रुपये में रोता ना गाँधी नज़र आया ....

किसी को मार कर लूट ले गया वो
रुपये में रोता ना गाँधी नज़र आया

दौलत की चाह है, ना मिटने वाली
हर कोई उसी पे परवान नज़र आया

रिश्ते हो गये है कैद तिजोरियों में
इन्सानियत से घमासान नज़र आया

उस शहर में भूख से मर गया कोई
जहाँ हर शख्स धनवान नज़र आया

मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे है बहुत
पर ना कोई भगवान नज़र आया

कहने को बर्फ सी तासीर है जिनकी
हर जलता हुआ शोला वहीँ नज़र आया

यूँ चर्चे तो बहुत थे उनके शहर के
नज़र गयी जहाँ, शमसान नज़र आया

 ------विक्रम-------------------



तलाश जारी है, खोज जारी है।

आधुनिकता की होड़ में
जीवन की अन्धी दौड़ में
रोज-रोज की आपाधापी में
मेरा चैन, फुरसत के पल
कहीं खो गये है, कहीं खो गये है !!
तलाश जारी है, खोज जारी है।

भौरों के मधुगुंजन में
तितलियों के व्यंजन में
हर फूल हर कली में
हर पेड़ की डली में
हर सुर, सरगम में

मन्दिर में, मस्जिद में
गिरिजाघर, गुरूद्वारे में
हर पुजारी की पूजा में
हर उपन्यास, उपनिषद् में
हर पंचायत हर परिषद में

किताबों में,  कहानियों में
गायकों की जुबनियो में
रंगमंच की अदाकारी में
नदियों की कल-कल में
पक्षियों के कलरव में

हर तरह के ऋतुओं में
पतझड़ में बहारों में
ग्रीष्म की दोपहरों में
हर गाँव, हर चौबारे में

जुगनुओं की टिमटिम में
पानी की रिमझिम में
खेती की फसलों में
हर किस्म की नस्लों में

हर जगह तो खोजा 
पर लापता है बस
तलाश जारी है, खोज जारी है।

उन्हें जेहाद करनी है, हमे इन्सान बनना है।

हमारा इन्सानियत से रिश्ता पुराना है
हो हालात कैसे भी, हमे ही निभाना है।

खौफ का मंज़र है, दिल में जज्बा है मगर 
वो दर्द देते देते है, हमे मरहम लगाना है। 

कुछ कदम पीछे हट गये है हम तो क्या
उन्हें जेहाद करनी है, हमे इन्सान बनना है।

दिल हमारे डूबे है मुहब्बत में, हम दूत है
उन्हें उन्माद करना है, हमे सौहार्द लाना है।

एक छत के नीचे रह सके मजहब सभी
हमे ऐसा एक खुशनुमा मौसम बनाना है।

ठोकरों से सम्भल पाये या कि गिरे हम
उन्मुक्त होकर के जिये यही तमन्ना है।

-------- विक्रम -----------

आज चलते है कल मिलेंगे, फूल बन कर जब खिलेंगे।

आज चलते है कल मिलेंगे
फूल बन कर जब खिलेंगे।

राह में देख मील का पत्थर
थके कुछ मुसाफिर फिर चलेंगे।

आँधिया आती है आएगी हमेशा
काफिले परिन्दों के फिर उड़ेंगे।

आ गये जो दूर तक कर के हौसला
बची बाकि सीढ़िया वो ही चढ़ेंगे।

फिर उगेगा भोर का सूरज यहाँ
पत्थरो पर एक इबारत हम लिखेंगे।

इस इश्क़ ने कुछ यूँ बरपाया है कहर मेरे शहर में, बर्बाद है, नौजवान हर घर के

जो बेसमय इश्क़ में पड़ लिया करते है बस उनके लिए पेशे खिदमत है .............

