पण्डित पोंगा भी हो सकता है ....

जिस तरह
मन्दिरों-मस्जिदों में वसूली
को नाकारा नहीं जा सकता
धर्म के नाम का माल
डकारा नहीं जा सकता
कमान से निकला तीर
दुबारा नहीं जा सकता
युद्ध के बीच शान्ति का
हरकारा नहीं जा सकता
बिन मेहनत जीवन
सँवारा नहीं सकता

अतैव एक इंसान को भगवान
कहकर पुकारा नहीं जा सकता

क्यों कि
पण्डित पोंगा भी हो सकता है
मौलवी चोंगा भी हो सकता है


ये भारत है मेरे दोस्त!!!

रामपाल की बगावत देखिये
आशाराम की शरारत देखिये
फिर भी भक्तों की इबादत देखिये
शाहदत देखिये
ये भारत है मेरे दोस्त!!!
कहीं रामायण कहीं महाभारत देखिये।

समाजवाद लोगो को छल रहा है ........

उत्तर प्रदेश परिवहन की डग्गामार
बस स्टैण्ड बेहद सड़े, बीमार
सड़को पर अतिक्रमण
आलिंगनबद्ध वाहनों की कतार
दूसरी ओर समाजवादी बग्घी गुलज़ार
जगह-जगह समाजवादी गुण्डो की मार
आम आदमी कुपित
और खास असरदार
मानवता के सूरज ढल रहा है
समाजवाद लोगो को छल रहा है
समाजवाद लोगो को छल रहा है। 



देश का प्रधानमन्त्री झाड़ू लगा रहा है और ट्रेन में ……

तारीख 21 Nov -2014, ट्रेन 12231 चण्डीगढ़ स्टेशन पर निर्धारित समय से ६ बजे से ३ घण्टे की देरी से पहुँची और 12232 बन कर अपने निर्धारित समय 9 बजकर 10 मिनट से  लगभग २ घण्टे  से लखनऊ की ओर रवाना होती है। ट्रेन के आगमन और प्रस्थान के बीच २ घण्टे था ट्रेन सफाई के लिये।  पर सफाई नहीं हुयी और शायद मैनटेनस चेक-अप भी। ट्रेन अम्बाले की ओर कूच कर चुकी थी और लगभग एक तिहाई रास्ता पायी थी। एक ऊँघता हुआ, बिना और जनरल टिकट वालों को सूँघता हुआ टी सी प्रकट हुआ। टिकट चेकिंग के अभियान में मशगूल था मुझसे टिकट माँगा, मैंने अपना फ़ोन आगे बढ़ा दिया और साथ ही साथ कुछ प्रश्न भी दाग दिये। जनाब क्या ट्रेन को रवाना करने से पहले यार्ड में ले जाया गया? ट्रेन की सफाई हुयी? जवाब था … नहीं। मैंने प्रतिउत्तर दिया जनाब देश का प्रधानमन्त्री झाड़ू लगाता और लगवाता फिर रहा है फिर भी ऐसा क्या हुआ कि रेलमंत्री और आपके डी र म ट्रेन भी नहीं साफ़ करवा पाये ? साहब ट्रेन यार्ड में ले जाकर साफ़ क्यों नहीं की गयी? समय तो था। अन्यथा २ घण्टे तब स्टेशन पर ट्रेन खड़े रखने का क्या औचित्य? मारक जवाब आया सर जी मैंने प्राइवेट सफाई कर्मियों को बुला कर 1st AC की सफाई करवा दी थी। बाकी का उन लोगों ने नहीं किया !! मैं क्या करूँ?? मैं भी तो सरकार का नौकर हूँ।

