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What is Consumer Court? Process to file complain online

What is Consumer Court:
Court which deals with the disputes and grievances of consumer/
customer.This judiciary is set-up by government to resolve customer/
consumer grievance up to satisfaction.

Type of consumer courts In India: Bottom to top:
  1. District Consumer Disputes Redressal Forum (DCDRF): A district level court works at the district level with cases valuing up to 2million(20 lacs)
  2. State Consumer Disputes Redressal Commission (SCDRC): A state level court works at the state level with cases valuing less than 10 million(1crore) 
  3. National Consumer Disputes Redressal Commission (NCDRC): A nation level court works for the whole country and deals with amount more than 10 million (1crore)

Some Words about Consumer Court:
"Consumer always has an edge over Brand/services/Bank/Telecom"

It is very simple and fair process to lodge a complain in consumer court. Though common man often hesitate under impression that filing case will consume lot of time and money will go in waste. Let us discuss fact which empowers consumer/customer, once he chooses to file a complain in consumer court.
- Filing complain in consumer court guarantee that only consumer 
  be a beneficial if he prove case of exploitation. Even if consumer 
  is not able to prove exploitation there no chances of punishment 
  to him. This mean it only win situation for consumer.
- Hiring a counselor/lawyer is not mandatory.If one is confident 
  enough he can represent himself. By this way the complete process 
  goes cheap.
- Even if counselor/lawyer is hired compensation will be provided if 
  you win case.

Filing a consumer case by locating the court:
- Locate "District consumer disputes forum"
- Purchase a form to file consumer complain
- Pen-Down your complain point by point
- Attach the proof of exploitation like bills, Job chart based on the case

Filing a complain online:
- Browse through URL:http://www.core.nic.in/
  This website managed by "Consumer Co-ordination Counsil"
- Register at URL:http://www.core.nic.in/complainant/cregistration.aspx 
  Step1: Screen-shot of registration
Register Here
 Step2:
Greetings For registration in CORE
Step3:
Complaint can File Complain ,check status here
Step4:
Fill details here and submit


step 4 is the most important one:
    - Here one has option to choose sector to which exploiter belongs
    - Chose type issue like: Billing issue, payment not posted issue etc.
     - Fill Complaint Text diligently:
       Please enter further details with respect to the complaint.(Maximum 

       2000 characters)
     - Consequences:
       Describe the economic or physical damage that resulted.(Maximum 2000 
       characters) 

     - What relief do you want.(Maximum 2000 characters)
     - Attach supporting documents ( If you have any)

Eventually,once you are done with submitting complain below:

"CORE Centre" would follow up with your complaint and report back with the feedback received. It is sometimes necessary for our staff to contact you in order to determine whether there is a legal remedy or a basis for your complaint. There is no charge for any such consultation.

By Toll free number:
Call on number - 1800-180-4566 and follow instruction.

Kaifi Azmi :कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।।

आज की रात बहुत गरम हवा चलती है।
आज की रात ना नीद आएगी।
हम सब उठे, तुम भी उठो, हम भी उठे।
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।।
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Aaj ki raat bahut garam hawa chalti hai
Aaj ki raat na neend aayegi
Hum sub uthen, main bhi uthun, tum bhi utho
Koi khidki isi deewar mein khul jayegi
__________________________________
 
क्यों सजी है चन्दन से चित मेरे लिए?
मैं कोई जिस्म नहीं जो जलाओगे मुझे।
रख के साथ बिखर जाऊंगा दुनिया में।
ठोकर जहाँ खाओगे वहाँ पायोगे मुझे।
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kyon sazai hai chandan ki chita mere liye 
mai koi jism nahi jalao ge mujhe
rakh ke saath bikhar jaunga dunia me
thokar jahan khaogey waha paogey mujhe

- कैफ़ी आजमी

कैफ़ी आज़मी: Great poem by Kaifi Azmi: 6 दिसम्बर को फिर मिला दूसरा बनवास मुझे!!!!

लीजेंड "कैफ़ी आज़मी" जी की अद्वितीय रचना 
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राम बनवास से लौट कर जब घर को वापस आये।
याद बहुत जंगल आया जो नगर में आये।
रख्से दीवानगी आँगन में जो देखा होगा।
६ दिसम्बर को श्री राम ने सोचा होगा।।
कि इतने दीवाने कहाँ से मेरे घर में आये ??

जगमगाते थे जहाँ राम के कदमों के निशाँ। 
प्यार की कहकशाँ लेती थी अंगड़ाई जहाँ।
मोड़ नफरत के उस रह गुजर में आये।
धरम क्या उनका है, क्या जात है, ये जनता है कौन ?
घर नम जलाता तो उन्हें रात में पहचानता कौन।
घर जलाने को मेरा,लोग जो घर में आये।

शाकाहारी है मेरे दोस्त तेरा खंजर।
तुमने बाबर की तरफ फेके थे सारे पत्थर।
है मेरे सर की खता जख्म जो मेरे सर पे आये। 
पाँवो सरजू में अभी राम के धोये भी न थे।
की नज़र आये वहां खून के गहरे धब्बे।
पाँव धोये बिना सरजू के किनरे से उठे।
राम ये कहते हुए अपने द्वारे से उठे।
राजधानी की फिजा आई नहीं रास मुझे।
6 दिसम्बर को फिर मिला दूसरा बनवास मुझे। 
6 दिसम्बर को फिर मिला दूसरा बनवास मुझे।।
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Ram banwaas se jab laut ke ghar mein aaye,
Yaad jangal bahut aaya jo nagar mein aaye,
Raqssedeewangee aangan mein jo dekha hoga,
6 december ko Shri Ram ne socha hoga,
Itne deewane kahan se mere ghar mein aaye?

