एक जाँच आयोग का गठन हो गया है .........

उसका आशियाना था स्वप्न हो गया है।
लम्बी सी गाडी से विघ्न हो गया है।।

वो सोया था कल शब इसी पुल के नीचे ।
ओढ़ी थी चादर कफ़न हो गया है ।।

थे खू के निशा बस ६ गज जमीन पर।
अख़बारों में कुछ ऐसा ही छपा है ।।

पुलिसिया रपट से कुछ खो गया है ।
लम्बी सी गाड़ी से अब ट्रक हो गया है ।।   

गरीबी का बस चीरहरण हो गया है ।
एक सच और फिर दफ़न हो गया है ।।

एक जाँच आयोग का गठन हो गया है।
नींद से जागा प्रशासन पुनः सो गया है ।।
                     ----- विक्रम ---------
फोटो  साभार: गूगल



जब दूर कोई भूखा सोता है

हृदय से निकले हुये कुछ भाव पेशे खिदमत है। ये भाव उस द्वन्द को दर्शाने का प्रयास है जो मन के किसी कोने में तब उभरता है जब आपकी नज़र किसी इन्सान को लाचारी की हालात में देखती है, दिल सोचता है की शायद इसे मेरी जरूरत है पर हम और आप मन की बात सुन कर आगे बाद लेते है , हालाँकि द्वन्द जारी रहता है …

जब दूर कोई भूखा सोता है
खुद ही खुद को समझा लेता हूँ

बादल से उमड़े भावों को
खुद ही आग लगा देता हूँ

कर्तव्य  विमुख होकर मैं
मन अपना बहला लेता हूँ

अपने मिटते हुये जमीरों से मैं
सब शिकवे गिले मिटा लेता हूँ

दिल के आँसू कहीं छिपा कर
पीर परायी झुठला देता हूँ

सोच के मेरा दामन साफ़ बहुत है
मन ही मन ही इठला लेता हूँ

मैं बेहद खुश हूँ इस दुनिया में
बस लोगो को दिखला देता हूँ

अपने जैसा अभिनय करना
तुमको भी सिखला देता हूँ

बड़ा गुबार भरा भरा है दिल
कुछ अपनों को बतला देता हूँ।

                                  -----विक्रम--------

दुर्घटना से देर भली

कल बेहद दुखद घटना में दिल्ली स्थित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्राँगण में ३ बाइक सवार लड़को की दुर्घटना में अकाल मृत्यु हो गयी। घटना करीब सुबह १.३० बजे की है जब अधिक गति में बाइक चलाते हुये बाइक स्किड कर गयी लगभग २० -२५ फ़ीट दूर घिसट कर डिवाइडर से तत्पश्चात पेड़ से टकरा गयी। घटना में बाइक सवार छात्रों के सर पर गम्भीर छोटे आयी और मृत्यु का कारण बनी। जाहिर है की बाइक सवार छात्रों ने हेलमेट नहीं पहन रखा था, बाइक में तीन लोग थे सवार थे, बाइक की गति निर्धारित मानकों से कहीं ज्यादा थी।जो हुआ वो बेहद दुखद था पर सम्भव है कि घटना को टालना मुश्किल था किन्तु यदि सावधानी बरती जाती तो  घटना में हुयी जनहानि एक हद कर काम हो सकती थी। यदि बजाय लापरवाही के नियमो और मानकों का पालन किया गया होता तो भी ये सम्भव था। हालाँकि सम्भव है की छात्रों ने हेलमेट पहनने की जरूरत ना समझी हो चूँकि पार्टी कहीं पास ही थी, ये अतिउत्साह भी हो सकता है, जो छात्र जीवन में कई बार कभी-कभी कुछ नया करने की गरज में और कभी-कभी दूसरों की देखा देखी में। पर कई बार इस तरह के निरर्थक प्रयास जाने-अनजाने ना सुधरने वाली भूल करवा देते है और उसका खामियाजा कई परिवारों को भुगतना उम्र भर भुगतना पड़ता है।ये प्रयास अक्सर उन लोगो को अच्छे लगते है जिनका कोई अपना इस तरह के प्रयासों के बाद भी घटना का शिकार ना हो या फिर ऐसी कोई घटना अपने साथ ना हुयी हो।
साभार: दा हिन्दू
छात्रावास वाले कॉलेज और विश्वविद्यालय में इस तरह की लापरवाही,नियमो की अनदेखी बहुतायत मात्र में देखने को मिलती है। चण्डीगढ़ स्थित पंजाब विश्वविद्यालय में कई बार इस तरह की घटनाये अख़बारों का हिस्सा बनती है। जाहिर है की यहाँ पर छात्रों से ज्यादा जिम्मेदारी कॉलेज प्रशासन की होती है। कॉलेज प्रसाशन को ये हर हाल में सुनिश्चित करना चाहिये की कॉलेज प्राँगण में यातायात नियमों का पालन हर हाल में हो।जहाँ बात जान हानि तक पहुँच सकती है ऐसे मालात में खास तौर पर कार्यवाही भी बनती है।