जवाब के उपरान्त न कुछ कहने को बचा ना ही सुनने को। यथा स्थिति कायम रहनी थी। कुछ नहीं हो सकता था , भारतीय रेल की अलसायी हुयी सेवा का। आप इसके मुँह पर घड़ों पानी उड़ेल दीजिये पर तन्द्रा से उठ कर खड़ी भी हो जाये तो भी आलस्य कभी न जाने वाला रोग है। प्लेटफॉर्म से लेकर ट्रेन के कूपे तक हर जगह नाक पर रुमाल रखनी पड़ती है। बढ़ा हुआ किराया देने का मलाल भी यही से शुरू हो जाता है। खैर आदतन कहे या इरादतन मैंने विरोध दर्ज कराने की ठान ली थी। पहले सोचा कन्डक्टर के पास से कम्प्लेन बुक ले आता हूँ पर पिछले अनुभवों का मान रखते हुये मैंने ऑनलाइन शिकायत दर्ज करने का मन बनाया। मैंने धर्मपत्नी से फ़ोन लीज पर लिया और भारतीय रेल के कस्टमर केयर पोर्टल पे शिकायत दर्ज कर दी। लगा की एयरटेल के 2G(GPRS) का दोहन रहा हूँ पर रफ्ता-रफ्ता शिकायत दर्ज ही हो गयी। यूँ तो मेरे पास भी 3G फ़ोन था और उसे सपोर्ट करने वाला रिलायंस का सिम भी पर अफसोस रिलायंस हाइली अन रेलाइबल है। अपने उत्तम क्षेत्र में भी सेवाएँ नहीं दे पता। जिस 3G के लिये मैं उस सिम को ढ़ो रहा हूँ वही नहीं आता और वॉइस तो मासाअल्लाह!!!!!

रेलवे स्टेशन्स पर रेलवे यूनियन की नारेबाजी के नारे बड़े बड़े अक्षरों में अंकित देखे जा सकते है। पगार भी बिना किसी उत्पादकता के मानक के  बढ़ती चली जाती है। खैर शिकायत दर्ज करने के उपरांत मुझे ध्यान आया की ये भी तो महज औपचारिकता ही है। रेलवे वाले तो सफाई कर्मियों को गन्दगी पर क्लीन चिट दे देंगे। अमूमन ऐसा ही होता आजकल विभिन्न मुद्दो पर समय-समय पर की गयी शिकायतों का नतीजा ढाक के तीन पात ही होता है । बस कभी रेलवे से चिट्ठिया आ जाती है " आप  शिकायत सही नहीं पायी गयी, आपको हुयी असुविधा के लिये हमे खेद है", सोचता हूँ की रेलवे तो केन्द्र सरकार के सीधे नियन्त्रण में है। फिर 6 माह के उपरान्त भी सफाई के क्षेत्र में कोई परिवर्तन क्यों नहीं दिखा? प्रधानमन्त्री जी तो पूरे देश की सफाई की कोशिश में लगे है जी। खयाली पुलाव और पके लगा की शायद सदानन्द गौड़ा साहब सोते रहे इसीलिये रेलवे जाग नहीं सका अब उनको सोने की सजा मिली है तो शायद नये मन्त्री जी कुछ कर दिखाये!!! सोच रहा हूँ कि कभी तो रेलवे की शिकायत प्रणाली दुरुस्त होगी!! कभी तो शिकायतों पर कार्यवाही होगी। देखो कब आते है अच्छे दिन। …………………

जब से दादी गुजर गयी .....

ना गाँव के उस घर,
ना उस पुस्तैनी जमीन,
में बात कुछ रही
जब से दादी गुजर गयी

यूँ करवट बदली समय ने
एक ही आँगन में पले रिश्ते
आँच में मक्के की तरह
दूर-दूर छिटकते रहे

हको-हुकूक की लड़ाई
घर से निकली
पेड़ो,खेतों,खलिहानों
तक चली आयी

वो घर की दीवारे
जो सदियों से चली आयी है
हम सब का साथ निभाती
वो दीवारे जो कभी कभी
पूछ लेती थी मेरा हाल
अब खमोश रहती है
बोल नहीं पाती!!
शायद टूटते बिखरते
रिश्तो को ना समेट पाने की
गरज में ग्लानि से भर चुकी है
और खामोश रह कर ही
अपना आक्रोश अपना रोष
जाहिर कर रही कर रही है।

वो दादी ही थी जिन्होंने
कई बातों का हवाला देकर
बाँध रखा था सभी को
पर ना पकड़ कोई रही
जब से दादी गुजर गयी।

अपनों के हाथ में खंजर देखा है ....

