बेसबब फस गया दुनियादारी के फेर में, वो बचपन वाली आवारगी भली थी


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बेसबब फस गया दुनियादारी के फेर में
वो बचपन वाली आवारगी भली थी

सब माटी के खिलौने थे कुछ भी उकेर लो
पत्थर की दुनिया में वो जिन्दगी भली थी

ना बुतो की, ना मस्जिद की मजारों की
बस माँ बाप की ही बन्दगी भली थी

इन्सान को समझना समझ का फेर था
वो गुड़िया और गुड्डो की दिल्लगी भली थी

दुनिया की आपाधापी में चैन ना मिला
वो माँ के ही आँचल की छाँव ही भली थी

उम्र लग जाती है दोस्त बनाने में, दुश्मनी पल भर की पैदाइश होती है ......


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उम्र लग जाती है दोस्त बनाने में
दुश्मनी पल भर की पैदाइश होती है

रिश्तों में दरारें मुमकिन है, जब 
अपनों से जोर-आजमइश होती है

ना टूट जाये छोटे से अहम पर
देख लो, हर रिश्ते में गुन्जाईश होती है
 
कभी-कभी झुक जाना भी बेहतर
शान तो हर किसी की ख्वाहिश होती है

मेहनत की आग में जलना ही होता है
सिर्फ दुआयों से ना पूरी फ़रमाईश होती है

हर चीज का है दाम यहाँ, पर हम नहीं बिके

उस शख्स के नाम समर्पित जो अपनी बेटी के रसूखदार हत्यारों से लड़ रहा पिछले दो सालो से। साथ कोई नहीं दे रहा पर मुझ जैसे कई है जो केवल सहानुभूति देकर अपनी जिम्मेदारियाँ हर जगह हर चीज में खत्म मान लिया करते है। ये पंक्तियाँ है देश की कार्यपालिका और न्यायपालिका से जूझते लड़ते बूटी राम के नाम। उनका संघर्ष इस लिये और बाद जाता है चूकि विधायिका में विदयमान कुछ लोग की हत्यारे की भूमिका में है। सो वास्तव में ये लड़ायी कार्यपालिका विधायिका और न्यायपालिका तीनो से। उनके असीमित संघर्ष के नाम कुछ पंक्तियाँ। बूटी राम की बेटी की कहानी


हर चीज का है  दाम यहाँ
पर हम नहीं बिके

राहें थी तमाम मगर
राह सच की चले

साथ ही थी ख्वाबगाह
पर दुःख से गले मिले

थे तमाशबीन बहुत मगर
वो हम ही थे जो जले  

सदियों से चले आये है
ये सितम के सिलसिले

बस कुछ लकीरों थका दिया
यूँ झेले थे हमने भी जलजले

दुनिया बड़ी ख़राब है
एक हम ही है भले।

सब बरी हो गये!! तो ज्योति को किसने मारा?

जब मीडिया में हिन्दी फिल्मों में किसी को ये कहते सुनता हूँ कि उसे "कानून व्यवस्था और न्यायपालिका पर पूरा भरोसा" तब - तब ये एहसास दिल में घर किये रहता है की ये जो बोला जा रहा है वो एक मानसिक दवाब में बोला जा रहा है। आदमी व्यथित हो पीड़ित हो फिर भी अगर उसे जीना है तो वो बागी नहीं हो सकता। जो बागी हो जाते है पूरा तन्त्र और व्यवस्था उनके विरुद्ध खड़ी हो जाया करती है। भारत देश में न्याय बेहद खर्चीला, थका देने वाला और दुर्लभ है। आशाये निराशा में बदल जाया करती है। पीड़ित की तमाम उम्र इन्तज़ार में , पीढ़िया बदल जाती है पर न्याय मरीचिका के मानिन्द बस अब मिलता तब मिला वाली स्थिति को दर्शाता रहता है। पर न्याय कहाँ मिलता है कैसे मिलता है ये जग जाहिर है!!! न्याय के मामले में कई वर्जनायें टूट जाया करती है कई मान्यताये मिट जाया करती है। इन्सान कुपित हो हो जाता है और इन्सानियत हतप्रभ!! ये हमारे देश का सच है, बेहद कड़वा सच। कानून सब के लिये बराबर नहीं होता ये एक व्यवहारिक सत्य है, असंख्य उदहारण उपलब्ध है। कानून सब के लिये बराबर होता है ये मात्र किताबी सच हो सकता है। जमीन पर हकीकत जुदा है। याद कीजये  "रुचिका गेहरोत्रा" के साथ हुये अन्याय को! उसके परिवार के साथ हुये दमन को। अगर आपने इस केस के बारे में नहीं सुना तो पढे जरूर विकिपीडिया में जानकारी उपलब्ध है। यकीन मानिये न्याय और कानून दोनों कटघरे में खड़े मिलेंगे। याद कीजिये उस सच के पहरुये सत्येन्द्र दुबे को जिसे सच की कीमत जान देकर चुकानी पड़ी थी। देश का मीडिया उनको शहीद बताता है और भारत की कानून व्यवस्था उन्हें भोर के लुटेरो का शिकार बताती है। ऐसे अनगिनत केस है जो आपके समक्ष उदाहरण के तौर पर रख सकता हूँ।

