व्यंग: पर्चा तो आउट होना ही था !!!!

उत्तर प्रदेश लोकसेवा आयोग का पर्चा आउट हो गया और रद्द भी। अब कई आयोग बनेगे , जाँच हुआ करेगी। नतीजा भी निकलेगा मगर महज ढाक के तीन पात!!! डर की ये मुद्दा भी सलमान खान के "हिट एंड रन" जैसा ना बन जाये। अब क्या कहियेगा समाजवादी व्यवस्था का!! कह भी दिया तो आजम खान बन्द करवा देंगे थाने में!! क्या हुआ जो 66A हट गया? कानून तो मन्त्री हाथ का खिलौना है, पुलिस उनकी मातहत। कोई कसार नहीं छोड़ेगे लंका लगाने में।  खैर पर्चा आउट होने  की बात पर लौटते है। पर्चा तो हर बार आउट होता ही है। बस इस बार चूक ये हुयी की ससुर नाती व्हाटसप हो गया, और इसी चक्कर में नेता जी की नाक कटने की नौबत आ गयी। सो रद्दीकरण हो गया। नाक अगर ज्यादा लम्बी हो  कटने का खतरा हमेशा ही रहता है। कभी चिड़िया ऊपर से बीट करे तो गन्दी  होने का खतरा भी बना रहता है। इस बार चिड़िया में नेता नाक पर हवाई हमला किया और सफल हो गयी और नेता जी की भद्द पिट गयी। और बाटो लैपटॉप और और लगायो wi -fi. 

छात्रों की तो लुटिया ही गयी डूब गयी, इधर-उधर जैसे तैसे सामान्य श्रेणी में , आरक्षित श्रेणी में किसी दूसरे की सीट कर अतिक्रमण कर बेचारे परीक्षा देने पहुँचते है। सैकड़ो का खर्चा यात्रा में और कष्ट अपार , तत्काल में रिजर्वेशन लेना पड़ गया तो जेब कटी समझो। फिर किसी नये शहर में जाकर रुकना। पैसे तो धुँयाँधार लगते है। उस पर ये गहरी निराशा। "ना खुदा मिला न विशालेसनम"!!! रात-रात भर जागकर पढ़ने की कीमत तुम क्या जानो आजमबाबू। तुम तो ढंग से पढ़ नहीं पाये!!! अब जो पढ़ रहे है उनको भी निराश करो इतना निराश करो की पढ़ाई छोड़ दे !!

खैर परीक्षा हो भी जाती तो कौन से तीर तलवार चल जाते!! इन्ही में कुछ छात्र राज्य  लोकसेवा आयोग से ट्रेनिंग लेकर नेता जी की सेवा में जाते। इतने थपेड़े खाने के बाद नौकरी मिलती तो तो वो अपना घर भी चमकाते। खैर जो होता है अच्छे लिये होता है ऐसा मानकर सोच को सकारात्मक करते है। और छात्रों को आगे आने वाली परीक्षाओं में लिये हर स्थिति से निपटने के देते हुये दुआये देते हुये आगे बढ़ते है। 
की बोलो समाजवाद की जय!!!!!

रोज का रोज रोजी रोटी के खेल में

रोज का रोज रोजी रोटी के खेल में
कमबख्त घूमता रहा खुली जेल में

यूँ तो बार बार बेल की अर्जी लगायी
छुट्टियाँ मानिन्द रेत के मुट्ठी में आयी

मालूम होता है तभी मेरी रिहाई होगी
जब जवानी उम्र की घरजमाई होगी

मौसम हसीन कई आते जाते रहे

मौसम हसीन कई आते जाते रहे
सालों की कमायी दिनों में गँवाते रहे।

रिवाज़ वो मिट गया जमीदारी का भले
कर, सरकार को फिर भी चुकाते रहे।

तू पत्थर है यूँ तो, पर कोई आस थी जो
सर तेरे आगे, हमेशा झुकाते रहे।

रेड लाइट पर रुक जाते है डर करके यमराज

उच्चतम न्यायलय ने 66A को निपटा दिया। अच्छा ही तो किया। अब सच उभर कर आयेगा!!!
पेशेखिदमत है कुछ प्रयास सच की दिशा में ......

