संता बंता और अभियन्ता .......

संता और बंता बहुत दिनों से काम की तलाश में थे। गली-गली भटके, बसो में लटके,अखबार खंगाले पर अथक प्यासों के बावजूद उन्हें कोई काम ना मिला। कई जगह से तो लगभग गाली खा कर लौटे। घर पर भी इज्जत लुटी टाइप थी बस लतियाये जाना ही बाकी बचा था। पर संता और बंता को अपने थोड़े से ही सही पर दिमाग पर पूरा भरोसा था। संता और बंता ने ठान के कुछ कर गुजरना है। इसी कवायद में माँ वैष्णो देवी के दर्शन कर लौटे। खूब मिन्नते की १५१ का प्रसाद चढ़ा आये और काफी कुछ आगे के लिए वादा कर आये। घर वापस लौटे थे की संता के पिता घंटा ने  संता को आगे पढ़ने की सलाह दी।  कहा B.TECH कर लो। संता के दिमाग में धूस -धूस कर भर दिया के उनको अब अभियन्ता बनना है। संता और बंता ने पिता घंटा से कहाँ पर पापा अभियन्ता कैसे बनेगे ? दाखिला कैसे मिलेगा ? पापा बड़ा जोर लगाना पड़ेगा छोटे से दिमाग पर। सुना है मेहनत भी करनी पड़ती है। हमसे ना हो पायेगा।
घंटा ने फिर संता को ढाढस बँधाया और बोला। बेटा मैंने दूरदर्शन में सुना है। अख़बारों में पड़ा है की अभियन्ता बनाने के कई छोटे और बड़े उधोग शहर, प्रदेश और देश में खुले है। कुछ समाचार वाले तो अभियन्ता बनाने वाले उधोग को कुटीर-उधोग का भी दर्जा देते है। क्यों की ये उधोग घर-घर और गली-गली चल रहा है। ऐसे ही किसी अभियन्ता बनाने वाली भट्टी में, तुम्हे भी डाल देगे, बन ही जायोगे। आजकल सारी जनता बन रही है अभियन्ता, तुम भी हाथ आजमायों कुछ ना होगा तो एक प्रोफेशनल डिग्री तो हाथ में होगी। ज्यादा हुआ तो कॉलेज वाले मास्टर से ही टूशन पढ़ लेना फिर कौन सा व्यावधान आएगा मार्ग में!!संता, बंता  ने अभियन्ता बनाने वाले एक कुटीर उधोग की फैक्टरी में दाखिला ले ही लिया। प्रवेश की  आहार्यता बस कक्षा -१२ पास होने की थी, प्रवेश पैसे के आधार पर होना था प्रवेश परीक्षा हवा थी ।  बाकि चलता है। घिसट-घिसट कर रो-धो कर संता और बंता ने ६ साल में कृपांकों(Grace Mark),बैक पेपर और खर्रे के सहारे अभियन्ता बनने का श्रेय हासिल कर ही लिया। आज कल संता और बंता फिर से नौकरी की तलाश में है। बंता आशावान है के वो एक दिन सॉफ्टवेयर अभियन्ता बनेगा और विदेश जाकर डॉलर कमायेगा। पर बंता बड़ा परेशान है की वो सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन तो जायेगा पर उसको पर कहीं उसको टेस्टिंग में डाल दिया तो क्या होगा, ड्रीम कंपनी में काम न मिला तो क्या होगा  ..........

गाँधी जी पैसे वाले है ……


गाँधी जी पैसे वाले है। …… एक दिन जिज्ञासावश पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में मेरी बेटी ने ऐसा कहा। वाक्या कुछ यूँ हुआ कि मैं रोज की तरह दफ्तर से घर वापस लौटा दरवाजा खुलते ही मेरी बेटी पापा पापा चिल्लाते हुये गोद में गयी गयी। शायद किंडर-ज्वाय में  थी तलाश में उसने मेरी जेब में हाथ डाला .… और उसकी तलाश खत्म हुयी जेब से एक 100 का एक नोट निकाल कर और नोट को उसने देखा और सवाल किया, पापा ये क्या है? मैंने जवाब दिया ये पैसे है। बेटी ने फिर से नोट को थोडा और परखा और फिर अगला सवाल  .... पापा ये चस्मे वाले कौन है? उसकी निगाहें गाँधी जी की तस्वीर की तरफ टिकी हुयी थी। मैंने जवाब दिया .... बेटा ये गाँधी जी है  "मोहनदास करमचन्द गाँधी" ये महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी थे और राष्ट्र पिता भी है। बेटी ने नाम को एक दो बार दुहराया।  


कुछ रोज बाद मैं बेटी को स्कूल छोड़ने जा था जिज्ञासावश या मैं मैंने बेटी से पूछ बैठा ....  बेटा गाँधी जी कौन थे? काफी सोच विचार करने के बाद ने  पूरी गम्भीरता के साथ उत्तर दिया। … गाँधी जी .... गाँधी  जी वो तो पैसे वाले थे।  अगले १० मिनट तक मैं अविरत हसता रहा। मैंने अपने कई सहकर्मियों को को भी वाक्या सुनाया सब मिल कर हँसे। इन सब के बीच एक गम्भीर सवाल मेरे जहन में कौंदा ……कि आगे आने वाली पीढ़िया हमारे देश के महापुरुषों को किस रूप में याद रखेंगी ?? नोट के आधार पर या वोट के आधार पर ?? पाठ्य पुस्तकों में जीवनी पढ़कर या फिर उनकी किस्से कहानियाँ सुन कर? आजकल जब शिक्षा बोर्ड्स के पाठ्य-क्रम सरकारों के साथ बदल जाते है । राज्य सरकारों के पाठ्यक्रम से लोगो का भरोसा बहुत पहले से उठ चुका है और साथ-साथ हमारी मानसिकता और मान्यताये भी बदली है । ये वो दौर है जब बहुत सारे माँ बाप अपने बच्चे को DID लिटिल मास्टर में नचाना चाहते है,  और बड़े रातों रात महाकरोड़पति बनना चाहते है। या फिर फिल्मी हीरो की तरह जीना चाहते है। कोई रजनीकान्त साहब वाले अंदाज़ में जीना चाहता है और कोई शाहरुख खान की तरह मिमियाना चाहता है। तात्पर्य ये है कि क्या हम आगे जाते अपनी धरोहर को आगे ले जा पायेगे? वो धरोहर जो महापुरुषों ने संजोयी थी। शायद नहीं !!! हमारे बाप दादायों के ज़माने वाले गाँधी जी अब नहीं रहे।  हमारी पीड़ी में उनका नया अवतार प्रस्तुत किया गया। आगे आने वाली पीढ़ी में फिर से कोई नया अवतार शायद आये। या फिर २ अक्टूबर को ड्राई के नाम पर गाँधी और शास्त्री जी को कोसा जाये !!