खास कर युवा छात्र और वो लोग जो शिक्षित कहलाते है जिनके लिए कहा जा सकता है की वो जो सड़क पर वाहन चलाने के नियमों से भली प्रकार परिचित है। काम से उन लोगो को सड़क की नियम का पालन उसी तरह करना चाहिये जिस तरह वो अपने धर्म का पालन करते है। अखबारों की खबरों पर यकीन करे ट्राईसिटी ( चण्डीगढ़, पंचकुला , मोहाली ) में होने वाले बहुतायत सड़क हादसे देर रात या जल्दी सुबह होते है और अधिकतर मामले जानलेवा होता है। आप खबरों का विश्लेषण करे तो पायेगे की इन मामलात में वाहन की गति हर हाल में निर्धारित मनको से कहीं ज्यादा होती है, कई बार वाहन चालक को नींद आना भी एक बड़ी वजह होती है। जल्दी सुबह तेज गाडी चालाने वाले ये तर्क भी दे सकते है की सड़क पर जब यातायात है ही नहीं तो तो गाड़ी तेज क्यों ना चलाये,ऐसे में ये भूल जाना की रात के समय मार्ग कुछ ही जगह होता और जहाँ होता है बेहद काम होता है। इन सब तथ्यों और तर्कों का जिक्र इस इस लिये क्यों की इन सब मामले को में थोड़ी सी सावधानी कई जाने बचा सकती है। आपको याद दिला दूँ की एक ऐसे ही जल्दी सुबह हुये हादसे में देश ने अपने प्रख्यात कॉमेडियन जसपाल भट्टी को खो दिया था, जब उनकी गाडी सड़क से उतर कर पेड़ से टकरा गयी थी।

एक और तथ्य जिसका जिक्र बेहद लाजिमी है "देर रात शराब पी कर गाडी चलाना" चण्डीगढ़ प्रशासन के द्वारा पिछले साल प्रकाशित आँकड़ों के असनुसार देर रात होने वाले चालान मुख्यतया नशे में गाडी चला रहे लोगो की होते है.  नशे में गाडी चलाने वाले कई लोग ये तर्क देते है की वो सब कन्ट्रोल कर लेते है। पर जब बात जान की सुरक्षा पर आती है तो ये तर्क औधें मुँह गिरने के लिये वाध्य होता है, और यातयात कानून के तहत किया गया अपराध भी। आप नये साल की अगली सुबह का अखबार पढ़े, आप होली, दशहरा दीवाली के के जश्न की बाद का अखबार पढ़े आपको सहज ही इस बात का अन्दाजा हो जायेगा कि सड़क पर कितने हादसे हुये और कैसे हुये!!!! तथ्यों के सामने तर्क वितर्क बन जायेगे, शराब पीकर वाहन चला रहे लोगो की सँख्या हुये हादसों के अनुक्रमानपाती पायेगे आप, इन हादसों के हरकारों में एक तबका उनका होता है जो नाबालिग है और गाडी चला रहे है वो भी शराब पी कर। बावजूद इसके की त्यौहारो के इन मौकों पर पुलिस की गश्त कहीं ज्यादा होती है कहीं ज्यादा पुलिसिया चेक-पोस्ट होते है।