उत्तर प्रदेश में चल रहा ठसक मुलायमराज
रेड लाइट पर रुक जाते है डर करके यमराज

लोग डरे डरे से फिर रहे,चाहे अज्ञातवास
जूतम पैजार कर रहे नेता जी के खास

लोकतंत्र और समाजवाद मा छिड़ी है भीषण जंग
समाजवाद का रंग चढ़ा, लोकतंत्र हुआ अपंग

गिद्ध द्रष्टि से देख कर रहे चील मंडराये
त्राहि माम रक्षा करो, जनता रही चिल्लाय।

आजम भैया आज भी, रहे भैस खुजवाये
जो भैसी ना मिले तो समूची पुलिस नप जाये

सुरसा सा मुँह फाड़कर दिया जोर से चिल्लाय

नेता जी जन्मदिन पर पैसा विदेश से आय।

तो बोलो भैया ठसक मुलायम राज की जय
तो भैया भैया की भैंस वाले आजम की जय।

लघु कहानी: समाज कल्याण

शुक्ला जी रोज की तरह दफ्तर से निकल कर सीधे पप्पू पनवाड़ी की दुकान पर आ टिके। पप्पू ने शुक्ला जी को देखते ही पान बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। पप्पू पान में कत्था लगा ही रहा था उसका ध्यान शुक्ला जी की खास वेशभूषा ने आकर्षित किया। थोड़ी देर चुप रहने के बाद पप्पू शुक्ला जी से थोड़ा झिझकते हुये बोला, "अरे का बात है साहब आज कोई खास दिन है का ।" शूट-बूट में है साहब एकदम लाट साहेब लग रहे है । अरे यार आज एक प्रोग्राम रहा उसी के चक्कर में पहिन के आना पड़ा। दूर -दूर से बड़े साहब लोग आये है। रेपुटेशन का सवाल था तो हम भी बन लिये लाट साहब। पप्पू मुस्काया पान शुक्ला जी की तरफ बढ़ाया। शुक्ला जी ने पान को मुह में दबा लिया, और बोले आज शाला टेंशन बहुत है। पान थोड़ा भी गिर गया शूट में तो मेझरारु घर के बाहर खड़ा कर देगी। पर पान तो पान है खाना तो पड़ेगा ही। पप्पू मुस्कराते हुये बोला अरे साहेब मेहरारू से भी कोई जीत सका है का!! थोड़ा ध्यान से खाईयेगा।  अरे शुकुल जी कैसे है? बिल्कुल चमक रहे है आज!!! शर्मा जी ने शुक्ला जी से हाथ मिलाते हुये चुटकी ली। शर्मा जी शुक्ला जी के ही दफ्तर में वित्त विभाग में काम करते थे।
