हिन्दू होने पर भी तो नहीं मिलता फ्लैट!!!

"मुस्लिम होने पर नहीं मिला फ्लैट", "नहीं मिली नौकरी" की हैडलाइन, अखबारों, ऑनलाइन संस्करणों, और दूरदर्शन पर लगतार सुर्खियाँ बटोर रही है। न्यूज़ चैनल पर देश में गणमान्य बुद्धजीवी बहस भी करते नज़र आये। आकाशवाणी पर रेडियो जॉकी भी इस खबर पर तीखी प्रतिक्रिया देते सुने जा सकते है । यदि वाकई भेदभाव हुआ है तो विरोध होना भी चाहिये, इस तरह का बर्ताव लोकतन्त्र की मुखालफत करता नज़र आता है। किन्तु इस तरह की हैडलाइन और उसके पीछे के पूरे सन्दर्भ और सच को समझना भी हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है जो लोगों के सामने ये खबर ला रहा है। इस तरह की खबरें पढ़कर चकित होना स्वाभाविक है। 
इस तरह की विवादस्पद खबरों में जब तक दोनों पक्षों की बात ना रखी जाय तब तक खबर पूरी ही नहीं होती। और अगर केवल एक पक्ष की राय रखी गयी है तो यकीन माने की खबर पक्षपाती ही मानी जाएगी।


जिक्र लाजिमी हो चला है। कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत विविधताओं का देश है। हर व्यक्ति को अपनी संस्कृति और अपनी संस्कृति के लोग प्यारे होते है। सम्पत्ति का हक़ भी संविधान प्रदत्त है। उदहारण स्वरुप यदि कोई व्यक्ति विशेष अपना घर किराये पर केवल उस व्यक्ति को देना चाहता है "जो शाकाहारी हो", तो एक मुस्लिम को, पश्चिम बंगाल और उड़ीसा के तटीय क्षेत्रों के हिन्दुओं को , एक ईसाई  को या एक सिक्ख  को घर घर देने में उसे गुरेज हो सकता है। इन्कार करने का तरीका मकान मालिक की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है। इस वाकये में मीडिया अगर हैडलाइन बनाये कि "मुस्लिम होने पर नहीं दिया घर" तो ये दुखद और निन्दनीय ही कहा जायेगा।  ये मीडिया की अवसरवादिता भी कहीं जा सकती है। गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश भी। इस तरह की घटनाओं के पीछे कई कारक हुआ करते है। उसमे से एक को उठकर सुर्खी बना देना चिन्ता का विषय है।  

उत्तर प्रदेश का निवासी जब बंगलौर जैसे शहर में एक घर या फ्लैट किराये पर लेने जाता है। पहला प्रश्न यही होता है यू पी के हो? इस नाते बहुतायत लोग घर देने में दिक्कत करते है। समूचे दक्षिण भारत में मुम्बई में उत्तर प्रदेश के निवासियों को इसी तरह परेशान  किया जाता है। महाराष्ट्र और खासकर मुम्बई में हालात जगजाहिर है।  कुछ मकान मालिक जो प्रोफेशनल है अपना घर दे देते है और कुछ जो इमोशनल है वो नहीं देते। क्या करेंगे आप। उत्तर प्रदेश के किसी शहर में जाकर घर किराये पर लगे तो वहाँ लोग धर्म से पहले आपकी जाति पूछ लेंगे!! बहुतायत मामलात में जाति के प्रश्न का जवाब ही घर के मिलने न मिलने का अंतिम कारण होता है। छोटे शहरो में जहाँ प्रोफेशनलिस्म ज्यादा नहीं वहाँ लोग जान पहचान के लोगो को घर देना पसन्द करते है। कुल मिलाकर घर इस मुद्दे पर, क्षेत्रीयता, जाति, धर्म, आर्थिक स्थिति, संस्कृति  इत्यादि कई कारण होते है। 

केवल मुस्लिमों  के मुद्दे को प्राथमिकता देकर छापना उचित नहीं ये सामाजिक विद्वेष को  बढ़ावा देने वाला कदम है । किन्तु साथ ही साथ ये भी समझ लेना जरूरी है की भारत देश में अप्रवासीय भारतीयों के भी मकान इत्यादि है, जो मकान को किराये में उठाते समय सुरक्षा और सावधानी बरतने पर ज्यादा यकीन रखते है। ये गौरतलब है की विदेशों  में पिछले कुछ समय में इस्लामिक आतन्कवाद के चलते इस्लाम की छवि को भी गहरा धक्का लगा है। खासकर इराक, सीरिया, नाइजीरिया में हो रही घटनाओं के बाद। अगर ऐसे में अप्रवासीय भारतीय यदि मन में  पूर्वाग्रह बना लेते है तो संवैधानिक नहीं है। जन्म से ही भारतीय नागरिक चाहे वो किसी धर्म का हो वो भारतीय पहले है। सर्वधर्म समभाव की भावना को आगे बढ़ाते रहने का दायित्व मीडिया पर भी है। सस्ती लोक्रियता बटोरने के लिये बिना जाँच पड़ताल के इस तरह की खबरों को प्रकाशित करना और दूसरे पक्ष की बात तक ना रखना न्यायप्रिय तरीका नहीं है। 

हाल-फिलहाल: रुपये 500 मात्र में राजस्थान दर्शन !!