भारतीय जुगाड पर भारी, सत्य नडेला (Satya Nadella) की पारी ……....

अगर आप किसी सॉफ्टवेयर का लाइसेंस खासकर विंडोज का लेते है और इस बात का जिक्र कहीं करते है तो यकीन मानिये लोग आपको इस बात के लिये ठगा हुआ महसूस करने के लिए विवश कर देगे। समय के साथ आपको भी ग्लानि होने लगेगी और ऐसा लगेगा की मानो पैसा पानी में बहा दिया हो। जब फ्री में जुगाड हो सकता था तो पैसे क्यों दिये, अंतर्मन में हाय-तौबा  मच जायेगी। दरअसल लोग लाइसेंस ना लेना पड़े ऐसी कोशिश करते है उसके दो कारण - कंप्यूटर विक्रेता लैपटॉप,डेस्कटॉप लोगो को DOS संस्करण में उपलब्ध कराते है अतैव विंडोज में लग सकने वाला पैसा बचाने की गरज में पाईरेसी को बढ़ावा मिलता है। जब फ्री में विंडोज मिल जाती है तो लोग लाइनेक्स भी क्यों चुने। पायरेसी दोष मिला-जुला है।  एक जुगाड है जो भारत में लगभग हर काम में होता है। छोटी से छोटी बात से लेकर बड़ी से बड़ी चीज में भी जुगाड काम आ जाता है। सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर बाज़ार में तो मूलतया बर्गर और पिज्जा वाली जेनरेशन काम करती है तो शॉर्टकट तो बनने तय है।

अब जब माइक्रोसॉफ्ट ने एक भारतीय को मुख्य-कार्यकारी बना दिया तब सॉफ्टवेयर और कंप्यूटर बाजार में कुछ सुधार आने ही है। सत्य नडेला भारतीय है और भारतीय होने के नाते वो भारतीयों और यहाँ के बाज़ार उन्हें इस बात का एहको बेहतर समझते है।उनके जहन में ये ख्याल जरूर आया होगा की अगर सभी भारतीय विंडोज का लाइसेंस खरीद ले तो यकीनन माइक्रोसॉफ्ट वित्यीय फायदा होना तय है। अतैव उन्होंने प्रयास करने शुरू भी कर दिए। चण्डीगढ़ के sec -20 के भरे पूरे कंप्यूटर मार्केट में अगर आप को विंडोज इंस्टालेशन करने वाला कोई नहीं मिलेगा है। हालाँकि सख्ती पहले भी थी, किन्तु अब अभेद है। मालूम हो की इस मार्केट में विगत महीने माइक्रोसॉफ्ट ने छापामारी का एक दौर चलाया था और दुकानदारों भारी जुर्माना थोपा गया। बार इस कंप्यूटर बाजार में हर आदमी ये कहता नजर आता है के यदि विंडोज चाहिए तो असली ही मिलेगी और 6 हजार लगेगे। 

अब वो दिन दूर नहीं जब माइक्रोसॉफ्ट के विंडोज को इस्तेमाल करने के लिये आपको पूरा पैसा अदा करना होगा। पाईरेटेड संस्करण हवा होने वाले है। भारत एक बड़ा बाजार है, और इस बाजार की नब्ज पर नडेला भारतवासी होने के नाते अच्छी पकड़ रखते है। बाजार जो पहले से ही विंडोजमयी है, को आधिकारिक तौर पर भी करवा देगे और मुख्य -कार्यकारी के अपने पहले ही कारोबारी साल में शायद बेहतर विकास दर भी पा सकेगे।
इस पूरे प्रयास में ध्यान रखने वाली बात हुई की भारत जुगाड विध्या में माहिर है। ज्यादा दबाव पड़ा तो UBUNTU का चलन भी आ सकता है। वैसे भी ओपन सोर्स सोफ्ट्वेयर्स के अनगिनत फायदे है। जुगाड होगे तो जरूर। पर फिलहाल तो नडेला साहब जुगाड़ के साथ जोर-आजमाइश करने पे अमादा है। आखिर उनको भी फायदा है बगैर किसी इनोवेशन के बगैर किसी रेनोवेशन के।  जब थोड़ी सख्ती से पैसा मिल जाये तो कौन नहीं लेना चाहेगा। 

"व्हिस्ल ब्लोअर एक्ट" के बहाने "सत्येन्द्र दुबे" जी याद आ गये .........

आज एक समाचार पढ़ा कि "व्हिस्ल ब्लोअर एक्ट" सत्येन्द्र दुबे जी की शहादत के लगभग १० साल बाद आया। अखबार लिखता है कि सत्येन्द्र दुबे भ्रस्टाचार का खुलासा करने के प्रयास में शहीद हुए थे
किन्तु सच्चाई इसके इतर है। लगभग १० वर्षों की लम्बी कानूनी लड़ाई के बाद न्यायालय ने ये मान लिया कि सत्येन्द्र दुबे जी शहीद नहीं हुये थे। उनकी हत्या भोर के कुछ लुटेरों ने लूट के इरादे से की थी। इसी आधार पर हत्यारों को सजा भी सुनायी गयी। पता नहीं ये लोकतन्त्र की कौन सी दुविधा है कि चौथा स्तम्भ जिसे शहीद का दर्ज देता है कानून और व्यवस्था न्यायपालिका उसे लूट की वारदात का शिकार मानता है!!!! 
From wiki




शायद लोकतन्त्र उसी को कहते है जहाँ जनमत और फिर बहुमत का महत्व होता है। बहुमत यही कहता है कि सत्येन्द्र दुबे शहीद हुये। क्या ये संकेत काफी नहीं की देश की स्थापित व्यवस्थायों में कहीं ना कहीं बड़ा खोट आ गया है? इसका पुरसाहाल लेने वाला कोई नहीं है। यहाँ दोष न्यायलय का नहीं है। न्यायालय वहीं तस्वीर देखता है जो जाँच आयोग और पुलिस की चार्जशीट दिखाती है। हाई प्रोफाइल मामलो में पुलिस और देश की सर्वोपरि एजेंसीज की नाकामी का पूरा चिट्ठा उनकी वेबसाइट पर देखा जा सकता है। विडम्बना ये है कि हमारे देश में कानून की प्रक्रिया को प्रभावित करने का माद्दा बहुत सारे लोगो के पास होता है।