रोज की तरह पान के साथी थे। शर्मा जी के आते ही दुकान पर सामाजिक बहस का दौर छिड़ गया। कहिये शुक्ल जी आज का हुआ प्रोग्राम में का कही के गये बड़े बड़े साहब लोग। अरे "वहीं  समाज कल्याण के राग अलाप रहे थे!!!" दिल्ली से आते है तो बड़ी बड़ी बाते तो छौंकेगे ही। इनको भी तो अपनी दुकान चलानी है। शाला पूरा दिन इन लोगो को सुनना भी एक बड़ा काम है। वैसे हम भी आज दफ्तर की काम काज पर एक सेशन दिये थे बड़े साहब लोगो को। का बताये आप ऊ सेशन माँ शुक्ल जी? शर्मा जी ने शुक्ला जी से सवाल किया। अरे वही की कितने बच्चों को स्कॉलरशिप दी, कितनो को मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास किया !! वही कच्ची मड़ैया वाले स्लम के कुछ लोगो का ब्यौरा दिये थे। पर मामला तब गड़बड़ा गया थोड़ा सा जब साहब लोग क्रॉस वेरिफिकेशन करने लगे।  बोले दिखाईये दस्तावेज कितने लोगो को वजीफा मिला कितनो का जीवन स्टार सुधारा इत्यादि- इत्यादि!!! थोड़ा गड़बड़ हुआ।  हम पाहिले से कई लोगो को बुला के  साइन करा लिये थे। ५०-१०० रुपये में सब मान जाते है।  अँगूठा लगा के चले जाते है।  हाँ सही कहे शुक्ला जी आजकल नये नये लौण्डे साहब बन जाते है फिर लगते है चलाने हम जैसे लोगो के ऊपर हम। "समाज कल्याण विभाग में नौकरी कर कर लिये!! जीना मुश्किल किये है लोग" समाज का ही कल्याण करते रहेंगे तो अपना कब करेंगे????  शुक्ला जी और शर्मा जी काफी देर तक लगे रहे और पप्पू ज्ञान बटोर लेने वाली मुद्रा में एक वक की तरह सुनता रहा।  बातें करते करते शुक्ला और शर्मा जी दफ्तर की तरफ बढे। ध्यान बातों में था और रिक्शे की घण्टी शुक्ला जी को सुनायी नहीं दो एक रिक्शे का आगे वाला पहिया शुकुल जी के पैर को स्पर्श करता हुआ निकल गया। शुक्ला जी हड़बड़ा कर रुके और ये देख कर आग बबूला हो गये की उनके पैन्ट में दाग लग गया।  शुक्ला जी आपा खो बैठे और रिक्शे वाले को जोर की चपत लगा दी। रिक्शे वाला रोने की मुद्रा में आ गया।  साहब हमार का गलती है येमा हम तो बराबर घण्टी बजावत रहे! आप ही नहीं सुने तो हम का करे!! शर्मा  जोर से चिल्लाये जानता नहीं हमे हम समाज कल्याण विभाग में काम करते है। एक आवाज़ लगायेगे तो पूरा दफ्तर निकल आयेगा तुम्हारा कल्याण करने। रिक्शे वाला चुप हो गया शुक्ल जी आग बबूला होकर उसको सड़कछाप गलियों से नवाजते रहे। और दफ्तर की तरह बढ़ गए।

