Pics: Rock Garden Chandigarh












ये जीवन खानाबदोश जीवन ही तो है!!

ये दर्द मेरा नहीं बहुतो का है कुछ लोग इसे स्वीकार करेंगे कुछ नकार देंगे है। पर ये सच है वेतनभोगी होने के नाते हम  लोग खानाबदोश जीवन जीते है। खानाबदोश इसलिये की अपना घर छोड़ कर दूर कहीं आशियाना बसाना होता है। वहाँ जहाँ कोई अपना नहीं होता। जीवन को नये सिरे शुरू करते है कुछ दिन जीते है फिर निकल पड़ते के नये सफर में। हर उस जग़ह जहाँ हम जाते है हम उपभोक्ता के तौर पर देखे जाते है और बस यहीं हमारा अस्तित्व होता है। 

मैं खानाबदोश हूँ, शायद इसीलिये मेरा कोई सामाजिक सरोकार नहीं बचा, कोई सामाजिक सम्पर्क नहीं बचा, कोई सामाजिक रुतबा नहीं बचा। सच कहे तो मेरा वो परिवार भी नहीं बचा जिसने मुझे पालपोश कर बड़ा किया। वो परिवार जो कभी मेरा अपना था जहाँ सभी थे सब अपने, वो परिवार बस सिमट गया है चन्द टेलीफोन कॉल्स में, अब परिवार के लोगो की गिनती बस तर्जनी से शुरू होकर मध्यमा पर आकर खत्म हो जाती है। परिवार की परिभाषा हमारी भावनाओं में अलग है और उन कॉरपोरेट घरानों के लिये अलग है जो हमे रोजगार देते है। वही घराने निर्धारित करते है की कब आपके परिवार में कौन होगा। फैमली बस अब एमिडिएट फैमली हो गयी है परिभाषा में आप पत्नी और २ बच्चे आते है। माँ, बाप, भाई, बहन, अब को परिवार मानना केवल आपकी श्रद्धा है। मैं एक संसाधन भी हूँ इसी लिये तो एक अदद भविष्य की तलाश में अपना घरबार सब छोड़ कर चल देता हूँ। कहीँ दूर पहले शिक्षा के लिये और फिर रोजी और रोटी के लिये। एक नयी जगह एक नयी शुरुआत और बदलती बिज़नेस जरूरतों के साथ ठिकाना भी बदल जाता है। विरासत में कुछ नहीं बचता के शिक्षा और सँस्कार के शिवाय ये जीवन खानाबदोश ही तो है।
साभार :http://www.stockpicturesforeveryone.com/2010_11_01_archive.html


बंज़ारों जैसा ही तो है ये जीवन मेरा, आपका आपका और बहुत से उन लोगो का जो वेतनभोगी है या अदद रोजगार की तलाश में है। यहॉँ-वहाँ इधर और उधर में सारा जीवन निकल जाया करता है। जब छोटा था तो अपने गृह नगर कानपुर में सब्जीमण्डी जाते हुये रास्ते में सड़क के किनारे आशियाना बनाये लोगो को देख कर बहुत सारे सवाल जहन में आते थे। उन आशियानों के बाहर लोग कई तरह के काम भी किया करते थे, मूलतया वो काम लोहे से जुड़े औजारो के हुआ करते थे। वो लोग बंजारे है, ये खानाबदोश जीवन जीते है। ऐसा उत्तर कई प्रश्नो के जवाब में मिल जाया करता था। खानाबदोश जीवन जीने वाले बस अपनी हुनर की खाते है कला और कारीगरी में उनका कोई शानी नहीं होता। इसी के सहारे  पना जीवन यापन करते है। वहीं दो चार लोग होते है जीवन में जो साथ साथ ठिकाना बदलते रहते है।

