गंगा सफाई: क्या हम पुरानी गलतियों से सीख रहे है???

गंगा सफाई के लिये देशव्यापी अभियान चलाये जा रहे है। जरूरी भी है। किन्तु केवल अभियान चलाना पर्याप्त कदम है? अभियान पहले भी चले है पर असफल हो गये, मनमोहन सिंह के कार्यकाल में गंगा बेसिन कमेटी बस ढाक के तीन पात ही बटोर पायी, हाँ पैसा जरूर जमकर खर्च हुआ। इस आयोग ने जो दुर्गति की उसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है की कमेटी के अहम सदस्यों ने जल पुरुष "राजेंद्र सिंह" के साथ इस्तीफ़ा दे दिया। अब नमामि गंगे चल रहा है सफलता की कामना है किन्तु बेहतर होता की हम इस अभियान के साथ-साथ बेहद जरूरी व्यवस्थाओं को चुस्त करते।

यदि गंगा में गन्दगी ना मिले तो गंगा का बहुतायत भाग तो अपने आप साफ़ हो जायेगा, अविरल धारा खुद को साफ़ कर के ही मानेगी। हाँ जहाँ पर गंदगी स्थायी है वहाँ सफाई अभियान की जरूरत है। सो गन्दगी ना हो इसके किये हर उस शहर जहाँ से गंगा गुजरती है वहाँ के उद्योगों और उन उधोगों के कारण नदी के एंकाटचमेंट एरिया में हो रही रिहायश पर शिकंजा कसना होगा। नियमों का पालन हरहाल में हो ये सुनिश्चित करना होगा। जिस दिन इतना भर हो जायेगा गंगा की को सफाई की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। मूल कारणों का पता करके उस पर काम करना बेहतर उपाय होगा बजाय इसके की गंगा को फिर से गन्दा होने के लिये साफ़ किया जाय।

जागरूकता अभियान भी चलना होगा, सख्ती भी करनी होगी , गंगा में लाशें बहाना, मूर्ति विसर्जन इत्यादि पर फौरी तौर पर रोक लगनी होगी इसके लिए धर्म गुरुओं के माध्यम से जागरूकता नही फैलानी होगी। कुल मिला कर बेहतर वो प्रयास जिसमे नतीजा सफलता की ओर जाता हो। नमामि गंगे अभियान की समीक्षा भी एक समयावधि में होनी ही चाहिये ताकि बेहतर परिणाम सामने आये। हाँ एक बात और पॉलिथीन तो सारे देश से तुरन्त बन्द कर देनी चाहिये।

पड़ताल: नोयडा में अच्छे दिन !!!

ना गाण्डीव उठा रहा हूँ, ना प्रत्यंचा चढ़ा रहा हूँ ना मोदी सरकार पर लक्ष्य साध रहा हूँ। सरकार किसकी है मुझे क्या मतलब? मैं तो एक सामान्य आदमी हूँ ? जो ये मानता है की अभी जो प्रधानमन्त्री है वो पहले वालो से बेहतर है, काम भी कर रहे है किन्तु इन सब मान्यताओं के बीच मेरा दिल तब जल जाता है दूरदर्शन पर अच्छे दिनों का विज्ञापन आता है!!! शायद सरकार और सामान्य आदमी लिये अच्छे दिनों की परिभाषा अलग अलग हो !! मतभेद हो सकते है। मैं अपने परिभाषा वाले अच्छे दिनों की तलाश कर रहा हूँ मिले तो सूचित करुँगा। ना कांग्रेस विरोध के कारण ना मोदी मोह के कारण, अच्छे दिनों के दावों की जाँच रुक तो नहीं सकती। जिक्र लाजिमी हो चला है।

