अहसास मर चुके है और रूह सो गयी है

किसी अनजान शायर की पेशकश है बजह फरमायें  ..... 

अहसास मर चुके है और रूह सो गयी है 
अफ़सोस आज दुनिया पत्थर की हो गयी है 

गाड़ी में कशमकश है सीटों के वास्ते अब 
वो पहले आप वाली तहजीब खो गयी है 

उसने नहीं उगाया अपनी तरफ से इसको 
बेवा के घर में मेहँदी बारिश से हो गयी है 

दुनिया के दौड़ में मैं फिर रह गया हूँ पीछे 
फिर मुफलिसी कदम की जंजीर हो गयी है 

 --------गुमनाम--------------

लघुकथा: राजनीति एक छलावा

राजनीति से भ्रष्टाचार को उखाड़ फेकेंगे, क्या आप साथ देंगे? हम मिलकर लड़ेंगे अंतिम साँस तक लड़ेंगे, क्या आप साथ देंगे? नेता जी ऊर्जा से भरा भाषण देकर लाखों की भीड़ में ऊर्जा भर दी थी। हाथ उठा कर लोग जवाब दे रहे थे। हम साथ देंगे हाँ हम साथ देंगे।

अगले दिन पार्टी के कार्यालय में टिकटार्थियों की भीड़ सजी थी। कुछ नेता जी की विश्वस्त लोगो के साथ आये थे। कुछ कुछ अपने काम और समाज सेवा की दम पर। अपने क्षेत्र के नामी गिरामी रामसेवक मास्टर का नम्बर आया, बातचीत हुयी, राम सेवक ने अपने सामाजिक कार्यो कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक जागरूकता फैलाने के कई कार्यक्रमो के बारे बता क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा बतायी। अच्छा ठीक है आप निष्ठावान कार्यकर्ता है, अपना टिकट पक्का समझिये।

देखिये कल पार्टी फण्ड में 3 करोड़ जमा करा दीजिये।..... रामसेवक के पाँव के नीचे की जमीन खिसक गयी। साहब, हमारे काम ही हमारी पूँजी है, पैसा तो हमरे पास है ही नहीं!! हम तो सोचते थे हमारा नाम और काम देखकर पार्टी अपने खर्चे पर चुनाव लड़ाएगी, आपकी भ्रष्टाचार विरोधी बातों से प्रभावित होकर ही तो मैं पार्टी में आया। .... वो ठीक है रामसेवक जी पर देखिये पार्टी बजी तो चलानी है ये कार्यकर्ता जो नारे लगाते है इनका चाय पानी कहाँ दे आयेगा, कल तक जमा करा दीजिये, नहीं तो दूसरा प्रत्याशी घोषित कर दिया जायेगा....
रामसेवक समाज सेवा का, ईमान का बोझ काँधे ओर लादे चल पड़े।

पर भौकाली पेल रहे ....

दफ्तर दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है
अपने शहर का छोड़ बसेरा
बंजारों से घूम रहे है ।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

पेट है पापी तन है याची
मजदूरी है भारत व्यापी
सुबह सवेरे, देर शाम तक
नथे बैल से झेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

भागदौड़ और मारामारी
दफ्तर में बन गये दरबारी
धर्म लुटा ईमान लुटा है
पर भौकाली पेल रहे है।

दफ्तर-दफ्तर खेल रहे है
जीवन गड्डी झेल रहे है।

@विक्रम


तकनीकि के जंगल में डार्बिन जिन्दाबाद।

जैसे -जैसे तकनीकि तार से बेतार हुयी, रफ्ता-रफ्ता हम एक विधुतचुम्बकीय तरंगो की सभ्तया बन गये है। सूरज के प्रकाश पुँज के अलावा चारों तरफ हवाओं और फिजाओं में विधुत तरंगे लहराती फिरती है। जिस तरह मकड़ी अपने रहने चलने और जीने के लिये अपना जाल बनाती है। उसी तर्जोअंदाज़ में रोज-रोज पैदा होती इंसानी जरूरतों का कारोबार मानवीय सभ्यता को बेतार/विधुतचुम्बकीय तरंग सभ्तया बनाता है। 

तकनीकि के घने जंगल में रोज नयी करिश्माई भाषाएँ विधियाँ जन्म लेती है।  किन्तु डार्बिन का सिद्धान्त स्वतः ही एक तकनीकि की चरित्र हत्या दूसरी तकनीकि से करा देता है। ये दौर अनवरत चलता जाता है। आज के दौर में 2G डाटा को एक बार देखे और सोचे लगेगा मानों कितना बोरिंग टाइप का आइटम सांग था। आज के 4G की चमक दमक के सामने कितना तुच्छ टाइप लगता है। 

कैथोड रेज़ टीवी की ट्यूबनुमा लम्बी पाइप लाइन भला कभी दीवार में चिपक पाती? अब देखिये ना दीवार चिपकू टीवी हाहाकारी छायाचित्रों के साथ कितनी आसानी से उपलब्ध है। जब जरा सोचिये बाहुबली क्या वाकई लग पाता कैथोड रेज़ टीवी में, कट्टपा की भारी आवाज से ही टीवी की पिक्चर ट्यूब ही फट लेती। 

कुल मिलाकर डार्बिन के सिद्धांत का भूत एक तकनीकि को खाता दूसरे को उगाता है और हमे अस्थायी तौर पर कमोवेश आधुनिक होने का भरम देता है। कल वो हवा होगा। 

कहानियों का बहीखाता - "कितने रंग जिन्दगी के"

"कितने रंग जिन्दगी के" तेज प्रताप नारयण जी का पहला कहानी संग्रह है। 'तेज प्रताप नारायण जी' का कविता संग्रह 'अपने अपने एवरेस्ट' वर्ष 2015 के  'मैथिली शरण गुप्त पुरस्कार (भारत सरकार प्रदत्त)' से पुरस्कृत है। 