कभी कभी ऐसा भी मंजर देखा है
अपनों के हाथ में खंजर देखा है

लहलहाती थी प्यार की फ़स्ल जहाँ
उसी जमीन को आज बन्जर देखा है

लुट गये अहसास और जज्बात रिश्तों से
हर दिल में हमलावर सिकन्दर देखा है

ये इंसान की ही कारस्तानी है वो जो
आसमाँ में उठा हुआ बवन्डर देखा है

वक्त ही कभी कभी करता होगा मजबूर
मैंने दरिया में सिमटता समन्दर देखा है


Kabhi kabhi aisa manzar dekha hai
Apno ke haath me khanjar dekha hai

Lahlahati thi khushiyon kee fasl jahan
Us jameen ko banjar dekha hai

Lut Gaye ehsaas aur jajbaat rishto se
Har dil me hamlawar sikandar dekha hai

Ye insaan ki hi karastaani hai wo jo
Asmaa me utha huya bavander dekha hai

waqt hi kabhi kabhi kar deta haga majboor
Dariya me simatta samandar dekha hai 

रामपाल का राजद्रोह: भास्कर की सम्पादकीय के जवाब में .....

आज दैनिक भास्कर की सम्पादकीय पढ़ रहा था। कल्पेश यागनिक जी द्वारा प्रस्तुत, कथित संत रामपाल के मुद्दे पर विचार व्यक्त कर रहे थे कल्पेश जी। उनका दृष्टिकोण क्या था? निन्दा का,आलोचना का,समीक्षा का ये सम्पादकीय पढ़ कर पता नहीं लगा! पर एक बात साफ़ थी कि उन्होंने हरियाणा पुलिस और मुख्यमंत्री की मनोहर लाल खट्टर पर जमकर हमला किया। ना जाने क्यों ऐसा लगा की जिसकी प्रसंशा होनी चाहिये उनकी निन्दा टाइप हो रही है। बरवाला में लगातार बढ़ता पुलिस बल क्या आगे कदम बढ़ाते जाने का संकेत नहीं था? जब एक तरफ 40 हज़ार का पुलिस बल और दूसरी ओर संत और उनके समर्थक बच्चे और महिलाये और उनकी सेना हो तो पुलिस के पास क्या विकल्प हो सकते थे? गाँधी जी के देश में क्या आप हज़ारों लोगो पर गोली चलाने का आदेश दे सकते थे? बातचीत के रास्ते समाधान निकालने की कोशिश गलत तो नहीं कही जा सकती!! देर आये दुरुस्त आये!! पुलिस हमलावर होती तो कई जाने जाती दोनों तरफ से। क्या वो अच्छा होता? कुछ गुमराह भक्त पुलिस की गोली से मारे जाते तो क्या वो लोकतन्त्र को शर्मशार नहीं करता?

देश के संविधान का मानना है कि यदि न्याय व्यवस्था 100 दोषी छूट जाये तो कोई बात नहीं किन्तु एक निर्दोष को सजा नहीं होनी चाहिये। तो हरियाणा सरकार संविधान के अनुरूप ही तो चल रही थी। फिर दोष मढ़ने का अवसर कैसे  मिल गया ? पुलिस संत से डर रही थी ऐसा कभी नहीं लगा, चण्डीगढ़ के अखबारों का तो कम से कम यही मानना था। पुलिस महिलाओं और बच्चों के लिये चिन्तित जरूर थी, और होना भी चाहिये था। संत और उसके समर्थको को अनन्तः तोड़ दिया गया ना। ये काम लाशों के ढेर गुजर कर होता तो क्या हम और मीडिया वाले जलियाँ वाले बाग़ काण्ड का उदहारण ना देते! हरियाणा पुलिस पर जनरल डायर होने का लेवल चस्पा नहीं होता। क्या हम इसे लोकतन्त्र पर कालिख ना बताते? एक हठधर्मी अपराधी को पकड़ने के लियें क्या पुलिस दुधमुँहो की लाशों से गुजर जाते? कुछ अन्य अखबारों ने पुलिस का ऑपरेशन शुरू होने पर ये भी लिखा था की पुलिस महिलाओं पर बर्बरता की। ये तो जी वो वाली बात हो गयी की चिट भी मेरी और पट भी मेरी। कुछ भी गाली तो पुलिस और मनोहर लाल खट्टर साहब को निकालनी ही है। कभी भयातुर बता कर कभी अपराधियों का संरक्षक बता कर। अजी बर्बरता देखनी है तो जी इराक को देखिये, सीरिया को देखिये महिलाओं के साथ जबरदस्ती देखिये और अमरीकियों के काटते हुये सर देखिये।
साभार : दैनिक भास्कर