आज की शाम, भुट्टा खाने इच्छा जवान थी, सो घर के पास ही एक भुट्टे वाले की ठेलिया पर आकर जम गया, वो भुट्टा भून ही रहा था की उससे व्यक्तिगत वार्तालाप का दौर चला। लड़के का नाम था सोनू , भागलपुर बिहार से था, कोई 14  -15  वर्ष का रहा होगा। शिक्षा के बारे में जब बात चली तो राजू बेहद भावुक हो गया उसने,  बताया कि वो कक्षा ६ तक पढ़ा है। पर भुट्टे की ठेलिया लगा कर आगे की पढ़ाई संभव नहीं है। खैर इन सब के बीच मैं उससे उसकी कमायी के बारे  जानना चाहा तो उसने जो बताया वो कानून, पुलिस प्रशासन सभी को को कटघरे में खड़ा करता है। बोला, साहब 3000 कमरे का किराया, बाकि 500 पुलिस वाले महीने लेते है, कमेटी वाले महीने में 200, और जब वो लाल नीली बत्ती वाली जिप्सी जब आती है कुछ तो देना पड़ता है 100 से कम तो लेते नहीं, महीने में २-3 चक्कर लगाते है। बोलते है दो नहीं तो तुरन्त ठेलिया उठायो !! नहीं तो सामान फेक देंगे!!!

वैसे हर शहर और हर जगह कमोवेश ऐसा ही होता है। दलाली के बगैर कोई काम नहीं। हालाँकि अब हालत थोड़े बदले हुये होने चाहिये थे। सनद रहे की देश में पिछले वर्ष  सितम्बर के अनत में देश की संसद ने " street vendor act" लागू किया था जो प्रभावी है। उसके तहत ठेलिया लगाने वालो को, रेड़ी लगाने वालो को पुलिस या नगर निगम तब तक नहीं हटा सकता जब तक स्ट्रीट वेंडिंग कमेटी इन लोगो को लाइसेंस ना देदे, जब तक काम के लिये सरकार उनको नयी जगह ना दिला दे। पर जो हो रहा है वो आँखों के सामने है कानून तो किताबो में कैद है। बाहर निकलता ही नहीं। सोनू से बातचीत के बाद मैं सोच रहा था कि अच्छे दिन तो अभी दिल्ली में संसद के मानसून सत्र के इंतज़ार में ही बैठे है, सब्सिडी वाली कैंटीन में नास्ता वास्ता कर रहे है, नोयडा तक आने में समय लगेगा ,पर पता नहीं कितना!! अच्छे दिन अभी तो नहीं आये? इंतज़ार करते है पड़ताल भी जारी रखते है।  देखते है मेट्रो और डीटीसी का टिकट मिलता  की नहीं।

जहाँ से फेसबुक की गालियाँ शुरू होती है।


अच्छे दिनों की तलाश वहाँ पूरी होती है
जहाँ से फेसबुक की गलियाँ शुरू होती है।

हर चेहरे पर रौनक
तस्वीरो में ख़ुशी की खनक
यहाँ प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है
हर बन्दा ख्यातिलब्ध है
बिना फेसबुक जिन्दगी अधूरी होती है ।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है ।।

फेसबुक की हर गली गुलज़ार है
यहाँ चौतरफा अच्छे दिनों की भरमार है
हर नागरिक के पास मौलिक अधिकार है
शेयरिंग और लाइक विधि थ्रू के परोपकार है।
हर आम और खास खबर यहाँ शेयर होती है।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है।।

देशाटन, विदेशाटन पल भर की बात है
संस्कृतियों का मिलन और जज्बात है
मीडिया से पहले खबरे आपके पास है
स्टेटस अपडेट हमेशा अपटूडेट
ग्लोबल बनने की शुरुआत यहाँ होती है।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है।।

यमराज और धर्मराज एक ही वेशभूषा में
लाइक और शेयर के थ्रू सेवा सुश्रुषा में
स्टेटस में नये- नये शेयर चिपका रहे
बिना लिखे ही "निंदा फजली" बने जा रहे है।
यहाँ की दुनिया बुद्धजीवी होती है।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है ।।

दिन में कई-कई बार स्टेटस अपडेट
हर पल नोटिफिकेशन का वेट
प्रोफाइल पिक और सेल्फ़ी की फ़िराक में
दिन गुजर जाता है मैटर की तलाश में
इवनिंग और मॉर्निंग वाक भी फेसबुक होती है।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है ।।

यहाँ नारी, पुरुष पर है भारी
राजनीति भी होती है करारी
होती है मौजमस्ती बिन उधारी
फेसबुक ने जिन्दगी लोगो की सवारी
यहाँ की जिन्दगी रंगीन होती है।
अच्छे दिनों की तलाश यहाँ पूरी होती है ।।

