पुरानी दिल्ली के पास

पुरानी दिल्ली के पास
एक बेहद ठण्डी सुबह
पुल के नीचे
एक आदमी लेटा था
नीचे बोरा था
ऊपर फटा हुआ कम्बल लपेटा था
अकड़कर सिकुड़कर
पेट और पीठ सपाट मालूम हो रहे थे
मेरा दिमाग सन्नपात
विचारो के झंझावात
लगातार अविरत
घूम घूम कर मानसपटल पर
वार कर रहे थे
दूरदर्शन में होने वाले बड़े-बड़े वाद विवाद
बड़े-बड़े नेताओं के अभिभाषण भाषण
संसद के बहस मुहाविशे
सन्न सन्न करके मेरे मेरे दिमाग को चीर रहे थे
राजपथ जनपथ सब के सब लथपथ
जानकारों से विचारो से
पर सब के सब घरो में
मखमली रजाई में विचारमग्न थे
की कल किस जगह किस सभा में क्या वादे करने है

समान नागरिक संहिता को लाना होगा ....

विकास की बात तब तक बेईमानी  है
जब तक बढती आबादी देश की निशानी है
सड़क पर चलने का,आगे निकलने का
रोजगार का,रोजमर्रा के हर काम का
एक नियम होता है
नियमो के अनुपालन से ही भला होता है
पर एक मुद्दा जो बेहद गंभीर है
जिसके अनुक्रमानुपाती देश की तकदीर है
देश में रहने का नियम क्यों नहीं है ?
धर्म और जाति के आधार पर कैसे सब कुछ सही है ?
इस फर्क को मिटाना होगा
जननी को भी बराबर का अधिकार दिलाना होगा
हम दो हमारे दो
का नारा फिर से लगाना होगा
समान नागरिक संहिता को लाना होगा
देश को विकास की राह पर बढ़ाना होगा ।।

शब्दावली :
समान नागरिक संहिता-Uniform Civil Code
अनुक्रमानुपाती -Directly Proportional

पॉलीथिन पर भी प्रतिबन्ध लगाये .....

प्रधानमंत्री जी आपने झाड़ू लगायी
देश की हस्तियों को झाड़ू पकड़ाई
अखिल भारत में सफायी की अलख जगायी
अच्छा किया, बहुत अच्छा किया
और बेहतर होगा यदि एक कदम और बढाये
पॉलीथिन पर भी प्रतिबन्ध लगाये
व्यवहारिकता में अमल में लाये
और जनता से करे अपील
आधे से ज्यादा देश स्वतः साफ़ हो जायेगा
प्रकृति के साथ भी इन्साफ हो जायेगा

गणतंत्र अब वरिष्ठ नागरिक हो चुका है 

गणतंत्र अब वरिष्ठ नागरिक हो चुका है
यथोचित सम्मान दो
कल जन्मदिन है
फिर तिरंगा तान दो
देश हित गर पड़े तो
तो कभी भी जान दो
वल्लभ भाई का एकता सूत्र
हर देशवासी मान ले
हो बन्द जाति धर्म का रण
सब देशवासी ले ये प्रण
अब जो भी आये देश में
वो केवल इन्सान हो
गणतंत्र अब वरिष्ठ नागरिक हो चुका है
यथोचित सम्मान दो 

धर्म ही प्रधान होता जा रहा है

मलाला को इस बात का मलाल रह जायेगा
मन में कहीं ये ख्याल रह जायेगा
इंसानी रंजिशों से जन्मा ये सवाल रह जायेगा
की जहाँ की शिक्षा और शांति के वो लड़ रही है
वहाँ लगतार धर्म की चाँदनी चढ़ रही है
धर्म की पढ़ाई जब जब ले रही है अँगड़ाई
तब तब इंसानियत पर हो रही है चढ़ाई
जन्नत का रास्ता सभ्यता पर हावी होता जा रहा है
धर्म ही प्रधान होता जा रहा है
संविधान खोता जा रहा है
इंसान रोता जा रहा है ।।