इसके पहले उनके चार कविता संग्रह चुके है। उनकी किताब के बही खाते में कुल जमा 10 कहानियो की पूँजी है। जीवन के विविध आयामों को अपने आगोश में लेती कहानियों का संग्रह। एक तरफ कहानियों में किसान खूबीराम के घर का छप्पर है, कमोवेश वैसा ही परिवेश जो प्रेमचन्द जी की कहानियों मिलता है, जैसा की फणीश्वरनाथ रेणु  के लेखन में झलकता है। दूसरी तरफ शहरी जिन्दगी की आपाधापी है, भीड़ में अकेलेपन का जख्म है, सदैव आगे बढ़ने जाने का श्राप है। समाज की मान्यताओं और परम्पराओं को चुनौती देती नारी है। कुल मिलाकर कर कहानियो का बही खाता जिन्दगी की जमा पूँजी का जवानी से प्रौढ़ावस्था तक पूरा हिसाब करता है। किताब का प्रकाशक मानो वो मुनीम है जो रंग के नोट को बटोर कर नयी तिजोरी भर लाया हो। 

तेज प्रताप जी की लेखन शैली और भाषा अनुशासन की लकीर इर्द गिर्द ही घूमती है। किन्तु रुचिकर है। भाषा में प्रयोगधर्मिता, रोज नये-नये पैदा होते शब्दों का चुनाव कम है।  किन्तु साहित्य को अराजक होने से बचाये रखने के लिये ये जरूरी भी और लेखन शैली का वजन भी। उनके सफल प्रयास  बधाईयाँ इस उम्मीद के साथ की उनकी कलम अनवरत चलती रहे, विसंगतियों और बुराईयों पर चोट करती रहे। 

@विक्रम 

11वी सदी का राष्ट्रवाद

इतिहास का लेखा जोखा जो अखबारों और सोशल मीडिया में चलता है, उसमें ये अक्सर पढ़ने में आता है कि 11वी सदी भारत में बाहरी आक्रमणकारियों के प्रवेश की सदी थी। चर्चा उसी पर है। बाहरी कौन और कैसे? राज्यवाद बनाम राष्ट्रवाद

इतिहास ये भी पुख्ता करता है 11वी सदी वीरो की सदी थी। दिल्ली के शासक पृथ्वीराज, महोबा के पराक्रमी सामन्त बन्धु आल्हा-ऊदल, मलखान, कन्नौज के जयचन्द और उनके पुत्र लाखन इत्यादि इत्यादि 11 वी सदी में जन्मे।

तत्कालीन संस्कृति  बेवजह लड़ाइयों के तमाम खाके खींचती है। ये भी कहती है लड़ाई स्वाभाविक कम पैदा की हुयी ज्यादा होती थी।महोबा के वीर आल्हा-ऊदल,मलखान ने 52 लड़ाईयाँ लड़ी, आधी से अधिक लड़ाईयाँ तत्कालीन विवाह पद्धतियों के कारण हुयी, जहाँ टीके से लेकर गौने तक खून बहता था। बाकी की अधिकतर लड़ाईयाँ अपने-अपने अहम् को तुष्ट करने की लड़ाईयाँ थी। जिन्हें इतिहासकार साम्राज्य विस्तार की लड़ाई भी कहते है।

11वी सदी के उत्तरार्द्ध में दिल्ली और महोबा के बीच जो युद्ध हुये उसने विदेशी आक्रमण कारियों के लिये द्वार खोले। इन युद्धों में मुख्यतया भुजरियों की लड़ाई जिसमें आल्हा-ऊदल ने पृथ्वीराज को हराकर महोबा को बचाया और बैरागढ़ की निर्णायक लड़ाई जहाँ ऊदल मारे गये और पृथ्वीराज की सेना लगभग तबाह हो गयी।

ये जाहिर है की राजा अपनी रक्षा, अपने अहम् की रक्षा, अपने राज्य विस्तार जी लडाईयां लड़ते रहे, वहाँ राष्ट्रवाद नहीं दूर तक नहीं राज्यवाद, अहमवाद था। राष्ट्रवाद एक राज्य की सीमा से दूसरे राज्य की सीमा पर जाकर दम तोड़ता हुआ दीखता है। हर राज्य की सीमा खत्म होते ही जो भी दूसरा राज्य था वो बाहरी था। कुल मिलाकर 11वी सदी में राष्ट्रवाद था ही नहीं, केवल राज्यवाद था, घना राज्यवाद था।रियासते थी और सियासतें थी।

चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो...

हाँसिये पर आ गया इंसान देखो
चुपके-चुपके रो रहा रसखान देखो

चर्चा में है प्रेम कृष्ण और मीरा का
दे रहे है लोग कैसे-कैसे नाम देखो

कबिरा मिट गया प्रेम का संदेश देते
नफरतों का हो रहा गुणगान देखो

दुनिया भर का है उपद्रव जिंदगी में
है शान्त कितना लेटा,शमसान देखो 

है प्रेम-कबूतर थाने में...

बरपा कहर ज़माने में
है प्रेम-कबूतर थाने में

लईका बिटिया इश्क़ लड़ाये
लगे माई बाप लगा कमाने में

इश्क का बाजार लुट गया
था अरसा लगा पटाने में

बन मुर्गा मशहूर हो गया
शहर भरे दीवानों में

बैठ पार्क, फरहाद बना
वही लगा रिरियाने में

प्रेम पपीहा मुँह बायें था
छलकी मदिरा पैमाने से

यादव जी सस्पेंड हो गये
बस अपनी बात बताने में

भैया भाभी दोवु नप गये
मुर्ग मुसल्लम खाने में