किताब : "सिफर से शिखर तक" AP Mishra

किसी व्यक्ति की बातों में निहित सरलता और सहजता ये एहसास करा जाती है की आदमी जमीन से जुड़ा है और जमीन से उठा। पिछले महीने MAA -Malviya Alumini Association की आम वार्षिक बैठक में उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन के प्रबन्ध निदेशक श्री AP मिश्रा ने अपनी बात जब कुछ इस तरीके से शुरू की कि "मैं जब आप लोगों के बीच बोल रहा हूँ तो यहाँ किसी तरह की कोई औपचारिकता नहीं होनी चाहिये, क्यों की हम सब एक परिवार है" उसके बाद इस परिवार और इसके लोगो की बेहतरी के लिये कई बातें उन्होंने कहीं। हम सब ने उनकी बात मन्त्र-मुग्ध होकर सुनी। कारण साफ़ था। बोलने की सरलता और सहजता के साथ उच्चकोटि की हिन्दी और उस पर जनाब मुनव्वर राणा जी के प्रभावशाली शेरों का इस्तेमाल बेहतरीन था। सर ने अपनी बात खत्म करते-करते कि उन्होंने एक किताब लिखी है "सिफर से शिखर तक" एक प्रतिलिपि मुझे भी मिली। ये उनकी हिन्दी और शेरों का ही असर था की मैंने किताब को पढ़ने की ठान ली थी। पढ़ी पूरी धार्मिकता के साथ। ये किताब हम सब को पढ़नी चाहिये !!

"सिफर से शिखर तक" साधारण से असाधारण बन जाने की दास्ताँ है। कलेवर का अन्दाजा इसी बात से लग जायेगा कि गोण्डा के ग्रामीण आँचलिक क्षेत्र में स्थित एक छोटे से पुरवे का लड़का, जो खाली समय में भैंस चराने जाता था, जो थोड़ा बड़ा होकर ५ मील नंगे पाँव पैदल चलकर स्कूल जाता था। बेहद ही विपन्नता और अभावों के बीच जीवन जीता लड़का। आज उत्तर-प्रदेश पावर कारपोरेशन का प्रबन्ध निदेशक है। "मदन मोहन मालवीय इंजीनियरिंग कॉलेज" से 1975 में पास-आउट इलेक्ट्रिकल इंजीनियर आज वो हकीकत जी रहा है जिसकी कल्पना उन्होंने सपनों में भी नहीं की थी। वही हकीकत उन्होंने सिफर से शिखर तक में अंकित की है। जीवन की हर कठिनाई कलम की बहाव के साथ बाहर आई और एक दस्तावेज के तौर पर अंकित हो गयी। जिन गाँवों में पढ़ाई दुष्कर कार्य होता है माहौल भी नहीं होता। वहाँ से निकल कर आकाश को छूना  साधारण से असाधारण बनना ही तो है। शुरूआती जीवन में पिता की धार्मिकता और नेकनीयती ने बालक अयोध्या प्रसाद मिश्र पर बेहद गहरा प्रभाव डाला। उसका असर कालान्तर में उनकी कार्यकुशलता के माध्यम से दिखा। मिश्रा सर ने शुरूआती जीवन से लेकर आज तक के कैरियर के बारे में बेहद ही साफगोई के साथ लिखा है । सच लिखा। सच की खुशबू किताब के हर पन्ने से आती है। शुरूआती जीवन के बारे में कुछ पंक्तियाँ मात्र सब बयान करती है। सर ने किताब लिखी है "आजाद कौड़ियावी" की  ये पंक्तियाँ।

हमहूँ मनइन कै लरिका हन
हमहुक भगवान बनाइन हैं
हमहू उर मां नौ मास रहेन
हमरेउ जनमे टठिया बाजी
हमरेउ छट्ठी बरहिउ आजी
मुलु हाय गरीबी सउरिन मां
महतारी चना चबाइन है।
…………………

शुरूआती जीवन की कठिनाईयों के बाद सर ने पहले मेघालय और फिर उत्तरप्रदेश के विधुत परिषद् में अपने करियर को आगे बढ़ाया। अब तक 5 बार कुम्भ मेले की विधुत जिम्मेदारियाँ सर ने सम्हाली। इस बीच कई उतार चढ़ाव आये वह सब जो उन्होंने जिया उसे लिखा। अपने कार्य में कुशलता कारण कई बार अपने वरिष्ठों के भी वरिष्ठ बने किन्तु कानून अड़चने भी आयी। सरकारी दफ्तरों में चलने वाली खींचतान और राजनीति का पुट भी बड़ी सरलता से कह दिया है। अग्नि परीक्षा के इस दौर में सर ने सच का दामन थामा और इस दौर में आये उतार चढ़ावों को लिखते हुये मानो दिल खोल कर रख दिया हो। कानूनी लड़ाई जीत लेने की बाद सर ने अपने मित्र और जाने माने कवि कैलाश गौतम जी की एक रचना का जिक्र किया है।

भले डाँट घर में तू बीवी की खाना
भले जैसे तैसे गिरस्ती चलाना
भले जा के जंगल में धूनी रमाना
मगर मेरे बेटे कचहरी ना जाना
कचहरी ना जाना .......


अपने की जवान पुत्र को खोने का दर्द सीने में समेटे मिश्रा सर कभी रुके कभी नहीं थके नहीं। बस अपने काम की गति और बढ़ा दी। संडे को दफ्तर जाने वाला ये इंजीनियर 2012 में केवल कार्यकुशलता के आधार पर उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन का प्रबन्ध निदेशक नियुक्त हुआ। तब से अब तक सफलता की कई और सीढ़ियाँ भी निरन्तर चढ़ी। खबर थी की इस बार उन्होंने इस बार लखनऊ के शक्तिभवन में 15 अगस्त को ध्वजारोहण भी किया।



मुद्दा:आँख के अन्धे नाम नयनसुख


धीरे-धीरे मेरे मन में ये धारणा घर कर चली है कि आजकल भारत देश में जो मोदी जी का समर्थक नहीं है, मोदी के कुछ अन्धे भक्त उसे या तो देशद्रोही करार दे देते है या तो अरविन्द केजरीवाल का समर्थक। मोदी जी को इसका संज्ञान लेना चाहिये इससे पहले कि बहुत देर हो जाये। एक प्रधानमन्त्री के तौर पर मोदी जी तभी सफल हो पायेगे जब अपने अंधभक्तों पर नकेल डाल सकेंगे। कुल मिलाकर आज यदि आप मोदी की सकारात्मक आलोचना भी करते है तो आप या तो देशद्रोही है या केजरीवाल के भक्त!! और "जंगल में आग" की तरह सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर व्यक्ति को मशहूर कर दिया जाता। आजकल हार्दिक पटेल को केजरीवाल का समर्थक घोषित किया जा रहा है। कल को किसी ब्राह्मण या बनिया को देशद्रोही घोषित किया जायेगा। हाँ यदि आप मोदी की प्रसंशा करते है रहे तो भक्तगण बेहद खुश है। अगर कोई ये भी कह दे की वो "मुरली मनोहर जोशी" या लालकृष्ण आडवाणी जी का ज्यादा सम्मान करता है तो वो भी तुरत-फुरत देशद्रोही जो जायेगा। बात चल ही निकली है तो जिक्र लाजिमी है।