राजस्थान में गुर्जर आन्दोलित है और सामान्य जान-जीवन रेत फाक रहा है। पर ये आन्दोलन एक मौका भी हो सकता है। रुपये 500 मात्र में राजस्थान दर्शन का !! राजस्थान से चलने वाली रेलगाड़ियाँ मार्ग बदल बदल कर हर आम और खास स्टेशन को छू कर शक्ति और सामर्थ्य का प्रदर्शन कर रही है।यदि आप रेल में बैठ गये तो समूचा राजस्थान आपकी जद में होगा। साथ ही साथ ये आपकी सामर्थ्य और सहनशीलता का परीक्षण भी होगा। जब पर 45 डिग्री सेल्सियस को पार कर रहा हो, और ऐसे में 14 घण्टे का सफर 35 घण्टे में बदल जाये, खाद्य और रसद सामग्री पहले ही आपकी भूख की भेट चढ़ चुकी हो तो सहनशीलता का परीक्षण तय है। और हो भी क्यों का जब गुर्जर बल प्रदर्शन की विधा में अपनी दक्षता साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे तो आम आदमी क्यों छोड़े। साथ ही साथ देशाटन का अपना आनन्द है खासकर तब जब टूटती हुयी सड़कों , उखड़ती हुयी रेल पटरियों, जलती हुयी सार्वजानिक सम्पत्तियों को जीवन्त और ज्वलन्त देखने का मौका मिले। सो एक बार राजस्थान जाये जरूर। हाँ अच्छे दिनों की खोज में भी सहयोग मिलने की बड़ी उम्मीद है। देश के बड़े भूभाग में कहीं का कहीं अच्छे दिन मिल ही जायेगे ना मिले तो भी क्या। कुल 500 ही खर्च होगे। पानी की व्यवस्था सरकारी है। खाना पैक करके जाये। बच्चे इत्यादि नाना नानी के घर ही छोड़ जाये तो बेहतर।
              "जनजीवन अस्त-व्यस्त
              लोकतन्त्र पस्त
              व्यवस्था ध्वस्त
              हो जाये इस सबके अभ्यस्त"

कंस्यूमर ( consumer) तो गधा है गधा।

आज एक मित्र के साथ नोयडा के सेक्टर -78 स्थित "जेनिथ एक्सप्रेस" नाम के बिल्डर के पास जाना हुआ। मित्र ने करीब ३ साल पहले इस बिल्डर के पास अपना एक फ्लैट  बुक कराया था। घर बनकर पिछले वर्ष-2014 में ही मिलना था किन्तु बिल्डर इस साल के अन्त तक भी फ्लैट दे पाने की स्थिति में नहीं है। फ्लैट का बना हुआ ढाँचा देख कर बिल्डर के ऑफिस की तरफ ही लौट रहे थे, कि बगल से किसी एक अन्य खरीददार का गुजरना हुआ, खरीददार बिल्डर के प्रतिनिधि के साथ फ्लैट देखने जा रहा था। आक्रोषित था!!! बिल्डर के प्रतिनिधि से बोल रहा था। "सारे के सारे अधिकार बिल्डर के पास सुरक्षित है, फ्लैट बना कर देने में १ साल की देरी है पर हर्जाना नहीं देता, मुझसे एक EMI डिले हुयी थी तो पूरे महीने का ब्याज लिया था!!! मैं EMI भी भरता हूँ और घर का किराया भी देता हूँ, कंस्यूमर(Consumer)  तो गधा है गधा "  दोहरी मार झेल रहे ऐसे लाखों ख़रीददार मेट्रोज में बिल्डर और विकास प्राधिकरणों के नेक्सस से जूझ रहे है। कानून न्याय दिला पाने में देर कर देता है। जिक्र लाजिमी हो चला है।

बीते दशक में देश के कुछ-एक शहरों ने विकास की ऊँची उड़ान भरी। एनसीआर, हैदराबाद, पुणे, बंगलोर इनमे से कुछ शहर है। इन शहरों में बढे औद्योगिक विकास ने रोजगार की सम्भावनाये बढ़ायी और साथ ही साथ शहरो की ओर पलायन भी। बढ़ते शहरीकरण के कारण लगातार आवास की माँग बढ़ी और जमीनों का दाम आसमान की तरफ इशारा करने लगा। मँहगी जमीनों ने अपार्टमेन्ट संस्कृति को जन्म दिया। बिल्डर्स इत्यादि ने इस मौके को जम कर भुनाया। सरकार खुद जमीन मुहैया कराने की बजाय बिल्डर्स को प्रोत्साहित करती रही, जो एक नजरिये से ठीक था। किन्तु इन सब के बीच निवेशकों के हित की सुरक्षा के सम्बन्ध में ज्यादा कोई ध्यान नहीं दिया गया। सरकारी-तन्त्र से मिलीभगत कर देश के छोटे मझोले बिल्डर भी अरबो में खेलने लगे। आँकड़ो में बात करे तो चण्डीगढ़ क्षेत्र के आस-पास जीरकपुर, मोहाली, पंचकुला इत्यादि में काम से काम 50-60  हज़ार के ज्यादा अपार्टमेन्ट विकसित हो रहे है। नोयडा और एनसीआर के क्षेत्र में ये संख्या बहुत अधिक है। केवल नोयडा एक्सटेंशन में 5 लाख से ऊपर अपार्टमेन्ट निर्माणाधीन है।
साभार: http://www.panchsheelgreens2noidaextension.in/panchsheel-greens2-review.html