वो  रोग नहीं है ये इश्क़ है यारो
लोग जिये जाते है बस मर मर के।

इस इश्क़ ने कुछ यूँ बरपाया है कहर
मेरे शहर में, बर्बाद है, नौजवान हर घर के।

जो खुद करते रहे है बस फाकामस्ती
इश्क़ में दिखलाये है ख्वाब संगमरमर के।

जिन्हे इश्क़ ने आगोश में लिया यारों
वो खा रहे है ठोकरे दर-दर बदर में।

बस हो गये दिलवालिया समझो
जो निकल पड़े इश्क़ के सफर में।

रोटी कपडा और मकान। रूपये 49 में सारा सामान।

इन्सान नहीं संसाधन हूँ।           
विकासमार्ग का प्रतिपादन हूँ।

रोटी कपडा और मकान। 
रूपये 49 में सारा सामान।
पेट नहीं पूरा भर पाता हूँ।
सरकार कहे के मैं धनवान।
         बस खालिश आँकड़ो सम्पादन हूँ।
         इन्सान नहीं संसाधन हूँ।

नोट नहीं हूँ फिर भी धन हूँ।
खुद तो मैं बेहद निर्धन हूँ।
शख्स नहीं मै क्रन्दन हूँ।
मोल तोल  का बन्धन हूँ।
           कठिन राह का अभिवादन हूँ।
           इन्सान नहीं संसाधन हूँ।           

एक ईमारत गगन चूमती।
मेरी मेहनत का परिणाम।
सड़क किनारे जीवन मेरा।
सड़क किनारे ही सामान।
       बस अनचाहा सा उत्पादन हूँ।
       इन्सान नहीं संसाधन हूँ।

है मेरा भी हिन्दुस्तान
है मेरा भी एक भगवान
है मेरा भी एक सम्मान
पर बचा नहीं मुझमे इंसान
        निष्ठुर से कर्तव्यों का बचा खुचा निष्पादन हूँ।
        इन्सान नहीं संसाधन हूँ।

 --------- विक्रम ----------------

कोहिमा भारत में है, सब जानते भी है और मानते भी है!!!!

ना मानने का सवाल ही कहाँ उठता है!! और उठेगा क्यों, जो अटल है उसे कौन झुठला सकता है और कैसे झुठला सकता है ? जिनसे मैट्रिक तक पढ़ाई कर ली उसे पता होता है कोहिमा भारत का हिस्सा है, कोहिमा भारत में है। एक प्रतिभागी सोनी टीवी के  "कौन बनेगा सप्तकरोडपति" में ये कहती हुयी पायी जाती है कि भारत को कोहिमा का हिस्सा है ये मानता कौन है?? उनका ये सवाल अटपटा और अजीब सा प्रतीत होता है। न जाने किस आधार पर ये कह दिया की कोहिमा को भारत का हिस्सा मानता कौन है??? उनका ये नादान सवाल सुन का मेरा रक्तचाप छलाँग मार जाता है। नीडो तमीम याद है, बंगलोर में हुयी कुछ हिंसक वारदातें भी याद है। पर उससे कोहिमा भारत का हिस्सा नहीं रहेगा क्या? महाराष्ट्र में जो बिहार के लोगो के साथ हुआ जो उत्तर प्रदेश के लोगो के साथ हुआ उसके बाद क्या पटना या लखनऊ भारत का हिस्सा नहीं रहे क्या??

 
भारत देश ही अनेकता में एकता का, मूल ही यही है। हमारी सँख्या ज्यादा हो गयी किन्तु केवल अँगुलियों में गिने जा सकने वाले लोगो की कुत्सित मानसिकता के आधार पर कुछ ऐसा कह देना की जो भारत की सम्प्रभुता को चुनौती देता हो स्वीकार्य नहीं। टीवी में प्रचार करना ठीक बात है पर सीमायों में रह कर ये अफ़सोसजनक ही तो की प्रतिस्पर्धा में आगे निकल जाने की गरज में कोहिमा को सवालिया बना दे? देश में अपराध हर आम और खास के साथ होते रहे है। उन्हें रोका जा सकता तो बेहतर था किन्तु एक अपराध होने के उपरान्त अपराधी का धर्म खोज लेना उसकी जाति जान लेना और उसका वर्ण जान कर टिप्पणी करना का किसी नतीजे पर पहुँच जाना सबसे बड़े लोकतन्त्र का अपमान ही तो है। ये इन्सानी फितरत है ये जो अब चैनल के कार्यक्रमों को बेचने में खुद इस्तेमाल हो और हॉलीवुड बॉलीवुड में खुद को बेचने की तैयारी में हो। कभी तो देश की सोचो लड़ाने हर गली मोहल्ले में मिल जाते है पर अच्छे लोग भी बहुत है देश में कभी उनको भी देखो। कोहिमा भारत में है और रहेगा भी क्यों की न होने का सवाल ही कहा उठता है!!!!!!