  
जब-जब बात भ्रस्टाचार और इससे जुडी लड़ाई की होती है। तब-तब अखण्ड शहीद सत्येन्द्र दुबे जी का नाम सर्वोपरि आता है। उनके मामले में कई तरह की जाँच भी हुई, पर ऐसे मामलो में होने वाली जाँच के निर्णय का लोगो को पहले से पता होता है। सत्येन्द्र जी एक समय भस्टाचार की लड़ाई के प्रतीक बन गए थे। उन्होंने भ्रस्टाचार की लड़ाई को मुक्कमल करने के साहसिक प्रयास में बात अपनी बात प्रधानमन्त्री तक को लिखी पर अफसोस अफसोस ……… हासिल कुछ भी नहीं था। 
तमाम जाँच आयोग की कोशिशो के बाद भी बहुत सारे सवाल आज भी कायम है। सत्येन्द्र जी की चिट्ठी लीक होने से लेकर दो गवाहों का मर जाना बहुत कुछ अनुत्तरित है।इस मामले को बेहद गम्भीरता से लिया जाना नितान्त जरूरी था। यहाँ एक मिसाल स्थापित होती तो यकीनन बहुत सारे अन्य नागरिक भी शायद भ्रस्टाचार की लड़ाई लड़ने कि हिम्मत कर पाते।

सत्येन्द्र दुबे जी मामले में धारावाहिक "क्राइम पेट्रोल" द्वारा प्रसारित विडिओ; 
विडियो में नाम बदला हुआ है।   



भ्रस्टाचार से लड़ने वालों को सुरक्षा देने का कानूनी प्रावधान तो हो गया किन्तु व्यवहारिक हो पायेगा इस पर संदेह है। मुझे कभी -कभी ऐसा लगता है की नये - नये कानून बना कर बस कानून का एक बड़ा तन्त्र बना रहे है। पहले शायद ये बेहतर होता की हम पुलिसिया कल्चर में सुधार लाते।  एजेंसीज को स्वतंत्रता देते।  क्यों कि अन्त में सुरक्षा के कानून की को बरकरार रखने की जिम्मेदारी भी पुलिस की होगी। जो शायद ही निभायी जायेगी। फिर से एक नया कानून सवालिया होगा और फिर से एक कानून बनाने की जरूरत आन पड़ेगी

दिल्ली में बिजली के बिलों का बढ़ना; एक प्रतिक्रिया है, एक अवसाद है।

खबर है कि दिल्ली में बिजली के दामों ने एक बार फिर से उड़ान भरी है। इस उड़ान कि डोर किसके हाथ में है, थी या रही है इस बात पर चर्चाये चल रही है। यकीनन इस सब के बीच प्रभावित केवल उपभोक्ता ही होगे। पर  उनकी गलती क्या थी? ये ना कभी मुद्दा था और ना होगा । केंद्र सरकार ने बजट में सब्सिडी का प्रावधान खत्म कर दिया। और बिजली का बिल राजनीति का शिकार बन गया। बिजली के बिल में ये उतर चढ़ाव उस राजनीति का दुस्प्रभाव है, प्रतिक्रिया है  जो हाल फिलहाल दिल्ली में हुयी। इतिहास चीख -चीख कर कह रहा है कि इससे पहले केन्द्र सरकार दिल्ली के प्रति कभी इतनी सख्त कभी ना थी। लोकसभा चुनाव सर पर है और बिजली सब्सिडी खत्म, यकीन नहीं होता। जब निर्णय और राजनीति का अखाडा खुद ही चुका है। तो आइये कारणों पर भी विचार कर ही लेते है।15 वर्षो तक जब दिल्ली पर कांग्रेस का शासन था तब शायद कभी ऐसा नहीं हुआ। आपकी बार दिल्ली की जनता ने कांग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर दिया। अब दिल्ली और जनता दोनों को उसकी सजा मिलनी ही है ऐसा मैं नहीं कहा रहा इतिहास कहता है । कुछ लोग इस बात का पिटारा पूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द जी पर भी फोड़ रहे है। तर्क है कि उन्होंने अगर केन्द्र सरकार की सहमति से घटायी होती। तो ऐसा कदापि नहीं होता। यहाँ कानूनी दाँव पेच ज्यादा है, तथ्य बहुत कम। इसके चक्कर में पड़े तो बात उलझ सकती है।  इस लिए आगे बढ़ते है। बात करते है। अरविन्द जी ने कुछ एक बार पुलिसवालों के खिलाफ कार्यवाही के लिए गृहमन्त्रालय से निवेदन किया किन्तु। नतीजा सबके सामने है। जनलोकपाल के मुद्दे पर जिस तरह अरविन्द जी की सरकार अल्पमत में आ गयी। उसी तरह तब भी आ सकती थी जब उन्होंने दिल्ली में बिजली के दाम घटाये थे पर ऐसा नहीं हुआ। इस समय केन्द्र सरकार उस बिल्ली की तरह आँखे तरेरे खड़ी है जो सामने खड़े खम्बे पर सर मार भी नहीं सकती और उसे गिरा भी देना चाहती है। पुरजोर कोशिश है ये जाहिर करने के आपने "आप" को वोट दिया सो ये तो होना ही था। गुजरे ६ दशक इसके गवाह है।
साभार - http://www.bsesdelhi.com/HTML/po_bpk.html#
 अमूमन जहाँ गैर कांग्रेसी सरकारे है वहाँ केन्द्र सरकार द्वारा प्रदत्त सुविधायों का आभाव ही रहता है। उदाहरण स्वरुप पंजाब को ले ले यहाँ पहले से ही बिजली कि डरे 7 रुपये। पड़ोस में कांग्रेस शासित राज्य हरियाणा में बिजली दरे पंजाब से काफी कम है। गैर कांग्रेसी पंजाब सरकार की माली हालत भी खबरों में रहती है। बैंक से लोन लेने के लिए एक बार तो सरकार को मोहली स्थित पुडा भवन ही गिरवी पद गया। केन्द्र सरकार के आसरे रहते तो दिवालिया हो गए होते।  हाँ यदि आप कांग्रेस को बाहर से समर्थन दे रहे है तो आप विशेष पैकेज के हक़दार जरूर है। आप के ऊपर चल रहे आय से अधिक सम्पत्ति के मामले भी कमजोर हो सकते है वापस भी लिए जा सकते है।