खानाबदोश ना ही किसी लोकतन्त्र के मतदाता होते है और ना ही कोई सरकार उनके लिए नीति पर ही विचार करती है। लोकतन्त्र में सँख्याबल की महत्ता जाहिर है और उसी से श्रापित रहते है ये खानाबदोश। हम भी वहीं है पर शायद थोड़े से बेहतर, दूर कहीं अपना कोई ठिकाना तो है। कहीं कोई परिवार तो है कहीं कोई अपना तो है जो फ़ोन पर ही सही आपके सम्पर्क मे तो है। पर हम है तो खानाबदोश ही अपनी संस्कृति,समाज और परिवार से दूर कभी इस प्रदेश तो कभी उस प्रदेश तो कभी विदेश है पर है तो दूर ही ना .......

वो तो बस महँगाई ने कमर तोड़ रखी है।

वो तो बस महँगाई ने कमर तोड़ रखी है।
वर्ना शौक तो अपने भी है नवाबों वाले।

धरती पे आये है बस तभी से गुमनाम है।
वर्ना है तो हम भी चाँद, सितारो वाले।

मुहब्बत ही रुसवा हो गयी है आजकल
है तो हम भी सूखे हुये फूल किताबों वाले।

वो तो धूप ने साँवला दिया विक्रम। 
वर्ना थे तो अपने भी रंग गुलाबों वाले।
                           
                       ----विक्रम-------

@Shimla: Perfection is needed to park a car this way

Highly skilled driver can park a car this way. Very high risk involved. @Vikas Nagar Shimla, Himanchal Pradesh.

थलोट-मनाली जैसे हादसे तो होते ही रहेंगे!!

एक जवान बेटे के चले जाने का दर्द उसके परिजनों से पूछिये। यूँ तो मातम के माहौल में कई चले आते है ढाढस बधाने, आरोप लगाने, पर परिजनों का दर्द शायद ही हल्का होता है, कुछ रोज पहले की ही तो बात है 24 छात्र, छात्राये जल में विलीन में हो गये। बस चन्द लम्हों में व्यास अपने साथ ले गयी इन सबको। ये व्यास का विकराल रूप कई परिवारो को बेहद भरी पड़ा है . बचाव कार्य जारी जरूर है पर अब बचा ही क्या बचाने को! अवशेष ही शेष होगे शायद। काल क्रूर है और उसके आगे किसी की नहीं चलती, ये तर्क इस हादसे के लिये दिये जा सकते है। किन्तु इस तर्क से प्रशासन द्वारा हुयी घनघोर लापरवाही शायद ही छिप सके। ये अपनी तरह की पहली घटना नहीं है . ऐसे हादसे होते आये और आगे भी होते ही रहेंगे। वो दौर भी चलता ही रहेगा जब लापरवाही के आरोप लगा करेंगे, जब परिजनों को मृत शरीर पाने के लिये, उसके मृत होने का प्रमाण पत्र पाने के लिये दर- दर भटकना ही होगा। इसके इसके उपरान्त उस मुआवजे  के लिये भटकना होगा जो सरकारे दे रही है। थलौट हिमआँचल में लारजी डैम से छोड़े गये पानी ने जो कहर बरपाया है उसके निशाँ ताउम्र परिजनों के जीवन में दस्तक देते रहेंगे।
साभार: http://www.dailypioneer.com

हम प्रतिक्रियावादी सभ्यता में रहते है। यहाँ दुर्घटना होने के बाद हो हल्ला करने कला रिवाज है। सब आते है मतमपुर्शी करने और ढाढस बँधा कर चलते बनते है। जो थलोट में हुआ उसमे शायद थोड़ी सी सावधानी दुर्घटना को ताल सकती थी। पर लाख टके का सवाल ये है कि सावधानी बरते कौन प्रशासन के पास तो समय ही नहीं है। मन्त्री जी को हादसे के बाद ही समय मिलता है। ऐसा हमारी सभ्यता में न जाने कब से होता चला आया है और पूरी सम्भावना है की आगे भी होगा। यहाँ पर लारजी डैम से बिना चेतावनी के पानी छोड़ दिया था और पिछले वर्ष उत्तराखण्ड में इन्द्र देव बदल ही छोड़ दिए थे। पर इस सब के बीच ऐसी घटनाओं लड़ने का काबू पाने का तरीका एक हीथा था। एटीउड एक ही था। जब होगा तब देखेगे पहले क्या करना। शायद इसी लिये पानी छोड़ने से पहले हूटर बजाना भूल जाते हैं। ख़राब मौसम की चेतावनी देना भूल जाते है। फिर कह देते है की ये जो हुआ वो बेहद दुःख का विषय था।