एक बेटी का बाप होने का, डर सबको सताने लगा है,

एक बेटी का बाप होने का
डर सबको सताने लगा है,
जन्म देकर गलती तो नहीं की
ये अहसास डराने लगा है।

ऐ मेरे देश के हुक्मरानों
ऐ मेरे देश के सयानों
ऐ मेरे देश के इन्सानों
कुछ तो करो, कुछ तो करो।



मत दो कन्या बचाव विज्ञापन
मत दो किसी को कोई ज्ञापन
करो अपराधियो का सत्यापन
जो जरूरी है वो तो करो।

क्या कर रही है न्याय व्यवस्था?
हर मुद्दे पर तारीखों अम्बार है,
दशकों तक चलते है मुक़दमे
जाहिर है की वो बीमार है।
कोई तो इसको औषधि दो।

न्याय का समय अगर नियत होता
तो अपराध पर कुछ नियन्त्रण होता
अभी तक नहीं किया है, अब कर दो
बेटियों को जीने लिये वातावरण दो
बन्द करो अब कन्या हरण को।

वर्ना बन्द दो पूजा माँ दुर्गा की
भूल ही जाओ माँ जीजाबाई को
हटा दो रानी झाँसी के गीतों को
ख़त्म करो दुर्गा भाभी की दास्तान को
या फिर बदल दो मानवता की व्याकरण को !!!
………....

एक बेटी का बाप होने का
डर सबको सताने लगा है,
जन्म देकर गलती तो नहीं की
ये अहसास डराने लगा है।

कविता: खेतों में किसानो को !!

हे ईश्वर!! हे ईश्वर!!
लोगो को कुछ तो बल दो
समस्या है कुछ तो हल दो

खेतों में किसानो को
शरहद पे जवानों को
कुछ तो बल दो !!

बरसात में धानों को
गाँव में पहलवानों को
कोई तो पहल दो !!


नदियों में गंगा को
शहरों में दरभंगा को
कुछ तो अविरल दो !!

सूखते हुये जंगलो को
बचे खुचे दंगलों को
कुछ तो  मुकम्मल दो !!

सभ्यता में धर्मो को
इंसानो में कर्मो को
मार्ग तो सरल दो !!

सब की अभिलाषा को
अनकही भाषा को
कोई तो शक्ल दो !!

हे ईश्वर!! हे ईश्वर!!

बात फर्रुखाबाद की .... बात महादेवी वर्मा जी की ...

भारत की राजनीतिक राजधानी से करीब 350 किलोमीटर की दूरी पर बसा है एक जिला फर्रुखाबाद। इस जिले को कानपुर और बनारस के साथ गंगा किनारे वाला होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। शहर सीमित है और शान्त भी!! राजनीति हो कला हो विज्ञान हो या आधुनिकता का चलन है सब कुछ पर सीमित चन्द लोगो तक। शायद इसी लिये प्रदेशस्तर पर देशस्तर पर चर्चा में कम ही होता है। यूँ तो हर जगह की और वहाँ  के वाशिन्दों की अपनी खासियत होती है शख्सियत होती है । और वही विशेषतायें और विशेष लोग लोग शहर का परिचय हुआ करते है। देश के लिये दुनिया के लिये। अब जब बात फर्रुखबाद की निकल ही पड़ी तो जरा सोचिये  कि फर्रुखाबाद को आप जानते भी है की नहीं और अगर जानते है तो क्यों ?? वहाँ के राजनेताओं के वजह से? लोगो की वजह से फिर वहाँ के कलाकारों की वजह से या किसी खास वस्तु की वजह से?? आप फर्रुखाबाद जाये और नाई दुकान में बैठ जाये और गाहे-बगाहे जिक्र छेड़ दे राजनीति का या काजनीति का कई लोग आपके साथ तर्क और वितर्क में शामिल हो जायेगे और अपना दुखड़ा भी रोयेंगे और अपनी प्रसंशा के पुल भी बाँध देंगे। अगर बात राजनीति की हुयी तो सलमान खुर्शीद, ब्रम्हदत्त द्विवेदी जैसे किसी प्रसिद्ध नेता से अपने घरेलू संबधों का हवाला जरूर देंगे, कुछ इस तरह कि "सलमान खुर्शीद के बाबूजी खुर्शीद आलम हमरे पापा के साथ पढ़ते थे घर आना जाना उठना  बैठना रहा है रहा है। सलमान जी फर्रुखाबाद आये बाबूजी से मिले बगैर नहीं जाते।" जो गर्व लोगो में राजनीतिज्ञों से सम्बन्ध का बखान करने में नज़र आता है उतना गर्व शहर पर नहीं है लोगो न जी शहर की संस्कृति पर!! ना उन लोगो पर जिन्होंने भारत मानचित्र में बहुत पहले इस शहर को पहचान दिलायी थी।