हाल फिलहाल में हुये एक केश के बारे में चर्चा करते है। ज्योति हत्याकाण्ड, हरियाणा के पंचकूला शहर में एक महिला का मृत शरीर मिला, चेहरा कुचल दिया गया था। जाँच हुयी हत्या की आशंका के साथ, हिमआँचल के पुस्तैनी विधायक जी का नाम सामने आया। गिरफ्तारियाँ भी हुयी, विधायक जी, उनका ड्राइवर कई रिश्तेदार धरे गये। ये केस सोनी चैनल पर धारावाहिक क्राइम पेट्रोल में भी प्रसारित हो चुका है। मुद्दा हाईप्रोफाइल लोगो से जुड़ा हुआ है। चण्डीगढ़ के आस पास के इलाकों में ये घटना रह-रह अखबारों के मुख्या पृष्ठ पर जगह बनाती रही है। इस केस के शुरू में हरियाणा पुलिस ने जिस तत्परता से कार्यवाही की थे वो सराहनीय थी किन्तु बाद में पुलिस वाले बदले शायद और पुलिस की नीयत ये केस अदालत में औंधे मुँह गिर पड़ा।


एक हत्या हुयी निर्मम हत्या!! जिन पर आरोप लगा वो सब के सब बरी हो गये। पर सवाल कायम रहा की वो जो हत्या हुयी थी उसमे हत्यारा था कौन ?? जब दोषी निर्दोष है तो दोषी है कौन। न्याय व्यवस्था ने दोषियों को निर्दोष कह दिया तो क्या उसे ये सुनिश्चित नहीं करना चाहिये था की दोषी कौन है? किसी ने तो हत्या की ही थी, उसे कौन पकड़ेगा?? क्या पुलिस और न्यायलय दोनों मिल कर सच को झुठला सकते है??? सवाल बहुत है जवाब कहीं नहीं। वैसे जवाब हो भी सकता है अगर आप इस सच को स्वीकार करे की "जिसकी लाठी उसकी भैंस" 

ज्योति के पिता बूटी राम को धमकियों और पप्रलोभनों का सिलसिला पिछले १९ महीनो में कई बार अखबार की सुर्खियाँ बना। पुलिस कई बार सक्रिय हुयी पर नीयत  सवालो के घेरे में रही। बूटीराम मुकदमा लड़ते रहे ये उनका साहस था। आर्थिक रूप से बेहद कमजोर व्यक्ति एक पुस्तैनी विधायक के सामने डटा रहा  सराहनीय है। पर जीत पाया ये दुखद है। इस केस में कई पहलू सवालो के घेरे में रहे। इसमें पुलिस के बड़े अफसरों से लेकर ज्योति का गर्भपात करने वाली डॉक्टर तक सभी संदेह के घेरे में रहे। जो चार्जशीट में पुलिस ने लिखा वो सब बाद में झुठला दिया गया। 
गैर कानूनी तरीके से गर्भपात करने वाली डॉक्टर के पर कोई मुकदमा भी दर्ज नहीं हुआ। पुलिस का कंप्यूटर जल गया इस लिये कॉल रिकॉर्ड गायब हो गये ऐसा कहा गया। जाहिर है की टेलीकॉम सर्विस प्रोवाइडर के पास तो रिकॉर्ड तो अभी भी होगा उसकी याद ना अदालत हो आई और न पुलिस को :)
सोनी में प्रसारित धारावाहिक को देखे और और नीचे चस्पा दैनिक भास्कर की खबरों पर सिलसिलेवार नज़र डाले। यकीन नाम की कार्यपलिका और पुलिस के गहरे गठजोड़ का, एक दूसरे को फायदा देने के खुलासा हो ही जायेगा। 
विधायक जी बरी हो गए
पुलिस की भूमिका पर उठे बहुत सारे सवाल जिनका जवाब कोई नहीं दे सकता
चार्ज शीट में भी की गयी थी हेराफेरी
सर्विस प्रोवाइडर के पास होता है हर रिकॉर्ड , खास कर जब मामला पुलिस में हो 