लघु कहानी: मछली की आँख

तालाब के आसपास आज मजमा लगा हुआ था। गाँव के उत्साही और रसूखदार घरो के बच्चे जमा थे और कयास लगा रहे थे। पास ही खड़ा जगदीश हवा में हाथ पैर चला रहा था। गुल्ली को डण्डे से किस तरह मरेगा इसी अभ्यास में रत था।  इतने में छोटे चौधरी की आवाज ने सन्नाटे को चीरा। चल यार शुरू कर ना कितना और इन्तज़ार करायेगा !!! जगदीश ने हामी भरते हुये गुल्ली और डण्डा उठा लिया। गुल्ली को जमीन पर टिकाया और फिर डण्डे  को दो तीन बार ऊपर नीचे कर गुल्ली के सही दिशा में होने को पुख्ता किया। इस बार जगदीश का लहराया, डण्डा परपेँडिकुलर जमीन की तरफ अग्रसर था। डण्डा गुल्ली की नोक पर लगा, गुल्ली हवा में नाचती हुयी ऊपर उठी, जगदीश की नज़रे गुल्ली पर टिकी हुयी थी।  गुल्ली ऊपर का सफर तय कर नीचे का रास्ता नाप ही रही थी की जगदीश का हाथ फिर से हवा में लहराया और गुल्ली पर नपातुला किन्तु जोरदार प्रहार किया। गुल्ली हॉरिजॉन्टल से लगभग 45 डिग्री का कोण बनाते हुये गोली की मानिन्द आगे बढ़ी और चन्द कदमों की दूरी पर लगे पेड़ के कैथे से टकरायी। कैथा औधे मुँह जमीन पर गिर गया। एक तो गुल्ली का सटीक प्रहार ऊपर से जमीन पर गिरने का प्रभाव, कैथा फट चुका था। आस पास खड़े लोगो ने दाँतो उंगलियाँ दबा ली। कुछ पढ़े लिखे लोग प्रोजेक्टाइल मोशन का उम्दा उपयोग देख सन्नपात में थे और कुछ के फंडे वहीं आस पास बिखर कर फड़फड़ा रहे थे। चौधराहट चाप हो रही थी. मानो जगदीश ने आज जग जीत लिया हो। उसने गाँव में वर्षो से चली आ रही परम्पराओं और व्यवस्थाओं को ललकारा था।  आज कैथे के साथ साथ उसने उन लोगो का दम्भ भी गिरा दिया था जो केवल इंसान की पैदाइश और उसके कुल से  योग्यता का अन्दाज़ा लगा लिये। पेड़ पर लगे इसी कैथे को गिराने की कोशिश कई और लोग इसी तरह कर चुके थे पर सब पर सब फैल। जगदीश  चुनौती को स्वीकार किया और सिद्ध किया मछली की आँख केवल अर्जुन ही नहीं कर्ण भी भेद सकता भले की कर्ण शूद्र पुत्र हो!!! 

एक कल्पना: तुम्हारी याद

तुम्हारी याद जब भी दस्तक देती है तो लगता है की मानों वर्षो से बन्द पड़े घर का कोई सीकचा आज ही खुला हो और धूप छन-छन कर मेरे पास आने को आतुर है मन को प्रकाशित करने के लिये आतुर है। मानों ग्रीष्म ऋतु की एक बेहद गर्म शाम, ठण्डी हवा का झोका मन को नयी तरावट देकर चला गया हो। मानों दशकों से सफ़ेद साड़ी में लिपटी किसी विधवा को, किसी ने होली के रंगो से सराबोर कर दिया हो। मानों एक सूखे, एक अकाल के बाद लाख जतन करने पर बरसात सी हुयी हो जमीन से निकल कर केंचुए जमीन को फिर से उपजाऊ बनाने के लिये तैयार खड़े हो।   

बरसाती मेढ़क:मन्दिर,मस्जिद,गिरिजाघर सब जाति धर्म के अड्डे है

1.
मन्दिर,मस्जिद,गिरिजाघर सब जाति धर्म के अड्डे है
आओ चले मयखाने में सब एक ही बोतल खोलेगे।

खूब पियेंगे खूब जियेंगे होश का जब तक होश रहेगा
जब मदहोशी का आलम होगा, किसी जगह भी सो लेगे।

2.
मुश्किले भी वक़्त की शागिर्द निकली
हर शह बढ़ती रही बुलन्दी की तरफ।

3.
जब से मेरी कमाई को किस्तों ने आँका है
तब से समय को मैंने बालिस्तो में नापा है 

ग़ज़ल: हालेदिल,शक्ल से बयाँ हो जाता है

हालेदिल,शक्ल से बयाँ हो जाता है
जब अपनों से फासला हो जाता है ।

बनती बिगड़ती है इबारतें हर सिम्त
मन में कम जब हौसला हो जाता है।

अब समझ आता है चिड़िया का दर्द
तबाह जिसका  घोसला हो जाता है।।

बरसाती मेढ़क:

1. 
जब से मेरी कमाई को किस्तों ने आँका है 
तब से समय को मैंने बालिस्तो में नापा है।