कल आकाशवाणी में सुन रहा था। लगभग उसी समय जब हार्दिक पटेल को गिरफ्तार करने की कोशिश  की जा रही थी।  तब गुजरात में अहमदाबाद में ही एक रिहायशी सोसाइटी के अन्दर पुलिस ने तोड़फोड़ की और लोगों को आन्दोलन के संन्दर्भ में धमकाया। इत्तेफ़ाकन ये समूचा हादसा CCTV में कैद हो गया। किसी जनसेवी ने याचिका दायर की और हाईकोर्ट ने मामले को जायज मानते हुये सुनवाई की। पुलिस को लगभग प्रायोजित षड़यंत्र के लिये गलियाया । जाहिर है कि पुलिस बिना आला अफसरान के आदेश के इस तरह के कृत्य को अंजाम नहीं दे सकती। सो आज्ञा ऊपर दे ही रही होगी। ये ये उजागर करने के लिये काफी है की आन्दोलन को दबाने के निर्देश पुलिस को पहले से थे। वर्ना गाँधी जी के गृह प्रदेश में शान्तिपूर्वक प्रदर्शन करते लोगों के नेता को जबरन हिरासत में लेने का प्रयास ना किया जाता है !!! अनशन पर बैठे लोगों पर लाठी चलाने का काम ना किया जाता है। 9 निर्दोष लोगों की जान ना जाती।

ध्यान देने की बात एक और है की प्रदेश में केवल पुलिस के भरोसे ४-५ जिलों में एक साथ कर्फु कभी नहीं लगाया जा सकता। बिना पैरामिलिट्री फोर्सेज के ऐसा सम्भव की नहीं हो सकता। जाहिर है इंतजामात पहले से थे। ये साफ़ है कि पुलिसबल का बेजा इस्तेमाल प्रायोजित ढंग से किया गया। जो मर गये वो देशद्रोही थे कहे जायेंगे और जो जीवित बच गये वो देशद्रोही। देशद्रोही नहीं तो वो तन्त्र जो आरक्षण हर दस साल में रिव्यु नहीं करता। जहाँ तक मेरी जानकारी है। जब आरक्षण लागू किया गया  तब ये व्यवस्था भी की गयी थी की हर 10 साल में इसे रिव्यु किया जायेगा। जिसको जरूरत रहेगी दिया जायेगा जिसकी जरूरत खत्म उसका आरक्षण ख़त्म। क्या किसी सरकार ने इसको रिव्यु किया? आँकड़े इक्कट्ठा किये गए? अगर कांग्रेस को निकम्मा मान लिया जाय तो क्या अटल जी के ज़माने में ऐसा हुआ? क्या मोदी जी ऐसा करने की सोच रहे है ? दमनकारी तरीके से आन्दोलन को दबाने की जगह माननीय प्रधानमंत्री को संसद में स्थिति साफ़ करनी चाहिये। नहीं तो आन्दोलन  भी लोग करेंगे और तब सबको देशद्रोही या आप का समर्थक नहीं बता पायेंगे अन्धभक्त !!!!

गज़ल: लोगों को इतना समझदार रखना ......

मेरे दुश्मनों का घर भी गुलज़ार रखना
पर रुतबा मेरा भी असरदार रखना ।

मेरे शहर में हो खुशबू चैनो-अमन की
लोगों को इतना समझदार रखना।

जमाना जो बदले बदल जाने देना
बस दोस्तों के दिल में बड़ा प्यार रखना ।

अहम् का वहम कभी छू भी ना पाये
मुझको सदा अपना तलबगार रखना ।

बुजर्गो की सीखों के संग-संग चले हम
हम सबको इतना अदबदार रखना।

-विक्रम

मुद्दा: नोयडा क्षेत्र का नया उद्योग धन्धा !!!

नोयडा में लूट, हत्या, राहजनी और रोडरेज नए उधोग के तौर पर उभरे है। बेहद ही अच्छे और प्रभावशाली तरीके से उभरता उद्योग है ये । सुबह अखबार पढ़ लीजिये, अपराध की खबर के आलावा कुछ होता ही नहीं है। शायद सरकार इस उद्योग के विकास को लेकर बेहद संजीदा है। तभी तो नोयडा, गाज़ियाबाद ग्रेटर नोयडा  में हर दूसरा लोकल कट्टा लेकर घूम रहा है। अपराधो  सिलसिला लगतार चल रहा है। कभी होश में कभी मदहोशी में। ना पुलिस कट्टा सप्लाई करने वालो को धर पायी। ना ही अपराधियों को। न ही इसकी सम्भावना है। शहर के SP अक्सर पुलिस बल की कमी बता कर पल्ला झाड़ लेते है। मुझे ठीक से मालूम नहीं है पता करिये हो सकता है कि कट्टा खरीद पर सब्सिडी दी जा रही हो!!! एक आप और एक मैं भी खरीद लेते ही आत्मरक्षा के लिये। दिन में अगर लुटना ही है तो लड़ते हुये लुटे तो बेहतर।


मुद्दा:हार्दिक पटेल और आन्दोलन का विरोध क्यों?

आपको क्या लगता है? कि देश में आज़ादी के बाद से चली आ रही, आरक्षण व्यवस्था किसी रोज अचानक एक चमत्कार होगा और खत्म हो जायेगी??? या फिर कुछ और सोचते है आप इस बारे में? क्या करना चाहिये आरक्षण को ख़त्म करने के लिये? वैसे एक तरीका ये हो सकता है कि जो आरक्षण माँगे देते रहो और एक दिन ऐसा आयेगा की सभी आरक्षित हो जायेगे और आरक्षण के मायने ही ख़त्म। दूसरा तरीका ये कि आरक्षण को पूरी तरीके से संसद में ध्वनिमत से ख़ारिज जाय। दूसरा तरीका सकारात्मक है। यदि ऐसा जाय तो कितना अच्छा हो। किन्तु क्या ये कभी सम्भव है? भारत में राजनीति की नींव ही जाति और धर्म है, जहाँ चुनाव में टिकट जाति और धर्म की बहुलता हो देख कर दिया जाता है। वहाँ अचानक संसद में ऐसा हो जायेगा ये व्यवहारिक नहीं लगता। किन्तु आज नहीं तो कल कोई न कोई हल तो चाहिये होगा। इसके लिये थोड़ा और विचार करना होगा। सामाजिक और राजनीतिक पहलुओं पर भी गौर करना होगा। आईये आगे बढ़े और कारणों को खंगाले।