यहाँ सरकार ने बिल्डर को स्वतन्त्रता देकर माँग और आपूर्ति के बीच की खायी को भरने का प्रयास तो किया। किन्तु खरीदारों के हितों को कुछ पुराने कानूनों के सहारे छोड़ दिया। बिल्डर और विकास प्राधिकरणों में गहरा मेलजोल है जो कानून का लाभ उठा कर हर कोई पैसा बना रहा है। "यादव सिंह" इस तरह के नेक्सस के बड़े खिलाडी रहे। इस पूरे जाल में कालेधन का भी भरपूर इस्तेमाल हुआ। अपार्टमेन्ट बने और बिके तो बहुत पर दलालों के माध्यम से इधर उधर होते रहे। एण्ड यूजर तक जाते दाम इतना की खरीददार बेदम हो जाये। अपार्टमेन्ट बनने की घोषणा के साथ-साथ ही फ्लैट ट्रेडिंग का कारोबार शुरू हो जाता है। अस्तित्व में आने से पहले ही एक फ्लैट कई बार बेचा और खरीदा जाता है। जिस तरह बाज़ारो में कालाबाज़ारी करके प्याज के दाम बढ़ा दिए जाते है, बिलकुल उसी तर्ज पर फ्लैट्स का कारोबार भी चल रहा है। बिना जमीन का स्वामित्व पाये, बिना कोई कागज़ी कार्यवाही पूरी किये, बिना नक्शा पास कराये बड़े निवेशक पैसा लगा देते है। कुछ एक अप्रूवल मिलने के बाद दाम चढ़ जाते है और वो फ्लैट जो सालों बाद अस्तित्व में आने के सम्भावना होती है। कई बार बेच और खरीद लिया जाता है। एण्ड यूजर तक जाते -२ दाम इतने होते है की आदमी अपने जीवन की अनुमानित कमाई के बराबर लोन लेता है।  उस घर के लिये जो सालो बाद बन कर मिलेगा। 

यहाँ यह बात गौरतलब है कि बिल्डर अपार्टमेन्ट विकसित करते समय किस तरह की सामग्री का यूज़ करता है, अपने किये गये वादों पर खरा उतरता है की नहीं, निर्धारित समय पर खरीददार को दिया गया की नहीं। इस तरह के मामले केवल कंस्यूमर कोर्ट का मुँह ताक रहे है। चूँकि अधिकतर खरीददार नौकरीपेशा लोग हुआ करते है जो अदालती कार्यवाही से मजबूरीवश दूर रहना ही पसंद करते है को शिकार बनाया जाता है। बिल्डर के पास पैसे के साथ सम्पर्को की ताकत भी हुआ करती है, एक स्थापित लीगल सिस्टम भी। केस लड़ना उनके लिये इस कारोबार का हिस्सा होता है। आम आदमी के लिये रोजी रोटी छोड़ देने की बात!!! नोयडा और आस-पास के इलाकों में बन रहे अधिकतर अपार्टमेन्ट निर्धारित समय में नहीं बन पाते। किन्तु बदले में यदि आप हर्जाना माँगे तो आपको अदालती कार्यवाही में पड़ना होगा। बेहद की ताकतवर नेक्सस से भिड़ना होगा। इसके साथ की देरी के बराबर दिनों में किराये और EMI की दोहरी मार झेलनी पड़ती है। हर हाल में बिल्डर्स की जीत।

नोयडा क्षेत्र में अधिकतर खरीददार इस समस्या से जूझ रहे है। बिल्डर द्वारा विलम्ब किये जाने पर कोई हर्जाना नहीं।  हाँ यदि खरीददार से विलम्ब हो तो महीने की पहली तारीख से ही बयाज लगा दिया जाता है। आधे अधूरे निर्मित अपार्टमेन्ट के किसी एक हिस्से को रहने योग्य घोषित कर खरीददार को हैंडओवर करना भी शुरू कर देते है। कुल मिला कर किसी भी तरह की आपदा से निपटने के इंतजामात ऐसी जगहों पर नहीं हुआ करते है। यहाँ तक की कुछ नामी गिरामी बिल्डर्स ने एण्ड यूजर को घर बना कर तो दे दिया किन्तु नोयडा विकास प्राधिकरण के बकाये को नहीं जमा किया। इस कारण से लोग अपने घरों की रजिस्ट्री तक नहीं करा पा रहे। नोयडा विकास प्राधिकरण बिल्डर्स की समपत्ति कुर्क करने के बजाय खरीददारों को परेशान  उतारू है।  यदि समय रहते सरकारों ने कोई कदम नहीं उठाया तो ठगी का ये कारोबार जो आभासी चीज को आभासी दामो बेचने की इज़ाज़त देता है। घर की इच्छा रखने वाले हर आम आदमी को ठगी का शिकार बनाता रहेगा। लूट का गोरखधन्धा यूँ ही फलता फूलता रहेगा। बैंक, बिल्डर और अफसर साथ बैठकर मयकदो में आम आदमी के पैसे से पार्टिया किया करेंगे। कई "यादव सिंह" पैदा हो और कई रॉबर्ट वाड्रा भी, शेयर बाजार में भी इस तरह की कम्पनीज ने खूब लूट मचायी है।  
   

अरुणा शानबाग जी को भावभीनी श्रद्धांजलि!!!