2.
बदलता हुआ मौसम शरारत कर गया 
अच्छे खासे गले में हरारत कर गया ।

3.
एक बार मुहब्बत करके तो देखो 
कभी जीते जी मर के तो देखो
खुद को किसी और का कर के तो देखो 
नये रंग में अपने ही शहर को देखो
खिली गुलाबी धूप हर पहर में देखो
कभी टूट कर कभी बिखर के तो देखो 
उसकी आरजू में सजदा करके तो देखो
तुम खुदा को भूल जायोगे

जब खुद को मुहब्बत में आजमायोगे।

कविता: जिन्दगी की कहानी


बुनी थी जिन्दगी हमने चारपाई की तरह
चढ़ी थी हर सीढ़ी ईकाई की तरह 
खुशियो में मिले लोगो से मिठाई की तरह
गमो को गले लगाया छोटे भाई की तरह
निभाया है हर धर्म लुगाई की तरह
साथ रखी उम्मीदे हमेशा दवाई की तरह 
मुश्किलों में डटे रहे सच्चाई की तरह
आखिरी पड़ाव में सिमट गये तनहाई के तरह 
कैद हो गये सन्दूक में रजाई की तरह!!

व्यंग: "जीन्स एक खोज"

फैशन के दौर में जो भी आइटम चल गया, बस मार्केट में छा जाता है। यूँ भी कह सकते है की फैशन एक महामारी जैसा है, एक संक्रमण वाली बीमारी जैसा जो एक पल में जंगल में लगी आग की मानिन्द हर आम और खास को आगोश में ले लेता है। अमूमन फैशन "टॉप टू बॉटम"  अप्रोच पर काम करता है। मतलब आमिर खान "गजनी" बने तो सीधा एटॉमिक रिएक्शन होता है। गली मोहल्लों के सैलून, सब बस "गन्जा  विथ स्पेशल मार्क" करते नज़र आते है।  कभी संजय दत्त छाप बालो के स्टाइल से, कभी मिथुन दा के अन्दाज़ वाले बालों वाले चोरे जगह जगह मिल जाते है। नये फैशन अपनाने वाले "उल्की के टाड" जैसे होते है। मतलब ध्यान आकर्षण की हर सम्भव कोशिश में अनवरत लगे रहते है। भले ही उसके लिये उँची आवाज़ में बाते करनी पड़े या फिर रह चलते फब्तियाँ कसनी पड़े। जब तक कोई  कमीना कह ही सही अलग दिखने की पुष्टि का  तक फैशन अधूरा ही समझो। 

जब कोई फैशन विशेष चलन में हो तो फैशन से बाहर हो चुकी चीजे विलुप्तप्राय हो जाती है। अगर जरूरत पड़ जाय तो उनकी खोज में लगना पड़ता है। आजकल जीन्स की पैन्ट का फैशन ही ले लीजिये। जीन्स का बस "लो वेस्ट" वर्जन ही उपलब्ध है। हर दुकान हर मॉल बस वही ऑफर कर रहा है। अगर "अंग प्रदर्शन" पसन्द नहीं तो तय मान लीजिये की आपको पुरानी पैन्ट से ही काम चलाना पड़ेगा। हालाँकि ये बात दीगर है की "लो वेस्ट जीन्स" गाँधीवादी  विचारधारा की पुष्टि करती है। जितनी जरूरत उससे भी काम वस्त्र!! खुले सरकते हुये वस्त्र !!! पहन कर बाइक में पिलियन राइडर बन जाईये तो बस प्रॉपर वेंटिलेशन मिलता है। भरपूर हवा का आवागमन, बिना रोक-टोक के। अगल बगल चल रहे लोग भी फैशन की नुमाइश कर लेते है। फैशन टी-शर्ट के पिछले हिस्से से शुरू पैन्ट के पिछले हिस्से की शुरुआत पर ही सिमट जाता है। हर निगाह आप पर आपकी तरफ।  