किसी विषय -वस्तु से कब पल्ला झाड़ना कब उसे गले लगाना है ये कांग्रेस के सियासती तजुर्बे का असर है।  बाकि के दल अपने ही दलदल में फसे रहते है। ये कांग्रेस का ही शिगूफा है। यूँ कहे कि हमेशा से रहा है। न्यूटन के नियम को "इति सिद्धम" करवाने में उस्ताद रहे है। एक हाथ दो, एक हाथ लो अगर नहीं तो फिर भुगतो। मुझे याद है की अगस्त 2011 में जब जनलोकपाल का आंदोलन चरम पर था तब अन्ना हजारे को उनके गाजियाबाद में उनके आवास से ही गिरफ्तार कर लिया गया था। उस समय तत्कालीन गृहमंत्री ने यह कह कर पल्ला झाड़ लिया था कि दिल्ली पुलिस अपना निर्णय ले रही है। अपना काम कर रही है। हमारा उससे कोई लेना देना नहीं है। ऐसा तब भी हुआ था जब रामलीला मैंदान में पुलिस ने रामदेव के आदोलन को गैर कानूनी बताते, भोर कि पहली पहर में लोगो पर लाठीचार्ज कर दिया था। औरते-बच्चे बड़े बूढ़े सभी हिंसा का शिकार हुए। तब भी गृहमंत्रालय ने अपना पल्ला झाड़ लिया था, और कहा था की पुलिस ने अपने विवेक से निर्णय लिया।  मतलब सरकार ने पल्ला झाड़ लिया और साफ़ साफ़ बहार निकल आयी।  हालाँकि अरविन्द जी के धरने के बाद समूचे देश को भान है की दिल्ली को कौन नियंत्रित करता है।

ध्यान रहे कि सत्य कि राह में संघर्ष बहुत होता है। लड़ाई लम्बी होती है।हम वो है जो अपनी आजादी के लिए दशकों लड़े है। विचलित ना हो साजिशों को समझे। परिवर्तन का दौर जब चल निकला है तो हो भी जायेगा। मार्ग में वधाए अवश्यम्भावी है। किन्तु धैर्य से मुकाबला करे। पेशानी पर बल आया तो सामने वाले को, उसकी सोच को और बल मिलेगा। हम विरोध करना, क्रान्ति करना भली प्रकार से जानते है। आखिर हम गाँधी जी, नेता जी, आजाद और भगत सिंह जी के देश से है।

तरुणावस्था में प्रेम की भाषा और परिभाषा !

प्रेम की कोई भाषा नहीं होती ऐसा हमेशा से सुनता आया हूँ। प्रेम की परिभाषा भी कभी एकीकृत और स्वीकृत नहीं हो पायी।  हालाँकि गुजरे दशक में प्यार करने वालों को प्रेम-पर्व नाम का त्यौहार उपहार स्वरुप जरूर मिल गया है। अब ये प्रेमियों के लिए धरोहर सामान है। इसकी आवृत्ति १ वर्ष है। गौरतलब है कि ये प्रेमपर्व, त्योहार औपनिवेशिक है, आयात किया हुआ। प्रेम पर्व से पहले प्रेमियो को केवल चंद नामो का ही सहारा था। हीर-राँझा, सोनी-महिवाल इत्यादि। बस इन्ही का सहारा होता था प्रेमी युगलों को। हर प्रेमिका प्रेमी से राँझा या महिवाल बनने की उम्मीद रखता था और प्रेमी प्रेमिका से हीर या सोनी बनने की। प्यार करने वालों जोड़ो का हमेशा ये विश्वास रहता है कि जो प्रेम वो कर रहे है उस जैसा प्यार पहले कभी नहीं हुआ उनकी प्रतिस्पर्धा में कोई नहीं। उनका स्तर गगनचुम्बी है। हीर-राँझा और सोनी महिवाल को जरूर अपना आदर्श मानते है। पर किसी भी स्थिति में अपने को उनसे कमतर नहीं आँकते।

जब-जब प्रेम और प्रेमियों कि बात होती है ताजमहल का जिक्र जरूर होता है। हिन्दुयो में जो दर्जा वैष्णो माँ के मन्दिर का है, मुसलमानों में जो दर्जा मक्का का है। वहीं और उससे भी ऊचा दर्जा प्रेमियों के लिए ताजमहल का हुआ करता है। ताजमहल के बहाने मुग़ल बादशाह शाहजहाँ और बेगम मुमताज का भी जिक्र हो ही जाता है। पर इस जोड़ी को वो इज्जत और रुतबा नहीं हासिल जो ताजमहल को हासिल है, सोनी -महिवाल और हीर-राँझा कि जोड़ियों को हासिल है। शायद इस लिये की शाहजहाँ बादशाह और उनके हरम में मुमताज़ के अलावा कई बेगमे थी। मतलब प्यार बटा हुआ था। पर ये भी सत्य है कि अगर आप हर प्रेम करने वाले को एक ताजमहल बनाने की इजाजत देदे तो यकीन मानिये कि देश में चारो तरफ ताजमहलो का जमावड़ा होगा। देश में रिहायशी इलाके कम पड़ जायेगे। यदि प्रेम की अवधि ताजमहल की भव्यता और कलाकारी के अनुक्रमानुपाती हो जाये तो। ये बात दीगर की बहुत सारे ताजमहल बेहद साधारण और कुरूप हो जायेगे। चंद ताजमहल ही बचेगे जो भव्य रहेगे। यहाँ तात्पर्य है की कई बार प्रेम खास कर तरुणावस्था में लघुकालीन ही होता है। दीर्घकालीन प्रेमो का चलन कम ही है। इसे समय की माँग भी कह सकते है। साथ-साथ जीने मरने की कसमे खाने वाले। बदलते ज़माने के हिसाब से अपने को ढाल भी रहे है। कभी-कभी कसमे तोड़ भी देते है। जीवन के प्रवाह में बहते हुए कई बार दुबारा किसी दूसरे के साथ खा लेते है।

प्रेम खासकर तरुणावस्था में चरम पर होता है। प्रेम जब नशों में प्रवाहित होता है तो बस प्रेम ही प्रेम होता है। भूत-भविष्य, समाज, अपने- पराये सब एक भटकाव से लगते है। तरुणावस्था का प्रेम कई मामलों में बहका हुआ और बेलगाम भी हो सकता है । प्रेमी सामाजिक दबाव के आगे नही झुकते और दबाव डालने की स्थिति में सबको अपना दुश्मन समझ बैठते है। अतैव बगावत की सम्भवनायों से इन्कार नहीं किया जा सकता। उम्र के इस दौर में आदमी का भविष्य निर्धारित करने में भी प्रेम की महती भी भूमिका होती है। जीवन के इस पड़ाव में भविष्य निर्धारक होता है।