18 मई की सुबह अखबार ऐसी खबर लेकर आया की मन भाव विभोर हो उठा। 42 वर्षो तक नियति से, नियन्तायो से एक लम्बी और बेहद कठिन लड़ाई लड़ने के उपरान्त अरुणा शानबाग जी वीरगति को प्राप्त हुयी। आपातकाल के बाद का पूरा-पूरा का लोकतन्त्र, न्यायपालिका, विधायिका सब के सब अरुणा जी के अपराधी है। इन सबको अपराध बोध हुआ हो न हुआ किन्तु अरुणा जी अपनी हर सास के साथ ये एहसास दिलाती रही की उनके साथ लगातार गलत होता रहा पर कोई नहीं चेता। लड़ाई दोनों तरफ चली इंसान से और भगवान् से !!! पर दोनों ओर से असीमित अन्याय हुआ। एक मामले का दूसरा पहलू भी है।KEM हॉस्पिटल की नर्सो का अरुणा जी के प्रति सेवाभाव!! मानव सभ्यता के इतिहास में ये सेवाभाव एक मील का पत्थर है। इसी भाव को याद कर शायद मानव सभ्यता कभी-कभी खुद को गौरवान्वित महसूस का लिए करेगी। हम सब अरुणा जी के कर्जदार है। उन नर्सो के भी जिन्होंने अपने सतत प्रयासों से सभी को हरा दिया।

 अच्छे दिन ................. आ गये है।

कल ही परसों की तो बात है। घर के सामने कौआ काँव- काँव कर रहा था। किसी के आने का संकेत था ये शायद !!! पर किसके आने का? आज कल तो जो भी घर आता है फ़ोन करके ही आता है। ये कौन हो सकता है जो आने वाला है।  मन के आँगन में विचार बेल पौधे की तरह पनप उठे। इसी उठापटक के बीच विचारों के झंझावात को विराम देते हुये, मैंने कानपुर फ़ोन लगाया माताजी जी से बताया की कौआ काँव-काँव कर रहा है। कौन हो सकता है जो आने वाला है? माता जी ने झट से जवाब दिया। बेटा पिछले वर्ष जब दिन में 16  घण्टे बिजली आती थी तब दूरदर्शन पे दिखाते थे कि "अच्छे दिन .............  आने वाले है"। अब जब दिन के केवल 8 घण्टे ही  बिजली आती है तो दूरदर्शन पर दिखा रहे है कि दिखा रहे है की "अच्छे दिन .......................आ गये है",  अच्छे दिन ................. आ गये है। 



उसी चक्कर में कौआ काँव-काँव कर रहा होगा!!! अच्छे दिन तेरे घर नहीं आये तो, पडोसी से पूछ शायद उसके घर आये हो!!! कई लोगो से पूछ चुका हूँ, पूछताछ का सिलसिला अनवरत अभी चल ही रहा है। पर किसी के घर अच्छे दिन नहीं आये। अभी तक  ताछ यही बयाँ करती है। सोचता हूँ कहीं अच्छे दिन रास्ता न भटक गये हो या फिर नोयडा के रास्ते में उनके साथ राहजनी ना हो गयी हो। …… या फिर दिल्ली के किसी होटल में उनका एनकाउंटर ना हो गया हो। अरे भाई!! अखवार बगैरह ध्यान से पढ़ते रहना और किसी को पता चले तो बताना जरूर कहाँ गए अच्छे दिन!!!

आयोग पर आयोग, आयोग पर आयोग …… आखिर कब तक ....

सुबह सुबह अखबार खोलिये। देश, विदेश, आस-पास, खेल-कूद या नगर के पन्ने में कहीं ना कहीं  रोज का रोज एक नया जाँच आयोग गठित होने की खबर आपको मिल ही जाएगी। कभी खाप पंचायतो के तानाशाही फरमानों पर तो कभी स्वयं भू धार्मिक लोगो के फतवे पर , तो कभी किसी सड़क दुर्घटना के मुद्दे पर या फिर मिड डे मील खाकर मरे स्कूली बच्चों की मामले में, या सड़क चलते किसी वाहन में हुए सामूहिक दुष्कर्म पर। जाँच आयोग का गठन एक चलन सा बन गया है। हालाँकि जाँच-आयोगों की जमीनी हकीकत बेहद दयनीय है। ये या तो रेवड़ियाँ बाटने के साधन के तौर पर इस्तेमाल किये जाते है या फिर न्याय के रस्ते को वाधित करने के उद्देश्य से।

जिक्र लाजिमी है की जम्मू कश्मीर के शिक्षक भर्ती घोटाले में एक जाँच आयोग गठित हो गया। जाँच चलेगी और जाँच आयोग के जाँच का समय बढ़ता रहेगा, रेवड़ियाँ बटती रहेगी और अन्त में नतीजा "ढाक  के तीन पात"  हर घटना के बाद एक जाँच आयोग गठित करना सरकारी संस्कृति बन चुकी है। नतीजे की परवाह कौन करता है।  बस फौरी तौर पर ये दिखा देना की न्यायप्रिय ढंग से काम होगा ये काफी होता है। बीते दशक कुछ नहीं तो सैकड़ो जाँच आयोग बने। प्रदेशस्तर  और देश स्तर पर !! पर किसकी जाँच का क्या परिणाम रहा पता ही नहीं। व्यापम घोटाला हो गया जाँच आयोग बना दिया गया। जाँच चल रही है गवाह लगतार टपकायें जा रहे है।

अमूमन जो जाँच आयोग बनाये जाते है, वो जाँच  में इतना समय ले लेते है की उस मुद्दे की ही प्रसांगिकता ख़त्म हो चुकी होती है या फिर यदि जाँच हो भी गयी तो वो देश की महिसासुरिय राजनीतिक राक्षस के गालो में समा जाया करती है। इस तरह के जाँच आयोग में आदर्श सोसाइटी घोटाले में बने जांच आयोग को रखा जा सकता है।  आयोग में मेरी जानकारी के अनुसार निर्धारित समयसीमा में विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत की थी उस रिपोर्ट में कुछ ओहदेदारों पर गम्भीर आरोप लगाये गए। किन्तु राजनीति का राक्षस फिर जागा और समूची रिपोर्ट को निगल गया। साथ ही साथ सच को भी अपने अजगरिया बदन में दबा का दफ़न कर दिया। तत्कालीन सरकार ने आयोग की रिपोर्ट को मानने से ही मन कर दिया?? ना जाने क्यों सरकार बदलने के बाद भी वो रिपोर्ट आज भी ठन्डे बस्ते में है। राजनीति है ही यही।!!!