पड़ताल: उत्तर प्रदेश वोट के लिये चोट की राजनीति

उत्तर प्रदेश जंगलराज के मुहाने पर खड़ा है। समाजवादी शासन के आने पर ये अपेक्षित भी था। इतिहास गवाह है कि समजवादी शासन में व्यक्ति विशेष का कद संवैधानिक कद से बड़ा हो जाता है। वोट के लिये चोट की राजनीति हमेशा हावी रहती है। चोट कानून व्यवस्था को, शान्ति प्रिय समाज को। धर्म और जाति, न्याय के तराजू में न्यायप्रियता से ज्यादा वजनदार हुआ करते है। खैर ये सब कुछ नया नहीं है। चर्चा उस बात की करते है जो समाज को चेताने वाली बात है।

पत्रकार जागेन्द्र की हत्या के मामले सरकार ने जो किया वो तो होना ही था। किन्तु जिस तरह से उस केस का गवाह पलट गया वो, जिस तरीके से जागेन्द्र के परिवार ने पैसा लेकर समझौता किया वो बेहद गम्भीर है। ये लोगो में न्याय के प्रति उठती आस्था का, न्याय की घटती विश्वसनीयता का ज्वलंत उदहारण है। पैसे और नौकरी लेकर आराम से गुजर बसर करना या फिर दशकों तक न्याय के लिए संघर्ष करना दोनों में से अगर किसी एक को चुनना हो तो जाहिर की वर्तमान हालात को देख कर कोई भी पहला विकल्प ही चुनेगा। गवाह के मुकरने का कारण भी जायज ही रहा होगा। हर कोई रवीन्द्र पाटिल बनने की कुब्बत नहीं रखता, सालो तक अदालत के चक्कर, एक आध बार गवाही नहीं दी तो जेल जाने की सम्भावना। फिर कौन डालेगा आग में हाथ। उत्तर प्रदेश की ये घटना पूरे के पूरे न्याय तन्त्र पर सवालिया निशान छोड़ती है। प्रदेश के के रसूखदार मन्त्री से कौन लड़ सकेगा जब थाने से लेकर विधान सभा तक सब उसके साथ खड़े दिखाई देते है।
साभार: दा हिन्दू

इस पूरे प्रकरण में कमजोर का विपक्ष का होना प्रमाणित करता है। या यूँ कहें की विपक्ष है ही नहीं !! एक पत्रकार को जिन्दा जल दिया गया किन्तु कानून और व्यवस्था की इतनी दुखद स्थिति में ना ही उत्तर प्रदेश के राज्यपाल ने संज्ञान लिया और ना ही गृहमंत्रालय ने। मीडिया को ललित मोदी के आलावा कुछ ध्यान नहीं। लोकसभा चुनाव में शानदार जीत हासिल करने वाली और केंद्र में सत्तासीन भाजपा के लिये एक सुनहर मौका था जब वो अपने होने का सबूत देते। वो बताते की वो मामले का संज्ञान ले सकते है।  बिलकुल उसी तरह का संज्ञान जैसा की पश्चिम बंगाल में आतंकवाद के एक केस में लिया गया था। किन्तु अफसोस  की वोट राजनीति न्याय पर यहाँ भी भारी। केन्द्र सरकार केवल दिल्ली और केजरीवाल से जुड़े मामले का संज्ञान लेती। बाकी को देख लेंगे। न्यायलय जब तक स्वतः संज्ञान लेकर किसी कार्यवाही के आदेश देता तब मामला हाथ से निकल चुका था फोरेंसिक लैब क्लीन चिट बाट चुकी थी । कुल मिला कर नतीजा ढाक के तीन पात। सब एक सी राजनीति करते है ये प्रमाणित होता है।