Jagmagate thhe jahan Ram key qadmon ke nishaan,
Piyaar kee kahkashan leti thi angdayee jahan,
Mod nafrat ke usee rah guzar mein aaye,
Dharam kya unka hae, kya zaat hae, yeh janta kaun?
Ghar na jalta tau unhe raat mein pehchanta kaun,
Ghar jalane ko mera, log jo ghar mein aaye,
Shakahari hae mere dost tumahara khanjar.

Tumne Babar kee taraf pheke thhe saare patthar
Hae mere sar ki khata zakhm jo sar mein aaye,
Paun Sarjoo mein aabhi Ram ne dhoye bhee na thhe
Ke nazar aaye wahan khoon ke gehre dhabbe,
Paun dhoye bina Sarjoo ke kinare se uthe,
Ram yeh kehte hue aapne dwaare se uthe,
Rajdhani kee fiza aayee nahin raas mujhe,
6 December ko mila doosra banwaas mujhe.

मौलाना मुलायम और उनकी तुष्टिकरण की नीतियाँ

वर्तमान उत्तर-प्रदेश सरकार की नीतियाँ तुष्टिकरण पर आधारित है, ये जगजाहिर है !!! ये मानना गलत नहीं होगा की ये नीति ही उनकी राजनीति का केंद्रबिंदु है। पर दुखद ये है कि तुष्टिकरण की ये नीति हर क्षेत्र में प्रभाव दिखा रही। हाल ही में उत्तर प्रदेश में "84 कोशी यात्रा" को प्रतबंधित करना क्या उचित कदम है? खासकर जब यात्रा में "संत समाज" भाग ले रहा हो? ऐसे में ये मान लेना की "84 कोशी यात्रा" एक रजनीतिक यात्रा है।  ये मान्यता तथ्यपरक नहीं है। विश्लेषण करे तो पायेगे की ये यात्रा पहले भी होती आयी है, और हर बार शांति-पूर्वक रूप में सम्पन्न हुई है। ऐसे में प्रतिबन्ध लगा क्या तुष्टिकरण की नीति को पोषित नहीं किया जा रहा? यदि इस यात्रा को सुचारू रूप से होने दिया जाता और कोई वाधा न डाली जाती तो ये तनावपूर्ण वातावरण तैयार नहीं होता। धर्म विशेष पर निशाना साधना और धार्मिक कार्यों में वाधा डालना एक लम्बे संघर्ष की राह पकड़ सकता है।
फ्लैग मार्च तो टाइट सिक्यूरिटी

बेहतर होता की उत्तर-प्रदेश सरकार यात्रा को प्रतिबंधित करने की जगह, यात्रा की शशर्त इजाजत देती और यात्रा के दौरान लोगो संतों की संख्या को सीमित रखने की शर्त रखती। ये एक शांति-पूर्वक हल हो सकता था। सम्भावनाये और भी है जिन पर विचार किया जा सकता था। किन्तु यात्रा को सिरे से ख़ारिज करना सन्देह को जन्म देता कि यात्रा को प्रतिबंधित करने के पीछे सरकार की क्या मंशा है? जो यात्रा हमेशा से होती आयी, शांतिपूर्वक हुई है, गड़बड़ी का कोई इतिहास नहीं है, उसको रोकने के पीछे बदनीयती तो नहीं? अगर तथ्यात्मक विश्लेषण करे तो सम्भावना ये भी है कि बीते दिनों में "दुर्गा -शक्ति" मुद्दे पर सरकार की जो फजीहत हुई वो उसके फजीहत के प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से लोगो का ध्यान भटकना चाह रही है!! दूसरी सम्भावना ये भी की "आजम खान साहब" को खुश करने की कोशिश है या फिर धर्म-विशेष के मतों का ध्रुवीकरण करने का प्रयास है? हालाँकि लोग ये सवाल भी उठायेगे कि ये यात्रा हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश है!!! हो सकता है ऐसा हो भी किन्तु सच ये भी है की ये यात्रा हिन्दुयों की धार्मिक यात्रा है, जो हमेशा से होती आयी। और अभी तक यात्रा करने की को मंशा घोषित नहीं है।  ऐसे हालात में पूर्वाग्रह से ग्रषित हो कर कोई निर्णय क्यों लेना? वैसे भी प्रदेश सरकार के पास सर्वाधिकार सुरक्षित है।  अगर यात्रा होती तो वो किसी भी समय यात्रा रोक सकती थी अगर उसे ये लगता की किसी तरह का कोई उन्माद पैदा होगा।  शांति-पूर्वक हल निकलने की बजाय टकराव का रास्ता अपनाना एक धर्म -निरपेक्ष लोकतंत्र में उचित नहीं है।

भारत के किस निर्माण पे हक है मेरा?