प्रेम के कई और रूप होते है। उनका भी जिक्र कर लेना तर्कसंगत रहेगा। कई मामलो में प्रेम  एक तरफा भी हुआ करता है। इस तरह का प्रेम कई बार बेहद आक्रामक,हिंसक और विकृत भी होता है । जिक्र लाजिमी है आरती तेज़ाब काण्ड का। जिक्र इस लिये कि इस तरह का प्रेम क्या प्रेम का भाव है ,भाव का परभाव है ये निर्धारित कर सके। प्रेम की परिभाषा को एक सीमा मिल सके। मेरे गृह-नगर कानपुर में और उस समय शायद देश में ये अपनी तरह का पहला अनूठा और हिंसक प्रेम था। जब एक आला अधिकारी के सुपुत्र ने कानपुर में DAV के एक प्रोफेसर साहब की पुत्री पर हमला किया। पिता और पुत्री स्कूटर से जा रहे थे तभी पुत्री पर तेज़ाब फेका गया, पिता भी घायल हुये। पुत्री जिसका नाम आरती था बेहद गम्भीर रूप से जल गयी। सारा शहर आगे आया आरती कि मदद भी की किन्तु ये काफी नहीं था। आरती पूरी तरीके से ठीक हुई ये कह पाना बेहद मुश्किल है। इस पूरी घटना में एक बात चौकाने वाली थी कि तेज़ाब फेकने वाला एकतरफ़ा प्रेमी इस काण्ड के बाद भी लड़की से शादी करने के लिए तैयार था। ये कौन सा प्यार था ? जाने माने विशेषज्ञ भी हत-प्रभ रह गए और मनो चिकित्सक भी बगले झाकने लगे।

प्रेम का और इस आलेख का उपसंहार शायद नीचे लिखी कविता से बेहतर से बेहतर नहीं हो सकता।

"प्रेम दो मन पास लाकर जोड़ता है। 
एक तन्मयता कठिनतम तोड़ता है। 
प्रेम मधु गुंजन नहीं कुछ और ही है। 
             
प्रेम कि अपनी परिधि है मान्यताये। 
है प्रबल नि:सीम जीवन कल्पनाये। 
प्रेम रति-मंथन नहीं कुछ और ही है।"
                                                           द्वारा - "माधवीलता शुक्ला" कवियत्री, कानपुर।

 नोट:  आज का आलेख अपनी पत्नी के जन्म-दिन( २१ Feb ) पर उपहार स्वरुप समर्पित करता हूँ। धन्यवाद।

खानपूर्ति और औपचारिकतायें

शहर का यातायात शहर के दिल की धड़कन हुया करता है। वाहनो का आवागमन जिनती सरलता से होता है उस शहर का जीवन उतना ही सरल और सहज माना जाता है। विगत समय शहरीकरण को समर्पित रहा है। शहर में लोगो की सँख्या बढ़ी और लोगो के साथ -साथ वाहनो कि सँख्या और जरूरते भी। पर बुनियादी ढाचा कमोवेश वही रहा। अगर कहीं बदलाव हुआ भी तो अधिक समय तक नहीं टिक पाया। जाहिर है कि हमारे यहाँ कि सड़क एक बरसात भी नहीं झेल पाती। बिना योजना का विकास अपने साथ कई मुसीबतें लेकर भी आता है। कुल मिलाकर सड़कें सकरी होती गयी और शहर बढ़ता चला गया। आपाधापी भरे इस जीवन में जब हर कोई आगे निकलने के लिये आड़ा-तिरछा अच्छा या बुरा मार्ग अपनाने से पहले एक बार भी नहीं सोचता। ऐसे समय में सड़कों का सकरा होना शहर में गुस्ताखियों,गालियों, नोक-झोक छोटे मोटे और बड़े लड़ाई झगड़ो का कारण बना। शहर छोटा हो या बड़ा प्रशासन के पहरुए तो बस इधर उधर के कार्यों में लगे हुए होते है। उन्हें यातायात नियन्त्रण के लिए  समय कभी -कभी बड़ी मुश्किल से ही मिलता है। सो ऐसे में यातायात भगवान भरोसे ही होता है। हर आदमी तैश में होता है स्कूटर हो या कार। सब एक - दूसरे को गलियाते हुए चलते है। नियम और कानून जेब में रख कर।पुलिस कभी कभी नाके लगाती है पैसा बनती है और चल देती है।

गत सप्ताह पंजाब के मोहाली में यातायात सप्ताह मनाया जा रहा था। चौरहों के आस पास खाली जगह खोज कर यातायात पुलिस ने तम्बू  तान रखे थे। तम्बू में बड़े-बड़े बैनर भी चस्पा कर रखे थे।
- यातायात के नियमों का पालन करे
- दुर्घटना से देर भली
- शराब पी कर गाड़ी ना चलाये
पूरे हफ्ते औपचारिकतायों का दौर चला नतीजा धाक के तीन पात। कभी -कभी कुछ पुलिस वालें तम्बू में बैठे दीख पड़ते थे और कभी -कभी जानवर वहाँ नित्य क्रियाकर्म नज़र आते थे।  कुल मिला कर उस जागरूकता  से कोई भी परिवर्तन नहीं हुआ। रंच मात्र भी नहीं। मोहाली के जीरकपुर चौराहे से 1 किलोमीटर बाद चण्डीगढ़ की सीमा शुरू हो जाती है। चण्डीगढ़ के हर मुख्य चौराहे पर आपको पुलिसवाला भी मिल जाता है और लाल बत्ती भी और उसका पालन करने वालें लोग भी। जो लोग ज़ीरकपुर में बेढंगी गाड़ी चालन करते है वो चंडीगढ़ में जाकर सही। यातायात नियमों का पालन करने वालें बन जाते है।  कारण स्पष्ट है चण्डीगढ़ में चालान भी होते है और ड्राइविंग लाइसेंस भी कैंसिल होते है . मोहाली में चालान कभी -कभी होते है और ५०-१०० रुपये में मामला सेटल हो जाया करता है। बेहतर होता कि औचारिकतायो का दौर चलने से अच्छा मोहाली प्रशासन इस बात धयन देता की ड्राइविंग लाइसेंस उन्ही लोगो का बने जो निर्धारित मानक पूरे करते हो। लाइसेंस में आदमी कि गाड़ी चलाने कि गुणवत्ता का भी एक स्थान होना चाहिए। लाइसेंस कैंसिल होने चाहिये।