आरक्षण माँगने के मूलभूत कारण क्या है?
अखबारों में पढ़ा कुछ लोग ये कह रहे थे की हमारे 90% वाले बच्चों का एडमिशन नहीं होता और उनके 35 -36 % वालों का भी हो जाता है। जायज बात है। किसी को भी कष्ट होगा। इस कष्ट निवारण लिये फिर वही पहलू निकल कर आता है। निवारण तभी है जब या तो आरक्षण जाये या सबको मिल जाये। हटाने की बात तो कोई मानने से रहा। हाँ लेने  सरल दिखती है जाहिर है कि 1990 के दशक से वाद-विवाद, हिँसा-अहिँसा का दौर चलता आ रहा है कई लोग कुर्बान भी हो गये, किन्तु आरक्षण जस का तस कायम है बुलन्दी के साथ। नयी जातियाँ आरक्षण से जुड़ने के लिये आन्दोलन करती रही। सामाजिक कदापि नहीं किन्तु राजनीतिक कारणों से कुछ समुदायों की माँगो पर विचार भी किया गया। उसी चलन का परिणाम है कि अब इन आन्दोलनों की सँख्या में इजाफा हुआ है और स्थिति बदली नहीं तो आगे भी होता रहेगा। भारत में रुतबे वाली नौकरी सरकारी ही होती है और मूल लड़ाई वही तक पाने की है। जो समुदाय प्रभाव वाले क्षेत्रो में है बस पैसा या नाम  अपनों को भरे पड़ा है। उत्तर प्रदेश में यदवीकरण एक नायाब उदाहरण है इसका। पुलिस के हवलदार से लेकर UPPSC के आला अफसरान किस तरीके से भर्ती हुये।

हार्दिक पटेल के उद्देश्य पर ध्यान दे  
खैर हार्दिक पटेल की बात पर लौटते है। कल शाम की रैली में हार्दिक ने ये कहा था कि आरक्षण या तो "हमें भी दो या तो हटा दो!!!" हमे भी दो वाली बात को दिल से लगाना कितना ठीक है? बाद वाली बात को भी तो तवज्जों दी जा सकती है कि आरक्षण हटा दो। देने की सम्भावनाये बहुत कम है। कारण जाहिर है कि पटेल या कुर्मी क्षत्रिय समुदाय की खासकर गुजरात में समृद्धता इसका कारण है। सो जाहिर है की आन्दोलन का अगर चलता रहा तो आन्दोलन का दूसरा पहलू " आरक्षण हटा दो" सामने आने की पूरी सम्भावनाये है. इसमें भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिये की खून हर स्थिति मजे बहेगा माँग हटाने की हो या फिर लेने की। इस तरह के आन्दोलन सकारात्मक रहे हो या नाकारात्मक कुर्बानियाँ जरूर ली है। इस बार वही हुआ। बेहतर होता की गुजरात के साथ के पटेलों/कुर्मी क्षत्रियों का आन्दोलन चलता रहता और इसी आन्दोलन में और आरक्षण माँगने के लिये और जातियाँ आ जाती तो आन्दोलन कोई न कोई सकारात्मक परिवर्तन शायद ले ही आता। व्यक्तिगत तौर पर मेरा मानना है कि आरक्षण ऐसे ही किसी आन्दोलन से या सबको मिल जायेगा। अन्यथा हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे गुजरते समय के साथ खात्मे  सम्भावनाये घटती चली जायेगी।

गाँधी जी के प्रदेश में लाठी क्यों चली
चन्द रोज पहले 5 लाख लोगों  हुयी। बिना किसी हील हुज्जत के, बिना किसी बखेड़े के। कल अहमदाबाद में अचानक हिँसा क्यों फ़ैल गयी?? 22 साल का एक नेता जिसको भरपूर समर्थन मिल रहा था। उसे जबरन गिरफ्तार करने की जरूरत क्यों आन पड़ी? आमरण अनशन पर बैठे लोगों पर बल प्रयोग क्यों किया गया? हिँसा भड़की नहीं जान-बूझ कर भड़कायी गयी प्रथम दृष्ट्या ऐसा ही लगता है। अन्यथा ना लाठी चार्ज होती और ना लोग मरते। आन्दोलन राजस्थान में हुये रेल की पटरियों पर लोग बैठ गये ,उखाड़ डाली। उन पर लाठी चार्ज नहीं हुयी। लाठी चार्ज की आन्दोलन को दबाने की कोशिश है। उस आन्दोलन को जो आरक्षण ख़त्म करने दिशा में ले जाता। पहले भी देखा गया है कि राज्य सरकार ने भले माँग मान ली हो किन्तु आगे जाते हुये माननीय उच्चतम न्यायलय या फिर उच्च न्यायलय ने उसे ख़ारिज कर दिया। ये तथ्य सामने होते हुये भी दमनकारी नीति अपनायी गयी लोग मारे गये सार्वजानिक सम्पत्ति को नुकसान पहुँचा। जाहिर है की सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी को लाठी चार्ज और जबरन गिरफ़्तारी की कीमत आगे  चुनावो में शर्तिया चुकानी पड़ेगी। बेहतर होता की बात कर मामला सुलझाया जाता। आगे जाते हुये अगर मामला कोर्ट से ख़ारिज होता तो आन्दोलनकारियों अपने आप छट जाती। और यदि आंदोलन बड़ा होता समूचे देश को फायदा होता। किन्तु भीड़ पर बल प्रयोग एक बड़ी कूटनीतिक भूल है बल्कि ये जनहानि और धनहानि का कारण भी है।