हमने पिछले कई हादसों से तनिक भी नहीं सीखा। इसीलिये हादसों को रोक पाना सम्भव नहीं। आप पता कर लीजिये मैं दावे के साथ ये कह सकता हूँ की बरस गुजर जाने के बाद भी अभी तक उत्तरखण्ड में काल के गाल में समाये लोगो को ना ही मुआवजा ही मिला होगा न अभी तक सब की पहचान ही हुयी होगी। ना कोई उपाय होगा जिससे आगे इस तरह के हादसों से बचने में मदद मिल सके। एक कान से सुन कर दूसरे से निकाल देना मंत्री जी की आदत है। आँखों से आँसू निकालते रहने की आदत है हमारी। थलोट में कुछ परिजन जिन्होंने अपने लाल खो दिये। मीडिया से मुखातिब होते हुये कह रहे थे की वो डैम अधिकारियों के खिलाफ कानून कार्यवाही करेंगे। उन्हें  कानून व्यवस्था और न्याय पर पूरा भरोसा है। उनके जज्बे को देखकर हिम्मत तो बहुत मिलती है, पर अफ़सोस जिस व्यवस्था पर वो भरोसा जता रहे थे वहीं व्यवस्था ही तो थी जिसने लील लिया सबको। और उन्हें शायद ही पता होगा की न्याय पाने के लिये उनको आन्ध्रप्रदेश और तेलांगना से हिमआँचल के चक्कर अगले कई बरसो तक लगाने पड़ेंगे। २० बरस जिसे पालपोश कर बड़ा किया अगले २० और बरस उसके लिये लड़ने में लगा देंगे है।  यही है कानून और व्यवस्था इसके व्यवस्थापक हम ही तो है ……

अपार्टमेन्ट कल्चर की इक समस्या ये भी

देखने में पढ़ने में भले ही नीचे दी खबर बहुत साधारण लगे किन्तु है बेहद महत्त्वपूर्ण और सीख भरी। अमूमन अत्याधुनिक साधन आराम तो बहुत देते है किन्तु कई बदस बड़ा संकट भी पैदा करते है। लिफ्ट का बेसमय बन्द होना लगभग हर अपर्टमेन्ट की कहानी है किन्तु इस स्थिति से निपटने की क्या सुविधायें उपलब्ध है उस पर उस उपलब्ध है ये पता होना बेहद जरूरी है। हमे सीख लेनी चाहिये और अपने अपार्टमेन्ट में काम से नीचे लिखी बातो पर तो नजर रखनी ही चाहिये ताकि आप इस दिक्कत से बच सके।

१. लिफ्ट की जाँच कितने दिनों में होती है ?
२. सर्विस का क्या शेडूल है ?
३. बिजली जाने की स्थिति में क्या सुरक्षा उपाय है ?
४. सुरक्षाकर्मी की उपलब्धता के तरीके
५. लिफ्ट में फ़ोन है की नहीं? यदि नहीं तो क्या लिफ्ट में फ़ोन के सिग्नल आते है ?
६. लिफ्ट की अलार्मबेल दुरुस्त है की नहीं
७. बिजली जाने की स्थिति में अन्दर प्रकाश होता है की नहीं।

ऐसे और कई अन्य कारक हो सकते है जिसकी जानकारी आप माँग सकते है जो भविष्य में आपकी सुरक्षा के लिये बेहद जरूरी है। और हाँ छोटे बच्चो को लिफ्ट में अकेले कतई न जाने दे, बड़े का साथ बेहद जरूरी

साभार : दैानिक भास्कर

धन्यवाद Orkut!!!