सामान्यता सड़क हादसों में मूल कारण सड़क के नियमों की अनदेखी ही होता है। कई बार लोग गाड़ी तो चला रहे होते है अपर उनको लेन बदलते हुये इंडिकेटर देने का महत्व ही नहीं पता होता. रेड लाइट क्रॉस करके अधिकतम कोई कितना समय बचा सकता है? समूचे चण्डीगढ़ में मेरी जानकारी में २ रेड लाइट ही ऐसी है जहाँ ३ मिनट का अधिकतम समय होता है अन्यथा सभी लाल बत्तियाँ १-२ मिनट का समय लेती है। पर फिर भी रेड लाइट क्रॉस करके दूसरे की जान लेने वाले हादसे रोज के है।  हम सबब सीख नहीं पा रहे। गाडी चलाते हुये फोन पर बात करना क्या आपकी जान से ज्यादा जरूरी होता है? आप किसी भी शहर की किसी भी रेड लाइट पर खड़े हो जाईये और सुबह ८ बजे से रात ८ बजे तक की रिकॉर्डिंग ले लीजिए आपको काम से काम आधे वाहन चलाने वाले लोगो रेड लाइट पर  उसके आगे या फिर पीछे फ़ोन पर बात करते हुये गाड़ी चलाते मिल जायेगे।
वो सब हम और आप ही है।  मित्रों ये ध्यान रखना बेहद जरूरी है की " सावधानी हटी दुर्घटना घटी!!

कविता: हे नेता !!! हम नर, तुम नारायण हो। कलयुग की रामायण हो।।

ये कविता मेरे देश की नेता के नेता के नाम प्रेषित है। यहाँ नेता की तुलना रामायण के पात्र रावण से की गयी है। जनता की तुलना कई परिस्थितियों से जो रामायण का हिस्सा थी। जैसा की आप सब जानते है कि रावण बेहद बुद्धिमान, पराक्रमी थे किन्तु खुद को भगवन समझने की भूल भी करते थे, इन्ही सब पर आधारित है ये कविता।

हे नेता !!!
हम नर, तुम नारायण हो।
कलयुग की रामायण हो।।

ये भारत माँ है जनकदुलारी।
तुम बुद्धिमान पर रावण हो।।

हम वचनबद्द है दशरथ है।
तुम कोपभवन, कैकेयी रण हो।।

हम जंगल में बानी कुटी है। 
तुम पण्डित पर दुराचरण हो।।

हम सोने की हिरण भागती।
तुम कपटी हो अभ्यारण हो।।

हम लड़ते हुये जटायु।
तुम मानवता का क्षरण हो।।
 
हम लक्ष्मण की कठिन साधना।
तुम सूर्पनखा का कुटिल आवरण।।

हम सुग्रीव से बलहीन सही।
तुम मरीचिका सा प्रबल छल हो।

हम आज्ञाकारी भाई लक्ष्मण।
तुम इन्द्रजीत का विजयवरण हो।।

हम निरीह है फूलों जैसे।
तुम ५ साल की तन्द्रा, कुम्भकर्ण हो।।

हम विभीषण से धर्म प्रशिक्षु।
तुम युद्ध क्षेत्र का भीषण रण हो।।

हम टी वी से चिपके दर्शक।
तुम रामायण का प्रसारण हो।।

हे नेता !!!
हम नर, तुम नारायण हो।
कलयुग की रामायण हो।।
                               --------- विक्रम ------------
--------शब्दावली-------
जनकदुलारी - सीता;
अभ्यारण- जंगली जानवरों के रहने का स्थान
इंद्रजीत - मेघनाथ
तन्द्रा - नींद