दूरदर्शन, आकाशवाणी, दैनिक समाचार-पत्र कुल मिला चारों दिशायों से बस एक ही विज्ञापन प्रशारित हो रहा है।  "भारत के इस निर्माण में हक है मेरा" मैं हैरान हूँ , परेशान हूँ सोच रहा हूँ और सोच कर कुण्ठा का शिकार हो रहा हूँ कि "भारत के किस निर्माण पे हक है मेरा???" उस भारत के निर्माण में जहाँ रोजमर्रा के जीवन में मैं खुद को और पाने परिवार को सुरक्षित नहीं पाता?  ना सामाजिक सुरक्षा, ना आर्थिक और न ही मानसिक!!! जब भी समाचार पत्र पढ़ता हूँ विचलित हो जाता हूँ। अपराध, भ्रस्टाचार, की ख़बरों के अलावा कुछ नहीं होता। क्या ऐसे ही भारत के निर्माण पे हक है मेरा??? जहाँ कानून और व्यवस्था से ऊपर राजनेता और नौकरशाह है। उस भारत के निर्माण पे हक है मेरा?  या उस भारत के निर्माण में जो देश की सीमायों पर अपने गौरव की अपने सैनिको की सुरक्षा नहीं कर पता ? या फिर उस भारत के निर्माण में जहाँ एक हिस्से में  दुश्मन देश का झंडा फहराया जाता है।  और दूसरे हिस्से में इसी मुद्दे पर गन्दी राजनीती होती है ? या उस भारत के निर्माण में जहाँ एक भीषण प्राकृतिक आपदा आती है। और उसकी पूर्वानुमान तक हम नहीं लगा पाते? मौसम विज्ञान में अनुशंधान ने नाम पर भरी पैसा खर्चा किया जाता है और उनकी उत्पादकता का कोई हिसाब नहीं ? सरकारी तंत्र को इसका अहसास होने में २ दिन का समय लग जाता है?? जहाँ लोग कोयला खा जाते है और और उसके दस्तावेज गम कर दिए जाते है। जहाँ कलमाड़ी साहब रहते है। जहाँ की संसद देश की समस्याओं पर नहीं बस राजनीतिक मुद्दे पर चलती है।  जहाँ की मुद्रा हवा हवाई खेल रही है? मैं ऐसे भारत ने निर्माण का हक़दार नहीं होना चाहता।  और पुरजोर विरोध करता हूँ ऐसे भारत के निर्माण का जहाँ आम आदमी की आवाज़ सरकार तक नहीं जा सकती। जहाँ मानवीय मूल्यों से ज्यादा तवज्जो पुराने कानून को दी जाती है।  मेरा ऐसे भारत के निर्माण में कोई हक नहीं। शिवाय इसके की मुझसे और मेरे जैसे देशवाशियों से आयकर के नाम पर जबरन वसूला जाता है। जो बाद में स्विस बैंक तक पहुच जाता है।

मुंबई में फिर हुआ दामिनी का दमन ???

यकीन नहीं आता की जिस देश में सरकारें कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ दूरदर्शन पर, आकाशवाणी पर, चौराहों और धार्मिक स्थानों पर पोस्टर चस्पा करके प्रचार-प्रसार में व्यस्त है। एक कन्या होने पर SBI ताउम्र शिक्षा का खर्च वहन करने को तैयार है। उसी देश में नारी पर चंद आसामाजिक तत्व क्रूरता करते है। कभी भारत की राजनैतिक राजधानी में तो कभी व्यापारिक राजधानी में?? और ऐसी ही क्रूरता, बर्बरता, देश के अन्य स्थानों पर भी होती है। कभी कभी मामले प्रकाश में आ जाते है और कई बार व्यवस्था की अँधेरी गलियों में खो जाते है। कई पुलिसिया तंत्र के खौफ से ही शिशकियों में तब्दील हो जाते है। ऐसे में सवाल उठता की क्या हमारी सरकार इस तरह को हादसों को रोक पाने में नाकाम है? न्याय मिलने में दशक क्यों लग जाते है? लोगो का विश्वास कानून और व्यवस्था से क्यों उठा हुआ है? एक प्रसिद्ध कहावत है की  "जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड" यही अपने देश में हो रहा है !!! सेशन कोर्ट से फैसला आने में दशकों का समय लगता है और यकीन माने बच्चा वक़्त की साथ बड़ा होता जाता है। जवान बूढा हो जाता है और बूढा गुजर जाता है न्याय की आश में।  क्या हम इस बात से इनकार कर सकते है कि आरोपी को समय पर दण्डित न करना अपराध को प्रोत्षाहन देने जैसा नहीं है? क्या हमने न्याय में व्यवस्था-गत खामियों को दूर करने का प्रयत्न मात्र भी किया है? क्या देश में कभी न्याय मिलने की समय सीमा निर्धारित हुयी है? क्या हमने तारीख तंत्र को कभी जाँचा या परखा है ? देश में विध्यामान तमाम अपराधों का मूल कारण न्याय का देर से मिलना नहीं है ???
क्या हम सबको इस बात का पूरा यकीन नहीं है की आने वाले भविष्य में इस तरह के हादसों की पुनरावृति फिर होगी? जिक्र लाजिमी है कि हम एक व्यवस्था और तन्त्र के रूप में पिछली गलतियों से सबक लेने के लिए तैयार नहीं है! और गलतियों से न सीखना सभ्यता के पतन का मूल कारण होता है। बीते साल के अंत में दिल्ली में १६ DEC की घटना का पुरजोर विरोध किया गया।
साभार विकिपीडिया :रेजीना हिल्स दिल्ली में विरोध प्रदर्शन का द्रश्