माँझी के माध्यम से नक्सलवाद की बात

माँझी डी माउंटेन मैन  और उसके एक पडोसी का संघर्ष देखकर देश में चल रहे नक्सलवाद की पैदाइश और उसके कारणों का भी पता चलता है। "पान सिंह तोमर" को भी याद करिये। पान सिंह के मेडल फेकता पुलिस वाला याद करिये।वाधा दौड़ का चैंपियन पुलिसिया तंत्र से लड़ने के लिए हथियार उठा लेता है। वो डकैत बन जाता है। ये भी नक्सलवाद की श्रृंखला का सूत्रपात करता नज़र आता है। आगे जिक्र लाजिमी है कुछ लोग भूख से लड़कर मर जाते है कुछ अत्याचारों से थक कर टूट जाते है किन्तु कुछ इसका विरोध करते है। हिंसक विरोध!! ऐसे ही विरोधियों का एक समूह नक्सलवाद का समूह है। कुछ लोग शांति पूर्वक विरोध करते है वो माउंटेन मैन बन जाते है। झरिया और धनबाद की कोयला खदानों में काम करता मजदूर अकाल पड़ने पर भूख का शिकार हो जाता है। देश और विदेश में बैठे बड़े-बड़े उद्योगपति जो इन्ही कोयला खदानों से बड़े बने है। इन्ही के नियोक्ता है किन्तु मदद तक नहीं करते खून पीने के इसी सिलसिले का विरोध ही नक्सलवाद है। शायद यही कारण है की देश में कोई भी सरकार रही हो नक्सलियों पर कभी कोई बड़ी कार्यवाही नहीं की गयी। जो भी कायवाहिया की गयी वो प्रतिक्रिया के तौर पर की गयी। अमूमन नक्सली व्यवस्था से लड़ाई लड़ रहे है। हालाँकि लोकतान्त्रिक देश में इस तरह के संगठित हिंसक समुदायो का होना गलत है। ऐसे समुदायो पर कठोर कार्यवाही भी होनी चाहिए किन्तु जरूरी ये भी है की पहले उनसे बात की जाय। पुनर्वास की व्यवस्था पारदर्शी तरीके से की जाय। व्यवस्था के सामने विवश होकर घुटने न टेक दे।यदि नहीं मानते तो लड़िये मार दीजिये।


शॉकिंग न्यूज़: "प्रथम आमआदमी" केजरीवाल का रासायनिक संघटन और उसका अध्ययन

"शॉकिंग न्यूज़" के संवाददाता को प्राप्त गुप्त सूचनाओं के अनुसार एक रसायनशास्त्री ने दावा किया है कि वो केजरीवाल के रासायनिक संघटन बारे में वो गहन अध्ययन कर चुके है। उन्होंने ये भी दावा किया है कि देश के "प्रथम आम आदमी" श्री केरजी आवर्तसारणी के 119 वे तत्व है। इस तत्व की उपज लोकपाल+ धरना+नैतिकता+झाड़ू+आन्दोलन+शिष्टाचार+RTI+समाज सेवा इत्यादि इत्यादि तमाम ज्ञात और अज्ञात सामाजिक और राजनीतिक प्रभावों से हुयी है। ये निर्वात में निष्क्रिय किन्तु धर्मनिरपेक्षता टाइप के वातावरण में बेहद ही क्रियाशील हो जाता है। ये अविरत बदलते रंगवाला तथा तीक्ष्ण गन्ध वाला पदार्थ है। इसका परमाणु क्रमाँक 420 और द्रव्यमान अस्थिर है। हालाँकि वरिष्ठ समाजसेवियों के नजदीक आते ही है इसका द्रव्यमान एक्सपोनेंसियलि बढ़ता है। 

इस पदार्थ की नाभिकीय संरचना बेहद जटिल और समझ से परे है। नाभि में उदासीन न्यूट्रॉन की जगह झाड़ू और प्रोटॉन्स की जगह सत्तासुख ने ले रखी है और बाहर वाली कक्षा में डाँवाडोल नीयत लगतार चक्कर लगा रही है। रसनशात्री ने ये भी कहा की भैसों की चारे से मिलकर जो क्रिया होगी उसका अध्ययन चल रहा है किन्तु धर्मनिरपेक्षता मिल कर जो क्रिया हुयी है वो उसकी विस्तृत रिपोर्ट अखबारों में प्रकशित हो चुकी है।



साभार : http://chemistry.tutorcircle.com/inorganic-chemistry/atomic-structure.html
                                    रासायनिक संघटन  याद दिलाने हेतु।

कुछ रोज नहीं जलता है चूल्हा जिसके घर ...

कुछ रोज नहीं जलता है चूल्हा जिसके घर
जब भी मिलता है, मिलता है मुस्कराकर

हसरतों और सपनों को दिल में दबाकर
जाने कहाँ से लाता है रोज जज्बा बनाकर

मौसम की मार होती है ,गिरता है उसका घर
बनता है फिर नया हौसलों सहेज कर

हवाओं का रुख बदलने की कुब्बत उसके दर
कभी जिद से तो कभी हिम्मत को दिखाकर ।

उस दिन जब बेटी ने मक्खी मार दी

बच्चे दुनियादारी नहीं समझते, शायद इसीलिये दूसरो का बुरा ना चाहते है ना करते है। आप उनको जो भी बताये थोड़े बहुत क्यों और कैसे के साथ यथावत, अक्षरसा स्वीकार कर लेते है। इसका एक उदहारण मुझे उस दिन मिला जब मैं दफ्तर के काम में मशगूल था, तभी फ़ोन ने घनघना कर ध्यान भंग किया। पत्नी की कॉल थी, फ़ोन उठाते ही दो आवाज़े सुनायी दी। एक पत्नी की, दूसरी बैकग्राउंड में बच्ची के रोने की आवाज़। पत्नी से मालूम हुआ की बच्ची ने एक मक्खी मार दी और अपराधभाव से ग्रसित होकर रो रही है और सफाई दिये जा रही है की मम्मा मैंने जानबूझकर नहीं मारा वो मुझे परेशान कर रही थी मैंने तो बस उसे भागने की कोशिश की और कटोरी के नीचे दब गयी। भगवान मेरे को पनिशमेंट देंगे।  ....... रोना फिर से शुरू ……।

स्पीकर पर फ़ोन लेकर मैंने और सामने खड़ी पत्नी बच्ची को लगतार ये समझाने की कोशिश में लगे थे की बेटा ये आपसे गलती से हुआ आपने जानबूझकर नहीं किया इसलिये डरने कोई बात नहीं। किन्तु वह मानने के लिये तैयार नहीं। बार-बार दोहराती रही की पापा मैंने जानबूझ कर नहीं मारा समझाने का सिलसिला बड़ी देर तक चलता रहा । अन्ततः हमने बीच का रास्ता निकाल लिया और पत्नी बेटी को लेकर घर में रखे छोटे से मन्दिर के सामने गयी और बेटी ने भगवान के सामने अपनी गलती स्वीकारी और सॉरी शब्द से भगवन को भी सराबोर कर दिया। तब जाकर रोना बन्द किया। शाम जब दफ्तर से लौटा तो बेटी ने देखते ही सफाई दी पापा मैंने जानबूझ कर नहीं मारा। बालमन के भोलेपन को देखकर मैं फिर से भवबिभोर हो उठा। उस दिन जब पत्नी ने उसे बताया था की बेटा "किसी को भी परेशान नहीं करते और ना को मारते है वो कोई भी हो , अगर आप किसी को मरेंगे तो भगवान आपको सजा देंगे" तब हम ये बताना भूल गए थे की आत्मरक्षा में कई बार गलतियाँ हो भी सकती है। और उसी का नतीजा था कि अपने ही दिये गयी सीख को परास्त करने के लिये हमे भारी जद्दोज़हद करनी पड़ी और अंततः साझा प्रयास विजय सकें। मैं बहुत देर तक ये सोचता रहा कि बच्चे धार्मिकता से सीख का पालन करते है काश बालमन का ये भोलापन उम्र के साथ विलुप्त ना होता। कितना बेहतर समाज और कितनी बेहतर समझ हर जगह हम  हम सब का इंतज़ार कर रहे होते।