मैंने कई साल पहले शायद सन 2006 में अपना ड्राइविंग लाइसेंस बनवाया मात्र 200 रुपये में। मुझे अपने शहर कानपुर के यातायात कार्यालय जाने कि जरूरत भी नहीं पड़ी बस एक 200 रुपये और एक तस्वीर चस्पा कर दी। कुछ जगह दस्तखत भी। जब मैंने लाइसेंस बनवाया तब ना ही मैं ढंग से बाइक चला सकता था और कार का तो सवाल ही नहीं उठता। पर मेरे पास लाइसेंस था। ड्राइविंग लाइसेंस भी महज औचारिकता ही है। देश के लगभग हर शहर में मैं और मेरे जैसे कई और महानुभाव 200 रुपये में पूरी व्यवस्था से ऊपर हो गए जाते है । ड्राइविंग लाइसेंस-वीर कि तरह।  ये बिलकुल वैसा ही है जैसे आप हाई स्कूल की परीक्षा दिये बगैर हाई स्कूल का प्रमाण पत्र लिए घूम रहे हो। और रस्ते में घर में कहीं कोई आप से अंकों का प्रतिशत पूछ बैठे और बगले झाँकने लगे। या इसे ऐसे भी कहाँ जा सकता है की ये ड्राईवर एक झोला छाप डॉक्टर कि तरह है। जो छोटे शहरों में अपनी जगह बना लेते है। और समय के साथ उन्हें लगाने लगता है के वो वाकई डॉक्टर है। इसी गफलत में कई बार गम्भीर गलतियां हो जाया करती है। ड्राइविंग की परीक्षा नहीं दी,मतलब मूलभूत तौर तरीके नहीं सीखे। मतलब ताउम्र जब भी गाड़ी चलायेगे केवल मोटे -मोटे अंदाजे के हिसाब से। बात तो ये है कि इन्हे कभी ये पता भी नहीं चलेगा कि वो गलत ड्राइविंग कर रहे है। भूल से अगर सिखाने कि कोशिश कर दी तो कोहराम मचा देगे। तात्पर्य ये हुआ कि कई बार उल्टी दिशा में चल राह व्यक्ति या बार लेन बदल रहा व्यक्ति आप से उलझ कर लड़ने लग जाये तन भी वो बहुत मासूम होता है क्यों कि उसे पता ही नहीं होता की वो गलत कर रहा है। उसे आप गलत लगते है। जो काम ज्यादा लोग कर रहे है वो सही लगते है। ज्यादा लोग लाल बत्ती लाँघ रैह तो ये सही है !!!!!

ड्राइविंग के अपने -अपने अंदाज़ होते है। आप कानपुर में गाड़ी चला रहे होते है तो आपकी मुलाकात बेहद ही कुशल चालको से होगी जरा सी जगह मिल गयी गाडी घुसा लेगे और बिना छुए निकाल भी लेगे और नहीं निकाल पाये तो कह देगे कि नौसिखिया है। बैशाखी मुस्की छोड़गे और निकल लेगे। आप हैदरबाद में गाड़ी चलायेगे तो बहुतायत जगहो पर फर्राटा धावक मिल जायेगे आपको। चिरंजीवी और नागार्जुन इफ़ेक्ट भी मिलेगे लहराती हुई मदमस्त गाड़ियों में। कई बार तो आप सड़क के किनारे गाडी पार्क करके जूस की दुकान पर खड़े होगे और कोई आपकी गाडी को पीछे से ठोक जायेगा!!  इसे महेश बाबू साइड इफेक्ट भी कह सकते है। आप बैंगलोर में गाडी चला रहे होगे तो आप को पता ही नहीं होगा की आप जहाँ के लिए निकले है वहाँ पहुँच भी पायेगे या नहीं। कब पहुचेगे इसका पता केवल भगवान को ही होता है।  बैंगलोर में शहर और सडकों के ऊपर लोग चढ़े होते है। चण्डीगढ़ और दिल्ली जैसे शहरों कि बाहरी सड़को पर लोग केर ऊपर सड़क का नशा चढ़ होता है।  नैशनल हाईवे पर लोग चेतक कि मानिन्द हवा से बातें करते हुआ दौड़ते है।

औचरिकताए खत्म हो और व्यवहारिकताएँ अमल में आये वो दिन कभी तो आएगा। आदमी अपने आप तो सुधरने से रहा, डण्डा तो चलाना ही पड़ेगा पुलिस चलये ,प्रशासन चलाये या फिर स्वयं भगवन।  

कल लोकतन्त्र बीमार था बेहद बीमार ....

ऐसा सुना है, पढ़ा है कि कल लोकतन्त्र में कोई तकनीकि खामी आ गयी थी। इसलिये लोकतन्त्र प्रसारित नहीं हो सका!!! कुछ लोग इसे दुसरे तरीके से कह रहे थे कि तकनीति खराबी के कारण लोकसभा कि कार्यवाही का प्रसारण नहीं हो सका। कोई कुछ भी कहे पर मुझे लगता है कि तकनीति खामी लोकतन्त्र में ही आयी थी। ये तकनीति खराबी दरअसल लम्बे अरसे से है। पर अब बेहद गम्भीर रूप ले लिया। कल जब ये सब पढ़ और सुन रहा था। तब यकायक मुझे एहसास हुआ कि लोकतन्त्र शायद बीमार है पर जिन्दा है!! चर्चाये जो आम है तो कुछ तो होगा ही। लोकतन्त्र जिन्दा ही होगा !!! ये कुछ अजीब सा लग रहा था । ऐसा जैसे दिमाग, कुछ अटपटा सा सोच गया हो। अगर लोकतन्त्र जिन्दा है तो है कहाँ? मुझे तो दिखता ही नहीं कहीं पर। आखिर कहाँ गया लोकतन्त्र? किसने जिया लोकतन्त्र को और लोकतन्त्र के साथ। मुझे तो हमेशा अखबारों में, समाचारों में इश्तिहारों में लोकतन्त्र के नाम पर गुमनाम घुप्प अँधेरा ही नजर आता है। हर चौक और चौराहे, हर सरकारी दफ्तर के पास, न्यायालय के गलियारों में या फिर लोकतन्त्र के फर्माबरदारों के घरों फार्म हाउस में, या जनता दरबार में लोकतन्त्र को जिन्दा करने कि लोकतन्त्र को एक आवरण देने की कोशिश तो होती है शायद। पर  प्रभावी नहीं। पर उस दिन जब लोकतन्त्र का इलाज करने के लिये एक साहब ने जब काली-मिर्च के स्प्रे का छिड़काव किया था तब तो लोग कह रहे थे के आज लोकतन्त्र ICU में भर्ती हो गया हो गया। अब कुछ और लोगो ने उसमे तकनीति खामी बता दी है। ये लोग बड़े है जाने माने है कहा है तो सही ही कहा होगा। पर मुझे लोकतन्त्र  दिख क्यों नहीं रहा। बीमार,बेहद बीमार ही सही पर दिखे तो। कुछ ये भी कह रहे थे कि लोकतन्त्र नजरबंद कर लिया गया है।  उसका इलाज़ चल रहा था कल।  बेहद मुश्किल और लम्बा ऑपरेशन था। इसी लिये नज़रबंद कर लिया गया। ताकि इलाज़ के समय भटकाव से बच सके। काश ऐसा ही हो। काश लोकतन्त्र की बीमारी सही हो जाये।  आइये हम सब मिल कर दुआ करे कि इस असाध्य रोग से हमारा लोकतन्त्र उबार सके।

