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