नोयडा की एक खतरनाक घटना: कार्बन मोनोऑक्साइड(CO) और A.C

स्थान: GIP Mall Entrance Gate

नोयडा का एक मुख्य मार्ग, भीड़ का अविरत उमड़ता गुबार, लगभग रुका हुआ यातयात, चौपहिया वाहनों से आच्छादित सड़क, चौपहियों के उत्सर्जन से सहमा हुआ वातावरण, इन सबके बीच GIP के gate २ के थोड़ा सा पहले अचानक एक कार के पीछे के दोनों दरवाजे खुले और दो महिलाये रोती हुयी बाहर निकली। दोनों के पास सोते हुये बच्चे, और बच्चों का सर माँ के काँधे पर। दोनों जोर-जोर से बच्चों को ठोक कर शायद उन्हें जगाने का प्रयास कर रही थी। बच्चे जागने का नाम नहीं ले रही थे। महिलाये रोने लगी, अनहोनी की आशंका से सहमी हुयी माँए। ये समझते देर नहीं लगी की कुछ गम्भीर हुआ है। वहाँ यातयात पूर्णतया रुक गया। घबरायी हुयी माँए कभी इधर कभी उधर भाग बच्चे को ठोक जगाने का प्रयास कर रही थी। जब तक लोगों को ये समझ आता की किस तरह मदद करनी है तब तक लगभग 5 -7 मिनट का समय गुजर गया। पास वाली कार से एक सज्जन उतरे और उन्होंने बच्चों के मुँह पर पानी डाला। माँए बच्चों पीठ ठोक बारबार चेहरा निहारती। तकरीबन २-3 मिनट बाद एक बच्चे ने हरकत शुरू की। तफ्सील हुयी की बच्चा केवल अचेत था। दूसरे बच्चे के ऊपर भी पानी की बौछारें की गयी। वो भी जाग उठा। क्रूर होता काल टल गया था।



इसी बीच पीछे से हॉर्न देती गाड़ियों ने आगे बढ़ने पर मजबूर कर दिया। किन्तु ये समझने के देर नहीं लगी, और बाद में इस बात को पुख्ता भी किया कि भीषण ट्रैफिक में फँसी एक गाड़ी जो पिछले २०-25 मिनट में कुछ 100 -200 मीटर खिसक पायी थी। इस पर लगातार चलता हुआ गाड़ी का AC और अन्दर बैठी महिलाओं की गोद में सोते हुये बच्चे। जब बच्चे जगाये गये तो जागे नहीं। महिलाये और गाड़ी चालक को जब ये समझ आया की ये गाड़ी के AC के कारण तो बच्चों को लेकर बाहर भागे। अनन्तः बच्चे बच तो गये लेकिन यदि थोड़ी देर और होती अनहोनी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता था। सोते हुये व्यक्ति को बेहोश कर कार्बन मोनो ऑक्साइड (CO) की कातिलाना ताकत हावी हो जाती to यकीन मानिये एक बड़ी अनहोनी हो जाती। जो हुआ वो अनहोनी से कम नहीं था किन्तु ये अनहोनी केवल चेतावनी के साथ बख्श गयी। किन्तु सबक जरूर ले कि सोते हुये गाड़ी का AC कभी ना चलायें, और AC यदि लगभग खड़ी में चल रहा हो तो बच्चों सोने naa दें।

Flipkart पर मेरा पहला ऑनलाइन शॉपिंग अनुभव - सर मुड़ाते ही जबरदस्त ओले पड़े

"अच्छा माल सस्ते में, घर बैठे" कुछ इसी सिद्धान्त पर है ऑनलाइन शॉपिंग का समूचा कारोबार। जबरदस्त चल भी रहा है। लुभावने ऑफर्स के साथ मार्केट में पैठ भी बना ली, ऑनलाइन शॉपिंग कम्पनीज ने। और फिर वही हुआ जैसा हमेशा होता है। ऑनलाइन दुकानों की सँख्या दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ी है और साथ-साथ बढ़ी प्रतिस्पर्धा भी। हिन्दी की एक कहावत है की "जहाँ गुड़ होता है वहाँ साथ-साथ मक्खियाँ भी आ जाती है" कुछ इसी तर्ज पर ऑनलाइन शॉपिंग कम्पनीज पहले "गुड़" दिखाती है और मक्खियाँ छोड़ देती है काटने के लिये वो ग्राहक को काटती है और बीमार भी करती है। भारत में हर कारोबार में अक्सर नैतिकता पहले-पहल बड़ी तेजी से उगती है और फिर अचानक नफे नुकसान के तराजू में तुलती-तुलती हवा हो जाती है। यही ऑनलाइन शॉपिंग में भी हो रही है। हाल फिलहाल एक अदद मोबाइल की चाह में मैंने पहली बार ऑनलाइन शॉपिंग का रुख किया और सर मुड़ाते की जबरदस्त ओले पड़े। सर अभी तक दुख रहा है। Flipkart की pre-planned शॉपिंग फेस्ट में रजिस्टर कर 29 जुलाई को फ़ोन का आर्डर दिया। पहले 4 अगस्त फिर 7 अगस्त को फ़ोन भेजने का वादा किया गया। 7 तारीख को फ़ोन नहीं मिला और 9 तारीख को आर्डर कैंसल कर दिया गया, Flipkart की तरफ से। आज 14 तारीख है। पैसा वापसी की का वादा तो हुआ किन्तु आसार कहीं नज़र नहीं आ रहे। ग्राहक सेवा केन्द्र के अधिकारी कई बार फ़ोन कर अफ़सोस जाहिर करते है। पैसे वापसी का वादा भी करते है। पर कुल मिला कर हालत वही है "ना खुदा मिला, ना विशालेसनम" ऑनलाइन कंस्यूमर कोर्ट का सहारा लिया है। देखते है क्या हासिल होता है। http://conisking.blogspot.in/2013/08/what-is-consumer-court-process-to-file_26.html
साभार:Flipkart के ऑनलाइन शॉपिंग पेज