14 सितम्बर, हिन्दी दिवस: हिन्दी है हम सब की पहचान, बहुत जरूरी हिन्दी ज्ञान

हिन्दी है हम सब की पहचान, बहुत जरूरी हिन्दी ज्ञान

हिन्दी भावो की भाषा है
हिन्दी संस्कृति की परिभाषा है
हिन्दी मन की जिज्ञासा है
हिन्दी भारत की अभिलाषा है
हिन्दी है भारत का सम्मान

हिन्दी है हम सब की पहचान, बहुत जरूरी हिन्दी ज्ञान 

हिन्दी एक विधा है ऐसी
बिलकुल मधुरस के जैसी
हर रिश्ते के बन्धन जैसी
फूल में पराग कण जैसी
बहुत जरूरी हिन्दी उत्थान

हिन्दी है हम सब की पहचान, बहुत जरूरी हिन्दी ज्ञान  

हम सब कर ले संज्ञान
रहेगी तब तक ही पहचान
सलामत तभी भारत का मान
गर बने हिन्दी अभिमान
हिन्दी हो बस एक जुबान

हिन्दी है हम सब की पहचान, बहुत जरूरी हिन्दी ज्ञान
साभार: गूगल

पाकिस्तान का लोकतन्त्र और उसके मायने

फिसले कुछ दिनों के अखबारों पर नज़र डाले तो तो पाकिस्तान की खबरें आपका ध्यान आकर्षित जरूर करेगी। शायद ये सवाल भी आपके जहन में उठे की क्या पाकिस्तान में लोकतन्त्र है? और है तो कैसे और कहाँ। इतना सवालिया सा क्यूँ है? लोगो का राज, लोगों के लिये और लोगो के द्वारा!!!! फिर सेना बीच में कहाँ से आ जाती है। या फिर गुजरे समय में लोकतन्त्र ने खुद को पाकिस्तान के हिसाब से ढाल लिया है। पिछले कुछ समय से पाकिस्तान में जो चल रहा है वो अजीबो-गरीब है। ऐसा दुनिया के दूसरे लोकतान्त्रिक देशो में अमूमन नहीं होता। और ना ही ये व्यवहार स्वस्थ्य लोकतन्त्र का परिचायक है। लोगो का हिंसक धरना प्रदर्शन, सेना का रवैया अपनी ढपली अपना राग वाला। क्या यही वो जिन्ना के सपनो का वो पाकिस्तान है जिसमे हर धर्म जाति के लोगो को सामान अधिकार देने की बात की गयी थी। क्या यही वो सम्प्रभु पाकिस्तान है जिसके लिये भारत के दो टुकड़े किये गये थे। लाखो लोगो का खून बहा था लाखो को अपना पुस्तैनी घर बार छोड़ना पड़ा था। यूँ कहे दिल बटे थे। पर अफसोस खून बहना बन्द नहीं हुआ। पहले बँटवारे की नाम पर अब काश्मीर और इस्लाम के नाम पर। जहाँ तक मेरी जानकारी है आज भी भारतीय मुसलमानों को पाकिस्तान में मुहाजिर कहा जाता है। ये जिन्ना के सपनो का पाकिस्तान तो कतई नहीं। न ही लोकतन्त्र।