नेता जी सुभाषचन्द्र  बोस जी मामले में कई बार कई आयोग बने और अपनी नियति को प्राप्त हो गये किन्तु सच दफ़न रहा। 2002 के गुजरात दंगो, हाल फिलहाल हुये मुजफ्फर नगर दंगो इत्यादि-इत्यादि पर जाँच आयोग बन कर खत्म होने आये सबूत और गवाहों निपटा दिया गया किन्तु जाँच है की खत्म ही नहीं होती। बोफोर्स तोप न जाने कहाँ चली गयी और आयोग भी खो गया। उत्तर प्रदेश में कुख्यात स्वास्थ्य घोटाले में, राज्य के कई बड़े स्वास्थ्य  अधिकारी बलि चढ़ गए। डॉ Y S सचान की हत्या तो थाने के अन्दर कर दी गयी।  किन्तु पूरा का पूरा मुद्दा जाँच आयोगों और न्याय व्यवस्था की कठिन डगर के बीच घुट कर रह गया। कुल मिला कर कहने का तात्पर्य ये है की देश में हर छोटी बड़ी घटना जो आम जनता के  होती है उसमे जाँच आयोग गठित कर दिया जाता है। और अमूमन ये पाया जाता है जाँच आयोग पीड़ित और न्याय के बीच की समय सीमा और पीड़ित की मुश्किले भी बढ़ाता है। मसलन ये कहना भी उचित ही होगा की जाँच आयोग अपनी प्रसांगिकता खो चुके है। या तो जाँच आयोग खुद राजनीति का शिकार हो जाते है या फिर उनकी की गयी जाँच ही राजनीति की शिकार हो जाती है। कुल मिल कर यहाँ जमीनी हकीकत पर बनी प्रसिद्ध फिल्म "दामिनी" याद आती है जहाँ  अदालत में वकील की भूमिका में सनी देओल चिल्ला चिल्ला कर कह रहे होते है की " तारीख पर तारीख।, तारीख पर तारीख ……  " कुछ उसी तर्ज पर हम भी ये कहने को विवश है की "आयोग पर आयोग, आयोग पर आयोग …… आखिर कब तक ....!!!!!!"

प्रधानमन्त्री जनसुरक्षा योजना: एक कदम और चलना होगा .....

विगत सप्ताह अपने IDBI Bank खाते के माध्यम से प्रधानमन्त्री जानसुरक्षा योजना से जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ। बैंक के कर्मचारियों ने बेहद सक्रियता इस योजना के जुड़ने में सहयोग किया। योजना के तहत 12 रुपये में २ लाख का दुर्घटना बीमा और ३२३ रुपये मात्र में 2 लाख का जीवन बीमा ( जीवन ज्योति बीमा ) किया जा रहा है। IDBI बैंक में ऑनलाइन नामित होने की सुविधा भी उपलब्ध है। कुल मिला कर इस योजना को एक अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है। पर समय के साथ इस तथ्य पर नज़र रखना भी आवश्यक होगा की योजना की जमीन पर अपने उद्देश्यों को साकार कर पाती है की नहीं। योजना का लाभ जनसाधारण को मिल पता है की नहीं। 

अमूमन देखा गया है की सरकारी योजनाये अव्यवस्था का शिकार हो जाया करती। उदहारण के लिये किसानो को दी जाने वाले फसल ऋण की बात करे तो।  किसानो को  फसल ऋण उपलब्ध तो हो रहा है किन्तु बीच में दलाली खिलाने की बाद ही। गन्ना इत्यादि की खेती के लिये लिये जाने वाले ऋण में सर्वेयर को १०% तक की राशि दलाली में देनी पड़ती है। तब जाकर किसान को ऋण मिल पाता है। इसी तरह का माहौल खेती के संसाधनो इत्यादि जैसे ट्रेक्टर,थ्रेसर इत्यादि का ऋण लेने में भी होता है। यदि किसी व्यक्ति को दलाली ना दी हो तो यह केवल और केवल एक अपवाद ही कहा जायेगा। सो प्रधानमन्त्री जनसुरक्षा योजना के तहतई दलालो को दूर करने की जिम्मेदारी भी सरकार हो लेनी होगी।

व्यवस्थागत खामियों को चिन्हित कर उन्हें दूर करना होगा। बीमा की राशि को सेटल करने के लिये सरकारी को जरूरी और कारगर कदम उठाने पर बल देना होगा। यदि एक बार कोई दुर्घटना थाने , सरकारी अस्पताल के माध्यम से रिपोर्ट हो जाती है तो यह उस अस्पताल और उससे जुड़े तन्त्र की जिम्मेदारी होगी की वो सूचना सम्बन्धित अधिकारी तक पहुँचाये, और अधिकारी ये निश्चित करे की दुर्घटना की बीमा राशि सम्बन्धित परिवार तक बिना किसी दलाली के पहुँच गयी। यहाँ "टॉप तो बॉटम" अप्रोच के साथ काम करने की आवश्यकता होगी। इस कार्य किसी तरह की हील हुज्जत या फिर लापरवाही की सजा भी निर्धारित करनी होगी। अन्यथा ये योजना भी अदालत की काम हो बढाती नज़र आयेगी। अमूमन बीमा कंपनी से दुर्घटना के आवाज़ मई बीमा राशि बिना कोर्ट जाये ले पाना संभव नहीं होता। बीमा कम्पनी हर वो हथकण्डा अपनाती है जो बीमा की राशि देने का मार्ग वाधित करता हो। 