Orkut हमारे बीच से चुपचाप चला गया, हमने उसे जाने भी दिया। हम नयी चीजो को सहज स्वीकार कर पुरानियों को भुला देने के आदि हैं ना। जब हम छोटे हुआ करते थे तब एक छोटी सी साइकिल पा कर बेहद रोमांचित होते थे। हमारे साथ साथ साइकिल बड़ी हो गयी पर पुरानी साइकिल को हमने स्टोर रूम के कूड़े में फेक दिया या फिर कबाड़ वाले के हाथ बेच दिया। जरूरत के हिसाब से चीजे बदल देना के नियम ही है पर कहीं न कहीं वो सभी पुरानी चीजे हमारे दिल में तो जगह रखती है ना किसी ना किसी कोने। कभी ना कभी तो याद आ ही जाती है। थोड़ी बहुत जी भावनायें हममे बची है वो भी उमड़ ही आती है। जैसे किसी छोटे बच्चे को अठखेलियाँ करते देख या फिर खेलते देख वो बचपन याद आना तय ही होता है। भले ही हम कॉपोरेट हो गए हो प्रोफेशनल हो गए हो देश तरक्की की सीढिया चढ़ रहा हो पर न बचपन के खेल भूलते है न वो पार्क जहाँ हम खेला करते थे और ना ही वो लड़ाईयाँ  दोस्तों के साथ किया करते थे।

ऐसा ही एक जमाना था Orkut का !! सोशल नेटवर्किंग के दौर के प्रारब्ध का जब कंप्यूटर में ज्यादा से ज्यादा गूगल गूगल करते थे या फिर याहू मैसेंजर पर लगे होते थे और कभी कभी rediff मेल से भी वास्ता पद जाता था।  ऐसे ही समय में Orkut आया था और रफ्ता रफ्ता हमारी जरूरत बन गया। Orkut वो था जिसने हमको कंप्यूटर से चिपके रहना सिखाया, पुराने स्कूल के दोस्तों से मिलवाया, पहले पहल सोसल नेटवर्किंग का कॉन्सेप्ट से हमारा परिचय कराया। नम्बर ऑफ़ स्क्रैप्स और नम्बर ऑफ़ कमेन्ट के आधार पर वास्तविक दुनिया में जीरो लोगो को भी ऑरकुट ने ही हीरो भी बनाया। कुछ के लिये मुहब्बत शुरू करने का माध्यम भी बनी। खासकर प्रेमीयुगलों को इज़हारे मुहब्बत का जरिया भी दिया। कुछ के लिये अपने हुनर दिखाने का मौका बना कुछ के लिये टाइम पास।
मेरी orkut प्रोफाइल का का स्नैपशॉट
इन्टरनेट की दुकान पर जाकर Orkut- Orkut सबने खेल होगा। वो स्क्रैप का आना वो स्क्रैप लिखना। वो किसी की फोटो पे कमेंट का दौर शायद ही भूला हो। इन्टरनेट पे Orkut एक धरम के जैसा था। वो पिक्चर बदलना वो और वो नयी पिच अपलोड वो नया एल्बम बनाना वो रोज नाम बदलना लगभग वो सब जो हम facebook में करते है वो सब पहले ऑरकुट में किया करते थे। बदलाव प्रकृति का नियम है वो स्वीकार करना ही होता है।  पर जी orkut ने हम सबको दिया उसके लिए एक धन्यवाद तो बनता ही है।

पँजाब के मुखिया प्रकाश सिंह बादल के नाम एक पाती

माननीय बादल साहब,
पारा 45-46 के आस पास ठहरा हुआ है, मौसम का मिजाज मारक हो गया है, बस इसीलिये आपको खत लिखने की जरूरत आन पड़ी। खत का एक मजमून है पर उससे पहले एक साधारण परिचय प्रस्तुत करना चाहूँगा, मैं पिछले ४ वर्षों से आपके प्रदेश का वाशिंदा हूँ। प्रदेश के सीमावर्ती इलाके में रहता हूँ, जिसे आपकी सरकार के लोग इस जगह को "अ सब अर्ब ऑफ़ चण्डीगढ़ कहते है".