मेरे देश में राजनीति होती है सत्ता की

ना उत्पादकता ना गुणवत्ता की
मेरे देश में राजनीति होती है सत्ता की 
केवल और केवल प्रभुसत्ता की 
पर देश की जनता ये समझ नहीं पाती है 
कभी हिन्दू तो कभी मुस्लिम हो जाती है   




संस्मरण:अतिक्रमण

राधा!!! शायद राधा ही नाम था उसका। उम्र कोई 30 -32 की रही होगी। ज्यादातर लोग उसे आप और तुम के सम्बोधन से पुकारते थे। उसका नाम शायद उसे ही याद रह गया था!! राधा के 2 बच्चे थे सोनू और लक्ष्मी बच्चों की उम्र कुछ 7  से 8 के बीच रही होगी। दोनों पास के प्राथमिक स्कूल में पढ़ते थे। रोजगार के नाम पर चाय की दुकान थी। चाय की दुकान लगभग पोर्टेबल थी और साथ ही 6 बइ 8 के टट्टर में अस्थायी घर भी। सोनू और लक्ष्मी अक्सर उस घर में बैठ कर पढ़ते नज़र आते थे। कभी-कभी इधर उधर खेलते कूदते भी नज़र आते थे। हाँ काम करते कभी नहीं देखा उन्हें। चाय की दुकान पर जमने वाली भीड़ में ज्यादातर आमने सामने की मल्टी नेशनल कम्पनी के लोग चाय और सिगरेट फूकने आते थे। कुछ सभ्य और शालीन हुआ करते थे।  चाय पी और रास्ता नापा पर कुछ अपना अपने काम अवसाद बातों के माध्यम से बाहर निकालते हुये गालियाँ हवा में लहरा दिया करते थे। जब जब ऐसा अवसर आया तब तब राधा मानो अपने बच्चों को अपने आँचल से ढक देना चाहती थी। ताकि दुनिया की ये बलाये उसके जिगर के टुकड़ो से दूर रहे। किन्तु ग्राहकों से कुछ न कह पाने की मजबूरी थी। अगल बगल भी कई दुकाने थी उनका क्या दूसरी पर चले जायेंगे और उसे फाके पद जायेंगे !!! ऐसा सोच राधा जहर का घूट पी कर रह जाती थी।

उन्ही दिनों की बात है। मैं एक हफ्ते के अवकाश पर था। छुट्टियों का लुत्फ़ उठाने के बाद हैदराबाद पहुँचा था। और फिर रोज की तरह दफ्तर में मित्र मण्डली के साथ चाय की चुस्कियाँ लेने बाहर निकला। रुख चाय की दुकान का था। बाहर आकर देखा थो स्तब्ध रह गया। राधा की चाय दुकान वहाँ नहीं थी। जहन को बात कचोटने लग गयी और मैंने मित्रो से जानकारी चाही पता लगा की नगर निगम के लोग आये अतिक्रमण हटा कर चले गये। साथ की चाय की वो दुकान और कई अन्य दुकाने भी साथ ले गये। बात जहन को कचोटने लग गयी की कहाँ गये होगे छोटे बच्चे।  नगर निगम को बरसात के दिनों में ही अतिक्रमण क्यों हटाना होता है!!! कभी देश के हालात पर तरस आने लगता तो कभी अपने कुछ न कर पाने की हालत पर।  पर सोच  क्या बदलना था।  चाय पी और वापस काम पर लग गये। जहाँ काम का बोझ सर पर आया भूल गए बाहर के उस हटाये गए अतिक्रमण को। जहाँ दो -चार दिन गुजरे दूसरी दुकान के चाय भी अच्छी लगने लग गयी।