फर्रुखाबाद और आलू एक दूसरे के पर्याय हुआ करते है। सर्दी के मौसम के आगाज़ के साथ ही जगह-जगह ढेलों पर आलू भून कर बेचने वाले नज़र आने लगते है। तीखी हरी चटनी के साथ बालू में भुना हुआ आलू खुद ही छील कर खाने का आनन्द ही अलग है। बयाँ नहीं किया जा सकता खुद जी कर देखा जा सकता है महसूस किया  सकता है। फर्रुखाबाद में लोगो की जिन्दगी में आलू का बेहद महत्व है।  हफ्तों तक केवल आलू खाकर काम चला सकते है यहाँ के लोग। शहर की  शुरुआत से अन्त आलू के भण्डारण के लिए कोल्ड्स्टोर मिल जायेगे। कुछ उसी तरह फर्रुखाबाद भी अपनी नमकीन के लिये जाना जाता है। फर्रुखाबाद की गलियों में घुसते ही आपको एहसास हो जायेगा की आप किसी ऐसे शहर में है जो बस अपनी ही चाल से चलता है। आप रिक्शे  बैठ जाईये या फिर ऑटो में बस अभी किसी से टकरा जायेगे ये एहसास आपके अन्दर घर किये रहेगा। रिक्शे और ऑटो एक दूसरे को और कभी लोगो को लगभग चूमते हुये निकल जाया करते है। गली-गली में जाम की स्थिति होती है। रात गये सड़को  को रोशन करने वाला उजाला अमूमन सड़क किनारे बनी दुकानो का हुआ करता है। आप शहर के बस अड्डे को के अन्दर आती जाती बसो  को देखेगे तो यकीन हो जायेगा की यमराज मानो स्वयं बसो में बैठे घूम रहे हो। बस अड्डे की हालत देख कर यकीन हो चलेगा की बिना किसी के हस्तक्षेप के बसे भी चल रही है और अड्डा भी। यहाँ शहर के  यातायात नियन्त्रण के लिये पुलिस नहीं चाहिए होती बस परस्पर सहयोग से ही काम हो जाया करता है।

आप देश के किसी भी शहर में हो और आपको शहर की आबो हवा और लोगो के मिजाज का अन्दाज़ा लगाना तो शहर में घुसते ही अखबार खरीद लीजिये अखबार की ख़बरें  शहर को और उसकी और हवा और रहन सहन को प्रतिबिम्बित देता है मैं भी एक बार अखबार ही पढ़ रहा तू बेहद खास खबर पढ़ दिल नीरस सा हो गया। अख़बार लिखता कवियत्री महादेवी वर्मा जी मेमोरियल जमीन लेकर विवाद!! जिन्होंने हिन्दी एक विषय के तौर पर पढ़ी है वो शायद ही भूले हो "गिल्लू" की लेखिका को उस लेखिका को जो जिन्होंने लिखा है " मैं नीर भरी दुःख की बदली ……" महादेवी  जन्म फर्रुखाबाद  हुआ था। आज भी फतेहगढ़ कैंटोनमेंट में महादेवी जी की याद में एक पुस्तकालय और वाचनालय बना हुआ है। स्थिति बस काम चलाऊ ही है। पुस्तकालय के के अन्दर बाहर कभी किसी को आते जाते देखा नहीं। पर पुस्तकालय है ये भी बड़ी बात काम से काम अपने होने से फर्रुखाबाद के इतिहास के खड़े होने का एहसास तो करा देता है। रेलवे की जमीन पर है इसी लिये सुरक्षित भी है। साहित्य का सर्वोच्च "साहित्य अकादमी पुरस्कार" पाने वाली भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान " पदम विभूषण"को पाने वाली महादेवी जी के स्मारक को जगह नहीं मिली। मिली तो थी पर विवाद हो गया। विवाद भी ऐसा की बात कब्जे तक आ गयी। वो कहावत है न की  "जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि,
     और जो हर जगह रखे अपना सामान वो है इन्सान :)"