पाकिस्तान में लोकतन्त्र का संघार बार-बार होता आया। ये कहना शायद गलत नहीं होगा कि पाकिस्तानी लोकतन्त्र खूनी लोकतन्त्र बन चुका है। भाषाओं और परिभाषाओं की कल्पना से परे,जो आज प्रधानमन्त्री है वो कल जेल में होगा या देश से उसे भागना पड़ेगा फिर फाँसी पर लटका दिया जायेगा ये तो शायद नास्त्रेदमश भी न बता पाये। पाकिस्तान के वर्तमान प्रधानमन्त्री नवाज शरीफ भी एक अरसे तक निर्वाषित रहे है। दूसरे देशो में शरण ली है। ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो २ बार प्रधानमन्त्री और एक बार राष्ट्रपति रहे पर अंतःत खुद को फाँसी नसीब हुयी। उनकी बेटी बेनज़ीर की हत्या भी एक राजनीतिक साजिश की ओरे इशारा करती है। सेना के शासक परवेज़ मुसर्रफ के हालात सबको पता है। पाकिस्तान की सेना ने अब तक तीन बार तख्ता पलट किया है। जाहिर है की कई बार ऐसी स्थिति और बनी है। तात्पर्य ये है की लोकतन्त्र हर बार पानी माँगता रहा है। जो बोया वहीँ काटना होगा ये कहावत यहाँ चरितार्थ होती है। पाकिस्तान की सरकारे बस भारत विरोध के आधार पर चलती नज़र आती है। कभी सीमा में दहसतगर्दों को भेज कर कभी सेना के माध्यम से भारत विरोध के नाम पर हिँसा करना। पाकिस्तान में व्यवस्था गड़बड़ाती है तो सीमा पर गोलीबारी शुरू हो जाती है। विकास इत्यादि की बातें इनके लिये बेमानी है। ये अफ़सोसजनक है की पडोसी राज्य लोकतान्त्रिक होते हुए भी भटकाव का शिकार है, कट्टरपन्थियों का ठिकाना बना हुआ है। शासन प्रधानमन्त्री नहीं सेना चलाती है। बीते वर्षो में ओसामा बिन लादेन जैसा आतन्कवादी पाकिस्तान की शरण में पाया गया। हालाँकि की  मारे जाने तक सरकार इस बात से इन्कार करती रही की ओसामा पाकिस्तान में है। दाऊद इब्राहिम की मामले में भी कुछ ऐसा ही है। मुम्बई के ताज होटल काण्ड में भारत के सबूत पाकिस्तान के लिये नाकाफी रहे। न जाने क्यों??

खुद पाकिस्तान भी आतन्कवाद की आग में झुलसता नज़र आ रहा है। आये दिन होने वाले फिदाईन हमले सैकड़ो लोगो के लिए प्राणघातक बने और हज़ारो के लिये शान्तिघातक। पता नहीं पाकिस्तान में कौन शान्तिपूर्ण और सुखद जीवन गुजार रहा होगा? साँप और सपेरे की कहानी से बेहद मेल खाने वाली कहानी आतन्कवाद और पाकिस्तान की। गलबहियाँ करते-करते कब खुद एक दूसरे लिये घातक हो गये ये बात खुद पाकिस्तान को पता नहीं चली। काश्मीर की रट लगाये पाकिस्तान काश्मीर के चक्कर में वो खुद खात्मे की कगार पर आकर खड़ा हो गया है। आये दिन के फिदाईन हमले, बेहद ही महत्व पूर्ण संस्थानों पर लगातार हमले इस बात के संकेत है की पाकिस्तान की व्यवस्था चरमरा चुकी है और सत्ता के कई केन्द्र चल रहे है। वो दिन दूर नहीं लगता जब परवाणु ताकत होने का दम भरने वाले पाकिस्तान के यही ताकत उसके लिये काल बन जाये। पाकिस्तान की हालत इस बात का भी संकेत है की दुसरे की सुख शान्ति पर बुरी नज़र रखना और प्रायोजित आतन्कवाद को बढ़ावा देना कभी किसी भी हालात में बेहतर नहीं हो सकता। जहाँ एक ओर लोकतन्त्र पर बड़ा खतरा और इसके बड़े निहित नुकसान है ना विकास की बात होती न शिक्षा की और न बेहतर जीवन की। सेना का हस्तक्षेप पडोसी देशो से सम्बन्धो को केवल बिगाड़ने का काम ही करेगा। बेहतर होता की पाकिस्तान इस बार को समझ पता है और अन्य देशो की तरह एक बेहतर देश और एक बेहतर पडोसी बन पाता।