इजहारे मुहब्बत

इज़हारे मुहब्बत और प्रेम का ताना बाना सदैव सन्देश वाहको के आस पास ही बुना जाता रहा है। प्राचीनकाल में पक्षी सन्देशवाहक  का कार्य करते थे हम इसे प्रेमदूत की भी संज्ञा दे सकते है। खतो-किताबत और प्रेमपत्र का आदान प्रदान इन्ही सन्देश वाहकों के जिम्मे रहा है । प्रेम पत्रों के माध्यम से प्रेम का इज़हार एक उत्तम तरीका रहा है दिल की बात कागज पर उतार बिना मिले-जुले ही भावों का आदान करना हर तरीके से सराहनीय था। प्रेम पत्र यादों को संजो कर रखने का भी एक बेहतर तरीका होता था प्रेम पत्रों के साथ बस एक ही हानि निहित थी। जब प्रेम पर सामाजिक दबाव होता तो कई बार प्रेम पत्र खतरनाक रूप धारण कर लेते। उल्लिखित तथ्यों की पुस्टि तत्कालीन साहित्य और रंगमंच  और फिल्मो साफ़ से साफ़ हो जाती है।  फिल्मो में भी प्रेम के सन्देशवाहक कबूतर पर कई गाने लिखे गए। प्रेमपत्रों को भी कवियों ने बड़े ऊचे पायदान पर रखा। कबूतर जा जा ……    ये मेरा प्रेम पत्र पढ़ कर तुम नाराज़ .......    लिखा जो खत तुम्हे वो तेरी याद में …
बिग बाजार: इज़हारे मुहब्बत का अनूठा तरीका
सन्देशवाहक और प्रेमपत्र भी तभी तक प्रभावी थे जब तक प्रेम एक जोड़े के बीच हो, प्रेम के एक तरफ़ा मामलात में इज़हारे मुहब्बत का तरीका थोड़ा अलग रहा है। प्रेम के इज़हार की ये विधा प्रेमी जोड़ों ने भी अपनायी किन्तु सन्देश वाहको के उपयोग के आधार पर कुछ फर्क थे। मैं उस तरीके की बात कर रहा हूँ जो प्रेमी जोड़ो को ऐतिहासिक बनने और एकल प्रेमियों को येन केन प्रकारेण अपनी मुहब्बत का इज़हार करने का माध्यम प्रदत्त करता है। प्रेम के इज़हार की ये विधा सार्वजानिक स्थानों पर अपने दस्तखत छोड़ने से जुडी है। इस विधा का आकलन किसी भी बड़े प्रसिद्ध जगह पर जाकर लगाया जा सकता है। खासकर आगरे का ताजमहल, पुराने एतिहसिक किले उदहारण स्वरुप दिल्ली का लाल किला, हैदराबाद का गोलकुण्डा, फतेहपुर सीकरी का बुलन्द दरवाजा, दिल्ली की कुतुबमीनार और हैदराबाद की चारमीनार इन सब जगहों पर दीवारों में, झरोखो पर कई दस्तखत अंकित होते है।  तस्वीरें चस्पा है।  वैसे ये ऐतिहासिक जगह को चुनने वाले अमूमन जोड़ो होते है जो  हीर-राँझा की तरह अमर प्रेमी बन जाने की इच्छा रखते है। कई बार इस तरह के दस्तखत अन्य सार्वजनिक जगहों पर भी देखे जाते है जैसे ट्रेन में बस में कई बार दरख्तों और एकान्त जगह पड़ने वाले खंडहरों में भी।कई बार ऐसा  होता है की प्रेम एक तरफ़ा था उसका इज़हार करने हेतु दस्तखत अंकित किया गए है पर कई बार जब दस्तखत के साथ दूरभाष के अंक भी लिखे जाते है तो प्रेम थोड़ा निष्ठुर और अवसादयुक्त लगाने लगता है। पर ऐसा होता है इसे रोकना थोड़ा मुश्किल होता है।
ये तरीका शायद ज्यादा लोगो का ध्यान आकर्षित करेगा।
कई बार स्कूल कॉलेज की दीवारों पर भी इस तरह के दस्तखत मिलते है। दीवारों पर, बैठने वाले बेंचो पर , पुस्तकालय में इत्यादि इत्यादि। यहाँ प्रेम की परिभाषा थोड़ी अलग होती है। यहाँ व्यक्त किया जाने वाला प्रेम मूलतया एक तरफा ही होता है। ऐसी जगहों पर जहाँ सब एक दूसरे में जानते है या तो निक नाम का इस्तेमाल किया जाता है पर यदि पूरे नाम का इस्तेमाल हुआ तो यकीनन प्रेम बेहद बेहद गहराई वाला होता है जिमसें प्रेमिका के दिल की बात भले ही प्रेमी को न पता हो पर प्रेमी एडवांस में साथ जीने और मरने की कसमे खाए बैठा होता है। साथ मिला तो ठीक नहीं तो देवदास का चरित्र धरातल में उतर आता है।
भारत में जुगाड़ हर चीज पर हावी रहा है और शायद यही जुगाड़ ही इज़हारे मुहब्बत के नए तरीको को ईजाद करने का कारण बनता है अब प्यार इलेक्टॉनिक हो चला है और कई मामलात में बेहद खतरनाक भी। दूरसंचार क्रान्ति को प्रेम के इज़हार के स्थापित माध्यमो की विलुप्ति का कारण माना जा सकता है। प्री-पेड मोबाइल और स म स आधुनिक माध्यम है। पर फिर भी देश में कई बार लोग पुराने माध्यमो के इस्तेमाल को बेहतर मानते है। जैसे इज़हार का वो तरीका जो बीरू में शोले में अपनाया थे वो युगों -युगों तक प्रासंगिक रहने की सम्भावना है। कवि भी शायद ही कभी माने प्रेमी प्रेमिकायों मण्डन करने से। एक बात तो तय है कि प्रेम करने वालों को सर्वाधिक सम्मान कवियों ने ही दिया है और देते भी रहेंगे। प्रेम कभी भी ना खत्म होने वाला विषय और भारत में सबसे ज्यादा बिकने वाला भी।