आगे चलते हुये यदि प्रधानमन्त्री स्वस्थ्य से जुडी जुडी सुरक्षा योजना लाते है तो बेहतर रहेगा। क्यों की बिना इलाज़ के मरने वालो की बड़ी सँख्या है।  जनसाधारण कई बार पैसे की आभाव में इलाज़ नहीं करा पता। सरकारी अस्पतालों में भीड़ और लापरवाही  के चलते कई बार लोगो को अपनी जान गँवानी पड़ती है। अतएव प्राइवेट हॉस्पिटलस की जिम्मेदारी तय करते हुये उन्हें भी इस स्वास्थ्य योजना का हिस्सा बनाया जाये। इलाज़ में आये खर्चे का बीमित हिस्सा सरकार से लेना उनकी जिम्मेदारी हो। कमोवेश इसी तरह की योजना YSR ने आन्ध्रा प्रदेश में चलायी थी जिमसें वरिष्ठ और गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले लोगो को अस्पताल में मुफ्त इलाज़ बीमे के तहत मिलता था और बीमे की राशि अस्पताल खुद सरकार से लेता था। ये योजना काफी सफल रही थी। 

दूसरा स्वास्थ्य की दिशा में यदि कोई ढंग का सुधार लाना है तो सरकारी अस्पतालों को भी स्वस्थ्य और जवाब देह बनाना होगा। वो दवाये जो कागजो में सरकार अस्पतालों तक जाती और कागजो में ही बट भी जाती है। ऐसे चलना जो तुरत फुरत विराम देना होगा। 

12 घण्टे की ड्यूटी करते है रोज!!!

नोएडा की गगनचुम्बी इमारतों के बीच कई मानवाधिकार या तो छिप गये है या दब गये है। लोकतन्त्र के सैकड़ो फरमाबरदार रोज अपनी निगाहों से उस दबे कुचले मानवाधिकारों को देखते है और नज़रे फेर लेते है। नज़रे फेरना शायद उनकी मजबूरी भी कही जा सकती है। शायद कानून के लम्बे हाथ गगनचुम्बी इमारतों में गच्चा खा जाते है और पीड़ित को पकड़ कर ही मुजरिम बना देते हैं। जिस कानून के लम्बे हाथों को धता बता कर सुपरमैन सलमान  मुम्बई की बेकरी की दहलीज से उड़ान भर देते है। जो कानून अम्मा के वजन के आगे दब जाता है उस कानून पर भरोसा कोई करे भी तो कैसे?
"कभी मौका मिले तो गौर से देखिएगा उन सुरक्षाकर्मियों को जो आपके गेट में प्रवेश से लेकर लिफ्ट के पास तक आपकी सुरक्षा हेतु कुर्सी जमाये बैठे रहते है। पुलिस से भी ज्यादा अराजक मच्छरों का मुकाबला करते हुये पूरी रात काट देते है। निवासियों की शिकायत भी दर्ज करते है और कई मुद्दों उनके कोप के भाजक भी बनते है। "12 घण्टे की ड्यूटी करते है रोज!!!" भारत का श्रम कानून इसकी इज़ाज़त नहीं देता। अधिकतम 9 घण्टे से ज्यादा किया गया काम ओवरटाइम काम के अन्तर्गत आता है। ये आपको भी पता है मुझे भी और कानून के नुमाईंदों को भी की किसी तरह का कोई ओवरटाइम इन सुरक्षाकर्मियों को नहीं दिया जाता। सम्भव है की कागज़ों में कोई युक्ति भिड़ा कर ओवरटाइम दिखा भी दिया जाता हो और कानून गुमराह हो जाता हो!!" किन्तु कानून के पालनहार भी ऐसी ही इमारतों या सोसाइटीज में रहते है, उनकी आँखें तो देखती होगी ये सब। संसद में कई बार बहस होती देखी है नये कानूनों पर, नये  प्रावधानों पर, पर जो कानून है उनकी व्यवहारिकता का क्या? उन पर चर्चा कब होगी?

कविता: अनचाहे ही सही सबसे रिश्ता तोड़ आया हूँ मैं।

अब कहाँ उड़ानें भर पाता हूँ मैं
अब कहाँ पतंग उड़ाता हूँ मैं
अब कहाँ आसमाँ छू पाता हूँ मैं
अब कहाँ सितारें तोड़ पाता हूँ मैं
अब कहाँ गुलेल चलाता हूँ मैं
अब जीवन में आपाधापी है बहुत
दूरियाँ तय करनी बाकी है बहुत
अपना और जमीन पीछे छोड़ आया हूँ मैं
अनचाहे ही सही उनसे रिश्ता तोड़ आया हूँ मैं
अनचाहे ही सही सबसे रिश्ता तोड़ आया हूँ मैं।


 