पड़ताल: पुलिस वेरिफिकेशन - एक झूठा सच

आतन्कवाद और अपराध दोनों भारत वर्ष में व्यापक तौर पर पाये जाते है। चूँकि हम एक प्रतिक्रियावादी समाज में रहते है सो जब तक कहीें बम ना फूट जाये, 10 -15 लोग निपट ना जाये,  कुछ घायल होकर बिस्तर ना पकड़ ले तब तक प्रशासन की तन्द्रा भंग होती ही नहीं। जब घटना हो जाती है तो नये कानून, फरमान जारी किये जाते है निन्दा का दौर चलता है। जब तक मुद्दा जेरे-बहस रहता है कई पैमानों में आँका जाता है, और फिर ठण्डे बस्ते में !!! एक दामिनी जब क्रूर 16 दिसम्बर की भेंट चढ़ जाती है तो CCTV, फलाना, ढिकाना ना जाने कितनी ही कल्पनायें जन्म लेती है और समय के साथ दम तोड़ देती है। जितना सोचा जाता है अगर उसका 50 % का भी लक्ष अगर हम साध पाते तो स्थिति बेहतर होती, अपराध काम होते आतन्कवाद भी काम होता। 

ऐसी ही घटनाओं से निपटने के लिये कुछ वर्षो पहले देश और प्रदेश की सरकारों ने घर किराये पर लेने वालों के लिये, नये ज्वाइन करने वाले कर्मचारियों के लिये, पुलिस वेरिफिकेशन आवश्यक बना दिया। तत्कालीन परिस्थितियों में ये एक भावनात्मक फैसला ही रहा होगा। चूँकि आजकल ये कानून धरातल पर ही है। पुलिस वेरिफिकेशन हो पाना एक बड़ी बात है । अगर बिना घूस के हो जाये ये चमत्कार होगा, पुलिस वेरिफिकेशन में लगने वाला समय अपराधी द्वारा अपराध को अंजाम देने के लिये पर्याप्त है। यूँ तो पासपोर्ट बनवाते वक्त हम सभी ने कभी न कभी पुलिस को अपने श्रद्धा भाव से चन्दा दिया ही होगा। बेहतर होगा अगर ये कहें की देना ही पड़ा होगा!!!

नोयडा और दिल्ली के आसपास के क्षेत्रों में किरायेदार का पुलिस वेरिफिकेशन कराने वाले दलाल सक्रियता के साथ काम कर रहे है। ये दलाल अमूमन प्रॉपर्टी डीलर होते है। ये एक हिस्सा खुद रखते है और बाकी का थाने की गुल्लक में थोड़ा का योगदान स्वरुप डाल आते है। पुलिस वेरिफिकेशन के लिये ४५ दिन का समय लेते है। पर काम समय पर कभी नहीं होता। हो भी नहीं सकता। कब होगा इसकी सूचना भी किसी को नहीं होती। इतने दिनों में कोई छोटा-मोटा दाऊद भी बम फोड़ ही देगा। या कोई लुटेरा लूट को अंजाम देकर निकल ही लेगा। नोयडा में पुलिस वेरिफिकेशन में पारदर्शिता लाने हेतु ऑनलाइन पोर्टल भी उपलब्ध है। बिना किसी शुल्क के आवेदन कर सकते है। हालाँकि ये चन्द पढ़े लिखे लोगो को ही पता है। अमूमन रोजगार की तलाश में आने वाले मजदूर पारम्परिक तरीको का इस्तेमाल करते है और दलाली के शिकार होते है। आँकड़ो के अनुसार मार्च -२०१५ के आंत तक करीब 700 पुलिस वेरिफिकेशन फॉर्म ऑनलाइन माध्यम से, नोयडा क्षेत्र में भरे गये उनमे से घिसते-घिसाते १०० लोगो का ही पुलिस वेरिफिकेशन हो पाया। वो भी विलम्बित !! कुल मिला कर 45 दिन का निर्धारित समय और उसके बाद लगने वाला असीमित समय पुलिस वेरिफिकेशन के महत्व को ख़त्म कर देता है।
http://noidapolice.com/noidapolice/index.php