रामपाल ने सेना बनायीं सेना पुलिस से टकरायी अगर बात केवल इतने तक सीमित होती तो सेना भी लगायी जा सकती थी। बराबर का मुकाबला भी हो सकता था। पर बात महिलाओं और बच्चों पर आकर टिक जाना स्वाभाविक था। कहने जो बड़ी बड़ी बातों से मैं अपने कथन का समर्थन सकता हूँ कह सकता कि हम उस देश के है जहाँ पितामह भीष्म पैदा हुये जान दे दी पर स्त्री पर अस्त्र नहीं उठाये . पर बेहतर वही होता है जो समय की नज़ाकत को देखते हुये किया जाय, ना की जोश में कोई गलती की जाय!! और शायद इसी को बुद्दिमत्ता कहते है। पुलिस ने सार्थक प्रयास किये, प्रसंशा बनती है हर समय गाली निकलना ठीक नहीं होता। क्यों की किताबी बातें अलग है और धरातल का सच अलग। ४० हज़ार पुलिस के जवान जब एक जगह रुकते तो उनको पाँच सितारा होटल नहीं मिलता। खुला आसमान ही साथी है। विकट परिस्थितियों में किये गये ऑपरेशन संत को मुबारकबाद देनी बनती नहीं। वेलडन हरियाणा पुलिस वेलडन मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी !! उँगलियाँ देश के हर नेता पर उठती है क्यों कि लोकतन्त्र हक़ देता है विचार व्यक्त करने का। आपने निर्णय लिया और कथित संत को धार दबोचा ये अच्छा था। वो कहते है ना की "अन्त भला तो सब भला!!!"

व्यंग: बरवाला के पेट्रोल बम वाले सतलोकी संत ...........

अमूमन सुबह के पहर में मद्धिम रफ़्तार से चलने वाला शहर चण्डीगढ़ आज सुबह कमोवेश रुक ही गया था। दिल्ली के रास्ते चण्डीगढ़ आने पर चण्डीगढ़ की सीमा से लगा ओवरब्रिज पर आधे रास्ते तक जाम की स्थिति में था कदम-कदम बढ़ना माउंट एवेरेस्ट चढ़ने सरीखा था । ऊपर से बेताब कारसवार, यमराज स्वरुप हरियाणा रोडवेज की बसे,घड़ी-घड़ी पी-पी पो-पो कुल मिला कर चिल्ल पो किये पड़े थे। जल्दी सबको थी पर कुछ ज्यादा ही जल्दी में थे। बैटमैन बन कर उलटी दिशा में ही गाड़ी मोड़ कर चलने लग गए। खैर रेंगते-रेंगते जब चण्डीगढ़ की सीमा में प्रवेश किया तो भारी भरकम पुलिस बल, दंगा नियंत्रक वाहन, फायर ब्रिगेड, महिला पुलिस की एक बड़ी टुकड़ी कतार में थी कुछ छोले कुलचे खा रहे थे तो कुछ की सुबह अलसायी हुयी सी लग रही थी मानो किसी में जबरदस्ती जगा कर खड़ा कर दिया हो। पर दण्डो के सहारे ही सही खड़े तो थे ही। नज़ारा कुछ यूँ था जैसे स्कूली बच्चो को डॉट कर अनुशासन का पालन करने की हिदायत दी गयी हो। वो बस ले दे कर कर रहे हो। अखबार कहता की आज चण्डीगढ़ के हर प्रवेश द्वार पर कुल मिला कर ५ हज़ार पुलिस वाले थे। यानी चप्पे-चप्पे पर पुलिस। सेक्टर-26 के पास उत्तर-मार्ग से लगी बापूधाम कालोनी के पास भीषण पुलिस बल था यहाँ संत के ज्यादा समर्थक पाये जाते है। नाले के पास बैठे कुर्सियों का जुगाड़ कर बैठे कुछ पुलिस वाले अलाव सा ताप रहे थे।