लगभग दो हफ्ते गुजर गये, अब चाय पर चर्चा का अड्डा नयी दुकान  थी। चर्चाओं का दौर चल ही रहा था की अचानक सोनू और लक्ष्मी आते हुये दिखे।नज़र उन पर टिक गयी, स्कूल से ही आ रहे थे शायद,  स्कूल ड्रेस में  बैग टाँगे हुये आगे बढे जा रहे थे। मैंने आवाज दी पास बुलाया और सोनू से पुछा कहाँ चले गए थे भाई तुम लोग। सोनू ने जवाब दिया अंकल वो पुलिस वाले अंकल लोग आये थे सो घर का सब सामान हटाना पड़ा उस रोज बरसात भी हो गयी हमारा सारा सामान और कॉपी किताबे तक भीग गयी। फिर हम लोग नानी के घर चले गए आज ही लौटे है। नानी भी साथ आई है और माँ नया घर बना रही है। बच्चो ने इशारा किया वो देखिये। राधा फिर से 6 x 8 का टट्टर लगाने की जुगत भिड़ा रही थी पास में एक बूढी औरत बैठी थी।  शायद सोनू की नानी थी । इस बार कमोवेश थोड़ी सुरक्षित जगह पर। सड़क के दूसरी चोर जो दफ्तरों से थोड़ा दूर था लिखें अतिक्रमण हटाने वाले वहां की सुध नहीं लेते थे। राधा आत्मविश्वास से भरी हुयी थी। जिन्दगी की कठिनाइयों और चुनौतियों को ठेंगा दिखाते हुये। नगर निगम के प्रयासों को अदना बताते हुये!! मानो कह रही हो की तुम कितनी भी आफत ले आओ ऊपर वाले किन्तु हिम्मत मेरी धरोहर हर इसे ना मुझसे तुम ना कोई और छीन सकता है। मैं एक माँ भी हूँ अपने बच्चो की खातिर मैं साड़ी कायनात से भी लड़ सकते में समर्थ हूँ। कभी न टूटने वाली जिजीविषा साफ़ झलक रही थी। बच्चे फिर स्कूल जाने लगे थे। सोचा कल से चाय की चर्चाये फिर वहीं शुरू करेंगे। एक नयी सकारात्मक सोच साथ।

वैसे चाय पर होने वाली चर्चाओं के मुद्दे देश- विदेश, मुख्यमन्त्री, प्रधानमन्त्री और राजनीति पर हुआ करती थी। देश तरक्की कर रहा है …  तो फलाना मुख्यमन्त्री बन गया। ढिकाना क्या भाषण देता है!!! वगैरह -वगैरह उसी दुकान पर बैठे बैठे हम देश और दुनिया की सैर कर आते थे । और  पर उस दुकान और उसके आस पास की दुकानों पर जब भी देखा नगर निगम वालो को ही देखा घर गिराते हुये। लोगो को बेघर और बेजोरगार करते हुये। हाँ आस-पास बहुमंजिला इमारते बहुत थी। कुछ कानून के हिसाब से कुछ बिना हिसाब के। उन्हें केवल बढ़ते देखा और झोपड़ियो को उजड़ते। कभी कभी समझ नहीं आता था अतिक्रमण कहाँ है ? सरकारी जमीनो पर सरकार का लोगो के जमीरों पर अधिकारों पर। ये सवाल आज भी कायम है ……

जगह जगह पाकिस्तान मिलेगा ....


कायदेआजम के देश में कायदा खोजिये
बाग़ में बबूल बोने का फायदा खोजिये
मासूमो,दुधमुहो का जनाजा खोजिये
आतंक को इनाम से गया नवाजा खोजिये
जन्नत जाने का दरवाजा खोजिये
मिलेगा सब कुछ आपको
लाशो के ढेर पर
एक नया देश बनाती कब्रो की सेज पर
इसी खोज खोज में आपको
अच्छे और बुरे का होने का इल्जाम भी मिलेगा
हर तरफ, हर जगह आतंक का नाम मिलेगा
जगह जगह पाकिस्तान मिलेगा ।
जगह जगह पकिस्तान मिलेगा ।।

माँ बाप, उस अखबार की तरह होते है.......


माँ बाप
उस अखबार की तरह होते है
जो हर अलसायी सी सुबह
हमारी आँखें खुलते ही
मुस्कराते हुये दरवाजे पर
दस्तक दे रहे होते है
मौसम कैसा भी रहा हो
मौसम कोई सा भी रहा हो
कोहरा हो धुन्ध हो
मूसलाधार बारिश हो
अखबार तो आना ही है ।

अखबार, सर्वस्व न्योछावर को तैयार
जितना चाहो, जितनी देर चाहो
पढ़ो बटोर लो सारा ज्ञान
किताबों पर चढ़ा लो
अलमारी में लगा दो
जरूरत पड़ने पर
तोड़कर मरोड़कर
नयी आकृति बना लो
पर कभी उफ़ की आवाज तक ना आयेगी