सँस्मरण: 13 अगस्त-2006 की दर्दनाक शाम

आशंकायें, काले बादलों की तरह घुमड़-घुमड़ कर जी को डरा रही थी। शरीर सन्नपात, दिमाग शून्य और खून जमा हुआ मालूम होता था। माथे पर से पसीने की बूँदे अविरत टपक रही थी, जैसे आज समय निचोड़ने पर उतारू हो। ऐसी रात जिसकी सुबह होने का नाम तक नहीं लेती थी। हर-पल, हर-क्षण ताकत कम होती मालूम पड़ती थी। रातभर साथियों का मजमा लगा रहा लोग आते-जाते रहे । सब के सबों ने अपने को जैसे सिगरेट की भट्टी में झोक दिया हो। भट्टी का धुयाँ पँखे की पंखुड़ियों के साथ खिचा चला जाता, समन्दर में आये किसी बवण्डर की तरह। जानें कई थी पर जान किसी में नहीं थी। शाम की ही तो बात थी, करीब 5.30 से 6 बजा रहा होगा, जब हम मस्तमौला, चाय की एक-एक चुस्की को मौजों की बारात में बदलने में मशगूल थे। दुनियादारी किनारे पड़ी तपड़ रही थी। तभी शेखर का फ़ोन घनघना उठा। खान का फ़ोन था। फ़ोन की आवाज थोड़ी तेज थी शेखर के फ़ोन उठाते ही उसके चेहरे की भाव भंगिमाएं बदलने लगी। मानो गंभीरता का भाव आकर उसके चेहरे से थपेड़े की मानिन्द टकरा गया हो। मैंने कान फ़ोन की तरफ गड़ा लिये फ़ोन से खान रुआँसी सी आवाज दिल को चीर गयी। "अबे पकन्ना, मोना और वर्मा सर बह गये" टाइड आई और तीनो बह गये, मोना को एक आदमी ने बाहर निकाला है, साँसे चल रही है। वर्मा सर और पकन्ना का कोई पता नहीं। दूर गोवा के beach से आई इन विधुतचुंबकीय तरंगो ने एक ही बार में सारी खुशियाँ और आशाओं पर कुठाराघात कर दिया। खान का फ़ोन आया था तो लगा था कि गोवा हम नहीं जा सके तो क्या अब गोवा के beach का आँखों देखा हाल हमे दिल्ली के जियासराय में बैठे मिल जायेगा। लेकिन पहली बार इतना काल क्रूर था। हमारा एक दिलेर साथी जब आँसू बहा रहा था तो कमोवेश उसी दशा और दिशा को हम भी प्राप्त हुये। कब,क्यों और कैसे जैसे सवाल आशंका की चादर ओढे मन के किसी कोने से निकल-निकल कर बाहर आने को उतावले हो रहे थे। सोच का दायरा बढ़ जरूर रहा था पर आशंकाओं के आसमान को टकराकर बस धराशायी हो जाती।

440 वोल्ट के तार से टकराकर गिरे पन्छी मानिन्द मरे गिरे कदमों से आगे बढ़ते हुये, हम शेष बची कुछ संभावनाओं, शेष बची कुछ आशायें डूबते को तिनके के सहारे की तरह मालूम होती थी। घटना हो चुकी थी अब बारी थी मित्रों के घर खबर करने की। अश्कों से भरी ये खबर घरवालो दी जाय तो कैसे? कौन देगा? क्या कहेगा? क्या हुआ कैसे हुआ? घर वाले ज्यादा परेशान न हो जाये। जब ये सनद हुआ की "पकन्ना और वर्मा सर" अपने पिता के एकलौते पुत्र थे तो ऐसा लगा की उन तक खबर पहुँचाना उनकी भावनाओं के साथ खिलवाड़ करने जैसा होगा। काल के इस अट्टहास को कैसे झेल पायेंगे वो सब, उनके भेदते सवालों का जवाब कैसे देंगे? सोच कर मन आधा हुआ जाता था। आखों के आगे अँधेरा छाया जाता और दिल में घबराहट का ताव बढ़ता जाता। मन में आया की चीखें मार कर रो लेते है, किन्तु वो भी ना हो सका बस आँखें नम थी और ग़मों का बादल दिल में छाया हुआ था। खैर ज़माने भर की हिम्मत बटोर कर इधर उधर से मित्रोंके परिजनों का नम्बर जुगाड़ा। एक-एक कर फ़ोन के माध्यम से सूचना की गयी। दर्द  लहरें दिल्ली से निकल लखनऊ और बनारस की गलियों तक अपना कहर बरपाने। सूचना दी गयी की बीच पर नहाते हुये लहरों ने कई को लील लिया, हालाँकि सलामती की सम्भावनाये शेष है, ये बिलकुल दबी आवाज में ढाढ़स बढ़ने के लिए कहा। खबर साथियों के पिता को थी।

बेहद लम्बी उस रात को समुद्र कि लहरें जैसे हम सब को लील लेगी ऐसा अहसास अविरत घर किये रहा, समुद्र का गुस्सा बेहद भयावह होता है, उसके गुस्से का शिकार हुये गये मित्रों की याद में मन गोरखपुर की हर उस जगह को याद कर रहा था जहाँ जीवन के चार हँसीं साल हमने साथ-साथ गुजारे। विश्वेसरैया हॉस्टल, रमन भवन के और बाहर पंचम का एक-एक लम्हा जैसे मन के कैनवास पर खिचा जाता था। मस्तियों और यारियो का वो दौर, बॉस्केट बॉल कोर्ट  शामे, कई रातें जो हमने एक दूसरे को जानने में परिवार को जानने में बाते करते करते गुजारी थी। मनीष त्रिवेदी के अचार का वो डब्बा जो लखनऊ से आता उसके कमरे पर था पर उसे विक्रम खा जाता था कभी माँग कर कभी माखनचोर की तरह। मनीष अक्सर व्यंगात्मक लहजे में कहता। अबे वी पी आजकल मेरा आचार बड़ी जल्दी खत्म हो जा रहा है, तुम्हारा क्या ख्याल है। वो इतना कहता और हम देर तक जोरों से हँसते।