आजम खान साहब अन्ततः "विकास बोलता है बकवास नहीं"

जो आज़म खान ने कारगिल के बारे में कहाँ कहा उसमे राजनीति तो कतई नहीं है एक कुत्सित रणनीति और व्यक्तिनीति जरूर हो सकती है। हालाँकि इस तरह के बेतुके बयान आज़म की आदतों में शुमार है पर इस बार वो कई सीमायें लाँघ गये जब उन्होंने देश के बहादुर सैनिको के बलिदान को उनके असीम और अद्वितीय पराक्रम को धर्म के तराजू तौल डाला। अनेकता में एकता भारत की संस्कृति का प्रतिनिधित्व करने वाली बात रही है और देश की ताकत भी। पर इसे व्य्कतिगत निहित स्वार्थों के चलते अगर चुनौती दी जाय तो ये गहन चिन्ता का विषय है। ये जाहिर है आज़म उत्तर प्रदेश और खासकर समाजवादी पार्टी में अपनी सार्थकता सिद्ध करने के प्रयास में लगे हुये है। मान लीजिये की वो ये सिद्ध कर भी ले की उनकी वजह से मुस्लिम मत समाजवादी पार्टी को मिल भी गये तो क्या? वो देश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बच सकते है है क्या है?  नहीं सिद्ध कर पाये तो ज्यादा से ज्यादा समाजवादी पार्टी अहमियत थोड़ी सी कम होगी पर देश में एक इंसान के तौर पर सम्मान के साथ तो जी सकेगे।  आज़म खान को फिल्म "चक दे इंडिया" का वो दृश्य जरूर देखना चाहिये जब कोच " कबीर खान" अपनी टीम का संगठित करने के प्रयास में हॉकी खिलाडियों से उनका परिचय पूँछ रहे थे। खिलाडियों ने अपना परिचय दिया  … मैं कोमल चौटाला सेन्टर फॉरवर्ड हरियाणा  … मैं मेरी राल्टे पेनाल्टी शूटआउट स्पेशलिस्ट मिजोरम  …… इन सब के बाद जब कोच कबीर खान ने कहा था की मुझे प्रदेश के नाम सुनायी नहीं देते मैं केवल इंडिया को जानता हूँ। सबसे पहले देश फिर प्रदेश और अगर फिर भी कुछ बाकी बच जाये तो मेरा शहर मेरा घर!!! आज़म खान साहब अगर इस दृश्य को देख कर वो सीख ले सकते है जो हर भारतवासी के लिये जरूरी है। आज़म खान साहब की कारगिल वाली बात पर वीर अब्दुल हमीद की आत्मा रोयी तो बहुत होगी है!!!