पुलिस वेरिफिकेशन में लगाने वाला समय खतरनाक वारदातों को दावत देने वाला होता है। बेहतर ये होता की कर्मचारी, किरायेदार का पुलिस वेरिफिकेशन, तत्काल पासपोर्ट, नार्मल पासपोर्ट की तर्ज पर किया जाता। बेहतर होता की जिस तरह एक ब्लॉक और मोहल्ले में मतदाता कार्ड होते है उसी तर्ज पर थानों में भी डेटा बेस तैयार किया जाता , या इस दिशा में प्रयास किया जाता, ताकि काम से काम मानव संसाधान के इस्स्तेमल के बगैर वेरिफिकेशन त्वरित गति से होता। घूस की संभावनाओं को काम किया जा सकता। हर व्यक्ति का पुलिस रिकॉर्ड आधार कार्ड से लिंक किया जाता। जो दीर्घकालीन संकल्पना को साकार करता। कानून का होना पर्याप्त नहीं होता जब तक जमीन कार्यान्वित ना हो। काम समयबद्ध हो और पारदर्शिता के साथ हो तो बेहतर।

नोट:
नोयडा में पुलिस वेरिफिकेशन के लिये ऑनलाइन पोर्टल का इस्तेमाल करे- http://noidapolice.com/noidapolice/index.php

किसी तरह की दिक्कत होने पर E -mail ID - complaintcell@noidapolice.com पर संपर्क कर सकते है। अमूमन मेल करने के 4 -5 दिन में नॉएडा पुलिस आपसे संपर्क करती है। 
जाहिर है की काम समय पर होने की उम्मीद ना रखे किन्तु बिना घूस के काम हो जायेगा ये तय है :)

बेवाक: देश का धन एक शिक्षित मन!!

हम उस देश के वासी है जहाँ घर के लिये कर्ज 10% में, कार के लिये 11%, पर्सनल लोन 13 -14 % और शिक्षा के लिये कर्ज 15 -16 % पर मिलता है। जब कोई बिल्डर अपार्टमेन्ट का निर्माण करने के लिये कर्ज  लेता है तो नियम कायदे कानून सब ताक पर रख कर कर्ज दिया जाता है। कर्ज आगे चल कर NPA की श्रेणी में शामिल हो जाता है। जब कोई किसान फसल के लिये कर्ज लेता है तो उसका सर्वेक्षण किया जाता है और उससे चन्दा लेकर कर्ज दिया जाता है। मतलब 100 मंजूर हुआ तो 80 से ज्यादा जरूरतमन्द को नहीं मिलता। जब कोई छात्र शिक्षा के लोन माँगता तो उससे तरह-तरह की गारण्टी माँगी जाती है। बाप की जमीन तक गिरवी हो जाती है। यूँ तो शिक्षा का कर्ज NPA कम ही बनता है, और अगर बनता भी तो एक व्यक्ति को शिक्षित तो कर ही जाता है। देश में दम तोड़ती प्रतिभायें कई बार सफलता की लकीर को बस छू  कर निकल जाया करती है। क्यों की हर बाप के पास गिरवी रखने के लिये जमीन नहीं होती!!! कई बाप बेटे के लिये शिक्षा का सपना लेकर खुद खर्च हो जाते है।
 
हाल ही में IIT में चयनित मजदूर के बेटो को शिक्षा के लिये माननीय प्रधानमंत्री जी, मानव संसाधन मंत्री ने त्वरित सहायता प्रदान की। उनके प्रयास भी काबिलेतारीफ है। किन्तु क्या उनके ये प्रयास दीर्घकालीन है? जो एक बड़ी जमात को फायदा पहुँचाये? बेहतर होता की मानव संसाधन मंत्री जी अनुदान देने की जगह शिक्षा का ऋण मुहैया कराती। केवल उन छात्रों को नहीं बल्कि कई अन्य को भी, जो जरूरतमन्द है। हर रोज और हर कोई मंत्रालयों तक नहीं पहुँच पाता। हाँ बैंक तक जरूर पहुँच सकता है!! अगर बैंक ध्यान दे ऋण दे तो दो छात्रों का मुद्दा राष्ट्रीय मुद्द्दा नहीं बनेगा।
एक शिक्षित जो किसी व्यावसायिक पाठ्यक्रम में अध्ययन करता है , आगे चल कर देश के लिये धन है और अपना ऋण तो चुका ही देता है। ऋण की ब्याजदर काम हो तो और भी अच्छा। क्यों कि "देश का धन एक शिक्षित मन"

बुगुर्जो का चले जाना !!!

बुगुर्जो का चले जाना !!!