फटी-पुरानी जीन्स का भी चलन खूब है। एक तो "लो वेस्ट" दूसरी जगह से फटी हुयी। सोने पे सुहागा वाली बात हो गयी। किसी गाँव में चले जाये तो शर्तिया गली के कुत्ते दौड़ा ले। अगर आपको जीन्स का पुराना वाला वर्जन चाहिये तो आप "पैन्ट एक खोज" ऑपरेशन में लगते है। आप किसी बड़े मॉल जाते है जहाँ किफायती दरों पर चीजे उपलब्ध है।हर दुकान से जवाब आता है सर "यहाँ तो बस "लो वेस्ट" पैन्ट ही मिलेगा। आप एक से दूसरे दूसरे से तीसरे दुकान पर चक्कर लगा लगा कर थक लेते है पर पैन्ट की तलाश खत्म नहीं होती। फैशन का कहर आप पर बरपा हो जाता है।  किसी दुकान विशेष में जाकर MRP पर पैंट खरीद कर लानी पड़ती है और जेब का पैसा हवा !!! 

मुद्दा बेहद गम्भीर है। समझ नहीं आता की फैशन वरदान है या अभिशाप!!! 

निबन्ध: स्नान-ध्यान और उसकी विधाये

स्नान- ध्यान  यूँ तो नित्य क्रिया-कर्म का हिस्सा माना जाता है। पुराने समय से ऐसा माना जाता रहा है कि समय पर स्नान स्वास्थ्य और स्वच्छ्ता का परिचायक है। स्नान के कई तौर-तरीके समाज में प्रचलित है। ये व्यक्ति की पसन्द ना पसन्द पर निर्भर करता है कि वो किस प्रकार के स्नान को पसन्द करता है। कुछ लोग स्नानागार में जाते है तो चिपक कर बैठ जाते है। घण्टो का समय लगाते हैं और कुछ लोग "आये गये और हो गया"। स्नान के साथ अमूमन ध्यान का नाम भी चला आता है। चूँकि स्नान-ध्यान का पूरक है। बिना स्नान के ध्यान अधूरा है।

घण्टों स्नानागार में चिपके रहने वाले लोगो का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करेंगे तो पायेगे कि ये लोग बेहद साफ़ और अतीव सुन्दर दिखना चाहते है। ऐसा मान लेना उचित ही होगा  देश में बिकने वाले बड़े सौन्दर्य प्रसाधन बस इन्ही की कृपा दृष्टि पर काबिज है। मैला-कुचैला हटाने की तकनीकि का कोई पहलू इनसे शायद ही अछूता रहा हो। बालों में सैंम्पो से लेकर ऐड़ियों तक मैल रोज का रोज साफ़ होता है। ऐसे लोग जब सड़को पर चलते है तो आस-पास के माहौल में भी टेलकम पाउडर और इत्र की भीनी खुसबू बिखरा देते है। "स्वच्छ भारत अभियान से अगर इस प्रजाति के लोगो को जोड़ दिया जाये तो यकीनन ये अभियान मील के कई पत्थर स्थापित करेगा। "

स्नान की अन्य बहुप्रचलित क्रिया जो अमूमन सर्दी के मौसम में सक्रिय हो जाती को "अर्ध स्नान", "काग स्नान" या "कौआ स्नान" की संज्ञा दी जाती है।  कौआ स्नान की विधा को चुल्लू भर पानी से लेकर आधी बाल्टी  तक के पानी से अन्जाम दिया जा सकता है। ये नहाने वाले की श्रद्धा है की वो जल संचय पर यकीन रखता  है जल की बर्बादी पर!! कौआ स्नान करने वाले लोगो पर परिवार के बड़े-बूढ़ों की तिरछी नज़र रहती है। उनके द्वारा की गयी किसी भी गलती को, उनको मिली किसी भी हताशा को उनके कौआ स्नान करने से जोड़ कर देखा जाता है। कई बार परिवार के दबाव में इन्हे पूर्ण स्नान करने पर मजबूर हो जाना पड़ता है। कई बार ऐसे लोगो को "बकरी होने की उपाधि" भी दी जाती है। तथाकथित सभ्यसमाज में ऐसे लोगो को हेय दृष्टि से देखा जाता है।