वास्तव में आज चण्डीगढ़ से शुरू होकर पास के इलाके बरवाला तक मेला लगा था। मेला बच्चों का नहीं था, मेला बड़े खिलाडियों का था। अपने करतब के लिये मशहूर, भगवान के साथ सीधे हॉटलाइन पर रहने वाले एक महान संत का मेला था ये पेट्रोल बम वाले संत है । मेला कई दिनों से चल रहा है। संत मानवरूप में जन्मे है फिर भी कोई कानून कोई न्याय व्यवस्था उन पर हाथ डाले ये उन्हें नागवार गुजरता है। वो कभी अस्पताल में भर्ती हो जाते है तो कभी उनके समर्थक किलेबन्दी कर भगवान रुपी संत के लिये जान देने की बात करते है। वो जहाँ रहते है उसे सतलोक कहते है। सतलोक में महान संत के सिपाही कानून से टकराने को हथियार बन्द खड़े है। पेट्रोल बम भी है उनके पास। पर सब से बड़े और अचूक बम है बच्चा और महिला बम जो प्रवेश द्वार तैनात है। बिना रुके बिना थके संत लगे है। ४० हज़ार पुलिसकर्मी अपने आकाओं के आदेश के इंतज़ार में बहार चौपाल लगाये है। नेता जी संत से बात करने की कोशिश में लगे है। पर पेट्रोल बम और स्वयं भू सेना वाले सतलोक वाले संत की मानते ही नहीं। सारा प्रशासन एक टाँग खड़ा तपस्यारत है और भगवन है की मानते नहीं। संत रुपी भगवन का प्रकोप, संताप चण्डीगढ़, हरियाणा और पँजाब की आम जनता झेल रही। संत सामने सब नतमस्तक है। हे संत दयावन्त लाज रख लो हमारे कानून की। बखिया मत उधेड़ो। जज साहब बहुत नाराज़ है। एक बार जो धर लिया तो साहब सालों -साल जमानत नहीं होगी .

एक आसराम भी थे, जमानत नहीं हुयी २ साल होने को आये। पुराने गड़े मुर्दे हर आश्रम में खोद रही है पुलिस। आगे भी खोदती रहेगी। सहारा भी बन्द है, जमानत नहीं हुयी. ध्यान रहे आप पेट्रोल बम वाले संत सही पर जन्म तो इन्सानी रूप में ही हुआ है जी। नाक चबाने पड़ेंगे जब अदालत के दरवाजे पर जायेगे तो। वक्त हमेशा एक सा नहीं रहता। कल जब सतलोक में खाद्य और रसद खत्म ओ जायेगा तो कहाँ जाओगे। २१ नवम्बर मोहलत है जी इज़्ज़त बचा लो। नहीं  पेट्रोल बम फटता है तो धूल सा ही हो जाता है। कानून  लम्बे हाथ कब कान के नीचे आ जाये पता ही नहीं चलेगा जी आप को। बाल हठ छोड़ो मान जाओ जल्दी से ऑटो पकड़ अदालत चले आओ। 

वक्त की अपनी रवानी है .......

वक्त गुजारिश नहीं सुनता
वक्त सिफारिश नहीं सुनता
वक्त ख्वाहिश नहीं सुनता
वक्त गुन्जाईश नहीं सुनता
वक्त फरमाइश नहीं सुनता
वक्त ना धर्म सुनता है
वक्त ना पन्थ सुनता है
वक्त की अपनी रवानी है
ना उसका कोई सानी है
वक्त सुनता है तो
केवल कर्म सुनता है
वक्त चुनता है तो केवल
मेहनत का हमसफ़र चुनता है।

व्यंग: यमराज आज कल कहाँ है?