आगे चलते हुए केस को फ़ास्ट ट्रैक में डाल दिया गया और जस्टिस वर्मा ने कुछ बदलाव कानून में किये। मृत्यु-दंड की माँग की गयी, अपराधी को रसायनों के प्रयोग से नपुंसक बनाने की भी बात हुई ।  पर ये सब बाते एक झूठी कवायद थी सत्य को दरकिनार करने की।  बुनयादी सवाल ये था की क्या हम आरोपियों को सजा भी दे पायेगे या नहीं ?? सजा की कठोरता तो सजा मिलने के बाद का पड़ाव है।  बात केवल सजा की कठोरता पर हुई ख़तम हो गयी।  सजा कब मिलेगी?  इस पर कोई  नियत समय निर्धारित नहीं हुआ।  जबकि आरोपी, गवाह और सबूत सभी दामिनी के शहीद होने के पहले ही मौजूद थे। मालूम हो इस दामिनी कांड को केवल भारत ही नहीं बल्कि विदेश के मानवाधिकार संगठन भी देख रहे थे। और अमानवीय घटना के दोषियों को सजा देने के अलावा ये देश की प्रतिस्था का भी मुद्दा था। क्या हमने या सरकार ने कभी इस विषय पर अनुसंधान किया, विश्लेषण किया।  शायद नहीं !!!!!!जब दामिनी काण्ड  को फ़ास्ट ट्रैक न्यायलय में दिया गया था तो कहा गया था की केस की सुनवाई प्रतिदिन होगी।  शायद ऐसा हुआ भी हो !!! पर यकीन करना मुश्किल है कि 8 महीने प्रतिदिन सुनवाई के बाद भी न्याय अभी तक नहीं हुआ।  जबकि चश्मदीद खुद दामिनी थी!!  और वो घटना के बाद जीवित थी!!  दामिनी का मित्र जीवित है और इस केस का मुख्य गवाह भी!!!!! इस केस में फैसला न हो पाने के कारण या हो रहे विलम्ब को दूर करने के क्या प्रयास किये ?? गए या यूं कह ले की यहाँ भी लगातार तारीख पर तारीख वाला सिलसिला क्यों चला ?? इसका जवाब शायद ही मिले। इस केस में अगर अपराधियों को सजा समय पर मिलती तो ये एक नजीर होती उनके लिए जो जिनके जहन इस तरह के अपराध का ख्याल भी आता है।  और शायद मुबई का हादसा होने से बच जाता!! बेहतर होता कि केस की महत्ता के मद्देनज़र देश के कानून मंत्री स्वयं 15 दिन या १ महीने में हर बार प्रेस-कांफ्रेंस बुला केस में हुई प्रगति से देश और देशवाशियों को अवगत करते जो सरकार पर जनता को जोड़ने का काम करता और जनता का विश्वास व्यवस्था पर कायम होता। अगर ये करने के लिए कानून में संशोधन की जरूरत होती तो वो भी करना उचित था। सजा का भय होना बेहद जरूरी और अगर ऐसा नहीं तो यकीनन हम अपराध और अपराधियों को प्रोत्षाहित कर है  ये कह कर की आ "बैल मुझे मार " यकीन मानिये समयबद्द न्याय समाज में एक नयी उर्जा और अपराधियों में एक भय पैदा कर सकता है जो वक़्त के साथ नयी सभ्यता और चलन का कारन बन सकता है।  

खबर असाधारण,आश्चर्यजनक ,अदभुद, और अविस्मर्णीय

चोरी- डकैती की खबरे यूं तो बहुत आम है।  किन्तु ये खबर असाधारण, आश्चर्यजनक, अदभुद,
और अविस्मर्णीय है।  ऐसा शायद ही कभी हुआ हो? पर हुआ है ये तय है। ये साधारण
सी दिखने वाली, असाधारण  घटना भारत के आने वाले भविष्य का एक प्रतिबिम्ब मात्र है।
आने वालें समय में ऐसी ही कई और घटनाये प्रकाश में आये हो हतप्रभ होने की जरूरत नहीं।
सच मान कर स्वीकार करे।  जब महगांई आसमान हूँ रही हो, रूपया धूल चाट रहा हो और
सरकार किन्तु और परन्तु के जाल में उलझी हो। तो बहुत सारी अस्वाभाविक खबरें
स्वभाविक ही जाती है!!!!  और ऐसा हो भी क्यों ना? सोना- चाँदी तो आजकल बहुत
अत्यंत महंगा है। बेचने और लेने में PANCARD की जरूरत होती है।  मतलब पकडे
जाने का डर। प्याज का क्या है, कहीं-भी कभी-भी रेडी लगा बेच लेगे। और भी मार्जिन
तगड़ा है।गौर तलब है की प्याज अगर बाज़ार भाव से कम में दे दी तो हाथों -हाथ  बिक
भी जाएगी और लोगो की दुयाए भी बोनस में मिलेगी।  सांप भी मर जायेगा और लाठी
भी टूट जाएगी।

Important aspects of Employee Provident Fund (EPF) - EPF, EPS, EDLI

In recent past, while at office, discussion at lunch time, tea time and various available online forums. I often interacted with several fellow colleagues, most of them were having several confusions, assumptions, in context of  EPF, EPS, their further breakup, various component, % of deduction, withdrawal, transfer, question like who manages PF etc. As a conclusion to all these discussions, I am under impression that only few of us know about EPF, EPS, and its importance, points which should be always taken care-of with respect to EPF. Missing social security tools importance may leads to less earning than expected. This may also lead to some amount going to unclaimed funds of EPFO. You might have came across the news that various PSU banks has thousands of Crore INR as unclaimed amount pending with them. Consider a equivalent situation EPFO as well. As EPF is mandatory deduction for all organizations working with more than 20 employees strength. So the quantum of  unclaimed amount can be understood. As now a days switching company in every sector is very often observed, resulting to change of PF account a person is holding. So be cautious with your earning which are going to help after retirement, or better term here may in various stages of life when you need financial assistance. Below are the fact one need to know to operate their EPF and EPS account efficiently:


What is EPF(Employees Provident Fund)? What all are its component?