कौआ स्नान की विधा को अपनाने वाले तमाम लोग ज्यादातर कॉलेज के हॉस्टल, या ऐसी किसी जगह पाये जाते है जहाँ परिवार के लोगो के भारी और अनुचित दबाव से बच सके। ऐसे तमाम लोग जब एक जगह एकत्रित हो जाते है। तो वहाँ कौन कितने दिन केवल कौआ स्नान करके काम चला सकता है इस बात की होड़ लग जाती है। किसी इलाके में अगर सभी लोग कौआ स्नान करते हो तो ये मान लेना उचित होगा की उस जगह का जलस्तर जल्दी गिरेगा नहीं। वातावरण में प्रदूषण का स्तर भले बढ़ जाये। इत्र और डिओड्रेंट की खुसबू भले हवाओं फिजाओं और घटाओं में लहराया करें। ऐसे लोगो का समाज के निर्माण में बेहद ही अहम किरदार होता है। इनकी तुलना पुराने ज़माने के साधु-संतो से भी की जा सकती है। जो वर्षो बिना नहाये धोये साधना में लीन रहा करते थे।

नोट: ये निबन्ध केवल पुरुष स्नान  विधाओं पर प्रकाश डालता है। 

सँस्मरण :8 रुपये

मैं जो लिख रहा हूँ वो वास्तविकता से ताल्लुक रखता है। हम सब इसके शिकार होते है, तब जब कोई दुकानवाला आपको 5 रुपये के बदले नमकीन का एक पैकेट थमा दे, या फिर चॉकलेट। वैसे तो ये रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा बन चुका है। रेलवे स्टेशन पर पानी की बोतल लीजिये तो पाँच के बदले नमकीन ही मिलती है। सब्जीमण्डी में सब्जी लीजिये तो भी 5 रूपये की मिर्च या अदरक टाइप की कोई चीज आपको थमा दी जायेगी। ये मायने नहीं रखता की आपको जरूरत है की नहीं। 5 रुपये खुले ना होने का हवाला दिया जाता है। वास्तव में हम सब इसके आदी हो चुके है। हो भी क्यों ना अब 5 रूपये २5-50 पैसे जैसी हैसियत रखता है।

पर एक बार को मान लीजिये की आप बस में सफर कर रहे है और आपके टिकट की कीमत होती है 105 रुपये। आपके पास एक 100 का नोट है दूसरा "हज़ार" का और एक नमकीन का पैकेट जो आप 5 रुपये के बदले ना चाहते हुये भी लेकर आये है। क्या आप बस वाले को "100 + नमकीन का पैकेट" देकर टिकट माँग सकते है? शर्तिया आप ऐसी गुस्ताखी नहीं करेंगे!!! और अगर करेंगे जो बस का परिचालक आपकी गुस्ताखी के बदले टिकट देने से रहा है। 

जिक्र लाजिमी हो चला है। आज दोपहर एक मेडिकल स्टोर पर कुछ दवायें खरीदने की गरज से जाना हुआ। मेडिकल स्टोर के प्रवेशद्वार की सीढ़ियों पर एक महिला बैठी थी। अधेड़, थोड़ी बीमार सी दीख पड़ती थी। आँखें एकदम लाल चढ़ी हुयी। खैर अपने रस्ते बढ़ा और मेडिकल स्टोर के काउंटर पर जाकर अपनी बारी के लिये खड़ा हो गया। दुकानदार एक ग्राहक के साथ व्यस्त था। ग्राहक बेहद साधारण सी दिखने वाली मैली पोशाक में, हाथ में एक मैला सा झोला टाँगे हुये, चेहरा देख कर ऐसा लग रहा था की मानो बेहद थका हुआ हो। कुल मिलाकर ये अन्ज़ादा लगता था की वह या तो दिहाड़ी मजदूर था। दुकानवाले ने उस ग्राहक को दवाईयो का एक पत्ता थमा दिया। कुल मिला कर 12 टेबलेट थी। उसने दवा का दाम पूछा "14.50 पैसे की एक टेबलेट है" दुकानवाले ने जवाब दिया .