यमराज आज कल कहाँ है? पाकिस्तान दौरे पर या इराक और सीरिया के दौरे पर या फिर थोड़ा इधर थोड़ा उधर। या फिर यमराज का भैसा वाघा सीमा पर और खुद इराक सीरिया की सीमा पर!! मन संसार के मैप पर इधर-उधर भागता है। बड़ा तगड़ा मैनेजमेंट है यमराज जी का सब तरफ समेटे पड़े। पाकिस्तान में जगह-जगह लंगर फेक रखा और जैसे ही मौका मिलता है वैसे ही ऊपर खीच लेते है। एक ही झटके में एक ही फटके में। हालाँकि मानवता दुखी होती पर क्या करे यमराज जी का अपना पेशा है। सुना है की यमराज का अगले पूरे साल तक अपॉइंटमेंट इराक के बगदादी ने बुक कर रखा है।

कुछ लोगो का मानना है की जी यमराज ने एक लोगो की देखा देखी एक ऑउटसोरर्सिंग कम्पनी खोली है। अपने यमदूत पाकिस्तान और इस्लामिक स्टेट्स के कब्जे वाले देशो में कॉन्ट्रैक्ट पर दे रखे है। 24X7 वाली नौकरी है, ग्लोबल डिलीवरी मॉडल को फॉलो करते है सारे के सारे यमदूत। हर उस जगह जहाँ हँसी और ख़ुशी, चहल-पहल देखते है वहीं यमदूत काम पर लग जाते है। वैसे तो यमदूतों की नौकरी लगभग परमानेंट है टाइप की है। पर कभी कभी डेपुटेशन पर भी भेजे जाते है ये लोग। अमेरिका और भारत जैसे देशो में।

हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर .......

करा ले अपना बीमा 
जिसकी हो अधिकतम सीमा
मनाये अपनी खैर 
करे उत्तर प्रदेश की सैर 
अपनी किस्मत आजमाईये जरूर 
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर 

ना जाने कौन सी बस 
यमलोक के दर्शन करा दे 
या बस स्टैण्ड की सड़ान्ध 
आपके होश उड़ा दे
एक बार यमराज से टकरायिए जरूर 
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर

आपके खर्च हो जाने में 
ज्यादा समय नहीं लगेगा 
बीमा सेटल होते ही परिवार 
का भाग्य जरूर जागेगा 
करोड़पति बन कर दिखाईये जरूर
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर 

होकर जहरखुरानी के शिकार 
पाये बीमा सेटलमेंट की सम्भावनाये अपार
एक बार व्यवस्था से टकराये
अपनी मिट्टी पलीद कराये
किस्मत की ओर कदम बढ़ाये जरूर 
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर 

उड़ती धूल और गर्दो गुबार 
ढेर सारा कचरा और शहर बीमार
जगह-जगह सीवर का गुबार
हर शाम मादा एनफिलीज से 
इश्क़ फरमाये जरूर 
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर 

छोड़ कर अपना अभिमान 
ताक पर रख कर अपना ज्ञान 
खुले में लघु और 
दीर्घ शंका निपटाये जरूर 
एक बार गंगा नहाये जरूर 
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर 

हर गाडी में सत्ता धारी झण्डा 
बेतरतीब चलता पुलिसिया डण्डा 
खुला घूमता हर मुस्टण्डा
केरोसिन मिला पेट्रोल डलवाये जरूर
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर
हुज़ूर, एक बार उत्तर प्रदेश आईये जरूर।।

-------निवासी कानपुर उत्तर प्रदेश-----------

मुझे सेक्युलर बना दिया

पहले कुरान
फिर अजान
फिर ओम-ओम का उच्चारण
फिर सुन्दर काण्ड व्याकरण
कि  भैया  रेल सफर में
अलग-अलग लोगो ने 
अपने मोबाइल से
मुझे जाने क्या-क्या सुना दिया
विविधता  का आइना दिखा दिया
सोने  से पहले जबरन नींद उड़ा कर
सुबह - सुबह  जल्दी जगा कर
धार्मिकता का भोग लगा दिया
एक राष्ट्रवादी को
धर्मो में फँसा दिया
मुझे सेक्युलर बना दिया

कविता: तन पे कपड़े हो नाप भर

तन पे कपड़े हो नाप भर
पेट में भोजन खुराक भर
सर्दी में नींद रात भर
गर्मी में छाँव खाट भर
खुशियाँ छटाक भर
मन में तेरी छाप भर
जीने को जिन्दगी दो चार पल
बस इतनी सी है इल्तजा है प्रभु अब की मर्तबा।