निराधार होती आधार कार्ड की संकल्पना।

बचपन में जब दूरदर्शन पर समाचारों के बाद गुमशुदा लोगो की खबरें देखता था। तब ये सोच पर परेशान हो जाता था की परिवार के एक सदस्य के बिछड़ जाने के बाद परिवार के लोग कितने परेशान होते होगे। इन गुमशुदा लोगो को खोजने का कोई तरीका क्या ईजाद नहीं किया जा सकता? सालों गुजर गये अब दूरदर्शन विलुप्तप्राय है और गुमशुदा लोगो की खबरे या तो अखबार में आ जाती है या फिर व्हाट्सअप हुआ करती है। गुमशुदा लोगों की तरह वो लोग जो परिवार से दूर किसी जुर्म का शिकार हो गये हो उन लोगों की पहचान और परिवार को जानकारी देना आज भी उसी ढर्रे पर है जैसा की एक-डेढ़ दशक पहले हुआ करता था। चण्डीगढ़ प्रवास के दौरान कई बार "दैनिक भास्कर" के हवाले से ऐसी खबरें भी पढ़ी की थानो में लावारिस लोगों के शव इतने ज्यादा आते है की उनकी शिनाख्त करने के लिये बहुत ज्यादा समय पुलिस नहीं दे सकती, चूँकि संसाधन सीमित है। हर बार जब भी ऐसी खबरें पढ़ी एक बार विचारमग्न जरूर हुआ की कभी तो कोई ऐसा तरीका ईजाद हो पायेगा जो गुमशुदा और परलोक सिधार चुके लोगो को उनके परिवार तक पहुँचाने में मदद करेगा। 

आज से करीब तीन बरस पहले जब "आधार- Unique Identification" की आधारशिला रखी गयी तब एक आशा का भाव मेरे अन्दर जागा। 2011 के अन्तिम पड़ाव में जब मैंने अपना "आधार कार्ड" बनवाया तो इस आशा को और बल मिला। कारण बिलकुल साफ़ था। हाथ की अँगुलियों के निशानात और रेटिना की पहचान जब आधार कार्ड के साथ जोड़ी गयी तो लगा की मानों अब ना कोई गुमशुदा रहेगा और ना कोई लावारिस। आँख या हाथ के माध्यम से आसानी से आदमी की पहचान की जा सकेगी। आधार कार्ड के पीछे के मूल विचारों में ये विचार भी शामिल रहे होगे ऐसा मेरा मानना था। आधार कार्ड के साथ अक्सर जब मैं हरियाणा, उत्तर प्रदेश की बसों में आता जाता था तो कन्डक्टर के हाथ में बैटरी चालित टिकट वेंडिंग मशीन देख कर ऐसा लगता था की मानों एक दिन ऐसा भी आएगा की जब आप अपना आधार कार्ड नंबर या अपनी अंगुलियों के निशान ऐसी ही किसी मशीन में इनपुट देंगे तो आपके क्रिया कलापों पूरा चिट्ठा सामने होगा। कितने चालान हुये, कहाँ हुये, आपका पता, आपका बैंक खाता, इत्यादि -इत्यादि सब शीशे की तरह साफ़ दिखाई देते। काश ऐसा हो पाता? ये एक सपना पूरा हो पाता तो सारा भारत एक होता प्रदेशों और नगरों की सीमायें आभासी हो जाती। 

वक्त के साथ राजनीतिक बदलाव आये और आधार कार्ड की संकल्पना अपने मूल उद्देश्य से भटक गयी। कभी आपसी राजनीतिक उठापटक के चलते तो कभी सरकारों के विचारों में बदलाव के चलते, तो कभी माननीय न्यायलय के हस्तक्षेप से!!! आज आधार कार्ड दूसरे अन्य कार्ड्स की तरह है।  कोई इसे केवल पहचान पत्र का दर्ज देता है कोई पते का लिये भी मान्य कहता है। वाहन चालान का प्रमाण पत्र (ड्राइविंग लाइसेंस), पैनकार्ड, मतदान पहचान पत्र(वोटर कार्ड), निवास प्रमाण पत्र, आयप्रमाण पत्र, इत्यादि की श्रृंखला में जुड़ता एक और नाम "आधार कार्ड।" राजनीतिक और न्यायिक लड़ाई का शिकार "आधार कार्ड" और उसकी संकल्पना। ये भी सोचने की बात की काश हर आदमी का एक पहचान पत्र एक नम्बर होता और जगह जगह सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने से छुटकारा मिला जाता। इससे न केवल आदमी की पहचान करना सरल होता वरन महिसुरीय भ्रस्टाचार पर नकेल डालने में मदद मिलती।

आज एक नागरिक जो जन्म से भारतीय है। जब एक जगह से दूसरी जगह स्थनान्तरित होता है , एक मजदूर जब एक प्रदेश की सीमाये लाँघ कर दूसरे प्रदेश में दस्तक देता है तो। सबसे बड़ा संकट पहचान का होता है। गैस कनेक्शन से लेकर बैंक अकाउंट, फ़ोन कनेक्शन, बच्चों का स्कूल में एडमिशन इत्यादि में सभी जगह पते का संकट होता है। एक मजदूर की दूसरे प्रदेश में कोई पहचान नहीं होती, गरीबी रेखा के नीचे मिलने वाले किसी भी फायदे को उठा नहीं पता मजदूर क्यों की, बच्चों का स्कूल में एडमिशन करना भी दुष्कर कार्य होता है। कुल मिला कर यदि एक व्यक्ति विशेष के पास भारतीय होने का प्रमाण है, एक पता है तो उसे दूसरे प्रदेश या नगर में जाकर फिर से किसी अग्नि परीक्षा से क्यों गुजरना पड़े? क्यों उसे निष्ठुर सरकारीतन्त्र से टकराना पड़े? ऊपर से नीचे तक क्यों माया पहचानी पड़े? आय से अधिक सम्पत्ति होने पर सरकार जो तब ही क्यों पता चले जब पानी सर से गुजर जाए? क्यों ना आधार कार्ड को हर क्रय-विक्रय से जोड़ दिया जाय। देश में कोई और किसी तरह की क्रय -विक्रय बिना आधार कार्ड के मान्य नहीं। तो क्यों मरणोपरान्त किसी के बैंक खाते में कोई राशि बिना परिजनों की जानकारी के पड़ी रहे। तो क्यों EPF में करोड़ो की रकम बिना अनक्लेम्ड पड़ी रहे? इन सभी समस्याओं का समधान आधार हो सकता था किन्तु अफसोजनक है की इस संकल्पना में विलम्ब हो होता जा रहा है उससे भी अफसोसजनक ये है ये संकल्पना मूल उद्देश्यों से भटका दी गयी, कारक क्या रहे ये अलग बात है चर्चा का विषय भी है।