पर हम स्वार्थी हो जाते है
जब अखबारो का ढेर
बड़ा हो जाता है
वो इधर उधर गिरने
 बिखरने लग जाता है
तब हमे रद्दी की दुकान
नज़र आती है
चन्द पैसों में मुस्कान नज़र आती है ।
काश मैं हॉकर होता
और निभा पाता
अपना धर्म, समझ पाता अखबार का मर्म ।
समझ पाता अखबार का मर्म ।

जेब मे झाँक लेते है


शिक्षा आज के युग में व्यवसाय ही तो है। पहले माना जाता था की माँ सरस्वती और देवी लक्ष्मी जी एक साथ वास नहीं करती ।पर बदले दौर में आज क्या हो रहा है उसकी एक झलक प्रस्तुत है ।

प्राथमिक शिक्षा बेचने वाले
लोगो का चेहरा मोहरा देख कर
हाव भाव पढ़ कर
साक्षात्कार गढ़ कर
जेब मे झाँक लेते है
आदमी को ताक लेते है
वातानुकूलन और सफाई के नाम पर
बच्चे के विकास और पढाई के नाम पर
जितना आपकी जेब में है
जितना बैंक में है वो सब चाहते है
एक बार प्रवेश हो गया
बस अभिवावक हर माह कराहते है
शिक्षा बेचने वाले
विद्या के मन्दिर में
माँ सरस्वती के साथ
लक्ष्मी जी को ले आये है
देखिये आधुनिकता से साथ
हम कहाँ तक चले आये है।

मेरी होने वाली कमउम्र बेगम ...


कल जब इमरान खान को उनकी बेगम के साथ पेशावर के स्कूल में घुसने से रोका गया । उन पर मटरगश्ती करने राजनीति करने के आरोप लगाये गए तब मृत बच्चों का एक पिता क्या सोच रहा होगा इमरान  खान के बारे में उसकी अदनी सी कल्पना .......

जब दुनिया और पकिस्तान के लोग
पेशावर के बच्चों के गम में
मोमबत्ती जला रहे थे
शायद तब इमरान खान अपनी
नयी मासूका से फोन पर इश्क़ फर्मा रहे थे
फुनियाते हुये कहे जा रहे थे
मेरी होने वाली कमउम्र बेगम
हम अपने बच्चों को UK या USमें पढ़ायेंगे
देखो ना खराब तालिबान
हर जगह घुसे जाते है
कभी एअरपोर्ट तो कभी स्कूल में
गोलियाँ चलाते है
पकिस्तान में हम केवल
राजनीति की दुकान चलायेंगे
बाकि अपने सैफू और जन्नत को
US या UK में ही पढ़ायेंगे।।

गंगा तीर्थ स्थान है ना कि शमसान है .......

सुना है सैकड़ो लाशे कल माँ गंगे की गोद से बरामद की गयी है। हमारे घरो और शहरों का कूड़ा भी वहां तक चला जाता हैं। माँ गंगे के साथ हम कैसा दुर्व्यवहार कर रहे है? एक कविता के माध्यम से अनुरोध करूँगा कि ....


गंगा तीर्थ स्थान है
ना कि शमसान है
अपनी आस्थायें
अपनी श्रद्धाये
कृपया गंगा में ना बहाये
क्यों कि एक ना एक दिन
अंत में यही गंगाजल
हम सबको पीना पड़ेगा
मर कर भी अपनी फैलायी
गन्दगी को जीना पड़ेगा
वैसे भी गंगा नदी नहीं है
हम सबकी माँ
अतैव अपनी माँ को
गन्दा होने से बचाना चाहिये
ना की उसके गर्भ में
कूड़ा और लाशें फैलाना चाहिये।।

व्यंग: रुपयो से भरे ब्रीफ़केस बटवाओगे?