मेरे पास शिकायतों की एक लम्बी फेहरिश्त है जो आप तक पहुँचाने की एक अदनी सी कोशिश कर रहा हूँ। पहली शिकायत तो ये है की मेरे इलाके में बिजली गायब रहती है। कई बार पता ठिकाना खोजने की कोशिश की किन्तु मिली नहीं। दिन के काम से 5 घण्टे अधिकतम १-2 दिन तक लापता रहती है । लापता होने दौरान मैं बिजली को कहीं खोज नहीं पाता, कोशिश की मैंने, पावरकॉंम को फ़ोन लगाया कई बार किन्तु बिजली किन्तुओं और परन्तुयों के जाल में लापता रही। हाँ बिजली का बिल लापता नहीं होता, वो हमेशा समय पर आकर मेरी जेब में जोर की दस्तक देता है। अभी हाल ही में लोकसभा चुनाव दौरान आपकी सरकार कहती थी कि पँजाब पावर सरप्लस है। पर तब भी बिजली लापता रहती थी और अब भी लापता रहती है!!! मैं सोच रहा था की बिजली का पता जानने हेतु क्यों ना पुलिस में शिकायत दर्ज करा दूँ , तभी ध्यान आया की पँजाब पुलिस तो किसी की सुनती ही नहीं है। असल में मैं तो पुलिस थाने नहीं गया, किन्तु रोज अखबार में यही छपता है कि पुलिस किसी की सुनती नहीं है। ना जाने क्यों और कैसे १-२ महीने में पँजाब पावर सरप्लस से पावर डेफिसिट हो गया। हो सके तो एक जाँच बिठा दीजिये, और बिजली को खोजने के लिये रेड अलर्ट भी जारी कर दीजिये।

चण्डीगढ़ की सीमा खत्म होते ही ना जाने क्यों कानून और व्यवस्था का कद अचानक नेताओं और अधिकारियों के सामने बौना हो जाता है? सड़क बस बनती और टूट जाती है। शिकायत कोई नहीं सुनता!! हर तरफ जालसाजी दौर है। कोई नशे में डूबा हुआ है तो कोई बिना नशे के ही मतवाला हुआ जाता है। करोडो की जमीने कुछ लोगो को कौड़ियों के दाम दी जाती है बात में वहीं जमीन सोने के भाव वापस सामान्य नागरिकों को वापस बेंच दी जाती है। सब एक दूसरे के पूरक का काम कर रहे है, नेता अफसर और दलाल। ये हालत पँजाब में कमोवेश सब जगह है। तभी तो पठानकोट से आते-आते बालू मोहाली में सोना बन जाती है। पर आपको पता ही नहीं चलता। जब आप भाषण देने कहीं जाते है। तो जिन चमकदार सडको से आप गुजर रहे होते है उनको रातों रात बना दिया जाता है। चुनाव में हार के बाद आप कुछ कर गुजरने की कोशिश में बस लग रहे है। हकीकत में कुछ हो नहीं रहा। नशे के कारोबार को खत्म करने की आपकी कोशिश ठीक है पर शतरंज के खेल जैसा कुछ चल रहा है। पैदल शिकार हो रहे है और बजीर अभी भी कायम है। पैदल फिर पैदा हो जाते है भरी सँख्या में। बेहतर होता की आप कुछ वजीरों को धर लेते। पर अफ़सोस।