खैर जैसे तैसे खुली आँखों से सपने देखते वो रात कट गयी। सुबह बारिश हो रही थी, आसमान रो रहा था। सामान पैक कर कब दिल्ली से लखनऊ के लिये निकल गये, ट्रेन की भीड़ में कब कहाँ जगह बना ली पता ही नहीं चला शाम लखनऊ में विश्राम किया। मित्र अनुज सिंघल के घर, सुबह होते ही सरोजनी नगर में डेरा डाल दिया गोवा मित्रों लगतार सम्पर्क में थे 15 अगस्त के उस राष्ट्रीय अवकाश वाले दिन असंख्य कठिनाईयों के बीच दोपहर मनीष आ गया, डब्बे में पैक होकर। शैय्या पर लेटा वो मुस्करा ही तो रहा था। गोमती नगर के घाट में उसके शरीर को लपटों ने लील लिया. आँसुओं से भीगा हर पल भीषण पीड़ा से भरा था। पीड़ा यही समाप्त नहीं हुयी। अगला पड़ाव बनारस था, मेरा जाना पहली बार था। बनारस में BHU के राजपूताना हॉस्टल में मित्र अनुज सिंघल के बड़े भाई के कमरे पर आराम कर  दूसरा दिन और डरावना था। पकन्ना उर्फ़ सुशील सिंह का पार्थिव शरीर बनारस आ चुका था देखने की हिम्मत नहीं हुयी। गोवा से खबर मिली की करीब 35 घण्टे का सर्च ऑपेरशन चलने के बाद सुशील और 42 घण्टे के बाद अमित वर्मा सर का पार्थिव शरीर मिला। सुशील बनारस के एक विद्युत शवदाहगृह में में ब्रम्हलीन हो गया। अमित वर्मा सर बनारस के एक घाट में ब्रम्हलीन हो गये। पैदल-पैदल शवयात्रा में शामिल हम सब मैं, शेखर, अभिषेक जैन,आशीष शाली, अनुज सिंघल, आशीष गुप्ता और भी अन्य मित्र थे हम सब उस रोज बहुत बड़े हो गये थे और गम्भीर भी । जिनके साथ एक थाली में खाना खाया करते थे उनकों अपने सामने ब्रह्मलीन होते देख। अब केवल यादें शेष है। आज ९ वर्ष हो गये। मित्रों को श्रद्धाँजलि और उनके साथ गुजरे समय को नमन। 
Sushil Singh kee orkut profile se

Manish Trivedi kee orkut profile se

पूत को लात और कपूत का साथ।

समाजवाद के सौदागर आजकल मोलभाव में लगे है। साम,दाम,दण्ड भेद सभी हथकण्डों को आजमा रहे है। जरा सोचिये और विडम्बना देखिये। भ्रष्टाचार के पर्याय "यादव सिंह" के मुद्दे में कई खुलासे और खासकर CBI जाँच जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता नूतन ठाकुर द्वारा की जनहित याचिका कारण हुयी। इन्ही नूतन ने उत्तर प्रदेश के एक खनन माफिया के विरुद्ध भी जंग छेड़ी थी। परिणाम ये हुआ की नूतन और उनके पति दोनों का शिकार समाजवादी बहेलियों ने किया। दुष्कर्म के मुक़दमे का जहर बुझा तीर दम्पति के दामन में जा धँसा । सम्पत्तियाँ भी खँगाली गयी और भी कई तीर छोड़े गये। वही दूसरी तरफ हज़ारों करोड़ को अपने नाम कर "धनकुबेर" बन चुके "यादव सिंह" पर सरकारी कृपा है। CBI जाँच ना हो उसके किये। उच्च न्यायालय, उच्तम नन्यायालय सब जगह गुहार लगायी। जिन नूतन को सामाजिक कार्यो के लिये पुरस्कार मिलना चाहिये उनका शिकार हो रहा है और जिनके विरुद्ध आज से कई साल पहले कार्यवाही होनी चाहिये थी वो कृपा की रेवड़ियाँ खा रहे है। हुयी ना वही बात कि "पूत को लात और कपूत का साथ।"

फतवे जारी होते रहे, जेहाद चलती रही

फतवे जारी होते रहे, जेहाद चलती रही
धर्म की आग में इन्सानियत जलती रही।

वो दबे पाँव आकर, कर गया धमाका
बस कुछ आँखे ताउम्र रोती रही।
                               -विक्रम 












लोकतन्त्र पर अट्टाहस कर रहा है कोई !!

वीकेन्ड पर किसी शॉपिंग मॉल में जाना होता है, दिल्ली मेट्रो में सफर करना होता है और इन सबके मुख्यद्वार पर सुरक्षाकर्मी जब तलाशी लेकर स्वागत करता है। तो ये सवाल अक्सर जहन में उठता है कि क्यों मुझे अपने ही देश में तलाशी देनी पढ़ रही है? जाहिर है कि जगह-जगह सुरक्षा जाँच से ऐसा लगता है की मानों मेरी,आपकी सभी की देश के प्रति हमारी निष्ठा और प्रतिबद्धता को सवालिया माना जा रहा है!!! अराजक और असामाजिक तत्व होने का इल्जाम चस्पा किया जा रहा है। हालाँकि जब सवाल देश की जन-धन की सुरक्षा का हो तो सुरक्षा जाँच में सहयोग करना हमारा नैतिक दायित्व है। पर सवाल फिर भी कायम रहता है कि तलाशी क्यों और किसकी वजह से? इस सवाल का जवाब मुझे उस दिन मिल गया जब आतँकी याकूब दफ़न हुआ और बड़ी भीड़ उसे रुखसत करने  के किये आयी। इस सवाल का जवाब तब भी मिला जब ये खबर आई की मोहम्म्द नावेद और उनके दोजख सिधार चुके साथी नोमन वा अन्य कश्मीर में 45 दिन तक शरणागत रहे और पता तब चला जब गोलियाँ दागी गयी। ऐसे माहौल में जब कोई धर्मनिर्पेक्षता की बात करता है तो लगता है कि कोई लोकतन्त्र पर अट्टाहस कर रहा हो।

मुद्दा: छद्म धर्मनिर्पेक्ष भारतीय कांग्रेस

एक सदी और तीन दशक गुजर गये, जब कांग्रेस  का जन्म हुआ था, "अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" का जन्म!! वो  एलन ओक्टावियन हूयम, दादा भाई नैरोजी, गंगाधर तिलक, ऐनी बेसेन्ट, नेताजी सुभाष और वल्लभभाई की कांग्रेस थी। "आज़ादी का संघर्ष" इसी कांग्रेस की ऊँगली पकड़ कर आगे बढ़ा और रफ़्तार पकड़ी, 1950 के आस-पास ये सिलसिला खत्म हुआ। ये कांग्रेस भारतीय संस्कृति की स्थापत्य कला का एक बेमिसाल नूमना था। इस कांग्रेस को अगर राष्ट्रीय संग्रहालय में सँजो कर रख लिया गया होता तो बेहतर होता। दूसरे दौर की  कांग्रेस नेहरू और शास्त्री जी की कांग्रेस थी। लोकतंत्र, विकास, साक्षरता इत्यादि सब के सब कांग्रेस के साथ कन्धे से कन्धा मिला कर चलते रहे, एक दूसरे के अनन्य सहयोगी की तरह। ये समय ज्यादा दिन तक नहीं चला। 1970 आते-आते कांग्रेस की दशा-दिशा उद्देश्य सब बदलाव की राह पर चले निकले। ये इन्दिरा, संजय और राजीव की कांग्रेस थी। लोकतन्त्र नज़रबन्द हो गया और उसकी तबियत नासाज़ हो गयी। 1986 में राजीव ने उच्चतम न्यायलय के "समान नागरिक संहिता" की कल्पना को उलट दिया। ये कांग्रेस वो कांग्रेस थी जिसका "अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस" से 36 का आँकड़ा था। ये कांग्रेस स्वार्थो की कांग्रेस थी, ये कांग्रेस परिवारवाद की कांग्रेस थी ये कांग्रेस बोफोर्स की कांग्रेस थी। विचारधारा और उद्देश्य उलट थे अतैव नाम भी बदलना चाहिए था। नया नामकरण " छद्म धर्मनिर्पेक्ष भारतीय कांग्रेस" होना चाहिये था, नयी पीड़ी के प्रदर्शनकारी नेताओं को इस नामकरण की जरूरत पर विचार करना चाहिये। ये जरूरी है कि वल्लभभाई की कांग्रेस राहुल गाँधी की कांग्रेस से अलग रहे। नहीं तो इतिहास हमें कोसेगा!!