आजकल सपने दिखाने का दौर चल रहा है।  कोई कहता है की 2021 तक सबको घर दिला देंगे कोई कहता है कुछ और दिला देंगे। बाते चलती रहती  वादो का दौर भी पर एक सामान्यजन होने के नाते हम वादो पर यकीन कैसे करे। खास कर तब जब वादों और हकीकत के बीच कभी  ना पट सकने वाली खायी हो। पेशे खिदमत है कुछ ज्वलन्त सवाल…… 

अच्छे दिनों वाली सरकार
कर रही है वादे बार-बार
2021 तक सबको घर दिलवायेंगे !!!
पर, एक सवाल जो बहुत बड़ा है
यक्ष प्रश्न की तरह खड़ा है।
भैया इतने घर कहाँ से लाओगे?
घर खरीदने के लिये क्या
रुपयो से भरे ब्रीफ़केस बटवाओगे?
कभी-कभी ऑनलाइन आया करो
मकान डॉट कॉम,
और मैजिक ब्रिक्स पर
झाँक कर जाया करो
पता लगेगा की EWS वाले घर भी
२५ लाख के आते है
उसपर आपके नुमाइन्दे १०%
इधर उधर के  टैक्स लगाते है
जनाब क्या जनता को बतायेगे?
की महत्वकांक्षी वादों को
हकीकत  में कैसे बदल पायेगे?
सपनो को छोड़ों जमीन पर आओ
HRA क्लेम करने के लिये
पहले मकान मालिक से पैनकार्ड दिलवाओ
15 से 20  लेते है पर पैनकार्ड नहीं देते है
सरकारी नियमो का हवाला दो
वो देते है दो टूक जवाब
रहना है तो रहे ,नहीं तो जाये जनाब
आप के जैसे 50 आयेगे
पर फिर भी हम से पैनकार्ड नहीं ले पायेगे
हम कहाँ गुहार लगायेगे?
और आप इतने घर कहाँ से लायेगे?
घर क्या हवा में बनायेगे?
अरे पहले जनसँख्या पर रोक लगाईये
बेलगाम अफसरों को समझाइये
व्यवस्था को चुस्त और दुरुस्त बनाइये
फिर अच्छे दिनों के सपने दिखाईये।
फिर अच्छे दिनों के सपने दिखाईये।। 

समाजवाद के पुष्पक पर उड़े जा रहे है।

नोएडा उत्तर प्रदेश के हालात पर एक चुटकी। समाजवादी शासन में क्या चल रहा है क्या पल है!!  ……

जब मैं नोएडा आया था
मित्रों ने नोएडा का मतलब
नो -आईडिया (NO-IDEA) बताया था
बात चरितार्थ हो रही है

सुबह सवेरे शहर का यातायात
इधर उधर ना जाने किधर
लोग एक दूजे पर चढ़े जा रहे है
गाली-गलौज के साथ लड़े जा रहे है
लड़ते झगडते आगे बढे जा रहे है

ये सब देख, पत्नी ने कल ही हिदायत दी थी
अब यातायात नियम तोड़ने सीख लो
नहीं तो यातायात में फँसे रह जाओगे
समाजवाद का रथ पकड़ लो, चढ़ लो 
नहीं तो चौराहे पर ही खड़े रह जाओगे

क्या तुम्हे पता नहीं की प्रदेश के
CM  साहब  PK डाउनलोड करने में बिजी है
अधिकारी तबादला रुकवाने और कराने में बिजी है
इसी लिये यहाँ पर
हर नियम -कायदा ताक पर रखना इजी  है

नियम कायदे कानून का पालन छोड़ दो
हर मर्यादा तोड़ दो
देखो ना हर चौराहे पर लोग
पुलिसवालों को गालियाकर  बढे जा रहे है
समाजवाद के पुष्पक पर उड़े जा रहे है
समाजवाद के पुष्पक पर उड़े जा रहे है।




   

कहानी: पुलिसिया बूट ....