घूस भी चलता है। रसूख भी चलता है।

--------------------व्यंग - -----------------------------------------
कुछ लोगो की सीख देने की बड़ी बुरी आदत होती है। जब भी मिलेगे लगेगे आदर्श झाड़ने। ऐसा मत करो वैसा मत करो। सुधार अपने से शुरू होता है … अपने में सुधार करो बाद में किसी और से उम्मीद करो।  कानून का पालन करो। कानून सबके लिए बराबर होता है। इत्यादि इत्यादि …… अपने अनुभव के गुणगान में सबको लपेटे रहते है। जब बोलेगे खुद ही बोलेगे दूसरे की ना सुनने कि कसम रखी होती है। अब इनको कौन समझाये की आज के जमाने में भी भला कोई भ्रस्टाचार से लड़ सकता है क्या? भ्रस्टाचार सर्वव्यापी है, सर्वमान्य है। भ्रस्टाचार का अंदाज अलग है, लब्बोलुआब है।  हर जगह तूती बोलती है और ईमानदरी बोलती ही नहीं। गूँगी टाइप्स है। किसी गरीब की घर जन्मी बेटी कि तरह। या तो गर्भ में ही मार दी जाती है और अगर पैदा भी हो गयी तो चूल्हा -चौका -बर्तन से ऊपर नहीं उठ पाती। पिता तनाव ग्रस्त रहता है।

TV न्यूज़ वाले बहुत पकाते है?

क्या  मेरी तरह आपको भी कभी ये एहसास हुआ हो कि TV न्यूज़ वाले बहुत पकाते है?  खबर को सनसनी बनकर पेश करते है , फिर खबर को सपोर्ट करने की गरज में पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ डालते है। लोगो के व्यक्तिगत जीवन में सुरंग खोद कर ना जाने कौन से तान कहाँ जोड़ देते है । एक खबर पकड़ कर बैठ जायेगे २४ घंटे निरन्तर उसी का रोना रोते रहेगे । जब तक दर्शक हाय -हाय  ना करने लग जाये तब तक प्रसारण जारी  रहता है। एक दम तबाही मचा डालते है। विचारों का एक झंझावात, चक्रवात चल निकलता है। जब तक दर्शक नेस्तोनाबूद ना हो जाये ये चलते ही रहते है। माइक लेकर आदमी के पीछे पीछे उसके घर तक चले जाते है। आदमी का दिमाग परजीवी कि तरह खीच लेते है। दर्शक इधर उधर न्यूज़ चैनल बदल- बदल कर परेशान हो लेता है। पर भाई लोग बोलना नहीं छोड़ते। पहले खबर को सनसनी बना कर हेडलाइन फ़्लैश करते है उसके बाद आदमी के कार्य विशेष जिसके कारण चर्चा शुरू हुई उसको छोड़ कर बाकि सब पहलुयों पर विचार करने बैठ जाते है। पूरा बैकग्राउड खोद कर निकाल देते है।

केजरीब्रांड धरने का विशलेषण!!

केजरी धरनेबाज धुरन्धर है ,फायरब्रांड नेता है, उनका अन्दाज़ हाहाकारी है। हाहाकारी धरना देते है  जनता और जनार्दन दोनों कि पुंगी बजा डालते है। ऐसा धरना देते है कि धरने कि परिभाषा के पुनरव्याख्या करने कि जरूरत पड़ जाये। मानव सभ्यता के इतिहास में बहुत धरने हुए। पर केजरी ब्रांड धरना अनूठा है, अतुलनीय है।  उनके धरने में धर देने वाली बात है। जोश है, उन्माद है और क्रान्ति की आकांक्षा भी है। पर केजरीवाल ब्राण्ड धरना गाँधीवादी कतई नहीं। ये नये तौर तरीकों वाला थोड़ा ही सही पर हिन्सक धरना है। धरने के अर्थ बड़े व्यापक है। शब्द विन्यास के आधार पर धरना शब्द की समीक्षा करे तो पायेगे कि एक धरना होता है, और दूसरा धर + ना होता है। पहला धरना हिन्दी व्याकरण में संज्ञा है। और ये केवल केजरीवाल ब्राण्ड धरना है।
केजरी ब्राण्ड धरने के वाक्य प्रयोग बिन्दुवत है।
- कल दिल्ली के मुख्य-मंत्री धरना देगे।
- जंतर -मंतर पर आम आदमी पार्टी का धरना।

प्रेमपर्व(Valentine Day) पर एक पत्नी का पति को माँग पत्र

मायके से पत्नी द्वारा प्रेमपर्व पर गिफ्ट को लेकर लिखा गया माँग पत्र !!

प्रिय पतिदेव,
यहाँ पर मैं कुशलता से हूँ और  उम्मीद करती हूँ कि आप भी कुशल होगे। आगे समाचार ये है कि हर बार की तरह मुझे यकीन है कि आपको ये याद नहीं होगा कि आज कौन सा त्योहार है।  चलिए मैं याददास्त  को ताजा और दुरुस्त करवा देती हूँ।  आज प्रेम पर्व है वहीं प्रेमपर्व जो संत वैलेंटाइन के नाम पर मनाया जाता है। उन्होंने प्रेम के लिए जान दे दी थी। आप क्या दे रहे हो?? मुझे मालूम है कि मेरे इस प्रश्न का आप वहीं घिसा पिटा और थका हुआ जवाब देगे। …… कि गिफ्ट -विफट में क्या रखा है। ये तो सब मोहमाया है।  पर आप ये जान ले कि इस बार इस तरह के निराशावादी उत्तर अब मुझे डिगा नहीं पायेगे। मैंने दृण निश्चय किया है, कि इस पर्व पर गिफ्ट मेरा अधिकार है, और ये अधिकार अब मुझ से कोई नहीं छीन सकता।

लल्लनटाप छुटभैया नेता उर्फ़ कनपुरिया बकैत !!!