विचार: न्याय की कीमत रवीन्द्र पाटिल!!!

कल शाम मुम्बई उच्च न्यायलय द्वारा सलमान खान को बेल पर रिहा किया जाना और आज निचली अदालत के फैसले को निलम्बित कर देने के पूरे घटनाक्रम से न्याय और व्यस्था पर कई सवाल उठे है।कानून सब के लिये बराबर है, यह  धारणा कमजोर होती दिखी है । एक लोकतान्त्रिक देश में ये स्वस्थ संकेत कतई नहीं कहा जा सकता। 2002 से 2015 तक चले इस हिट एण्ड रन केस में निचली अदालत द्वारा सलमान खान को दोषी करार दिया गया। निचली अदालत के इस फैसले को १ ही दिन में भीतर निलम्बित कर देने का क्या मतलब? ये तो निचली अदालत के वर्षो की कड़ी मेहनत और विश्लेषण को एक पल में बेकार बता देने जैसा है, निचली अदालतों को अयोग्य करार देने जैसा है। ये जान लेना बेहतर होगा की देश के अधिकतर मामले इन्ही निचली अदालतों में सुने जाते है। जो इसका मतलब ये निचली अदालत के न्यायधीशो के मनोबल को भी गिरानेवाला कदम है। बेहतर होता यदि सलमान खान को जेल भेज कर इस मामले पर आगे की सुनवाई की जाती। मामले पर उच्च अदालत द्वारा सुनवाई और किसी निर्णय तक पहुँचने से पहले निचली अदालत का फैलसा कायम रखा जाता !! यहाँ इस बात को मद्देनज़र रखना भी बेहतर होता की सलमान खान के ऊपर एक अन्य अदालत में भी संरक्षित जानवर को मार गिराने का अपराधिक मुकदमा दर्ज है। खासकर जब मामला कई लोगों की जान से जुड़ा हो।

पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा आहत करने वाली बात ये है कि वो जो मुलजिम से मुजरिम करार दे दिया गया। उसे एक मिनट के लिये भी जेल नहीं जाना पड़ा!! और वो रवीन्द्र पाटिल जिसने इस घटना को पुलिस थाने में रिपोर्ट किया, घटना का गवाह बना। उसे अदालत में ना हाज़िर होने के लिये जेल भेज दिया गया!!!! इसे विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे!! हिन्दी की मशहूर कहावत "आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास" यहाँ चरितार्थ होती है। कॉन्स्टेबल रवीन्द्र पाटिल की नौकरी का जाना, अदालत द्वारा गिरफ्तार किया जाना, उसका गायब हो जाना, और अचानक असाध्य बीमारी के साथ मिलना। ऐसा तो कतई नहीं लगता की ये नियति  का रचा हुआ जाल था!!! ये बेहद अफसोसजनक है की व्हिसलब्लोअर की स्थिति में होने के बाद भी रवीन्द्र पाटिल की ना कोई सुध ली गयी और ना ही उससे सुरक्षा प्रदान की गयी। ये लोकतन्त्र और लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं में एक कदम आगे बढ़ कर मदद और सच बोलने वाले लोगों को हतोत्साहित करता है। एक बेहद की कमजोर और वीभत्स कर देने वाला उदहारण देश के समक्ष रखता है।

आनन-फानन में की गयी अदलती कार्यवाही से देश में बुद्धजीवीवर्ग में बेहद निराशा का माहौल है। आगे चलते हुये ये सवाल उठने लाजिमी है की एक तो न्याय बेहद देर से होता है और जब होता है तो अपने शुरू होने से होने तक के सफर में कई और लोगो के साथ अन्याय कर देता है। पीड़ित पक्ष के तो जैसे पीड़ित रहने का श्राप ही मिल जाता है!!! जैसा की इस हाई प्रोफाइल केस में हुआ। रवीन्द्र पाटिल की कुर्बानी तो ले ही ली ना!! न्याय पाने और न्याय के लिये लम्बी लड़ाई के लिये दम भरने वाले लोग बेदम होकर अन्य तरीको पर विचार करने को मजबूर है। जहाँ अदालतों ने इस केस के माध्यम से अपनी सार्थकता सिद्ध करने का सुनहरा अवसर गवाँ दिया वही दूसरी ओर को न्याय के मिलने और ना मिलने के बीच के फर्क को बहुत कम, लगभग ना के बराबर कर दिया है। "जिसकी लाठी उसकी भैस का तर्क इस मुद्दे में जीवन्त हो उठता है।