EPF- Employee Provident Fund is "social security" constituted Act, 1952. This provides social security to employees( work force). In companies internal working this social security fund is often referred as retiral benefits. EPF can be further subdivided in three components:
1. EPF
2. EPS
3. ELDI

EPF - Is sum of deductions and contribution from employee and employer.


Calculation of PF(EPF)

1. If Basic Salary is > INR 15000
    - 12% Basic Salary of Employee + 12% of Basic Salary
       contributed by employer -1250

2. Basic Salary is < INR 15000 the contribution will be

      calculated based on
   - 12% of Basic salary from employee + 12% of basic salary
      of employee -8.5 % of basic salary

What is EPS?

EPS is part deduction from contribution by employer

Calculation of EPS

1. Basic Salary > INR 15000
    - 1250 will deducted towards pension account

2. Basic Salary < INR
15000
    - 8.5% of INR 6500 will be deducted

3. EDLI: Employer contributes - 0.5%of basic salary.

Points to be noted :

EPF - Either managed by RPFC* or by "trust commissioned by company"
EPS - Always managed only by RPFC* only, even if company has it own trust.
          
Gist of EPFO Program( Minute Details)

Program name
ProgramType
Financing
Coverage
Employees Provident Fund
Mandatory
   Employer: 1.67-3.67%
 Firms with + 20  employees

Employee:10-12%

Government: None
Employees Pension Scheme (EPS)
Mandatory
Employer: 8.33%
Firms with + 20 employees
Employee: None
Government: 1.16%
Employees Deposit Linked Insurance Scheme (EDLI)
Mandatory
Employer: 0.5%
Firms with + 20 employees
Employees: None
Government: None

( Taken from labour Ministry website- http://www.labour.nic.in) 

Point to be taken care while switching company:
- This is sole responsibility of employee to get his EPF abd EPS transferred
- Either PF is managed by trust or RPFC no interest will be given if account remains idle for period greater that 3 years.
- To transfer EPF and EPS both one has to submit two separate form with the employer which later on sent to RPFC or trust for -EPF and RPFC for pension.

It is best to get transferred EPF and EPS both with-in short time-frame after switching job.As time passes process goes complex due to various factors. If employee forget to transfer his EPS or EPF then he his bounded to loose that money or if going to face lot of complexities going ahead. I have seen lot of guys getting EPF transferred but they either do not know about EPS or they forgets about that.


Getting your PF withdraw:

Common assumption which most of us has  
1. Withdrawing PF prior to 5 years of membership will invite tax deduction
    "amount paid" after tax deduction.
Fact- 
It is true that withdrawing PF prior completing 5 year of membership invites tax deduction but important point to note here is PF office will not deduct tax while paying final amount.It is responsibility of employee to declare received amount as "income from other sources while filing tax" and pay the remaining amount.

2. If one form-13 is sufficient to get both EPF and EPS transferred

 Fact: 
 Two separate form-13 need to submitted form are required. On top of form one has mention that is meant 
 for  EPS or EPF.

3. EPF and EPS account number or same or different?
Fact:
Mostly both EPF and EPS account numbers are same but factually
they can differ as well. Usually they are same.

What if your PF transfer is taking lot of time and you do not know status:

- Log a grievance in respective PF office( it is online) & keep following till the time EPF and EPS transferred?
- In case4 your EPF account is managed by RPFC. One can know his PF balance at any given point of time. to know PF balance click here also one should have his salary slip or EPF account number in has which trying to know balance.

In case you are not satisfied with response, file an RTI - right to information application. Asking below questions:

·         When you application of EPF and EPS transfer received?
·         What is day to day progress on your application? Starting from day1
·         Please ask if there was blocking issue which caused delayed in execution? Please provide detail of issue, officer name and designation who handled this?
·         What is clause of penalty if my application has been kept on hold for time more than applicable?
·         What is maximum time of resolution of EPF and EPS transfer application?
·         How may application you resolved timely in last one year time frame?

The information provided in response of RTI query is provided on letter head of organization and that can be considered proof received by government? These questions are sufficient to serve you purpose. Though it is often observed that in case of RTI, queries responded with bit delay from PF offices. It may be due to heavy work load they have. Therefore, I suggest you to wait for 40 days to get response rather than 30 days.


What is maximum pension amount a employee can get :
INR 3250  based on calculations

What is the minimum amount of pension as of now ( declared on Jan-14) 
INR 1000 as notified by Labour Ministry , that may need further approval of cabinet.

Revision Notification from Labour Ministry 
Labour ministry has approved new basic salary that is INR 15000 for calculation of EPS. Till now this was INR 6500.

Abbreviations:
RPFC- Regional provident fund  commission - The office of India government?
EPF - Employee Provident Fund
EPS  - Employee Pension scheme
RTI - Right to information ( RTI act enabled in 2005 )

For more question please contact at - vpsinghknp@gmail.com

पैसे और प्रभाव का दम, कानून बेदम ....