जब मुजफ्फर नगर में दंगे हुये थे उस समय भी आज़म खान की भूमिका पर सवाल उठे थे दंगो से प्रभावित लोग आज भी सामान्य जीवन शुरू नहीं कर पाये यहाँ [फिर से उसी तरह की धार्मिक कटटरता वाली जमीन तैयार करने का प्रयास किया जा रहा है। समाजवादी पार्टी की सत्ता वापसी के बात उत्तर प्रदेश का इतिहास कई बार दंगों का गवाह बना है। और ये सब महज वोटो के लिये बेहतर होता यदि बात कर दिये गए विकास की विकास के आगे की खाके पर होती है। लोगो से पूछा जाता की क्या आपको मनरेगा में काम मिला या नहीं? पूरे पैसे मिले या नहीं? नहीं मिले तो क्या आपने कम्प्लेन फाइल करी की नहीं? नारा देते कि "आप कम्प्लेन करे कार्यवाही मैं सुनिश्चित करुँगा" हिन्दू होता या मुसलमान बहुतायत वोट आपके ऐसे नारों से ही खींचे चले आते है। विकास के नाम उत्तर प्रदेश में क्या हो रहा है ये किसी से छिपा नहीं है किसी भी शहर की सड़कों से लेकर शिक्षा सब सवालिया है। काम केवल तुष्टिकरण की नीति को पोषित कर रहा है। उधोग का विकास, रोजगार कानून व्यवस्था सब ताक पर है। दुर्गति उत्तर प्रदेश की हुयी और उस दुर्गति को छिपाने के प्रयास में ऐसी खाई खोदी जा रही है जिसको भरने के लिये प्रदेश में "गणेश शंकर विधार्थी" जैसे महान कई लोगो की कुर्बानी भी भर नहीं पायेगी।

आज़म खान साहब आपको याद दिला दूँ की अन्ततः "विकास बोलता है बकवास नहीं" आप को हिन्दू या मुसलमान से पहले इक बेहतर इंसान बनने की दिशा में प्रयास करने की आवश्यकता है। कुछ नहीं तो काम से काम कोशिश करके तो देखिये।
 आधुनिक ग़ालिब जनाब "बशीर बद्र" जी का एक शेर पेशेख़िदमत है। मतलब स्वय खोजे तो बेहतर।

"दुश्मनी करो तो जमकर करो, लेकिन ये गुंजाईश। 
रहे की जब हम दोस्त हो जाये तो शर्मिन्दा ना हो।।"