वैसे तो देश में भाति -भाति प्रजातियाँ अस्तित्व में है। पर भारत की पूर्व औधोगिक राजधानी कानपुर का अंदाज़  निराला है। ये एक ऐसा शहर है जहाँ छोटे-बड़े हर आदमी को अपने अंदर समाहित कर लेता है । इस शहर में वैसे तो लोगो की कई किस्मे पायी जाती है। पर एक खास किस्म की प्रजाति है कनपुरिया .... कनपुरिया  बकैत या यूँ कह ले की छुटभैया नेता उर्फ़ बकैत। इनका जिक्र जरूरी है। क्यों कि ये किस्म बेहद खास है। इनके बगैर कनपुरिया गलियारें सूने है। कानपुर की  हवायों, फिज़ायों  और घटायो में बस इन्ही के दावे बह रहे होते है। हर बकैत के कुछ चारित्रिक लक्षण होते है या यूँ  कहे कि गुण-धर्मं होते है जो दिन पर दिन अनुभव के साथ महिषासुरीय रूप धारण कर लेते है। इनके लक्षण बिन्दुवत है

छुटभैया नेतायों के चारित्रिक गुण-धर्म 
१. कनपुरिया बकैत अमूमन १८-३० वर्ष ये युवा होते है।  जो या तो कॉलेज शुरू कर रहे होते है या फिर कॉलेज के जाने उम्र के अंतिम पड़ाव में होते है।
२. ४-५ बार छात्र संघों के चुनावो में वोट दाल चुके होते है। दो चार बार छात्रसंघ के अध्यक्ष या फिर महामंत्री से हाथ मिला चुके होते है। यही इनकी धरोहर होती है। इसी धरोहर को सजोने में बयान करने में, बखान करने में इनके दैनिक जीवन का अधिकतर टाइम जाता है।
३ . अपने घर और मोहल्ले में छवि बेहद साफ़ रखने का हरसम्भव प्रयास होता है।
४ . ये दावा करते है की कानपुर के फला - फ़ला .... दिग्गज नेता से इनका परिचय है।
५  . दिग्गज नेता की तारीफ के पुल बाँधते ये अपनी पूरी उम्र गुजार देते है।
६ . जिस मोहल्ले में ये रहते है वहाँ का पान वाला और कुछ एक युवा इनको सुबह शाम सलाम ठोकता है।
७  . पान ये खाते है दूसरे मोहल्ले में जहाँ बकैत साहब के, पापा नहीं जाते। और इनका खता भी चलता है पान वालें के पास।  
८ . सुबह शाम घर से निकलते ही ये बकैत लोग किसी ऐसे आदमी की बाट जोहते रहते है।खुदा  न खास्ता किसी
   ने एक बार नमस्ते कर लिया तो समझो कि काण्ड हुआ।
९ . अपने बाप से बहुत डरते है। या यूँ  कह ले कि बहुत सम्मान करते है

सक्रियता का मौसम  
1. बकैतों कि सक्रियता का ख़ास मौसम कॉलेज की परीक्षायों के समय आता है । इनका दावा हमेशा मजबूत  होता है कि पर्चा आउट करा देगे तुम्हारे बस तुम्हारे लिए। तुम तो अपने खास हो। नेता जी का का प्रिंसिपल साहब से .... समझ लो बस
२. जब कॉलेज में एडमिशन का समय आता है, उस दौर में इनकी सक्रियता सबसे ज्यादा होती है। एडमिशन के लिए लोगो को अपने पास दौड़ाना और सलाम नमस्ते करवाना एक्ने मुख्य कार्य होते है।
३. छात्र संघ के चुनावो के दौरान भी सक्रियता खास होती है।  उस दौरान छात्रसंघ के ताकतवर प्रत्याशियों से अमूमन दावा किया जाता है और किस एक के जुलूस में शामिल भी हो जाते है।
४. जुलुस के दौरान अगर कोई बवाल हुआ तो ये मान लीजिये की बकैत साहब ना होते तो बवाल निपटना ही नहीं था। बस इनकी वजह से ही सुलटा सब कुछ....... इन्होने ही सुलटाया बस।

सुसुप्तावस्था का मौसम
१. ये प्रजाति पाने पापा जी के साप्ताहिक अवकाश के दिन अंडरग्राउंड रहती है।
२. कभी कभी, किसी का कोई काम फस जाये बहुत दिनों से न करवा पा रहे हो तो नेता जी मुह छिपाये घुमते है।
३. नेतागिरी का मार्केट ख़राब न हो इसके लिए हर सम्भव प्रयास करते है। नेता जी की दूकान बन्द न हो ये बात उनके लिए सर्वोपरि होती  है। सर्वाधिक भय भी मार्केट वैल्यू ख़राब होने का ही होता है।

क्या संसद में विधेयकों से खत्म हो सकते है; साम्प्रदायिक हिंसा, नश्लवाद, बलात्कार .... ??

                      जहने इन्शा कि हदे अगर इस तरह घटती रही।  
                      तो जमी पे केवल सरहदें ही सरहदें रह जायेगी।                          
हमारे देश में जब कोई वीभत्स हादसा होता है तो अचानक नेतायों, राजनेतायों, सामाजिक कार्यकर्तायों, आम आदमी सभी  के जमीर जाग उठते  है। लोग झंडे और डंडे उठा लेते है। लोकतन्त्र का चौथा स्तम्भ मीडिया भी २४ घंटे एक ही खबर को मिर्च मसाला लगा कर प्रस्तुत करता है। खबर में खोज कम और भावनात्मक आवेश ज्यादा होता है। धरना,प्रदर्शन,कैंडल लाइट मार्च जैसे कई तरीके अपना कर विरोध दर्ज किया जाता है। सरकार और प्रशासन पर दबाव बनाया जाता है। अन्तत: एक कानून बनाने का कार्य किया जाता है। कानून के क्या नफे और नुकसान होगे इस पर विमर्श या समीक्षा को शायद ही महत्व दिया जाता है।  देश की व्यवस्था में पहले से ही बहुत सारे कानून और विधेयक मौजूद है। किन्तु चर्चा का मुद्दा ये है कि क्या हम उन पर अमल कर पा रहे है।

देखो दबे पाँव कलयुग आ ही गया!!!

राहुल गाँधी जी आजकल पूरे इलाके में छाये हुए है!! खासकर चंडीगढ़ हरियाणा के इलाके में एक दम टिप-टॉप, "साला मैं तो साहब बन गया वाले अंदाज़ में" खम्बों में टंगे है। सुबह अखबार खोलो तो राहुल गाँधी जी , रस्ते में इधर -उधर जिधर जाये नज़र वहाँ राहुल जी छाये हुए है। और भला हो भी क्यों ना । चंडीगढ़ हो या हरियाणा प्रत्यक्ष - अप्रत्यक्ष रूप से सरकार और प्रशासक तो यही है। … मतलब आलाकमान …… कभी कट्टरता का मुद्दा