- हाल ही में चंडीगढ़ में एक हादसा हुआ। बेहद तेज रफ़्तार BMW ने अपना नियंत्रण खो दिया और divider को तोड़ कर दूसरी ओर से आ रही तवेरा गाड़ी को सामने से टक्कर मारी। और तवेरा सवार तीन लोग परलोक सिधार गए।  BMW सवार बच निकले और गाडी छोड़ कर फरार हो गए।  घटना के आये बाद आये पुलिस बल ने  जाँच पड़ताल की और तवेरा ने मृत ड्राईवर को खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया।  जाहिर है की BMW सवार शहर में काफी प्रभावशाली थे। तवेरा के मृत ड्राईवर पर मुकदमा उसी का परिणाम था।  हालाँकि ये गौरतलब है की BMW में तलाशी के दौरान बियर की कई बोटेल और नमकीन इत्यादि मिले। जब माल मीडिया में आया तो आला पुलिस अधिकारियों ने जाँच दुबारा करवाई और BMW के ड्राईवर के ऊपर कानूनी कार्यवाही की।

- चंडीगढ़ शहर में यातायात नियमो के प्रचार-प्रसार की गरज से शहर पुलिस के आला अधिकारियों की उपस्थिति में कार्यक्रम शुरू हुआ एक bike सवार द्वारा खतनाक स्टंट्स के साथ जो जानलेवा भी हो सकता था
और तो और स्टंट करने वालें सख्स ने हेलमेट भी नहीं पहन था।  अखबार में ये स्टंट वाली फोटो छप गयी और दूसरे दिन शहर के पुलिस कप्तान ने अन्य आला अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछ ही लिया??? की ये यातायात नियम सिखाने की कोशिश थीं या इसके उलट ? जिक्र लाजिमी है दिलवालों के शहर दिल्ली में एक bike सवार को स्टंट दिखाने की क्या सजा`मिली थी !!!!! पर यहाँ केवल एक नोटिस से काम हो गया ख़तम!!!! अफ़सोस  

- ये शहर के रक्षक है।  क्या इन्हें नियम कायदे और कानूनों को धता बताने का हक है? क्या इन पर कभी कसी जा सकेगी नकेल? ये सवाल बड़ा है और इसका जवाब हमारी लडखडाती कानून और न्याय व्यवस्था में कोई देगा ये यक्ष प्रश्न है।
साभार दैनिक भास्कर
नोट - मेरे व्यक्तिगत अनुभव के अनुसार चंडीगढ़ पुलिस अन्य शहरों की पुलिस बहुत बेहतर है। 

ना माया मिली न राम, बस हर तरफ कोहराम

भारत सरकार आज कल जो भी प्रयास करती है हो जाता है उसके उलट।  या यूँ कहें की सर मुड़ाते ही ओले पड़ जाते है। सरकार की हालत राज कॉमिक्स के हीरो "बाँकेलाल" की तरह है। अब सोने(gold) की बात ही ले लीजिये।  सोने की मांग को कम करने की नियति से सरकार में आयात कर ४ प्रतिशत से बढ़ा कर १० प्रतिशत कर दी पर नतीजा ढाक के तीन पात।  सोने के दाम २५००० प्रति १० ग्राम से बढकर ३१००० प्रति दस ग्राम तक आ गए।  और तो और सोने की माँग पिछले तिमाही की तुलना में ७१ इस प्रतिशत तक बढ़ गयी।
गिरे हुई सकल घरेलू उत्पाद ने पहले ही सरकार के १२ बजा रखे थे ऊपर से अचानक रूपया टूटना शुरू हो गया और ये सिलसिला मुट्ठी से रेत गिरने के  मानिन्द था ।  हर संभव प्रयास भारत सरकार ने और और "भारतीय रिज़र्व बैंक" ने किये पर फलीभूत नहीं हुआ कोई भी।  अफ़सोस ये है की इस प्रयास में उन्होंने पाने ही हाथ जला लिए और भारत के अर्थ जगत के "संवेदी सूच्यांक -SENSEX " ने वो ग़ोता लगाया की, निवेशकों के २ लाख करोड़ रुपये १ दिन में ही हवा हो गए।  या यूं कहे की दलाल स्ट्रीट में भीषण रक्तपात हुआ। प्रक्रियागत खामियों के चलते लंबित प्रोजेक्ट न पास होने के कारण विदेशी निवेशकों का भरोसा तो पहले ही टूटा था ऊपर से "spot exchange" MCX में संभावित घोटाले के चलते स्थिति इस तरह डावाडोल हुई की विदेशी संस्थागत निवशकों ने बाज़ार में भारी बिकवाली की। सरकार की हालत और पतली तब हुई जब महीने पहले पास हो चुके FDI के नियम निवशकों को नहीं भाये। यूं कहा ले की अब तक कोई बड़ा या चित निवेश लाने में सरकार पूर्णतया नाकाम रही।  मतलब ये हुआ की नीति नियंतायों के चारो खाने चित हो गए।  और आगे चलते पता नहीं अर्थ व्यवस्था कैसे संभल पायेगी ???? सरकार ने पहले ही खूब लुटिया डूबोयी और अब तो राजनीतिक लाभ लेने वाले फैसले करने का टाइम आ गया है।  मुफ्त लैपटॉप , मुफ्त अनाज तो भैया कैसे चलेगा देश का का काम काज???????????????????????

मैं कानपुर हूँ मैं ... मिट रहा हूँ मैं... सिमट रहा हूँ ...