महादेवी  वर्मा जी

सुभद्रा कुमारी चौहान
दुःख हुआ की महापुरुषों के साथ ऐसा होता है। ऐसा कोई पहली बार नहीं है ऐसा अक्सर होता है। भारतरत्न बिस्मिलाह खान जी का मक़बरा बनारस में आज तक एक छत को मोहताज है, जगह में विवाद है। कानपुर में अमर शहीद गणेश शंकर जी और शालीग्राम शुक्ल की मूर्तियों के नीचे चाय के ठेले लगे होते है। जो ठेले लगाये होते है उन्हें पता ही नहीं होता की वो क्या कर रहे है क्यों की उनको शिक्षा नहीं मिली उनको न गणेश जी के बारे में पता है और ना ही महादेवी जी के बारे में वो तो बस अपने पेट की आवाज़ सुनते है पर शासन और प्रसाशन किसी और ही धुन में होते है। अपने बड़ो को दरकिनार करने का दर्द कई बार गुमनाम होने पर भी मजबूर कर देता है। खैर जब बात महादेवी जी चल ही रही थी तो चलते-चलते बता ही देता हूँ कि आज से कई साल पहले लगभग ६ साल पहले जब फतेहगढ़ कैंटोनमेंट रेलवे स्टेशन मैंने महादेवी जी ना नाम देखा तो विस्मय और ख़ुशी दोनों से भर उठा यकीन करना मुश्किल था की मैं महादेवी जी यही जन्मी थी। यूँ तो महादेवी जी का जीवन परिचय हम सबने पढ़ा है किन्तु उस दिन इन्टरनेट के माध्यम से मैंने एक और खास बात पढ़ी। स्कूली शिक्षा के दौरान महादेवी जी और "सुभद्रा कुमारी चौहान" हॉस्टल के एक कमरे में रहती थी। जहाँ महादेवी जी समाज में नारी की दशा का व्याख्यान कुछ इस तरह किया कि ....... "मैं नीर भरी दुःख की बदली …" वहीं दूसरी ओर सुभद्रा जी ने झाँसी की रानी को नारियों का प्रतीक बनाया और लिखा "चमक उठी सन 57 वो तलवार पुरानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वो तो झाँसी वाली रानी थी। दोनों ही लेखिकाओं को पढ़ा महादेवी जो को गद्य और पद्य दोनों में और सुभद्रा जी को पद्य में।

भाई! रेलवे का किराया वाकई बढ़ गया है!!