बेगाने (मोदी) की शादी में अब्दुल्ला(पप्पू) दीवाना

नरेन्द्र भाई मोदी ने हलफनामे में लिखा की वो शादीशुदा है, बात मीडिया में उछल गयी.… उछलनी ही थी गुजरात के नेता विपक्ष शंकर सिंह वाघेला ने बयान दिया और नरेन्द्र मोदी का बचाव किया, कहा मुद्दा उनकी निजी जिन्दगी से जुड़ा है अतैव राजनीति से दूर रखा जाय तो बेहतर। ऐसा एहसास हुआ की रजनीति में नैतिकता अभी भी शेष है। बयान स्वागत योग्य था। पर इसी बीच अमेठी वाले पप्पू तक खबर पहुँच गयी फिर क्या पप्पू के कानो में जू रेंग गयी पप्पू अवसादग्रस्त ( फ़्रस्ट्रेशन) हो गये कारण जाहिर है पप्पू का विवाह नहीं हो सका है जबकि एक्सपायरी जाने कब की निकल चुकी है, ऐसे में दूसरे की जुडी सकारात्मक खबरें भी नकारत्मक उत्प्रेरक का कार्य कर जाती है और वहीं हुआ पप्पू भावनाओं पर काबू नहीं कर पाये अपना अवसाद मीडिया के सामने जाहिर कर दिया शादी के मुद्दे पर मोदी को नीचे दिखाने की जुगत में राजनीति की लक्ष्मण रेखा पार कर गये। इसमें दोष पप्पू का नहीं है ये तो मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट है अब पप्पू कोई कार तो है नहीं की रिकॉल कर मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट पर काम किया जा सके।
साभार NDTV
ऐसे में पप्पू करे भी तो क्या करे? एक तो बेचारे की शादी नहीं हो पायी दाम्पत्य जीवन जी नहीं पाया बेचारा और दूसरा जिस कुँआरेपन के सहारे पप्पू PM बनने का सपना देख रहा था अब वो मुद्दा ही मर गया। अब अवसाद कहीं ना कहीं से तो निकालना ही  था। अब पप्पू भष्मासुर बने घूम रहे है। पप्पू ने रामानन्द सागर की रामायण भी तो नहीं देखी उन्हें क्या पता की लक्ष्मण रेखा क्या होती है। इतनी साड़ी खामियाँ होने के बाद तो अदालत भी माफ़ कर देती है फिर हम और आप तो संवेदनशील लोग है चलो माफ ही कर देते है!!! आगे न बोलने की नसीहत के साथ। वैसे पप्पू को अपने पूर्वजों के बारे में भी ज्यादा जानकारी नहीं लगती, अगर होती तो दूसरों के घर में पत्थर काहे को फेकते। पप्पू बड़े घर में पैदा तो हुये पर फिर भी कुपोषण का शिकार हो गये, संयुक्त राष्ट्रसंघ वाला माहौल चाहिये था पूर्ण विकास के लिये, पर रहना पड़ा देशी माहौल में अब भला विकास कैसे होता। इन सब के चलते शादी हुयी मोदी की अवसाद में नाचे पड़े है पप्पू …… 

IRCTC का बुरा हाल!!

पिछले २० मिनट से IRCTC की वेबसाइट का पेज ओपन ही हो रहा है!!! ऐसा तब हो रहा जब BHARTI AIRTEL का 4G बेहद उम्दा स्पीड पर ऐसा होता है। दिन में वेबसाइट को खोलने ऐसा तीसरा विफल प्रयास है।
 सरकारी तन्त्र की ही महानता है। सबसे ज्यादा राजस्व पैदा करने वाली वेबसाइट ये हाल  है और हमेशा ही ऐसा रहता है।  ये सरकारी तन्त्र की ही महानता है कि सबसे ज्यादा राजस्व पैदा करने वाली वेबसाइट ये हाल है और ऐसा हमेशा ही ऐसा रहता है। रेलवे के किसी काउंटर पर जायेगे तो लम्बी पन्तियाँ आपका स्वागत करने हेतु तैयार होती है, बिलकुल अव्यवस्थित और अराजक आगे निकलने की होड़ में लोग चोट भी खा जाते है।
दो पंक्तियाँ जहन में आती है।
                           

                                  तत्काल का है अकाल
                                  इंडियन रेल है भोकाल।

                                 क्या होगा खीच कर अपने बाल
                                 टिकट तो बुक कर मेरे लाल। 
     
                                 जब भी बैठो तो लो देखभाल
                                अन्यथा हो सकता है बुराहाल 
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कविता: अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते ......

अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते

अपने  और पराये में
जाति धर्म के बन्धन में
धन दौलत के अम्बर में
गला काट प्रतिस्पर्धा में।
              अब दोस्त नहीं बनते, अब दोस्त नहीं मिलते।

आप का संकट अपने पर
अपनी छाती आगे कर देते थे
बिन माँगे, बिन अनुरोध किये
कितना कुछ कर देते थे।
                अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।

साभार:blog.clarity.fm















तब छोटे से कमरे में कई लोग आ जाते थे
अब कमरे में जगह बड़ी है
पर मन बिल्कुल खाली है
टूट गयी कुछ पेड़ो से प्यारीवाली डाली है।
                                  अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।

वक़्त की बहती तेज धार में
कुछ अफ़साने बह निकले
कुछ अहसास पुराने बह निकले
शेष बची है कुछ यादे,शेष बचे है कुछ सपने।
                                  अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।
                   
गुजरे वक़्त में कुछ छूट गया है
दिल सीसे का टूट गया है
वो तस्वीरें बनाना मुश्किल है
जो कभी ह्रदय में बसती थी।
             अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।

जो अमूल्य था जो अनमोल था
वो दूर कहीं पर छूट गया है
अब कुछ देदो खुशी ना मिलती
भाग्य विधाता रूठ गया है।

                           अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।
                           अब दोस्त नहीं मिलते, अब दोस्त नहीं बनते।।

                                                                          --------------विक्रम------------------

कविता: मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?

मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?
 दफ्तर में मालिक में मालिक हड़काये
करो विरोध, पगार अटकाये 
पुलिस वाला डण्डा चटकाये
अफसर बारम्बार  भटकाये     
                         तुम बैठे बस गाओ ठुमरी, 
                         मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                          नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?

१० घण्टे है बिजली कटौती
मोहल्ले की हर सड़क है टूटी
चला रहे तुम हम पर सोटी       
हमरी ही बस किस्मत फूटी
              
                             बैठ बैठे तुम खाओ तुम रबरी,
                            मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                           नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?
साभार रेडिफ डॉट कॉम
















अफसर कभी आओ हमरी गली
यहाँ मुरझायी हर एक कली
टूट गयी हर रोड़ यहाँ पर
आम नागरिक जाये कहाँ पर

                       अब तो कुछ करो सहायता हमरी,
                       मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                        नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?
        
यहाँ रुपये १०० में बिका टमाटर
और तुम पीते हो मिनरल वाटर
यहाँ चूल्हा चौका पड़ा है सूना
और तुम घूम रहे हो पूना
 
                  बन्द करो अब ये बेशरमी, 
                  मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                  नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?

महगाई की भीषण मार पड़ी है
पूरी व्यवस्था सड़ी पड़ी है
हमरी जेब में बचा भी कुछ ना
तुम्हरी सम्पत्ति बड़ी है चौगुना
                    
                   सजा दी हमरे अरमानों ही अर्थी,
                  मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                  नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?

 सपने तो तुमने खूब दिखाये
 अब पाँच बरस बाद नज़र आये
 तुम तो ईद के चाँद हुये
अब का होये जो पाँव छुये
              
                   अब सहो जनता और मौसम गरमी
                   मैं तो आम नागरिक हूँ, मैं किसकी जिम्मेदारी हूँ?
                    नेता तुम्हरी की अफसर तुम्हरी ?
                                                       
                                                            ----- विक्रम