मैं कानपुर हूँ मेरा एक गौरवशाली अतीत है जो मुगलिया सल्तनत से लेकर बर्तानिया हुकूमत तक केवल और केवल नए-नए आयाम स्थापित करता रहा और कई इतिहास रचे। देश की आज़ादी की लड़ाई से भारत की औधोगिक राजधानी बनने तक का सफ़र शानदार था बेहद ही शानदार। किन्तु वर्तमान जब अपने ही लोग देश के तख़्त पर आसीन है। तब से मैं लगातार अविरत पीड़ित हूँ, शिकार हूँ और यूं कहे की अनाथ हूँ। कमोवेश सच ये है की मैं अर्श से फर्श पर आ गया हूँ । हालाँकि मेरा वजूद आज भी कायम पर मैं संघर्षरत हूँ, मैं जूझ रहा हूँ, नीति के नियंतायों, से देश की राजनीती से, मैं जूझ रहा हूँ उस दर्द से जो मेरे अपनों ने मुझे दिया। लोग कहते है की मैं अपनी जमीन पर कोई बड़ा राजनीतिज्ञ पैदा नहीं कर पाया शयाद इस लिए गुजरते वक़्त के साथ मैं हाशिये पर आ गया। कुछ लोगो का ये भी मानना है की मैं कभी क्षेत्रीय दलों को तवज्जो नहीं दी इस लिए मैं बेगाना हो गया। मेरे जहन में बहुत दर्द है क्यों की मैं मिट रहा हूँ। …. मैं सिमट रहा हूँ। …. मेरा गौरवशाली अतीत अब केवल किताबों का हिस्सा बनने की कगार पार है। 
Screenshot from wiki of Kanpur









जिक्र लाजिमी की की देश के १०वे प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने अपनी उच्च शिक्षा मेरी ही गोद में देश विशालतम DAV कॉलेज में ग्रहण की और वो अपने पिता के साथ एक ही हॉस्टल में रहा करते थे। पर फिर भी मैं राजनीतिक तौर पर अनाथ रहा गया पता नहीं क्यों और कैसे मैं हाशिये पर आ गया। वक़्त के साथ धूमिल होती मेरी गरिमायी छवि जो कभी बेहद शानदार थी वो छवि जो मैंने और मेरे हुक्मरानों ने बनाने में सदियाँ लगा दी। उसकी महत्वपूर्ण दास्ताँ शुरू होती है सन १८५७ से

१८५७ की क्रांति:

मैं १८५७ की क्रांति - "देश की सबसे बड़ी क्रांति" का गढ़ और गवाह था। गंगातट पर बसे बिठूर से तत्कालीन प्रशासक बाजीराव पेशवा नानाराव साहब धोंडू पंत ने मोर्चा संभाला और बर्तानिया सरकार हुक्मरानों को काबू कर कैद कर लिया, बाजीराव के सिपेसालार तात्या टोपे ने कानपुर की सरजमीं पर बर्तानिया हुकूमत की सेना कानपुर के दूसरे मोर्चे पर को काबू किया जिक्र लाजिमी है की मेरी सरजमीं पर पली बड़ी बेटी मनु ने झाँसी को जीता और ग्वालियर को बर्तानिया हुकूमत से मुक्त करते हुए शहीद हुई। आज भी नानाराव पार्क में उस बूढ़े बरगद के अवशेष उन १५७ शहीदों की कहानी बयां करते है जिनको बदले की आग में बर्तानिया हुक्मरान ने भस्म कर दिया था। कई दिनों तक चली ये लड़ाई एक सबक दे गयी पूरे देश की आवाम को बर्तानिया सरकार से लड़ने का।
Boodha Bargad Kanpur

 









स्वतंत्रता संग्राम
भारत के विशातम विद्यालय - DAV कॉलेज में चंद्रशेखर आज़ाद ने उस Hindustan Socialist Republican Association (HSRA) संगठन की कमान सम्भाली और मुख्य कार्यवाहक बने। जिसकी स्थापना रामप्रसाद विस्मिल, रोशन ठाकुर, और राजेंद्र लाहिरी जी ने किया थी। आज़ाद ने भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, शिव वर्मा, असफाक उल्ला खान, जैसे क्रांतिकारियों को दीक्षा दी। और मेरी सरजमीं को अपने कार्यक्षेत्र का गढ़ बना कर रखा । जाहिर है की आज़ाद ने अपने क्रांति दल को मेरी सरजमीं से की नियंत्रित किया? आज भी मेरी आखें गर्व से नाम हो जाती है जब मुझे १९ वर्ष के बालक शालिग्राम शुक्ल की याद आती है।  क्रांति दल को बचाने के लिए शालिग्राम ने बर्तानिया सरकार के सिपाहियों से मुकबला किया और ३ सिपाहियों को ढेर कर शहीद हो गया। उसकी कुर्बानी ने भगत, आज़ाद और दल के अन्य सदस्यों को सुरक्षित बचा लिया। 
गणेश शंकर विध्यार्थी ने देश में पत्रकारिता और मानवता को नए आयाम दिए। देश के इस महान सपूत ने अल्पायु में ही कानपुर में भड़के दंगों को शांत करते हुए अपनी जान दे दी। गणेश जी बलिदान पर गाँधी जी ने कहा था "मुझे आज गणेश जी से ईर्ष्या हो रही है, काश मुझे उनके तरीके से बलिदान देने का मौका मिलता"
 