बीते पखवारे देहरादून में नाना जी का निधन हो गया। वो १०४ वर्ष के थे। अपने साथ-साथ वो एक विरासत को, एक धरोहर को लेकर चले गए। एक युग का अन्त हुआ!!! अपने भोगौलिक रूप से बिखरे किन्तु मानसिक रूप से संयुक्त परिवार के शादी सम्बन्धो के कार्यक्रम में हमेशा नाना जी को उपस्थित पाया। हमारे बचपन से लेकर समझदार होने की अवस्था तक हमारे बुजुर्ग ही हमारे लिये संस्कृति और सभ्यता के धवजवाहक होते है, गुरुजन ही होते है। हालाँकि उनको जाना ही होता है किन्तु उनके जाने से एक अपूर्णीय क्षति होती है। उनसे जुडी कुछ बाते स्मृति में आती है जिक्र लाजिमी है।

जब वो बिना वोट डाले वापस आ गये !!
नाना जी उस पीढ़ी से थे जिन्होंने बर्तानिया हुकूमत से भी लड़ाई लड़ी और जुल्मो सिम्टम सहे। चुनावो के मौसम में नाना जी से मुलाकात हुयी। मैंने औपचारिकतावश पूछा नाना जी किसको वोट दिया इस बार? मेरी बात सुनते ही उनके चेहरे पर गम्भीरता का भाव उमड़ा। बोले बेटा वोट डालने गये तो थे, किन्तु अन्दर जाकर बैलट देखा और बिना वोट डाले वापस चले आये!!! मैंने कारण जानना चाहा, जवाब मिला बेटा बैलट में "पँजे" का निशान मिला ही नहीं तो किसको वोट देता छोड़ दिया। उम्र भर पँजे पर ही मुहर लगायी, गाँधी और वल्लभभाई के दल हो ही वोट था बस।
इस चुनाव में कांग्रेस ने राजनीतिक गठजोड़ किया था और उस क्षेत्र से गठबंधन दल का प्रत्याशी उतरा था। सो पँन्जा निशान बैलट से गायब था।

जब ननिहाल में कुत्ते ने मेरा शिकार किया !!
बचपन में एक शादी में ननिहाल जाना हुआ। शादी के दिन हम सब नये कपडे पहन कर रवाना होने का इंतज़ार कर रहे थे। इतने में मुझे किसी काम के लिये कहा गया। मुझे पड़ोस के घर तक जाना पड़ा। रास्ते में कुत्तों के एक दल ने मेरे ऊपर घात लगा कर हमला किया, मैं शिकार हो गया, नयी पैंट पानी माँग गयी। और पिछवाड़े में कुत्तों ने अपने निशान छोड़ दिए, कुत्ते जब हमलावर थे तब बड़े मामा जी ने दौड़ का मुझे बचाया। घर लेकर जा कर कुछ देशी इलाज़ कर दिया गया, कडुवा तेल इत्यादि, पैन्ट बदली गयी और फिर शादी के लिये रवाना हो गए। इस पूरे घटनाक्रम ने मुझे आक्रोशित कर दिया। एक बार को लगा की काश मेरा गाँव पास होता तो अपनी पैतृक बन्दूक से ननिहाल के कुत्तो को कुत्तों की मौत मार देता। खैर ये आक्रोश क्षणिक था। मूल आक्रोश दूसरा था कि मामा ने मेरे कड़वा तेल क्यों और मिर्ची क्यों लगवा दिया??? दवा क्यों नहीं दी?? जब कि की वो खुद एक डॉक्टर है??? उन्हें दवा ही देनी चाहिये थी। 

कुछ देर बाद नाना को जानकारी हुयी, उन्होंने हाल चाल पूछा, मैंने अपना आक्रोश बयां कर दिया , मैंने कहा आपके गाँव के कुत्तों ने तो काटा ही काटा ऊपर से बड़े मामा ने जले पर नमक छिड़क दिया।  मेरे कड़वा तेल मिर्ची गरम करके पट्टी बंधवा दी। वो डॉक्टर है थोड़ी बहुत दवाईयाँ तो होगी उनके पास वहीं देनी चाहिये थी।  नाना हँसने  लग गए, बोले बेटा मामा दूसरे वाले डॉक्टर है, डॉक्टर ऑफ़ फिलॉसफी, वो कृषि वैज्ञानिक है, गन्ने के डॉक्टर है आदमियों वाले नहीं!! स्थिति साफ़ हुयी और आक्रोश छट गया। उस मेरे मन का एक भरम भी दूर हुआ की सभी डॉक्टर आदमियों को ठीक नहीं करते। कुछ अन्य सजीव और निर्जीव प्रजातियों के डॉक्टर भी हुआ करते है।

हल्लाबोल खबर:"समजवाद और कानून व्यवस्था" का निकाह.....

विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त खबरों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में २०१२ के आस-पास लोकतन्त्र का जो मंडप सजा था। उसी मण्डप के नीचे, प्रदेश के लगभग बहुतायत लोगों के आशीर्वाद के साथ। "समाजवाद और कानून व्यवस्था ने विवाह कर लिया है।" रिसेप्शन राज्यपाल भवन में आयोजित किया गया। बड़े बूढ़ो ने जम कर आशीर्वाद बरसाया। तत्पश्चात दोनों हनीमून पर चले गये है। खबर ये भी है कि समजवाद और कानून व्यवस्था करीब पाँच वर्षो बाद ही उत्तर प्रदेश वापसी का रुख करेंगे है। समाजवाद और कानून व्यवस्था ने प्रेस कॉन्फ्रेन्स में एक साझा बयान जारी करके इस बात की पुष्टि की है कि हनीमून के लिये उत्तरप्रदेश उचित तरह का माहौल नहीं दे पाता अतैव वो पाँच सालो तक बाहर ही रहेंगे। इस बात को जानकारों ने भी सही ठहराया है। उनका तर्क है कि भैया बनारस जैसी धार्मिक नगरी में हनीमून मनने से रहा। लखनऊ और कनपुरिया हालात भी हनीमून के काबिल नहीं। सो ऐसे में हनीमून के लिये प्रदेश छोड़ कर बाहर ही जाना होगा।

साझा बयान में ये भी कहा गया की, "समजवाद और कानून व्यवस्था" का विवाह का विरोध दादा और परदादा के ज़माने से होता आया है। लोहिया जी लगातार लोहा लेते रहे। पर दादा परदादा का जोर नहीं रहा, माहौल बदल चुका और विवाह भी सफल है। तो हम शुरूआती दिन प्रदेश के बाहर के बीताना पसंद करेंगे। विवाहित युगल समाजवाद और कानून व्यवस्था ने, अपने हनीमून के इस पावन अवसर पर "अराजतकता" और अव्यवस्था" नाम की दो संतानें जनी है!! जो पैदा होते ही सुरसा की मुँह की भाँति बढ़ती रही और दो साल में ही महिसुरिय रूप धारण कर लिया है। चूँकि विवाहित युगल उत्तर प्रदेश में लौटने की बात को पहले ही नकार चुका है। इस लिये उसने अपने प्रतिनिधि के तौर पर अपनी महत्वाकांक्षी संतानों को प्रदेश की सीमा में भेज दिया। अब "अराजकता और अव्यवस्था" दोनों बिना माँ बाप के संतानों की तरह उत्तर प्रदेश की सीमाओं में इधर से उधर भटक रही है, जो भी रस्ते मिला उसे गुस्से में झटक रही है पटक रही है।

खबर है की विवाहित युगल की दोनों संताने, आज से कुछ दिन पहले मैगी खाकर ही जीवन चला रही थी।पर मैगी पर प्रतिबन्ध की खबर के बाद ही आजकल बोर्नबीटा का सेवन कर रही है। आसार है की ये दोनों दिन दूनी रात चौगुनी दर से बढ़ेगी और उत्तर प्रदेश में नया इतिहास गढ़ेगी। स्थिति को देखते हुये राज्यपाल ने एक वक्तव्य जारी करके कहा है कि "अराजकता और अव्यवस्था जिस मार्ग से भी गुजरे, कृपया वह कोई वाधा ना उत्तन्न करे, ये लोग पहले ही टोल, माँगने पर कई टोल कर्मियों को लहूलुहान कर चुके है। अब खुद घायल होने से बचे और उनका मार्ग प्रशस्त करे।