पिछले वर्ष जब चप्परचिड़ी में अभेद्य सुरक्षा के बीच आपने प्रदेश के मुखिया बन कर शपथ ली थी तब से अब तक परिवर्तन के नाम पर सरकारी विज्ञापनों के अलावा क्या हुआ है? जब से आपकी सरकार बनी है तब बिजली की दरों के साथ सब कुछ बढ़ा ही तो है। अपराध, अव्यवस्था, संवेदनहीनता ठगी लगभग सब कुछ।  मेरे मुहल्ले की सड़कों के गड्ढे भी बड़े है और ,मेरे दिल का दर्द भी। मेरे मुहल्ले की सड़क तब भी नही थी अब भी नहीं है। अधिकारी न पहले सुनते थे न अब सुनते है। पुलिसवाला बेलगाम है, न पहले FIR लिखी जाती थी न अब लिखी जाती है, पहले जब सड़क पर चलता था तब भी असुरक्षित लगता था वो आज भी है। ट्रैफिक पुलिस पहले भी वसूली करती थी आज भी करती है। पॉलूशन सर्टिफिकेट पहले भी बिना गाडी चेक किये बन जाता था आज भी बन जाता है। RTO में दलाल कल भी थे आज भी है, घटना हो जाने  के  बाद ही हमारी आँख खुलती है वो पहले भी था आज भी है। सरकारी दवा खानो में डॉक्टर और दवा न पहले था न अब है। तो सर जी एक सामान्य नागरिक के लिये परिवर्तन है कहाँ? वादे तो आपने किये थे, टैक्स भी आपने ही लिया था? पर है तो अब भी वही जो कल था। "जिसकी लाठी उसकी भैंस" आप प्रभावशाली है तो काम होगा अन्यथा नहीं। क्यों है ऐसा? आप-कुछ करेंगे क्या? …

@370: अब्दुल्ला दीवाना

हाल ही में एक़ दीवाने का बयान आया कि "जम्मू काश्मीर" भारत का हिस्सा तभी तक है जब तक ३७० है, अन्यथा नहीं। बयान पढ़ा तो मैं आतुर हो उठा, ये जानने हेतु की इस दीवानगी का मजमून क्या? "जम्मू और काश्मीर" अगर भारत में नहीं रहेंगे तो जायेगे कहाँ?प्रश्न भी जहन में कौंदा और हलचल मचा दी । बहुत सोचा, हर दृष्टिकोण से  आखिर जायेगे तो जायेगे कहाँ और क्यों? भारत छोड़ जा भी कहाँ सकते है? क्या पाकिस्तान जायेगे, या  चाइना, नेपाल … या अकेले सम्प्रभु देश बनेंगे? वैसे नेपाल जाने की सम्भावना तो क्षीण ही है, कारण भी कई है। सम्प्रभु राष्ट्र बनेंगे तो कितने दिन चलेंगे? नाको चने चबाने पड़ेंगे, पर चबा तो तभी तक सकते है जब तक दीवानेपन का जोर है, एक बार नशा उतरा तो फिर क्या ?चाइना की सम्भावना भी काम ही है। क्यों कि दीवाने अक्सर कुछ भी बोल देते है। या यूँ कहे की मुँहफट होते है, दीवानो को ज्यादा बोलने की छूट तो केवल लोकतन्त्र में होती है पर चाइना में तो तानाशाही है, वहाँ गये और बोले तो गये ही समझो। हाँ पाकिस्तान में लोकतन्त्र है वहॉं की सम्भावना ज्यादा है । पर गये तो हासिल क्या है? वहाँ केवल लोकतन्त्र है, बाकी के तन्त्र तो विलुप्तप्राय है। वहाँ तो आदमी बम के साथ उड़ जाता है। जो नहीं उड़ पाता वो कभी पानी के रास्ते मुम्बई चला आता है तो कभी पहाड़ों रास्ते काश्मीर ही आ जाता है। बिना किसी निमन्त्रण के। रोज के रोज तो बम फूटते है वहाँ कभी तालिबान घुस आते है कभी जेहाद हो जाता है!! वहां वहॉ तो लादेन भैया भी मिलिट्री कैम्प के बगल में छुपे होते है, और कानो कान कान खबर नहीं होती । लोग तो कहते है दाऊद भी वहीं है, मुर्गे मारकर खा रहा किसी कोने में बैठे-बैठे, मुर्गो की कुकडुकू सुनायी दे रही पर दाऊद दिख ही नहीं रहे??