औधोगिक शहर के रूप में पहचान 
मैंने वो दौर भी देखा है जब बर्तानिया हुकूमत ने देश पर कहर बरपाया और सदियों तक देश में राज्य किया। पर बर्तानिया सरकार के कुछ नुमयिन्दों ने मेरे महत्व को पहचाना।  मुझे औधोगिक शहर का दर्ज दिया। "ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन" की स्थापना उद्घोष था एक महत्वपूर्ण शुरुआत का ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन ने मुझे वो जमाना भी दिखाया ज देश का बेहतरीन ऊनी कपडा मेरे जमीन पर बनता था।  "लाल इमली" का  नाम आज भी प्रासंगिक है।
BIC लाल -इमली का द्रश्य -साभार wikipedia कानपुर 
१९१४ में केंद्रीय वस्त्र सस्थान की स्थापना के साथ मैंने कदम आगे बडाये। मैं देश का सबसे बड़ा जूट उत्पादक, कपडा उत्पादक शहर बना।देश की सेना द्वारा पहने जाने वाले जूते- टेफ्को  मेरी ही सरजमीं पर बनते थे, देश की सेना के लिए वस्त्र, हथियार - गन फैक्ट्री देश में मेरा सामरिक महत्व स्पस्ट था।  देश सबसे पुराने खेल मैदानों में से एक "ग्रीन पार्क स्टेडियम" स्थापित हुआ । शिक्षा के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान रहा मेरा एच बी टी १९२५ में स्थापित हुआ जो देश चौथा सबसे पुराना तकनीकी संस्थान, दलहन संस्थान, रास्ट्रीय शर्करा संस्थान, चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय , गणेश शंकर विद्यार्थी मेडिकल संस्थान, भारतीय तकनीकी संस्थान -१९५९ , नेशनल लेदर संस्थान , स्थापित हुआ  ये सब दर्शाते है की मैं कितना महत्त्वपूर्ण देश की चुनिदा व्यापारिक जगह था।
जुग्गीलाल कमलापति समूह (JK group ) ने मेरी सरजमीं पर ही अपना कारोबार शुरू किया। LML का कारोबार विश्वाविखात है । कोठारी समूह के पानपराग,rotomac जैसे बड़े नाम मेरी जमीन पर पनपे। घडी साबुन, रेड-चीफ, red-tape(Mirza International) का नाम आज भी कायम है। उत्तर प्रदेश में मल्टीप्लेक्स कल्चर लाने का श्रेया मुझे ही जाता है।  और आज भी मैं उत्तर प्रदेश को सबसे ज्यादा राजस्व देता हूँ।  छोटी और बड़े कई समूह आज भी कार्यरत है।
 
पत्रकारिता का उद्गम:
मेरे सुपुत्र गणेश शंकर विद्यार्थी, प्रताप नारायण मिश्र, महावीर प्रसाद दुवेदी ने पत्रकारिता को नए आयाम दिए.आज भी मेरी जमीन पर देश में सबसे सस्ता अखबार बिकता है।"जागरण समूह" का उद्गम मेरी ही सरजमीं  पर हुआ।  लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ की बात की भी हमारे हुक्मरान सुन नहीं पाए मुझे रफ्ता -रफ्ता हाशिये पर धकेल दिया ????
Jagan Samooh ke Hindi daily ka ek snapshot.
रफ्ता -२ हाशिये पर हाशिये पर आ गया 
आज भी मैं एक औधोगिक  शहर हूँ पर देश के बड़े संस्थान मेरी सरजमीं पर है। किन्तु जिस दर से मैं बाद रहा था वो थम सी गयी। शहर में विधुत का उत्पादन कर हूँ मैं  और वो वितरित होती है लखनऊ में , कन्नौज में , संभल में ?????? मेरी सड़क मिटटी हो गयी पर किसी ने पुनरोद्धार का नाम नहीं लिया ???? कई उधोग और उधोगपति चले गए मैं देखता रहा।  गंगा गन्दी हो गयी और मैं देखता रहा।  रोज सड़क  पर लगते जाम देख कर मैं विचलित हो जाता हूँ  और सोचता हूँ क्या मैं फिर से अपने पुराना कानपूर नहीं बन सकता क्या मैं फिर से औधोगिक नगरी नहीं बन सकता ?????????????????

सलमान खुर्शीद साहब बोल रहे बड़े -बड़े बोल....

नरेन्द्र मोदी जी के भाषण को "छोटा मुँह बड़ी बात" बताने वालें सलमान खुर्सीद साहब बहुत सारी बातों को नज़रंदाज़ कर गए


मोदी  जी क्या है?
- ३ बार गुजरात की जनता द्वारा चुने गए मुखमंत्री
- सामने से नेतृत्व करने वाले आत्म विस्वास से भरे, निर्णय लेने की अदुतीय क्षमता, सीखने को तत्पर
- विकास के नए आयाम हासिल करने के लिए गुजरात विश्वविख्यात है.

एक राजनीतिज्ञ के तौर पर मनमोहन जी क्या है ?
- कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीते
- एक बार दक्षिणी दिल्ली से लदे और हारे, राज्यसभा से  है
- २G में राजा को बचाने की कोशिश जग जाहिर है

सलमान खुर्सीद क्या है??
- फर्रुखाबाद से चुनाव ले दे कर जीते , हारे लगभग हरबार जीते १ बार
- बीते विधान सभा के चुनाव  में फर्रुखाबाद से ही पत्नी की जमानत जब्त हो गयी.
- गैर सरकारी संस्था से जुड़े भ्रस्टाचार के आरोप जाहिर है.

अब बताये छोटे मुँह बड़ी बात कौन कर रहा है? 
-६७ सालों देश को विकासशील है और आगे भी कोई सम्भावना नहीं दिखती।
- देश की नौकरशाही नख से सिख तक भ्रस्ताचार में डूबी हुई है. ऐसा देश के आदरणीय राष्ट्रपति भी मानते है.
ऐसे समय में देश को जागरूक करने की कोशिश करना क्या खलनायक होना है?