मुद्दा:घर के सपनों का बाजार और ग्राहकों की दुश्वारियाँ

अपना एक आशियाना बनाना, उसे दुनिया की हर खूबसूरती बक्श देना हर आम और खास का सपना होता है। अमूमन घर का सपना पूरा करने के लिये लोग अपने जीवन की समूची कमाई लगा देते है, या फिर अनुमानित कमाई की क़िस्त-क़िस्त भरते रहते है। इस सपने का बाजार धोखाधड़ी और फरेब से भरा हुआ है। सपने को बेचने वाले किस पर भरोसा किया जाय किस पर नहीं ये बेहद ही मुश्किल सवाल होता है। भरोसा कर भी लिया तो कब तक टिकेगा कोई नहीं जानता। चूँकि जमीने सोने के दाम बिकती है शायद इसीलिए घर का सपना दिखाने वालो के बाजार में अराजक तत्वों की कमी नहीं है। यह बाजार सरकारी संस्थओं के मुलाजिमों के लिये भी पैसा बनाने का एक मौका उपलब्ध कराती है सो इस बाजार में बड़ी हस्तियों का भी हस्तक्षेप होता है। एक नेक्सस है, नेता,गुंडों और व्यापारियों का। कालाबाज़ारी और कालेधन का भी बड़ा कारोबार यहाँ होता है। हालाँकि अच्छे लोगों की भी कोई कमी नहीं है। किन्तु उन्हें खोज पाना भूसे के ढेर में सुई खोजने के बराबर है। जब आप कहीं घर खरीदने निकलेगे तो घर बेचने वाला ऐसी भूमिका बाँधते की अगर आज आपने घर ना खरीदा तो कल इसी के दोगुने दाम आपको देने पड़ेंगे!!! एक अंतहीन छलावा और दिखावा इस बाजार में आपका इंतज़ार कर रहा होता है।

घर की खोज में निकले एक ग्राहक के सामने सबसे जो बड़ी चुनौतियाँ होती है आइये उनके बारे में समझते है।

- बिल्डर और प्रमोटर्स के बारे में कोई वित्तीय जानकारी न उपलब्ध होना। इस कारण से एक स्वस्थ वित्तीय कम्पनी की जानकारी कर पाना मुश्किल होता है।
- बिल्डर द्वारा जिस जमीन पर निर्माण कार्य करने का प्रस्ताव है, उसके मालिकाना हक़ के बारे में जानकरी ना होना। जो दस्तावेज उपलब्ध कराये जाते है, उनकी प्रमाणिकता ही सवालों के घेरे में होती है। इस कार्य के लिये जो नियामक संस्थाये है उनसे जानकरी निकलवा पाना दुष्कर कार्य है।  सो अधिकतर समझौते बिना पूरी जानकारी के हो जाते है।
- ग्राहकों से पैसा लिया जाता है किसी अन्य प्रोजेक्ट के लिये और वसूलकर किसी अन्य प्रोजेक्ट मेंलगा दिया जाता है।
  यही मूलकारण होता है की बिल्डर्स पोजेसन देरी होती है।
साभार: गूगल

इन सब दुश्वारियों के उपरान्त घर का सौदा हो जाता है उसके बाद तरह की समस्याएं ग्राहकों के सामने आती है।
बिल्डर की तरफ से समय-समय कई अन्य तरीकों से वादाखिलाफी की जाती है। ग्राहकों का शोषण किया जाता है। अमूमन बिल्डर्स का एक स्थापित लीगल सिस्टम होता है जिसको चुनौती देना आम ग्राहक के बस की बात नहीं होती।
१. समय पर पजेशन न मिलना
२. डील फाइनल होने के बाद फ्लैट का एरिया चेंज करना उसके एवज में पैसे की मांग करना 
३. कन्स्ट्रशन क्वालिटी का घटिया होना, इसकी गुणवत्ता केवल और केवल बिल्डर की श्रद्धा पर निर्भर करती है। यदि आप कंस्ट्रक्शन क्वालिटी से संतुष्ट नहीं है तो मन मसोस  कर रह जाने के अलावा कोई अन्य तरीका नहीं होता।
४. कई मामलात में किसी और की जमीन को अपना दिखा कर बेचा जाना
५. प्री -लॉन्च जैसे कांसेप्ट का दोहन, बिना किसी इजाजत के लोगो से पैसा वसूल करना और प्रॉपर्टी की ट्रेडिंग को बढ़ावा देना।
६. अथॉरिटी से बिना परमिशन के कंस्ट्रक्शन का कार्य शुरू होना, 
७. कुछ टावर बन जाने पर पजेशन देना , जबकि सोसाइटी रहने योग्य नहीं होती
८. बिल्डर का कानूनी कार्यवाही से न डरना
९.  नंबर ऑफ़ फ्लोर्स में परिवर्तन पूरे के पूरे फ्लैट का ले-आउट चेंज करने के उद्देशय
१०. ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के सहारे घर में दाम बढे हुए दिखाने का यत्न
११. ब्लैक मनी को बढ़ावा देना 
१२. एंड यूजर की जगह किसी एक ही व्यक्ति को ग्बहुत सारे फ्लैट उपलब्ध करना बाद में उन्ही फ्लैट्स को ऊँचे दामों पर बेचना।

ऊपर लिखी परेशानियों के बहुत से पहलुओं का निदान उपलब्ध कारयेगा "मोदी सरकर का रियल स्टेट बिल" जो अभी संसद में विचाराधीन है। अगली पोस्ट में इस "रियल स्टेट बिल" के महत्वपूर्ण बिन्दुओं को समझेगे और देखेगे की ये कैसे के आम आदमी को सपने का घर बनाने में सुरक्षा मुहैया करायेगा। आप के पास इस विषय में यदि कोई सुक्षाव है तो आप उसे यहाँ पर लिख सकते है। 
http://pmindia.gov.in/en/news_updates/amendments-to-the-real-estate-regulation-and-development-bill-2013/