दाम सुनकर ग्राहक थोड़ा चिन्तित सा हुआ किन्तु ये बात किसी पर जाहिर ना हो शायद इसीलिये उसने चेहरे पर थोड़ा सा दृणता का भाव लाया। पता नहीं उसके मन में क्या और क्यों चल रहा था। उसने दुकानदार से कहा अच्छा ६ टेबलेट दो दुकानदार ने जवाब दिया "6 चाहिये तो खुले पैसे देने पड़ेंगे!!!" एक लम्हा चुप रहने के बाद ग्राहक ने कहा खुले तो नहीं हैं, अच्छा पूरा पैकेट ही दे दो। दुकानदार ने दवा के पैकेट के साथ उसे के हैप्पी डेंट का पैकेट और ३ टाफी थमा दी। 8 रुपये ना मिलने पर उसकी बेचैनी हाव-भाव से जाहिर थी। पेशानियो पर बल था किन्तु दुकान में खड़े अन्य ग्राहकों के सामने क्षेप ना जाये शायद इस लिये अलग तरीके से माँगने की कोशिश कर रहा था। हैप्पी डेंट का पैकेट उठाकर उसने पूछा ये क्या है? दुकानदार ने चेहरे पर भीनी से मुस्कराहट के साथ जवाब दिया "ये दाँत चमकाता है", ग्राहक असहज हो गया। मानो नकद ही वापस चाहता हो। खैर दुकानदार ने हाजमोला का विकल्प सुझाया किन्तु ग्राहक ने उसे भी मुस्कराते हुये अस्वीकार कर दिया। " अच्छा ये सब रहने दो और पैरासिटामॉल दे दो" दुकानदार मुस्कराया और उसे पैरासिटामॉल की कुछ गोलियाँ थमा दी।

ग्राहक ने जैसे-तैसे से स्वीकार किया और आगे बढ़ा। जैसे ही वो बाहर निकला बाहर बैठी स्त्री भी उसके साथ उठकर चल दी।ये समझते देर ना लगी की दवाये वो बाहर बैठी बीमार सी दिखने वाली महिला के लिये खरीद रहा था। 8 रुपये की नकद वापसी के लिये उसके उसके मन में जो पशोपेश चली होगी वो जाहिर थी। जो मानसिक संघर्ष हुआ था वो कर था वो भी जाहिर था। बिना कहे वो ये गया की उसे 8 रुपये नकद चाहिये थे। शायद इसलिये की वो उसके घर वापस जाने का किराया हो सकते थे। शायद इसलिये की वो इतने रुपये टॉफियों लिये क्यों छोड़ दे? इतने में तो उसके बच्चे के लिये 2 पेन्सिल या इरेज़र भी आ सकता था। उसे तो कोई 8 रुपये ऐसे ही नहीं देता। जिस देश में ५० रुपये कमाने वाला गरीब  वहाँ वो 8 रुपये जैसी सम्प्पति को दाँत चमकाने के लिये कैसे छोड़ दे??? क्यों छोड़ दे !! ऐसे सवाल उसके हर बढ़ते कदम के साथ पीछे छूट रहे थे। 8 रुपये के बदले पैरासिटामॉल लेना उससे उस समय शायद सबसे बेहतर सौदा लगा होगा।

होली का हल्ला है ...

होली का हल्ला है
रंगारंग सारा मुहल्ला है
आदमी बना बागड़बिल्ला है
गुझिया है रसगुल्ला है
पानी है बुलबुला है
मतभेद भुलाने का सिलसिला है
होली के दिन एक रंग का हर काफिला है
फिर दिल से दिल मिला है।
फिर दिल से दिल मिला है।।
-विक्रम