पता नहीं दीवाना, दीवानेपन में बेकरार क्यूँ हुआ जाता है। पाकिस्तान की राह तो अन्धा भी ना जाये। अगर पाकिस्तान नहीं जा सकते तो सम्प्रभु देश बन सकने की सम्भावना भी हो सकती है !! पर स्वतंत्रता कब तक? पाकिस्तान की गिद्घ दृष्टि तो ना जाने कब से है वहाँ किसी न किसी रोज तो हमला होगा या फिर घपला होगा। फिर कहाँ जायेगे दीवाने जम्मू और काश्मीर को लेकर? भारत से तो मदद ले नहीं पाओगे लाख आसूँ बहाओगे तब भी कुछ नहीं पायोगे। भारत में सम्मान के साथ हो और आगे भी रहोगे सुरक्षा की गारण्टी के साथ!! दीवाने को कौन समझाये की दीवानगी में रही सही इज़्ज़त भी जायेगी। अब हाल ही जब चुनाव हो का परिणाम घोषित हो रहे थे कुछ इज़्ज़त आबरू तो तभी तार -तार हो गयी थी। यहाँ वहीं बात खरी साबित होती है की "मान न मान मैं तेरा मेहमान"

ये जो दीवानापन है ना पुराना रोग है, मानो या न मानो। लाल चौक में हरा झण्डा लहराया जाता है तब भी दीवाना मस्ती में नाच रहा होता है। जूँ तक नहीं रेंगती दीवाने के, जब आतन्कवाद होता है तब भी दीवाना ट्विटर में ट्वीट कर रहा होता। जब संसद के हमलावर को सजा दी जाती है तब दीवाना फिर दीवानगी की हदें पर करता है। कभी ट्वीट करता है कभी हीट होता है। जब दीवाने से कोई बात करना चाहता है तो दीवाना बात करने की ट्वीट करने लगता है। हे दीवाने अब जिद छोड़ो भी। जो फेवीक्विक से भी ज्यादा मजबूत जोड़ से जुड़ा है वो टूट नहीं सकता। ना दीवानेपन सयानेपन से। सच को मानो अपने जो जानो और ट्वीट बंद करो भाई। 

बदायूँ में संवेदना का मेला

आजकल बदायूँ में एक मेला लगा हुआ है!! संवेदनशील होने और दिखने की चाहत में हर कोई बस मेले में शामिल हो पाने की जुगत में है। धूल उड़ाते हेलीकाप्टर लम्बी गाड़ियों के काफिले बदायूँ के हमदम हमसफ़र बन चले है। जो कभी अपने हलके में खोजे नहीं मिलते वो आजकल तपती गर्मी में बदायूँ की पावन हो चुकी धरती की धूल अपने माथे पर लगाने के लिये तैयार है। पर कमोवेश ये "चार दिन की चाँदनी और फिर अँधेरी रात" की कहावत को चरितार्थ करता है? हेलीकाप्टर और भी उतरेंगे लोग और भी आयेगे मीडिया की भी खूब दुकान चलती रहेगी। पर यकीन मानिये बस कुछ महीनों बाद ही न्याय की थका देने वाली लड़ायी। पीड़ित को अभियुक्त बना देगी . जोर आजमाइश होगी धमकियों का दौर चलेगा और फैसला आते आते इसी कहानी में कई मोड़ आ जायेगे। पीड़ित और पीड़ित होगा और अभियुक्त और उन्मुक्त होगा नतीजा होगा "ढाक के तीन पात"