रात के करीब ११ बज चुके थे। पराठे और मैगी खाने के शौक़ीन लोगो का जमावड़ा राजू की दुकान पर हमेशा की तरह सजा हुआ। राजू हमेशा की तरह तेजी से हाथ चलाते हुये सभी ग्राहकों की माँग पूरी करने की कोशिश कर रहा था। काम के भारी दबाव के बीच भी राजू के चेहरे पर चिरपरिचित मुस्कान ग़ालिब थी। कष्टो का गुबार घर पर कोई बीमार, मौसम की मार या कुछ भी पर ऐसा कभी देखा नहीं की राजू की पेशानियो पर बल आया हो !! मुस्कान अविरत राजू की चेहरे की शोभा बनी रही। शायद यही वजह थी की लोग राजू की दुकान पर जाना पसंद करते थे। कोई भी हो मुस्कराते हुये स्वागत हो तो किसे अच्छा नहीं लगेगा और यकीनन ज्यादा ग्राहक बटोरने में कामयाबी मिलनी तय होती है।

दुकान में कुछ पराठे खा रहे थे और कुछ पराठो के इंतज़ार में टेलीविज़न पर नज़रे गड़ाये हुये थे, इसी बीच हल्के से शोर शराबे की आवाजे दुकान पर बैठे लोगों के कानो से टकरायी। कुछ लोग दूकान से उठ कर बाहर आ गये। आवाज़ो की तीव्रता बढ़ती हुयी प्रतीत हुयी। गली में लोग आनन-फानन में अपनी दुकानों के शटर गिरा रहे थे। ग्राहकों की भीड़ दुकान से निकल कर सड़क पर खड़ी हुयी थी। टक टक टक ....... करती हुयी ठोस आवाज तंग गलियों में गूँज उठी। खाकी वर्दी में 3-4 लोग आगे बढे आ रहे थे, राजू की दुकान की तरफ। राजू की दुकान गली के अन्त में थी और बाकि दुकानों से थोड़ी दूर मुख्य बाजार से थोड़ा हट कर। राजू के दुकान के सामने आकर बूटो की आवाज़ थम गयी थी। पुलिस वाले ने राजू को घूरा " तन्ने निमन्त्रण भिजवाना पड़ेगा के दुकान बन्द करने के लिये!!"  पुलिसिया आवाज़ थोड़ी ऊची और हनकदार होती गयी। बन्द कर दुकान शाला !!!

"सर क्या हो गया ये धन्धे का टाइम है क्यों बन्द करवा रहे हो दुकान?" राजू ने पुलिस वालो की तरफ एक सवाल फेका। बन्द कर दुकान ज्यादा सवाल जवाब मर कर चल शटर गिरा। आक्रामक तेवर के साथ पुलिस वाले राजू की दूकान के अन्दर घुस गये। राजू खड़ा रहा। कुछ पैसे हाथ लेकर हाथ पुलिस वालों की तरफ बढ़ा दिये ये कहते हुये की सर इस हफ्ते का तो पहले ही दे चुका हूँ ये और ले लीजिये। शाला घूस देता है हमको पुलिसवाला आगबबूला गया। तड़ाक की आवाज़ गूँज उठी पुलिसवाले का वजनदार हाथ छोटे कद के राजू के गालों पर छप गया। राजू और बाकी के सब लोग अवाक थे। राजू के गालों की धमनियों पर रक्त श्राव तेज था। मानों "सत्यमेव जयते का" स्टाम्प राजू के गाल पर छाप दिया गया हो। अपने दायें हाथ से बायें गाल को राजू ने छुया और एक अश्रुधारा राजू की आँखों से फूट पड़ी।

मानों लोकतन्त्र के जंगल में वर्षो से जमी हुयी धूल पर पानी की कुछ बूँदे गिरी और गर्द का एक गुबार उठा हो। और इस गुबार में न्याय,कानून इत्यादि-इत्यादि धूल से धूषरित हो गये  हो।  न्याय का तराजू केन्द्र बिन्दु के दोनों तरफ तेजी से हिल कर टूट जाने को तड़प उठा हो। पुलिसिया गुर्गे हर हफ्ते पैसा वसूल करते थे देर तक दुकान खोलने का!! ये एक अनकहा अघोषित सत्य था। गाँधी  बन्दरों की तरह अगर इस सत्य को स्वीकार किया गया हो तो बेहतर होता।  पर उस रोज ना जाने क्यों रोज और हमेशा मुस्कराते रहने वाला राजू बागी हो गया था।