रेल के यात्री भाड़े के बढ़ने की मार आज मुझे पढ़ ही गयी। पहले से बुक टिकेट पर अब जब मैं यात्रा करुँगा तो मुझे नीचे लिखी राशि अदा करनी होगी।
-----------------------------Received from IRCTC-----------------------------
MD-IRCTCi:
Due to Fare Revision effective from 25-Jun-2014, TTE will collect Rs. 190 as difference of fare for PNR <xxxxxxxx>on train.
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ऐसे कई मैसेज मुझे प्राप्त हुये आवाजाही के बुक टिकेट के परिप्रेक्ष्य में सो कुल मिला कर मुझे ये यात्रा 90 +195 रूपये महँगी पड़ेगी। चलो बढ़ा हुआ भाड़ा तो देना ही है किन्तु इसके एवज़ में मुझे क्या मिलेगा? इस पर बात करना  अतिआवश्यक है। चण्डीगढ़ से लखनऊ जाने वाली रेल बीच में शाहजहाँपुर से होती हुयी जाती है। शाहजहाँपुर मध्यम दर्जे का स्टेशन है। जब वहाँ ट्रेन रूकती है तो आपको कभी ये नहीं पता चल सकता की कौन सा कोच किस जगह पर लगेगा!!! प्लेटफॉर्म पर बोर्ड तो लगे है लगभग हर डिब्बे के सामने पर डिसप्ले केवल प्लेटफॉर्म नम्बर होता है उसमे। आप के साथ ज्यादा सामान है या फिर कोई बुजुर्ग साथ में है तो ट्रेन पकड़ पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। खास कर जब आप १ बजे स्टेशन पर ट्रैन रुके ना कोई कुली ना न ही ट्रैन में  दरवाजा खुला हुआ।  कंडक्टर सोया करते है। जो दरवाजा खुला दिखे उसी से घुस लो बाद में अपना कोच और सीट खोजते घूमना। इस बावत मैं स्टेशन पर लगभग 18 महीने पहले एक लड़-झगड़ कर लिखित शिकायत कर चुका हूँ। अफ़सोस शिकायत लेने का समय नहीं था साहब लोगो के पास शिकायत दर्ज करने के लिये भी लड़ना पड़ा। इसके अलावा अपने फ़ोन पर सेव किये गये इलाहबाद रेलवे और इण्डियन रेलवे के नम्बरों  SMS भी कर चुका कॉल भी पर नतीजा ढाक  के तीन पात। SMS का जवाब था की आपकी कम्प्लेन दर्ज हो गयी है शीघ्र ही आगे की कार्यवाही होगी किन्तु हुआ कुछ भी नहीं। इलाहाबाद रेलवे के जिस नम्बर पर कॉल किया  था वो उठा ही नहीं। ये शिकायत करने के लिये समर्पित नम्बर था जो मैंने किसी रेलवे स्टेशन पर देखा और नोट कर लिया।

इलाहबाद रेलवे के पास तो बिलकुल समय नहीं है। ३.5  वर्ष पहले १० नवंबर २०१० को एक अमानवीय घटना की एक शिकायत मैंने नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दर्ज की थी जो बाद में इलाहाबाद ट्रान्सफर कर दी गयी।  इन तीन वर्षों में मैंने विभिन्न माध्यमो से शिकायत पर की गयी कार्यवाही पर जानकारी माँगी पर वो नहीं। PG PORTAL पर रेलवे के कस्टमर केयर पर  शिकायत पर की गयी कार्यवाही की जानकारी मांगी। तीन साल बाद जवाब आया की हमने जाँच कर ली है TT दोषी नहीं है। मैंने RTI फाइल करके पूछा की किस आधार पर TT निर्दोष है?? किस यात्री के बयान दर्ज किये आपने? मुझे पिछले तीन वर्षों में इस वावत जानकारी दी गयी?  RTI का जवाब नहीं आया लगभग ४ महीने हो गए। RTI में जाँच रिपोर्ट  प्रतिलिपि भी माँगी थी पर आया कुछ नहीं। इस शिकायत के बारे में पूरी जानकारी शिकायत पत्र सहित कभी फुरसत में लिखूँगा।

अभी तो बस इन्तज़ार कर रहा हूँ की सोच रहा हूँ क्या इस बार बढ़े हुये किराये के एवज़ में या फिर वर्षों पहले की गयी शिकायतों के आधार पर क्या इस बार मुझेपता चल सकेगा की मेरा कोच कहाँ पर रुकेगा या इस बार भी बच्ची सामान साथ लेकर डिब्बे तक पहुँचने के लिये दौड़ लगानी पड़ेगी? या फिर रात १ बजे कोच का दरवाजा खुलवाने लिये फिर कमोबेश जुबानी बल का प्रयोग करना होगा? वैसे मुझे तो पूरा यकीन है की अभी भी पहले जैसा ही होगा इंजन से डिब्बे की स्थिति के हिसाब से अन्दाज़ा लगा लेंगे। किन्तु इंजन कहाँ रुकेगा ये तो "स्टीफन" को ही पता होगा। रेल प्रसाशन कहाँ कुछ जानता है!!!!