अभी जुम्मा -जुम्मा ४-५ महीने ही तो हुये जब चण्डीगढ़ में ५ पुलिस कॉन्स्टेबल्स द्वारा नाबालिक छात्रा के शोषण का मामला सुर्ख़ियों में था। वहाँ भी एक मेला लगा था। बड़े-बड़े लोग आये थे,धरने हुये प्रदर्शन हुये, पुलिस वाले पिटे भी पर कुछ ही दिन गुजरे थे की पीड़ित छात्रा और उसके परिवार के लोग धमकियों और समझौते के साये में घिरे रहे। अखबार प्रकाशित ख़बरों का हवाला ले तो पीड़ित छात्रा २ दिन के लिये अचानक अपने घर से गायब हो गयी थी। परिवार पुलिस थाने में चक्कर लगता रहा है पर होना क्या था?? गायब होने के बाद जब लड़की वापस आयी तो कोर्ट में पहले वाले बयान से पलट गयी, कुछ दिनों बाद जब जज साहिबा ने बंद कमरे में लड़की के बयान लिये तो फिर से उसने पुराने बयान दिये। पर हर जज तो नहीं करता ना। जाहिर है की चन्द महीनों ही लड़की का परिवार और पीड़ित हुआ पर अब उनकी खैर-ख़्वाह लेने वाले बस कुछ गैर सरकारी संगठन बचे है। केस खत्म होते होते किस तरफ करवट लेगा पता नहीं। पर अन्दाजा सहज ही लग जाता है। अधूरा न्याय एक दंश है। जो समाज के एक बड़े हिस्से को अभिशापित किये हुये है। ये अपराधियों के मनोबल को बढ़ाव देने का माध्यम भी।

जो बदायूँ में हुआ उसे और उस जैसी सम्भावित घटनाओं को किस तरीके से रोका जा सकता है। मंथन इस बात पर होता तो बेहतर होता। विश्लेषण जरूरी है क्यों कि नेताओं का काफिला आगे होने हादसों को रोक पाने में समर्थ नहीं है। जब एक गाँव में इस तरह की घटना घटती है तो सरकारों को भले ही पता ना चला हो ! किन्तु गाँव के प्रधान , उप-प्रधान और सरपंचो को ये बात पता नहीं होगी ऐसा सम्भव नहीं!! पुलिस के लोग कुछ लोगो के साथ मिल कर उत्पात कर रहे है तो ये बात घर-घर में पता होनी तय है । पर प्रशासन को ना जाने क्यों खबर नहीं लगती? ग्राम प्रधान, ग्राम विकास अधिकारी इत्यादि जो दिन भर गाँव को लोगों के बीच उठते बैठते है। उनसे जवाब तलब नहीं किया जाना चाहिये? चुने  हुये प्रतिनिधि होने के नाते सबसे ज्यादा प्रभाव रोजमर्रा के जीवन में इन्ही लोगो है। सरकार को इन लोगो से संचार की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं करनी चाहिये? सत्ता के विकेंद्रीयकरण के इस दौर में भी जब केवल कुछ लोग ही महत्वपूर्ण रह जाते है तो ऐसी घटनाओं को मिलता है।

जिम्मेदारी समाज से लेकर न्याय तक सबकी तय होनी चाहिये। कम से कम इस तरह के वीभत्स अपराधों में तय समय में न्याय समय की मॉँग है। यदि नहीं मिलता तो अपराध को बढ़ावा देने का जरिया मात्र है। सम्भवता इन मामलों में मिलने वाली सजा को भी प्रचारित किया जाना चाहिये, ग्राम पंचायतों के माध्यम से, या फिर स्वयंसेवी संगठन के सहयोग से। जो कर्म का फल जानते है वो यकीनन थोड़ा ही सही कानून का पालन करते तो है ही। हमारे देश का चौथा स्तम्भ भी इसमें बेहद महत्वपूर्ण भूमिका में हो सकता है। जरूरत है तो बस एक इच्छा शक्ति की।