पुलिस वाले जा चुके थे। राजू ने स्टोव बंद किया। और रोते हुये बोला "क्या अपराध कर रहे है क्या? दुकान पर मेहनत कर के ही तो पैसा कम रहे थे।" हर हफ्ते इनको भी तो देते है। पर इन्हे ज्यादा और ज्यादा चाहिये!!! तो क्या खून बेंच के दे? दुकान का किराया भी देना है न भैया!! दुकान का मालिक दुगुने दाम पर दुकान देता है।  ब्लैक में घासलेट लाते है। सिलिंडर भी मिलता है तो ब्लैक में। ऊपर से इनको साहब लोगों को दो। हमको भी घर चलाना है। घर से दूर यहॉँ कमाने आये है। पुलिसवालों को जिस दिन ज्यादा चाहिए हमला बोल देते है। हम गरीब है तो क्या मेहनत करने।का अधिकार भी हमसे छीन लिया जायेगा। सम्मान के साथ कोई काम करने ही नहीं देते लोग। आज सम्मान भी खत्म कर दिया शालों ने। राजू बेहद आहत था। इतना आहत था कि जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। उस दिन जब राजू ने अपनी दूकान का शटर गिराया था। वो शटर उसकी उस मुस्कान पर भी पड़ा जो सदाबाहर थी हमेशा थी। पर उस रात पुलिसिया प्रकोप से ऐसा पतझड़ आया था की मानों अबकि बार जो पत्ते टूटे थे वो शायद फिर कभी नहीं लौटेंगे।

सूरज की हार

एक कल्पना है गौर करे :

उस रोज सूरज डूबना नहीं चाहता था। उसने ठान लिया की वो लड़ेगा। पर बादल भी कम कहाँ थे रौद्र रूप धारण किये आगे बढे जा रहे थे। सूरज और काले बादलों की सेना के बीच भीषण जंग छिड़ गयी। मैदानेजंग में सूरज  ने कहर बरपा दिया, बादल भी चितर-बितर होकर कराह रहे थे। पर बादलों की असीमित और बलवान सेना लड़ती रही और हावी हो गयी। सूरज घिर चुका था। चारों ओर से। अब कि बार बाजी पलट थी सूरज का तेज कमतर था बादलों की क्रूर सेना ने कत्लेआम मचा दिया और सूरज का लहू चारों तरफ छिटक गया। सूरज की लहू के बिखरने के साथ ही गहरी लालिमा बिखर गयी। दूर धरती पर खड़े कुछ लोग कह रहे थे वह कितना रमणीक दृश्य है। सब अपनी-अपनी आँखों और कैमरे में कैद करने की जुगत में थे। उधर सूरज घायल और आहत था सोच रहा था। मानों कह रहा हो हे इन्सान आज तो मैं घायल हूँ आज तो मेरा दर्द समझों। केवल अपने हितों को साधते कब तक साधते रहोगे।  आखिर कब तक....... 

पगार .......

महीने की शुरुआत में पगार
कुछ यूँ हो जाती है तड़ीपार
जैसे गाँवों से बिजली
सड़क से सुगमता
शहर से कानून व्यवस्था
समाजवाद में न्याय
वादा करके नेता जी
अपराध के बाद अपराधी
हो जाते है फरार

कविता: डाकिया लौट आया

ऑनलाइन शॉपिंग के चलन पर एक कविता के माध्यम से नाचीज सी टिप्पणी …


डाकिया लौट आया
ना पोस्टकार्ड
ना अन्तर्देशी
सैमसंग का नोट लाया
डाकिया लौट आया।

ना भावो से भरे खत
ना कोई दस्तखत
बस जेब पर भारी चोट लाया
डाकिया लौट आया।

ना वो टकटकी लगाये इंतज़ार
ना वो छोटे से झोले में बड़ा प्यार
बस पैक डब्बे में भेंट लाया।
डाकिया लौट आया

ना नये वर्ष के ग्रीटिंग कार्ड
ना रक्षाबन्धन की राखी
साथ बस माइक्रोवेव लाया
डाकिया लौट आया।

मोहतरमायो के शौक घर बैठे पलते रहे
जनाबो के दिल बिल देख जलते रहे
लाली लिपस्टिक और टूथपेस्ट लाया
डाकिया लौट आया।